October 25, 2020
जिन्हें मूल इतिहास लेखक मान लिया गया है, उनके बारे में कुछ तो जाने

जिन्हें मूल इतिहास लेखक मान लिया गया है, उनके बारे में कुछ तो जाने-1

पाठ्यपुस्तक लिखने की सरकारी नौकरी भी कामचोरी के साथ करने वाले लोगों ने भारत जैसे महान और विराट राष्ट्र के बारे में नई पीढ़ी को बताने के लिये इतिहास की जो पाठ्य पुस्तकें लिखी हैं, वे भारत के मूल अभिलेखों और दस्तावेजों तथा साक्ष्यों को स्वयं जानने और पढ़ने की जगह 19वीं शताब्दी ईस्वी के उत्रार्द्ध और 20वीं शताब्दी ईस्वी के पूवार्द्ध में कतिपय अंग्रेज और अन्य यूरो ईसाई लेखकों की अपने चर्च के लिये समर्पित निष्ठा के साथ किये गये परिश्रम को ही पर्याप्त प्रमाण मानते हुये अब उन्हें ही भारत के इतिहास का मूल लेखक मान लिया गया है।

परंतु उन तथाकथित इतिहास लेखकों में से एक भी व्यक्ति इतिहासकार नहीं है और उसने कभी भी इतिहास का ये पुस्तकें लिखने से पहले कोई अध्ययन नहीं किया था तथा इतिहास विषय में कोई पढ़ाई नहीं की थी और इस अनुशासन का उन्हें कोई अभ्यास भी नहीं था। उनमें से कोई चर्च सेवक था, कोई कस्ट्रक्शन कंपनी में कर्मचारी था और कोई इसी प्रकार का अन्य कर्मचारी था।

यहां हम उनमें से कुछ का परिचय दे रहे हैं –

 

Advertisement
  • हेनरी मायर्स इलियट

जिन्हें मूल इतिहास लेखक मान लिया गया है, उनके बारे में कुछ तो जाने
हेनरी मायर्स इलियट के द्वारा       लिखित पुस्तक

1. हेनरी मायर्स इलियट – हेनरी मायर्स इलियट का जन्म इंग्लैंड के वेस्ट मिनिस्टर्स शहर में एक चर्च के लॉज में हुआ था। वे स्वयंसेवकों के एक संगठन के कर्नल जॉन इलियट के 15 पुत्रों में से तीसरे बेटे थे।

1 मार्च 1808 को उनका जन्म हुआ। चर्च में पादरी की ट्रेनिंग लेने के बाद वे ईस्ट इंडिया कंपनी के नौकर हुये और उत्तरप्रदेश के बरेली शहर में कंपनी के टैक्स संग्राहक (कलेक्टर) के सहायक बनकर काम करने लगे।

कंपनी की अच्छी सेवा करने के कारण वे कुछ समय बाद स्वयं ही टैक्स संग्राहक बना दिये गये और बाद में कंपनी के लिये लगान वसूली करने वाले बोर्ड के सचिव बने। फिर वे कंपनी की सुरक्षा टुकड़ी में भी शामिल हो गये और सिखों से कंपनी की लड़ाई में मध्यस्थता का काम किया।

Advertisement

अपने निष्ठापूर्ण ईसाई आचरण के कारण उन्हें के. सी. बी. की उपाधि मिली। के. सी. बी. का अर्थ होता है नाईट कमांडर ऑफ बॉथ। नाईट इंग्लैंड की एक सामंत से मिलती जुलती उपाधि है जो पादरियों को ही दी जाती थी।

यह उपाधि जब दी जाती है तो एक पूरी मजहबी रस्म अदा की जाती है, उसे ही ‘बॉथ’ कहते हैं। इंग्लैंड में 20वीं शताब्दी ईस्वी से पहले वहां के अभिजात वर्ग के लोग भी नित्य नहीं नहा पाते थे। साल में कुछ ही दिनों नहाते थे।

साधारण लोग तो वर्ष में एक बार या कई वर्षों में एक बार कभी नहाते थे। क्योंकि वहां पानी की बहुत कमी थी और बर्फ के पिघलने से जो पानी सुलभ होता था वह मुख्यतः पीने तथा अन्य कामों में ही खर्च हो जाता था।

Advertisement

20वीं शताब्दी ईस्वी में ही बिजली वहां सर्वसुलभ हुई

बिजली का अविष्कार होने के बाद भी उसे सर्वसुलभ होने में कई दशक लग गये और 20वीं शताब्दी ईस्वी में ही बिजली वहां सर्वसुलभ हो पाई।

