मुक्त, स्वच्छन्द परिहास व मौज मस्ती की त्रिवेणी ‘होली’

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जितने अधिक पर्वों-त्यौहारों का प्रचलन हमारे भारतवर्ष देश में है उतना सम्भवतः संसार के किसी अन्य देश में देखने का नहीं मिलेगा। विगत दो माह जनवरी व फरवरी में मानों पर्वों की बाढ़ सी आई प्रतीत होती है। होली वसन्त-ऋतु का यौवनकाल है। गर्मी के आगमन की सूचक है। वनश्री के साथ-साथ खेतों की श्री एवं हमारे तन-मन की श्री भी फाल्गुन के ढलते-ढलते सम्पूर्ण आभा से खिल उठती है।

रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने फाल्गुन के सूर्य की उष्मा को ‘प्रियालिंगन-मधु-माधुर्य-स्पर्श‘ बताते हुए कहा है-‘सहस्र-सहस्र मधु-मादक स्पर्शों से आलिंगित कर रही इन किरणों ने फाल्गुन के इस वासन्ती प्रात को सुगन्धित स्वर्ण में आल्हादित कर दिया है।‘ वसन्त पंचमी के ठीक चालीस दिन पश्चात् घ्मशः फाल्गुन पूर्णिमा और वसन्त ऋतु के प्रथम मास चैत्र की प्रतिपदा को बड़े हर्षोल्लास के साथ देश के सभी भागों में मनाया जाता है। भारतीय-पर्व परम्परा में होली आनन्दोल्लास का सर्वश्रेष्ठ रसोत्सव है। मुक्त, स्वच्छन्द परिहास का त्योहार है। नाचने-गाने, हंसी-ठिठोली और मौज-मस्ती की त्रिवेणी है। सुप्त मन की कन्दराओं में पड़े ईष्र्या-द्वेष, राग-विराग जैसे निम्न विचारों को निकाल फेंकने का सुन्दर अवसर है।

फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को प्राचीन आर्यजन नये गेहूघ् और जौ की बालियों के हवन से अगिनहोत्र का प्रारम्भ करते थे। कर्मकाण्ड परम्परा में इसे ‘यवाग्रयण-यज्ञ‘ का नाम दिया गया है। लगता है, नवान्न की बालियों को प्रज्ज्वलित अग्नि में भूनने की सतयुग से आ रही परम्परा के कारण इस त्यौहार का नामकरण ‘होली‘ हो गया। अनाज की बालियाघ् संस्कृत में ‘होलक‘ कहलाती हैं। देश के वृहघर भाग में आज भी चने की सिकी-भुनी बालियों को ‘होला‘कहते हैं। वसन्त में सूर्य दक्षिणायन से उघरायण में आ जाता है। फल-फूलों की नई सृष्टि के साथ ऋतु भी ‘अमृत प्राणा‘ हो जाती है। इसलिए होली के पर्व को ‘मन्वन्तरारम्भ‘ भी कहा गया है। ‘दशकुमार चरित‘ में होली का उल्लेख ‘मदनोत्सव‘ के नाम से किया गया है। वैसे भी वसन्त काम का सहचर है। इसलिए कामदेव के विशेष पूजन का विधान है।

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आमोद-प्रमोद और उल्लास के अवसर पर मन की अमराई में मंजरित इस सुख-सौरभ का अपना स्थान है। किन्तु यह मदनोत्सव कालिदास, श्री हर्ष और वसणभट्ठ की पोथियों की वायु रह गया है। अब बस मादन रह गया है, न मदन, न उत्सव ! वर्तमान युग में काम को ‘सेक्स‘ बनाकर इतना बड़ा अवमूल्यन सृष्टि-तत्व का हुआ है कि काम के देवत्व की बात करते डर लगता है। सच्चाई तो यह है कि काम व्यापनशील विष्णु और शोभा-सौन्दर्य की अधिष्ठात्री लक्ष्मी के पुत्र हैं। इसका तात्पर्य है कि प्रत्येक व्यक्ति के भीतर दो चेतनाएं होती हैं-एक आत्म-विस्तार की और दूसरी अपनी ओर खींचने की। दोनों का जब सामंजस्य होता है तो काम जन्म लेता है।

