विडंग के आयुर्वेद में फायदे, क्या है इसके औषधीय गुण

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संस्कृत में विडंग कहलाने वाले पौधे को हिन्दी में बायबिडंग और लैटिन भाषा में इम्बेलिया रिब्स के नाम से जाना जाता है। भारत के पर्वतीय आँचल में यह पाया जाता है। आयुर्वेद में इसका फल बड़ा उपयोगी माना गया है। यह बात-कफ के साथ-साथ उदर शूल, अग्नि मांद्य, रक्तविकार पाण्डु, मेदोरोग के उपचार में तो काम आता ही है किन्तु इसकी मुख्य विशिष्टता कृमि नाशक है।

वस्तुतः आयुर्वेद को अथर्ववेद 5/3/13-13 में कृमियों का वर्णन विशेष रूप से मिलता है। इसके अतिरिक्त गरुड़ पुराण और सूर्य पुराण में भी उल्लेख है। आयुर्वेद के विशेषज्ञ महर्षि चरक के मतानुसार यह कृमि दो प्रकार के होते है। एक सहज और दूसरे वैकारिक। शरीर के जन्म से ही सहज कृमि उत्पन्न होते है। यह व्यक्ति के स्वास्थ्य का अनुसरण करते है और उनके जीवन की रीति-नीति कायिक संरचना के संचालन से मेल खाती है लेकिन वैकारिक कृमि शरीर में कई तरह के रोग पैदा कर देते है इसलिए उन्हें रोगाणु भी कहा जाता है। विकासग्रसित कृमियों को भी दो वर्गो में विभक्त किया गया है। एक को वाह्य और दूसरे को अभ्यन्तर के नाम से जाना जाता है।

बाहर के कृमियों के भी दो रूप होते है। जिन्हें यूका और लीक्षा कहा जाता है। भीतर के कृमियों को भी 18 प्रजातियाँ है। जिनमें 7 कफज, 5 पुरीषज और रक्तज की संख्या मंे रहते है। कफज और पुरीष को आंत्राज कृमि भी कहा जाता है। आमाशय में कफज कृमि और पक्वाशय में पुरीषज कृमि उत्पन्न होते है। कफल कृमियों की गतिशीलता मस्तिष्क, हृदय आदि में पायी जाती है। रक्तज कृमियों का स्थान रक्तवाहिनियों में होता है। अधिसंख्यक कृमि अतिसूक्ष्मदर्शी होता है। जो हैं पर दिखे नहीं उसे संस्कृत भाषा में लोप कहा जाता है। जिसको जानने के लिए लोपदर्शक यानी सूक्ष्मदर्शी यंत्रा का आविष्कार सामने आया है। इन सूक्ष्मतम कृमियों को नष्ट करने की शक्ति विडंग में पाई गयी है।

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महर्षि चरक ने 25 वें सूत्रा में लिखा है-‘विडग कृमिहनानाम्ं अर्थात विडंग के प्रयोग से रोगाणुओं का क्षय होता है। संसार में इसकी सौ जातियाँ देखने को मिली है। अकेले भारत देश में ही इसकी 18 जातियाँ पायी गयी हैं। केवल इम्बेलियारिब्स और इम्बेलिया रोबस्टा को ही औषधीय प्रयोग में लिया जाता है। दोनों के पफल समान होते हैं वैसे वैदिक साहित्य मंे विडंग के नाम को उल्लेखित नहीं किया गया है। लेकिन बुद्ध पाली साहित्य के अध्ययन से ज्ञात हुआ है कि बाजारों में बिकने वाली खाद्य सामग्री यवागू में विडंग का भी मिश्रण किया जाता था। मालवा क्षेत्रा की माताएँ आज भी अपने बच्चों को दूध में विडंग को मिलाकर पिलाती देखी जाती हैं। जिससे वे किसी प्रकार के कृमिरोग की चपेट में न आयें सदैव स्वस्थ-आनंद बने रहें।

