संस्कृति

संस्कृति क्या है? इसके लक्ष्य क्या है?

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भारतीय दर्शन के अनुसार संस्कृति के पांच अवयव हैं, वे हैं धर्म, दर्शन, इतिहास, वर्ण तथा रीति-रिवाज। ‘संस्कृति’ शब्द का यह अर्थ लगाते हुए यदि वर्तमान पश्चिमी संस्कृति भारतीय दर्शन के अनुसार संस्कृति के पांच अवयव हैं, वे हैं धर्म, दर्शन, इतिहास, वर्ण तथा रीति-रिवाज। ‘संस्कृति’ शब्द का यह अर्थ लगाते हुए यदि वर्तमान पश्चिमी संस्कृति का परीक्षण किया जाए तो विदित होगा कि उसमें इतनी त्राुटियां हैं कि उसे संस्कृति कहने में भी संदेह होगा। ‘संस्कृति’ शब्द का लक्ष्यार्थ धर्म, विद्या आदि की उन्नति हैऋ परन्तु वाक्यार्थ संस्कृत-शुद्ध करने की क्रिया है।

प्राकृत वस्तु जिस रूप में साधरणता से प्राप्य है, उसे संस्कृत नहीं कहा जा सकता। किसी स्थूल धतु से सूक्ष्म शुद्ध तत्त्व निकालने की क्रिया का नाम संस्कृति है। एक हरी मिट्टी को संस्कृत करने से भास्वत् ताम्र मिल जाता है। वैसे ही मनुष्य जाति के स्थूल धतु से संस्कृति द्वारा उत्तम मानसिक एवं सामाजिक गुण प्रादुर्भाव होते हैं। मनुष्य जाति का इतिहास समझने के लिए भारतखण्ड ही एक देश है, क्योंकि भारतीय संस्कृति को छोड़कर कोई भी ऐसी दूसरी संस्कृति नहीं है, जो मनुष्य की उत्पत्ति के समय से आज तक अखण्ड धरा से चलती आई हो। सब धर्मों का आधर सनातन धर्म, भारतीय धर्म ही है। धर्मानुसार समाज के स्वरूप की रक्षा केवल भारत में हुई है। इससे स्पष्ट होता है कि भारतीय संस्कृति में ऐसे गुण होना अनिवार्य हंै, जिनसे संस्कृति की रक्षा होती है।

आधुनिक पश्चिमी देशों में लोगों को एक विचित्रा अभिमान हो गया। वे कहने लगे कि ‘हम लोगों ने वैज्ञानिक आविष्कारों से एक नया युग पैदा कर दिया है।’ परन्तु इन नए आविष्कारों का पफल थोड़ा सा भी अन्वेषण करने से स्पष्ट होता है कि मनुष्य इस नए विज्ञान से अद्भुत यंत्रों के मालिक न रहकर निर्दयी, निर्विचार भयंकर यंत्रा रूप राक्षस के गुलाम बन गए हैं। किसी को पता नहीं कि वह राक्षस मनुष्य जाति को कहां ले जा रहा है।

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लोगों को अप्रिय काम में लगाए रखने के लिए उनकी विचार शक्ति का नाश करना पड़ता है। आजकल कई देशों में एक नई चिकित्सा का प्रयोग चला है, जिसके द्वारा मनुष्य के मस्तिष्क का एक छोटा अंश निकालकर असाधरण विचार करने की शक्ति नष्ट कर दी जाती है। यदि किसी व्यक्ति को ऐसा विचार होने लगता है, जिसमें दूसरे खतरा देखते हैं, तब छोटी-सी शल्य-क्रिया से उसको अनुकूल बना लेते हैं। ऐसी सम्भावना अवश्य ही स्वतंत्राता एवं उन्नति की द्योतक नहीं है। इस नए यंत्रा राज्य में स्वतंत्राता, धर्म व विद्या आदि का सत्यानाश अनिवार्य है।

