October 31, 2020
वेद आधारित आयुर्वेद ही चिकित्सा का आधार

वेद आधारित आयुर्वेद ही चिकित्सा का आधार

अनादि काल से मनुष्य के शरीर में उत्पन्न होने वाले विभिन्न रोगों की चिकित्सा का आधार आयुर्वेद ही रहा है जिसकी रचना प्रजापति ने की थी। भगवान नारायण ने ऋक्, यजु, साम और अथर्व को अपने मुख से उत्पन्न किया। ब्रह्मा ने इन वेदों को ऋषियों को सुनाया। इन वेदों को देखकर और उनके अर्थ का विचार कर प्रजापति ने आयुर्वेद ग्रन्थ की रचना की जिसे उन्होंने सूर्य देव को दे दिया सूर्यदेव ने आयुर्वेदसंहिता के रूप में अपने शिष्यों को दे दिया जिन्होंने बाद में अनेक संहिताओं का निर्माण किया जिसमें धन्वतरि ने चिकित्सा-तत्त्व विज्ञान’ नाम से एक अतिमनोहर तंत्र का निर्माण किया।

दिवोदास ने ‘चिकित्सा-दर्पण’ बनाया। काशिराज ने -दिव्य चिकित्सा कौमुदी की रचना की। दोनों अश्विनी कुमारों ने चिकित्सा सार तन्त्र जो भ्रम का निवारण करता है बनाया। नकुल ने ‘वैद्यक सर्वस्व’ तन्त्र बनाया।

सहदेव ने ’व्याधिसिन्धुविमर्दन नाम ग्रन्थ तैयार किया। यमराज ने ‘‘ज्ञानार्णव’ नामक महातंत्र रचा। च्यवनमुनि ने ‘जीवनदान’ व योगी जनक ने ‘वैद्य संदेहभंजन’ नामक ग्रन्थ लिखें। चन्द्रमा के पुत्र बुध ने ‘सर्वसार, ‘जाबाल ने ‘तन्त्रसार’ और जाजलि मुनि ने ‘वेदांग-सार’ नामक तन्त्र की रचना की पैल ने ‘निदान-तन्त्र’, करथ ने उत्तम ‘सर्वधर-तन्त्र’ की तथा अगस्त्य जी ने ‘द्वैधनिर्णय’ तन्त्र का निर्माण किया।

Advertisement

ये सोलह तन्त्र चिकित्सा शास्त्र के बीज कहें गये हैं, जो रोग नाश के कारण है। ये बीज मनुष्य के शरीर में बल का आधान करने वाले हैं। आयुर्वेद के उक्त महासमुद्र को ज्ञानरूपी मथानी से मथकर कर निकले अमृत से ऐसा कौन सा रोग होगा जिसका नाश न किया जा सके। यह कहना सत्य ही है कि वैद्य आयु का स्वामी नही है, वह आयु को घटा-बढ़ा नहीं सकता।

वेद आधारित आयुर्वेद ही चिकित्सा का आधार

रोग क्या है? मनुष्य को होने वाले रोग

मनुष्य के शरीर में उत्पन्न होने वाले 64 प्रकार के रोगों को मृत्यु कन्या के पुत्र और जरा को उसकी पुत्री कहा गया है जिसे हम रोग और मृत्यु के रूप अनुभव करते आ रहें हैं।

Advertisement

रोग क्या है? ब्रह्मखंड में इसका उल्लेख मिलता है-

पापेन जायते व्याधिः पापेन जायते जरा।
पापेन जायते दैन्यं दुःखं शोको भयंकरः।।

पाप से रोग होता है, पाप से बुढ़ापा आता है और पाप से ही दैन्य, दुःख एवं भयंकर शोक की उत्पत्ति होती है।

तस्मात् पापं महावैरं दोषबीजममंगलम्।
भारते संततं सन्तों नाचरन्ति भयातुराः।।

इसलिए भारत में संत पुरुष सदा भयातुर हो कभी पाप का आचरण नहीं करते।

Advertisement

पाप क्या है और पुण्य क्या है? भारत में एक माँ आरम्भ से अपने बच्चे को इसका ज्ञान कराना आरम्भ कर देती है। भारत में इस पर जितनी शिक्षा बचपन ही दी जाती है उतनी शिक्षा दुनिया के अन्य देश में नहीं दी जाती, और न ही पाप, पुण्य को इतना महत्व दिया जाता है जितना महत्व भारत में दिया जाता है।

कहा जाता है कि भारत में लगभग 5000 से 8000 वर्ष पूर्व का साहित्य लिखित रूप से विद्यमान था जिसे पहले मुगलों ने जलाकर नष्ट-भ्रष्ट कर दिया था और बाद में अंग्रेजों ने अपनी शिक्षा पद्धति थोपते हुए उस साहित्य को नष्ट करवा दिया। फिर भी यदा-कदा स्थानों पर राष्ट्रप्रेमियों ने उसके महत्व को समझते हुए उस साहित्य को अपने पास सुरक्षित रखकर देश पर बड़ा उपकार किया।