बायविडंग की पहचान के लिए एक परखनलिका में 5 मि.ली. ईथर लें जिसमें 0.2 ग्राम विडंग का चूर्ण डाल कर खूब हिलायें और छान लें। इस छने हुए घोल में 2 बूँद अमोनिया का घोल ;डाइल्यूट सोल्यूशन आपफ अमोनियाद्ध डालने पर नीलापन लिए बैंगनी रंग का तलछट नीचे होता है तो वह असली विडंग का स्वरूप सामने आ जाता है। सुप्रशिद्ध आयुर्वेदाचार्य सुश्रुत ने अपनी संहिता के चिकित्सा अध्याय 27 में लिखा है-‘शरीरस्योपधाता ये योषजा मानसास्तथा। उपादिष्टः प्रदेशेषुतेषां वक्ष्यामिवारणाम्।।’ जिसका तात्पर्य है कि शरीर को हानि पहुँचाने वाले वात, पित्त और मन को विकृत बनाने वाले रज, तम सभी प्रकार के रोगों के उन्मूलन में जितने भी प्रकार के द्रव्य काम आते हैं उनमें विडंग का स्थान सर्वोपरि है। यह एक ऐसा रसायन द्रव्य है जिसकी उत्तेजक क्रिसर से समूचा कायिक तंत्रा प्रभावित होता है। यह दुर्बल शरीर को सशक्त बनाता है। क्षय ग्रसित शिशुओं के लिए तो यह अनोखें ढंग की औषधि है।

आधुनिक शोध प्रयासों से पता चला है कि विडंग की कृमिघ्न क्रिया केंचुआ ;राउण्ड वर्मद्ध अंकुश मुख कृमि ;हुक वर्मद्ध पर बड़ी सफल पाई पायी है। केंचुओं को मारने में तो सेन्टोनिन औषधि भी इसका मुकाबला नहीं कर सकी है। इसकी एक प्रमुख विशिष्टता यह भी है कि कोई विरेचक औषधि देने की आवश्यकता नहीं रहती है। स्मरण रहे आन्त्रा कृमियों को मारने के लिए विडंग चूर्ण रोगी को गुड़ अवश्य खिला देना जरूरी होता है क्योंकि गुड़ के उदर में पहुँचते ही कृमि उसकी ओर आकर्षित होते है और गुड़ में चिपककर कृमि अंधे होने लगते हैं आयुर्वेद चिकित्सकों के परामर्शानुसार विडंग की 10 ग्राम मात्रा खाली पेट लेना लाभकारी होता है। यदि विडंग सेवन के पश्चात खुलकर पेट साफ न हो तो कोई विरेचक औषधि का सेवन अवश्य करें। विडंग सेवन के पश्चात् रोगी को दो-तीन दिन का हल्का सुपाच्य भोजन देना चाहिए।

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प्रायः छोटी उम्र के बच्चे कृमियों के ज्यादा शिकार अधिक होते हैं इसलिए इनकी चिकित्सा में विशेष जागरूकता की आवश्यकता होती है। महर्षि चरक ने कृमि रोग चिकित्सा के संबंध में तीन स्वर्णिम सूत्रा सुझाये हैं जिन्हें अपकर्षण, प्रकृतिविधात और निदान परित्याग के नाम से जाना गया है। अपकर्षण के अन्तर्गत वमन-विरेचन क्रिया आती है। कटुतिक्तकषाय, क्षार, उष्ण द्रव्यों का प्रयोग प्रकृति विधात में आता है। कटुकषाय और उष्ण होने के कारण विडंग प्रकृति विधात में सहयोगी सिद्ध होता है। निदान परिवर्तन हेतु कायिक और व्यवहारिक पवित्राता का होना अनिवार्य है। पाण्डु रोग कृमियों के कारण भी हो जाता है। कैल्शियम रहित भोजन करने से केंचुए उत्पन्न होने लगते है। इसलिए कैल्शियम का योग मिलना भी जरूरी होता है। बच्चों में सूत्रा कृमि ;चूनेद्ध अधिक पाये जाते है। ऐसे बच्चों को मूँग की दाल के पानी में विडंग चूर्ण को घी-हींग के साथ बघार कर पिलायें विडंगादि तेल में दूध की दुगुनी मात्रा मिलाकर पिलाने से भी लाभ होता है।

