Tulsi (Holy Basil) Plant

तुलसी की आयुर्वेद में महत्ता? क्या है तुलसी के फायदे?

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आयुर्वेद शास्त्रा में तुलसी की आवश्यकता और उपयोगिता पर विशेष बल दिया है। इसका पौधा सर्वत्रा उगता हुआ दिखता है। यहाँ तुलसी की धार्मिक महत्ता को प्रकट नहीं किया जा रहा है अपितु औपचारिक शक्ति-सामथ्र्य का ही विवेचन है। स्वाद की दृष्टि से यह खाने मे चटपटी और कड़वी लगती है। किन्तु हृदय के लिए बड़ी लाभकारी साबित होती है। प्रदाह तथा पित्तनाशक, अग्निदीपक, वातनाशक, कुष्ठ, मूत्राकृच्छ, पसलीदर्द, रक्तविकार, कफ और पफोड़े-पफुन्सियों के उपचार में रामबाण की भांति कार्य करती है।

निघंटु में तो यहाँ तक लिखा है कि इसके दो स्वरूप हैं एक श्वेत और दूसरा श्याम। स्वाद में कड़वी और तीखी तुलसी श्वास, कफ और हिचकी को तुरन्त मिटा देती है। वमन, दुर्गन्ध, पाश्र्वशूल, कुष्ठ, विषनाशक तथा मानसिक पीड़ाओं को मिटाने में बड़ी कारगर सिद्ध होती है।

चरक संहिता में तुलसी के बारे में क्या लिखा है?

चरक संहिता में इसकी सत्ता और महत्ता पर प्रकाश डालते हुए एक स्वर्णिम सूत्रा को प्रतिपादित किया है-‘हिक्कन विषश्वास पाश्र्वमूल विनाशिनी। पित्त कृत्कपफ वातध्नी सुरसा इति गंधयुता।। गौरवे शरीर, शूले पीनडर्धाक्भिेदके। कृमिकाधा वयस्मारे प्राणनाशे प्रमोहके।’’ यानी तुलसी के सेवन से कपफ-वायु रोग, विष-दोष, श्वास-कास दुर्गंध रोग मिटते है। यह ज्वरनाशक है। इतने गुणों के कारण ही हमारे ऋषियों ने इसे धार्मिकता से जोड़ दिया है। जिससे लोग इसका निरन्तर सेवन करते रहें।

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हिन्दू धर्म में तुलसी की महत्ता

हिन्दू धर्म के अनुयायी तो इसको गंगाजल की तरह पावन मानते और धार्मिक प्रयोजनों को पूरा करने में काम लेते है। मंदिरों में पूजा-अर्चना के पश्चात् गंगाजल में तुलसी के पत्तों को डालकर प्रसाद वितरण किया जाता है। इन सब प्रयोगों के पीछे एक ही संकेत है कि लोग तुलसी का प्रयोग अपनी दैनिक जीवनचर्या में निरन्तर करते है। जहाँ पर तुलसी के पौधे का आरोपण होगा वहाँ की वायु भी शुध्द होगी और विषैले कीटाणु भी प्रभावहीन हो जाते है। इस प्रकार देखा जाये तो तुलसी की सत्ता मानव जीवन की पवित्रता और गरिमा को बढ़ाने में सराहनीय सहयोगी की भूमिका निभाती है।

अन्य चिकित्सा पद्धति में तुलसी

Tulsi in Ayurveda

तुलसी की महत्ता को आयुर्वेद ही नहीं बल्कि अन्य प्रकार की चिकित्सा पद्धत्ति भी समान रूप से अंगीकार करती है। यूनानी चिकित्सकों के मतानुसार तुलसी के सेवन से रोगाणु नष्ट होने लगते है। यह एक प्रकार की हृदय में शक्ति भर देने की महाऔषधि है। वायु को परिशोधित करने की शक्ति रखती है। उनकी दृष्टि में इस पौधे में अनेकों तरह के औषधीय गुण विद्यमान रहते है।

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एलोपैथी चिकित्सा प्रणाली में तो इसे सद्गुण सम्पन्न बताया गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि तुलसी में मलेरिया रोग को भगाने की शक्ति विद्यमान है। सर्दी, खांसी, निमोनिया, पाश्र्वशूल को नष्ट कर देती है। तुलसी को सद्गुणों का भण्डार कहा है जिसकी सहायता से अनेकों तरह के छूत रोग भाग खड़े होते हैं यही कारण है कि लोगों ने हजारों वर्ष तक इसके प्रयोग को विस्मृत नहीं किया है।

स्वास्थ्य-संवर्धन की दृष्टि से तुलसी की गंध को अत्यधिक उपयोगी माना जाता है। इसकी पीली पत्तियों में हरे रंग के एक तैलीय पदार्थ की सत्ता समाहित है। यह वायुभूत होकर कीटाणुओं का संहार करती है। पत्तियों को पीसने से इसकी तैलीय गंध दूर-दूर तक फैलने लगती है जो कीटाणुओं को समाप्त कर देती है। वातावरण शुध्द होता है।