कुछ विद्वानों ने अपनी स्मृति के माध्यम से कई ग्रन्थों की पुनः रचना की। आयुर्वेद हमारी जीवन शैली का आधार है जिसमें एक मनुष्य के ब्रह्ममूहुर्त में जागने से लेकर रात्रि में सोने के बीच की अवधि के बीच की जाने वाली तमाम क्रियाओं को चरणबद्ध तरीके से वर्णित किया गया है जिसका प्रत्येक व्यक्ति को पालन करना चाहिए। कोरोना काल में आयुर्वेदिक औषधियों का प्रयोग पूर्ण निरापद है।

Advertisement

आयुर्वेदिक औषधियों के प्रयोग में समय और मात्रा का विशेष ध्यान रखा जाता है। प्रातः सेवन की जाने वाली औषधि रात्रि में नहीं लेनी चाहिए इसी प्रकार रात्रि में प्रयोग की जाने वाली ओषधि सेवन सुबह नहीं करना चाहिए। आयुर्वेद की उपयोगिता के कारण ही देश की 80 प्रतिशत आबादी आज भी आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति पर निर्भर है।

आयुर्वेद के अनुसार मनुष्ये को भूख से भी होता है ज्वर

क्या हल्का ज्वर कोरोना का लक्षण है- किसी व्यक्ति को हल्का बुखार होने पर कोरोना पोजिटिव माना जा रहा है। आयुर्वेद के अनुसार जब शरीर में भूख की अग्नि प्रज्वलित हो रही हो और उस समय खाना (आहार) न मिले तो शरीर में पित्त का प्रकोप बढ़ जाता है जिस कारण मनुष्य को हल्का बुखार हो जाता है। क्या इसे कोरोना का लक्षण माना जाना चाहिए? कोरोना काल में भूखा नही रहना चाहिए, कुछ न कुछ अवश्य खाते रहना चाहिए। पथ्य- चना,बेसन से बने खाद्य पदार्थ, पका बेल, दही, गन्ने का रस, अदरख, मूंग की दल का रस, ये पित्तनाशक है और शरीर को तत्काल बल प्रदान करते है।

श्रीराम की वंशावली-शास्त्रों के कथनानुसार है श्रीहरिविष्णु के नाभि कमल से ब्रह्मा जी की उत्पत्ति होना बताया गया है। ब्रह्मा ने दस पुत्रों मरीचि, अत्रि, अगिंरा, पुलह, क्रतु, महातेजसवी पुलस्त्य, प्रंचेता, भृगु, नारद और महाबुद्धिमान वसिष्ठ को उत्पन्न किया ये सभी ब्रह्मा जी के मानस पुत्र कहे गये हैं। ब्रह्मा के दायें अंग से ‘दक्ष’ जो प्रजापति के नाम से जाने गये उत्पन्न हुए।

Advertisement

 

प्रजापति के दौहित्रों के वंश से देव, दानव, गन्धर्व, सर्प, पक्षी सभी दक्ष की कन्याओं से उत्पन्न हुए है जिससे यह चराचरजगत चलायमान है। ब्रह्माजी जी के पुत्र मरीचि हुए। मरीचि से कश्यप, कश्यप से सूर्य, सूर्य से मनु, मनु से इक्ष्वाकु, इक्ष्वाकु से विकुक्षि, विकुक्षि से द्योत, द्योत से वेन, वेन से पृथु और पृथु से पृथाश्च की उत्पत्ति हुई।

वेद आधारित आयुर्वेद ही चिकित्सा का आधार

Advertisement

पृथाश्व से असंख्याताश्व, असंख्याताश्व से मांधाता, मांधाता से पुरुकुतस, पुरुकुत्स से दृषद, द्षद से अभिशम्भु, अभिशम्भु से दारुण, दारुण से सगर, सगर से हर्यश्व, हर्यश्व से हारीत, हारीत से रोहिताश्व, रोहिताश्व से अंशुमान् तथा अंशुमान से भगीरथ उत्पन्न हुए। भगीरथ से सौदास, सौदास से शत्रंुदम, शत्रुंदम से अनरण्य , अनरण्य से दीर्घबाहु, दीर्घबाहु से अज, अज से राजा दशरथ पैदा हुए।

वाल्मीकि रामायण के अनुसार राजा दशरथ के चार पुत्र हुए थे- राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न। इन चारों भाईयों के दो-दो पुत्र हुए। राम के पुत्र लव और कुश हुए जिन्हें उत्तर कौशल और दक्षिण कौशल का राज दिया गया था। लक्ष्मण के अंगद और चन्द्रकेतु हुए इनकों अंगदीया और चन्द्रकान्ता का राजा बनाया गया।

भरत के तक्ष और पुष्कल जिन्हें तक्षशीला ओर पुष्कलावती राज्य का राजभार सौंपा गया था। शत्रुघ्न के पुत्र सुबाहु और शत्रुघाती हुए, इनको मथुरा और विदिशा का राजा बनाया गया था। सूर्यवंशीय परम्परा में श्रीराम के बडे़ पुत्र लव से पद्व का जन्म हुआ, पद्व से पद्म, से अनुपर्ण से वòपाणि का जन्म हुआ। वस््रपाणि से शुद्धोदन और शुद्धोदन से बुध (बुद्ध) की उत्पत्ति हुई। बुध से सूर्यवंश समाप्त हो जाता है।

Advertisement