आयुर्वेदशास्त्रा में हृदय रोगों का निरूपण पांच प्रकार से किया गया है। उनमें से एक श्रेणी कृमिज हृदय रोग भी है। इस बीमारी में हृदय स्थान पर तनाव, खुजली एवं पीड़ा तीव्र गति से होने लगती है। ऐसी स्थिति में अरुचि, मिचली और आँखों में कालापन होने लगता है। विडंग मूत्राजनन होने की वजह से मूत्राकृच्छ को मार भगाता है। चक्रपाणिदत्त जी लिखते हैं कि विडंग सभी प्रकार के कपफज में प्रयुक्त होता है। मिट्टी खाने से उत्पन्न रोगों में इसका प्रयोग बड़ा हितकारी है। आचार्य बाग्भट ने काम चिकित्सा में लिखा है कि पीनस रोग में विडंग के क्वाथ में घी गुड़ मिलाकर पूड़ी बनाकर सेवन करने से लाभ होता है।

भावमिश्र के एक योग के अनुसार विडंग पीपली और टंकण तीनों को समान अनुपात में 2 ग्राम की मात्रा मासिक धर्म के चार-पाँच दिन तक स्त्रिायाँ सेवन करंे तो गर्भ नहीं ठहरता है। त्रिवेन्द्रम के स्टेट इंजीजेनस विभाग की रिपोर्ट के अनुसार यह विडंग योग 300 महिलाओं पर गर्भ निरोधक औषधि के रूप में पूर्णतः सपफल रहा है। योनिस्राव में पाये गये बैक्टीरिया का भी शमन होता है।

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यूनानी चिकित्सा विज्ञान के विशेषज्ञ हकीम शेखुर्रईस इब्नसीना ने 10वीं शताब्दी में विडंग को अपने निघंटु में समाविष्ट किया है। अतरीपफलदी लाल यूनानी चिकित्सा में विडंग कृमिनाशक माना गया है। इसके साथ-साथ यह अनुपम औषधि आमाशय और आँतांे की पीड़ा को मिटाती है और भूख को बढ़ाती है। आज के चिकित्सा ग्रंथों में भी विडंग को कृमिनाशक ;टीनीसाइडद्ध सिद्ध किया है। इसका 10 ग्राम चूर्ण रात्रि को सोते समय दही के साथ लेने से चपटे कृमि ;टेप वर्मद्ध मल के साथ निकल कर बाहर आ जाते हैं।

बाहर के कृमियों में सिर के जुएँ और लीखें आती हैं। विडंग को गोमूत्रा, मैनशिल, गन्धक आदि को सरसों के तेल में मिलाकर लगाने से ये कृमि नष्ट हो जाते हैं। थोड़ी देर बाद गर्म पानी से सिर धो लेना चाहिए। भीतर के कृमियों को मार भगाने का विडंग का ढंग अलग है। इसको मधु के साथ लेने से प्रयोजन की पूर्ति होती है। बीज निकले मुनक्के में विडंग के चूर्ण को भरकर सेवन करने की विधि भी कुछ ऐसा ही असर दिखाती है।