कुछ लोगों का कहना है कि ‘भारत वर्तमान उन्नति से वंचित रहा। जंगली जातियों की तरह भारतीयों ने वर्तमान उन्नति के मार्ग पर चलना नहीं सीखा। इसलिए भारतीयों को चाहिए कि अपने पुराने विचार एवं रहने-खाने के ढंग आदि को छोड़कर नवीन युग की रीति से रहने लगें।’ परंतु ऐसा कहने वाले एवं अर्वाचीन दोनों संस्कृति से अपरिचित हैं। यदि वे लोग प्राचीन एवं अर्वाचीन दोनों संस्कृतियों के गुणों की तुलना कर सकते तो कभी ऐसा विचार नहीं करते।

यह प्रश्न अनुचित न होगा कि ‘यदि प्राचीन संस्कृति वस्तुतः निर्मूल्य है तो अपने-आप मर ही जाएगी। फिर उसका मूल छिपाने, उसका प्रचार रोकने के लिए क्यों इतना प्रयत्न हो रहा है?’ इसका उत्तर यह है कि यदि किसी को भारतीय सनातन विद्या के छोटे से छोटे अंश का लेशमात्रा भी दर्शन करने का सौभाग्य मिलता तो वह कभी भी दूसरी विद्या, दूसरी संस्कृति को नहीं मानता। हर एक पुरुषार्थ, हर एक उन्नति का साध्न अन्य देशों से अत्यन्त उत्तम रूप में भारत की पवित्रा भूमि पर प्राप्य है। मानसिक प्रवृत्ति के साधनो से जीवन एक सुन्दर एवं मनोरंजक यात्रा बनता है न कि रेल, वायुयान,कार, इलेक्ट्रानिक आदि साध्नों से।

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जीवन को सफल एवं शोभायमान करने वाले उपायों का खजाना भारतवर्ष ही है। इस पुण्य देश की विद्या-मणियों को कौन गिन सकता है। मुझसे पूछा जाए कि ‘यदि यह सच है कि इतनी अनुपम वस्तुएं भारत में मिलती हैं तो नमूने के लिए कम से कम एक ऐसी वस्तु का नाम बताओ जो यहां मिलती है और अन्य देशों में नहीं।’ तब मैं एक बात बतलाऊंगा, एक ऐसे गुण से पूर्ण वस्तु का नाम लूंगा, अन्य सभी गुण जिसके अन्तर्गत हैं।

भारत ही एक ऐसा शुभ देश है, जहां सत्संग का अनुपम लाभ मिल सकता है, यह ही एक धन्य देश है, जहां साध्ु लोग रहते हैं। का परीक्षण किया जाए तो विदित होगा कि उसमें इतनी त्राुटियां हैं कि उसे संस्कृति कहने में भी संदेह होगा। ‘संस्कृति’ शब्द का लक्ष्यार्थ धर्म, विद्या आदि की उन्नति है, परन्तु वाक्यार्थ संस्कृत-शुद्ध करने की क्रिया है। प्राकृत वस्तु जिस रूप में साधरणता से प्राप्य है, उसे संस्कृत नहीं कहा जा सकता। किसी स्थूल धतु से सूक्ष्म शुद्ध तत्त्व निकालने की क्रिया का नाम संस्कृति है। एक हरी मिट्टी को संस्कृत करने से भास्वत् ताम्र मिल जाता है।

वैसे ही मनुष्य जाति के स्थूल धतु से संस्कृति द्वारा उत्तम मानसिक एवं सामाजिक गुण प्रादुर्भाव होते हैं। मनुष्य जाति का इतिहास समझने के लिए भारतखण्ड ही एक देश हैऋ क्योंकि भारतीय संस्कृति को छोड़कर कोई भी ऐसी दूसरी संस्कृति नहीं है, जो मनुष्य की उत्पत्ति के समय से आज तक अखण्ड धरा से चलती आई हो। सब धर्मों का आधर सनातन धर्म, भारतीय धर्म ही है। धर्मानुसार समाज के स्वरूप की रक्षा केवल भारत में हुई है। इससे स्पष्ट होता है कि भारतीय संस्कृति में ऐसे गुण होना अनिवार्य हंै, जिनसे संस्कृति की रक्षा होती है।