एक निराकार उत्सुकता को जन्म देती है। वह उत्सुकता यदि बिना किसी तप के आकार लेती है तो अभिशप्त होती है और अपने को छार करके आकार ग्रहण करे तो भिन्न होती है। दूसरी ओर काम इतना हेय था कि शंकर उसे तीसरे नेत्र से भस्म करके भी अनंग रूप से जीवित क्यों करते ? अन्तर इतना ही है कि आत्मा के मधुरतम और प्रियतम भाव को अनुभव किये बगैर होली के अवसर पर प्रकट होने वाले अनुराग को, जो मानव हृदय से सहस्रों धाराओं में फूट पड़ता है, अनुभव नहीं किया जा सकता। होेली के साथ अनेक दंत कथाओं का सम्बन्ध जुड़ा है। होली की रात को आग क्यों जलाई जाती है ? इसके लिए कुछ पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं।

पहली कथा है प्रह्लाद और होलिका की। प्रह्लाद के पिता हिरण्यकशिपु नास्तिक थे और वे नहीं चाहते थे कि उनके राज्य में कोई ईश्वर की पूजा करे, किन्तु स्वयं उनका पुत्र ईश्वर-भक्त था। अनेक कष्ट दिये जाने के बाद भी जब उसने ईश्वर-भक्ति नहीं छोड़ी, तब उसके पिता ने अपनी बहिन होलिका को प्रह्लाद के साथ आग में बैठने को कहा। होलिका को यह वरदान प्राप्त था कि वह अग्नि में नहीं जलेगी। अग्नि के एक ढेर में होलिका प्रह्लाद को लेकर बैठी। परिणाम उल्टा निकला। होलिका जल गयी और प्रह्लाद सुरक्षित बाहर आ गया।

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दूसरी पौराणिक कथा के अनुसार ठुण्डा नामक राक्षसी बच्चों को पीड़ा पहुचाती और उनकी मृत्यु का कारण बनती थी। एक बार वह राक्षसी पकड़ी गयी। लोगों ने क्रोध में उसे जीवित जला दिया। उसी घटना की स्मृति में होली के दिन आग जलाई जाती है। आज होली की अग्नि में बालकों की अलाय-बलाय का समर्पण कर उनकी सुख-समृद्धि की सूचक खुशियाघ् मनाई जाती हैं। इस कथा का अभिप्राय यही लगता है कि जड़ता का त्रास ही होलिका राक्षसी है और इस त्रास को बाल-सुलभ मुक्त उल्लास, समवेत क्रीडा और निर्बन्ध भाषा से ही प्राप्त किया जा सकता है। शिव की तपस्या को भंग करने के अपराध में शिव ने काम को अपने तृतीय नेत्र से भस्म कर दिया था। होली की अग्नि उसी कामाग्नि का रूप है।

कामुक भावनाओं का दहन कर आत्मा को उन्नत करो, यही घोषणा होली की पवित्र अग्नि करती है। भारत कृषि-प्रधान देश है। होली के अवसर पर पकी हुई फसल काटी जाती है। खेत की लक्ष्मी जब घर के आंगन में आती है तो किसान अपने सुनहरे सपने को साकार पाता है। वह आत्म-विभोर हो नाचता-गाता है। अग्नि देवता को नवान्न की आहुति देता है। बीसवीं शताब्दी में मानव को प्यार का संदेश देने वाले चैतन्य महाप्रभु इस दिन अवतीर्ण हुए थे। साहित्य, संस्कृति और राजनीति के सम्पूर्ण समग्र एकांत-तत्व को निश्चित दायित्व के साथ संस्कारित करने वाली छायावादी कवियित्री महादेवी वर्मा होली के दिन जन्मी थी।