विडंग के साथ अजवाईन, कमीला, करंज और ढाक के बीजों के समान मात्रा लेकर गुड़ में मिला कर लेने से उपर के कृमियों का सपफाया होता है। कुटकी, हरड़ और विडंग का चूर्ण कृमिहर माना गया है। यदि इस में मण्डूर भस्म मिला दी जाय तो इसकी प्रभावशीलता अधिक बढ़ जाती है। लेकिन इसमें गोमूत्रा का समावेश होना जरूरी है इससे उदर रोग ही नहीं पाण्डुरोग भी मिटता है। विडंग, सहिजन, यवक्षार, नागरमोथा और मूषाकानी का क्वाथ बनाकर पीने से पेट के कीड़े मर जाते हैं। कवोष्ण अन्नभण्ड के साथ विडंग और त्रिकुट का चूर्ण लेने से सभी तरह के कृमि नष्ट होते हैं और अग्नि बढ़ती है। तुलसी के पत्तों के साथ विडंग को लेने का भी अचूक प्रयोग है। विडंग और ढाक के बीज समान मात्रा में लेकर नींबू और शहद के साथ सेवन करें। विडंग हरड़ और काला नमक का तीन ग्राम चूर्ण लेने से कृमि नष्ट हो जाते हैं।

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हृदय रोग के कृमियों को मारने के लिए घृत, दही और तिल चूर्ण के साथ तीन दिन तक भात खाने के पश्चात विरेचन के लिए विडंग, दालचीनी, तेजपात, इलायची, सपफेद जीरा, नाग केशर, सेंधा नमक आदि इन सबको मिलाकर काजी पीयें। अन्य द्रव्यों की अपेक्षा विडंग की मात्रा अधिक रहनी चाहिए। विडंग और कूठ 3ः4 के अनुपात में लेकर गोमूत्रा में मिलाकर लेने से भी हृदय रोग के कृमि नष्ट हो जाते हैं।

कृमिघ्न विडंगादि मण्डूर को तैयार करने के लिए विडंग हरड़, कुटकी चूर्ण और मण्डूर भस्म समान मात्रा में लेकर भली भाँति खरल करें। उसकी 1 ग्राम मात्रा 10 मि.ली. गोमूत्रा में मिलाकर सेवन करने से उदर कृमि समाप्त हो जाते है। इस तरह कई प्रकार के प्रयोग सामने और भी आये है। 100 ग्राम वायविडंग, 50 ग्राम अजवाईन, 25 ग्राम कबीला, 15 ग्राम कपूर आदिको कूट कर कपड़े में छाल डालें। पूर्ण वयस्क रोगी को 6 ग्राम की मात्रा में रात्रि को सोते समय गरम जल के साथ सेवन करायंे। बच्चों और गर्भिणी महिलाओं को इसकी मात्रा कम ही दें। यह चूर्ण सब प्रकार के उदर कृमियों को नष्ट कर देता है।

सूत्रा कृमियों की वजह से बच्चों के पेट में दर्द होने लगता है। जिससे बिस्तर पर सोते हुए मूत्रा त्याग देते हैं अथवा सोते हुए दाँत किटकिटाने लगते हैं ऐसी स्थिति में 1 ग्राम की मात्रा जल अथवा दूध के साथ देने से कीड़े मर कर बाहर निकल आते हैं। विडंग, पलाश के बीज, कबीला, बच, दूधिया, राही बकायन के बीज, हल्दी, खुरासानी अजवाइन तथा निशोथ सभी को 50-50 ग्राम मात्रा में लेकर कूट पीस कर छान लें। ग्वार पाटे के गूदे के साथ घोंटकर एक-एक ग्राम की गोलियाँ बनायें यह कृमिघ्न वटी वन कर तैयार हो जाती है। एक गोली प्रतिदिन सेवन करने से 15 दिन के भीतर ही कृमि नष्ट हो जाते हैं। वायविडंग चूर्ण 1 ग्राम, 4 ग्राम कबीला चूर्ण और कृमिधातिनी वटी 4 ग्राम को कूटपीस कर कैपसूल की भांति प्रयोग करने से आमाशय पक्वाशय और मलाशय के कृमि मरकर बाहर आ जाते हैं।

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