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आधुनिक पश्चिमी देशों में लोगों को एक विचित्रा अभिमान हो गया। वे कहने लगे कि ‘हम लोगों ने वैज्ञानिक आविष्कारों से एक नया युग पैदा कर दिया है।’ परन्तु इन नए आविष्कारों का पफल थोड़ा सा भी अन्वेषण करने से स्पष्ट होता है कि मनुष्य इस नए विज्ञान से अद्भुत यंत्रों के मालिक न रहकर निर्दयी, निर्विचार भयंकर यंत्रा रूप राक्षस के गुलाम बन गए हैं।

किसी को पता नहीं कि वह राक्षस मनुष्य जाति को कहां ले जा रहा है। लोगों को अप्रिय काम में लगाए रखने के लिए उनकी विचार शक्ति का नाश करना पड़ता है। आजकल कई देशों में एक नई चिकित्सा का प्रयोग चला है, जिसके द्वारा मनुष्य के मस्तिष्क का एक छोटा अंश निकालकर असाधरण विचार करने की शक्ति नष्ट कर दी जाती है। यदि किसी व्यक्ति को ऐसा विचार होने लगता है, जिसमें दूसरे खतरा देखते हैं, तब छोटी-सी शल्य-क्रिया से उसको अनुकूल बना लेते हैं। ऐसी सम्भावना अवश्य ही स्वतंत्राता एवं उन्नति की द्योतक नहीं है। इस नए यंत्रा राज्य में स्वतंत्राता, ध्र्म व विद्या आदि का सत्यानाश अनिवार्य है।

कुछ लोगों का कहना है कि ‘भारत वर्तमान उन्नति से वंचित रहा। जंगली जातियों की तरह भारतीयों ने वर्तमान उन्नति के मार्ग पर चलना नहीं सीखा। इसलिए भारतीयों को चाहिए कि अपने पुराने विचार एवं रहने-खाने के ढंग आदि को छोड़कर नवीन युग की रीति से रहने लगें।’ परंतु ऐसा कहने वाले एवं अर्वाचीन दोनों संस्कृति से अपरिचित हैं। यदि वे लोग प्राचीन एवं अर्वाचीन दोनों संस्कृतियों के गुणों की तुलना कर सकते तो कभी ऐसा विचार नहीं करते। यह प्रश्न अनुचित न होगा कि ‘यदि प्राचीन संस्कृति वस्तुतः निर्मूल्य है तो अपने-आप मर ही जाएगी।

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फिर उसका मूल छिपाने, उसका प्रचार रोकने के लिए क्यों इतना प्रयत्न हो रहा है?’ इसका उत्तर यह है कि यदि किसी को भारतीय सनातन विद्या के छोटे से छोटे अंश का लेशमात्रा भी दर्शन करने का सौभाग्य मिलता तो वह कभी भी दूसरी विद्या, दूसरी संस्कृति को नहीं मानता। हर एक पुरुषार्थ, हर एक उन्नति का साध्न अन्य देशों से अत्यन्त उत्तम रूप में भारत की पवित्रा भूमि पर प्राप्य है।

मानसिक प्रवृत्ति के साधनो से जीवन एक सुन्दर एवं मनोरंजक यात्रा बनता है न कि रेल, वायुयान,कार, इलेक्ट्रानिक आदि साध्नों से। जीवन को सपफल एवं शोभायमान करने वाले उपायों का खजाना भारतवर्ष ही है। इस पुण्य देश की विद्या-मणियों को कौन गिन सकता है। मुझसे पूछा जाए कि ‘यदि यह सच है कि इतनी अनुपम वस्तुएं भारत में मिलती हैं तो नमूने के लिए कम से कम एक ऐसी वस्तु का नाम बताओ जो यहां मिलती है और अन्य देशों में नहीं।’ तब मैं एक बात बतलाऊंगा, एक ऐसे गुण से पूर्ण वस्तु का नाम लूंगा, अन्य सभी गुण जिसके अन्तर्गत हैं। भारत ही एक ऐसा शुभ देश है, जहां सत्संग का अनुपम लाभ मिल सकता है, यह ही एक धन्य देश है, जहां साध्ु लोग रहते हैं।

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