इसके तेल को किसी कांच के बर्तन में रखा जाये तो सूख कर रबेदार बन जाता है। इस जमे हुए तेल को तुलसी कपूर के नाम से जाना जाता है। जिसका छिड़काव चारपाई पर किया जाये तो खटमल नष्ट हो जाते हैं। ऊनी कपड़ें भी सुरक्षित बने रहते है। रात्रि को सोते समय यदि इस कपूर को हाथ-पैरों पर मालिश कर ली जाये तो मच्छर पास नहीं आयेंगे। इसकी गंध से मच्छर तुरन्त ही भाग खड़े होते हैं। तभी तो तुलसी की महत्ता का वर्णन इस प्रकार किया है-‘‘तुलसी काननं चैवव गृहयेस्याव विष्ठते। तद्गृह तीर्थवत्तत्रा नयांति यमाकिंकरा।’’ यानी जिस घर में तुलसी के पौधे का आरोपण होगा वह घर तीर्थ के समान पावन माना जायेगा और रोग रूपी यमदूत प्रवेश नहीं कर पायेंगे।

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वायुदेव तुलसी का सम्पर्क पाकर जिस दिशा में पदापण करते है वहाँ पर रोगाणु स्वमेव नष्ट होते चलते जाते है। गंदा वायु को शुद्ध करने की शक्ति भी तुलसी में विद्यमान है। इसकी वायु को आरोग्यवर्धक माना गया है। शरीर का रक्त शुद्ध होता है और पफैपफड़े भी निरोग बनते हैं। काया के स्थूल अंगों के साथ-साथ सूक्ष्म तंत्रा भी सशक्त बनता है।

तुलसी की वायु जिधर भी जाती है उधर से ही आकाश, वायु, जल, पृथ्वी को शुद्ध करती चली जाती है। तुलसी के समीप बैठकर प्राणायाम करने का विशेष लाभ मिलता है क्योंकि वायु में रोगनाशक सुगंधि भर जाती है जिससे शरीर बलवान बनता है और बुद्धि कुशाग्र होती है। मच्छर, भुनगा, खटमल, झींगुर, सर्प आदि तुलसी की गंध पाकर उस स्थान को छोड़कर अन्यत्रा चले जाते हैं। तभी तो तुलसी को ‘अपेत राक्षसी’ के नाम से भी जाना जाता है।

जल के भीतर तुलसी के पत्तों को डालने से पानी के समूचे दोष ही मिट जाते है। यह जल शरीर को तो परिपुष्ट बनाता ही है साथ ही अकाल मृत्यु से मुक्ति भी दिला देता है। तुलसी की पत्तियों को मिलकार जल नित्य प्रति सेवन करने से मुखमण्डल का तेज निखर कर आता है। मेध और स्मरणशक्ति में अभिवृद्धि होती है। तुलसी की गंध से मिट्टी भी सुवासित होती है। पुराने जमाने में गोबर और मिट्टी में तुलसी की जड़ के नीचे की थोड़ी सी मिट्टी मिला कर घरों की लिपाई की जाती थी जिससे घरों में बाहरी कीटाणुओं का प्रवेश नहीं हो पाता था।

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स्मरण रहे तुलसी में एक विशेष प्रकार का एसिड पाया जाता है जो दुर्गन्ध को भगा डालता है। भोजन के पश्चात तुलसी की दो-चार पत्तिया चबा लेने से मुख की दुर्गन्ध कदापि नहीं आयेंगी। यह शरीर में एक विशिष्ट ऊर्जा का संचार करती है। जिससे विजातीय कीटाणु नष्ट हो जाते है। अनेकों तरह के असाध्य रोग भी मिटते है। दमा अथवा तपैदिक के रोगी को तुलसी की लकड़ी अपने पास सदैव रखनी चाहिए।

टीबी रोग भी नहीं रहता। तुलसी की माला धारण करने से संक्रामक रोगों के पफैलने का खतरा मिट जाता है। प्राचीन काल में हल्दी रंगे वस्त्रा में तुलसी की जड़ रखने की परम्परा थी, ताकि रेडियाधर्मिता अथवा आकाशीय विद्युत का प्रभाव मकान पर न पड़ने पाये। आज भी ग्रामीण अंचल के अनपढ़ लोग इस वैज्ञानिक तथ्य से भलीभांति परिचित हैं।

तुलसी विश्व प्रसिद्ध औषधि है और उच्चतम कोटि का रसायन है। आयुर्वेद में इसकी सत्ता और महत्ता को अंगीकृत करते हुए बताया है कि चर्म-मांस और अस्थि रोगों के उपचार में इसका कोई मुकाबला नहीं है। शरीर के सफेद दाग मिटते और सुन्दरता बढ़ती है। क्योंकि इसमें रक्त शोधन क्षमता विद्यमान है। जब रक्त शु( होगा तो सुन्दरता स्वमेव दिखने लगेगी। नींबू के रस में तुलसी की पत्तियों का रस मिलाकर चेहरे पर लगाया जाये तो चर्मरोग मिटता और चेहरा खिलता है। तुलसी की पत्तियों को सुखाकर उसमें दालचीनी, तेजपत्रा, सौंपफ, बड़ी इलायची, अगियाघास, बनपफशा, लाल चंदन और ब्राह्मी को मिलायें और कूट डाले। उस पाउडर को किसी कांच के बर्तन में रख लें। चाय के स्थान पर इसका प्रयोग करने से चाय की हानियों से भी बचेंगे और स्वस्थ भी रहेंगे।

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