फाल्गुन पूर्णिमा होलिका-दहन का दिन है। लोग घरों से लकड़ियां इकट्ठी करते हैं। अपने-अपने मुहल्ले में अलग-अलग होली जलाते हैं। होली जलाने से पूर्व स्त्रियाघ् लकडी के ढेर को उपलों का हार पहनाती हैं, उसकी पूजा करती हैं और रात्रि को उसमें आग लगा दी जाती है। लोग होली के चारों ओर खूब नाचते और गाते हैं तथा होली की आग में नई फसल के अनाज की बाल को भूनकर खाते हैं। होली से अगला दिन धुलेंडी का है। फाल्गुन की पूर्णिमा के चन्द्रमा की ज्योत्सना, वसंत की मुस्कुराहट, परागी फगुनाहट, फगुहराओं की मौज-मस्ती, हंसी-ठिठौली, मौसम की दुंदुभी बजाती धुलेंडी आती है।

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रंगभरी होली जीवन की रंगीनी प्रकट करती है। मुघ्ह पर अबीर-गुलाल, चन्दन या रंग लगाते हुए गले मिलने का जो मजा आता है, मुघ्ह को काला-पीला रंगने में जो उल्लास होता है, रंग की भरी बाल्टी एक-दूसरे पर फेंकने में जो उमंग होती है, निशान साधकर पानी-भर गुब्बारा मारने में जो शरारत की जाती है, वे सब जीवन की सजीवता प्रकट करते हैं। चहुघ् और अबीर-गुलाल, रंग भरी पिचकारी और गुब्बारों का समां बंध जाता है। छोटे-बड़े, नर-नारी सभी होली के रंग में रंगे होते हैं। डफ-ढोल, मृदंग के साथ नाचती-गाती, हास्य-रस की फववारे छोड़ती परस्पर गले मिलती, वीर बैन उच्चारती, आवाजें कसती, छेड़छाड़ करती टोलिया दोपहर तक होली के प्रेमानन्द में पगी होती हैं।

ब्रज और मालवा की होली बेजोड़ है। यहा होली खेलने, देखने के साथ सहने की होती है। नारी-लट्ठ के सामने बड़े-बड़े वीर तिनके तोड़ जाते हैं। हरियाणा की ‘कोलड़ा मार‘ होली इसी लट्ठ होली का मृदु रूप है। लगभग दोपहर तक धुलेण्डी का प्रेमानन्द समाप्त हो जाता है। शाम को होली मेले लगते हैं। हास्य-व्यंग्य युक्त मूर्ख सम्मेलन की सवारियाघ् आयोजित होती हैं और हास्य उपाधिया देश के गणमान्य लेखकों व राजनीतिज्ञों को बंटती हैं। आज होली-उत्सव में शील और सौहार्द्र-संस्कारों की विस्मृति से मानव आचरण में चिंतनीय विकृतियों का समावेश हो गया है।

गंदे और अमिट रासायनिक लेपों, गाली-गलौज, अश्लील गान और आवाज-कसी एवं छेड़छाड़ ने होली की धवल-फाल्गुनी पर ग्रहण की गर्हित छाया छोड़ दी है, जिसने पर्व की पवित्रता और सत् संदेश की अनुभूति को तिरोहित कर दिया है। आज होली परम्परा-निर्वाह की विवशता का प्रदर्शन-मात्र रह गया है। कहीं ज्वार तो दीखता नहीं। शालीनता की नकाब चढ़ी रहती है, उल्लास दुबका रहता है। नशे से उल्लास की जागृति का प्रयास किया जाता है। वे भूल जाते हैं कि नशा बाहर के किसी मादक द्रव्य से नहीं होता, वह होता है अन्तःकरण के मादन भाव से। आज का मानव अर्थ-चक्र में व्यस्त है, त्रस्त है। भागते समय को वह समय की कमी के कारण पकड़ नहीं पाता। इसलिए आनन्द, हर्ष, उल्लास, विनोद उसके लिए दूज के चन्द्रमा बन गये हैं। इस दम घोटू वातावरण में होली-पर्व चुनौती है। इस चनौती को स्वीकार करें। मंगलमय रूप में हास्य, व्यंग्य विनोद का अभिषेक करें।

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