तो, ईसाई स्नान की एक विशेष पद्धति थी जो यह उपाधि देने के पहले करनी होती थी। शाम होने के बाद ऐसा व्यक्ति चर्च में जाता है और वहां निर्वसन नहाता है। इसके बाद नंगे बदन पर एक विशेष लबादा लपेट दिया जाता है और उसे चर्च में ही लिटा दिया जाता है।

वह रात भर चैपेल में रहता है और बाईबिल के कुछ अंशों का पाठ करता रहता है। इसके बाद भोर में उठकर वह मुख्य पादरी के सामने ‘कन्फेशन’ करता है कि उसके जीवन में कब-कब काम संबंधी विचार आये और कब-कब उसने स्त्री-प्रसंग किया। ऐसा करने के बाद फिर उसे ‘मॉस’ नामक एक कर्मकांड करना होता है इसके बाद वह सो जाता है और फिर बहुत दिन चढ़ने पर उठता है।

Advertisement

उठने के बाद हाथ मुंह धोकर कपड़े पहनकर उसे राजा के सामने हाजिर होना होता है। जहां राजा अपनी तलवार की नोक उसकी गर्दन पर गड़ाता है और फिर छोड़ देता है। यही नाईट ऑफ बॉथ बनने की पूरी रस्म है।

ईसाई स्नान के सामन्त

इस प्रकार ‘ईसाई स्नान के सामन्त’ (नाईट कमांडर ऑफ बॉथ) की उपाधि प्राप्त हो जाती है जिसे संक्षेप में के. सी. बी. कहते हैं। जब भारत में ब्रिटिश प्रभाव एक हिस्से में हुआ तब कुछ छोटे-मोटे राजाओं ने भी उत्साह में आकर इंग्लैंड के राजा से यह उपाधि इसी प्रकार प्राप्त की थी।
यह उपाधि प्राप्त कर इलियट भारत आये और कंपनी की सेवा करते रहे।

बाद में कंपनी के लिये उन्होंने एक अंग्रेजी पत्रिका मेरठ से चलाई। कंपनी के कर्मचारियों और अधिकारियों को भारत के उच्चवर्ग के विषय में भरपूर जानकारी सुलभ हो ताकि वे उनसे अच्छी तरह व्यापारिक वार्ता कर सकें इसके लिये उन्हेांने बहुत से काम किये।

Advertisement

सबसे पहले उन्होंने ब्राह्मणों और राजपूतों की वंशावली अंग्रेजी में तैयार की। इसके बाद उन्हांेने फारसी व्याकरण सीखी और मुसलमान दरबारी लेखकों की भी एक इनडैक्स प्राप्त की।

इसके बाद वे उन दरबारी लेखकों की किताब के आधार पर हिन्दुस्तान का इतिहास लिखने लगे। उन्होंने खूब सामग्री इकट्ठी की थी परन्तु वह सब मुस्लिम लेखकों द्वारा अपने-अपने नवाबों की तारीफ में लिखी गई प्रशस्तियां ही थीं।

स्वयं इलियट और डाऊसन ने लिखा है कि ये सब मुस्लिम लेखक अतिरंजित कहानियां गढ़ते हैं और गप्पे गढ़ते हैं। इसलिये इनका संपादित तथ्य प्रकाशित करना आवश्यक है।

Advertisement

इलियट यह काम कर ही रहे थे कि पहला खंड तैयार होने के बाद जब वे अफ्रीका गये हुये थे तो वहीं उनकी 30 दिसंबर 1853 ईस्वी को मृत्यु हो गई और शेष संग्रहित सारी सामग्री लेकर उनकी पत्नी इंग्लैंड वापस लौट गईं।

16 वर्ष तक वह सामग्री उनके पास पड़ी रही बाद में उन्होंने डाऊसन को वह सब सामग्री दी जिन्होंने कई वर्षों में आठों खंडो के लेखन और प्रकाशन का कार्य पूरा किया।


  • जान डाऊसन

जिन्हें मूल इतिहास लेखक मान लिया गया है, उनके बारे में कुछ तो जाने

Advertisement

2. जान डाऊसन – जान डाऊसन को अंग्रेज लोग संस्कृत का अच्छा जानकार पहला अंग्रेज मानते हैं। विलियम जोन्स को स्वयं अंग्रेज वैसा जानकार नहीं मानते जबकि भारत में विलियम जोन्स के चेले भरे पड़े हैं। जान डाऊसन का जन्म 1820 ईस्वी में हुआ और 1881 में उनकी मृत्यु हुई।जान डाऊसन एक समर्पित पादरी थे। उनके पिता ईस्ट इंडिया कंपनी के निदेशको में से एक थे। वे उसी कंपनी के एक प्रशिक्षण केन्द्र में प्रशिक्षक बने और बाद में भारत का अध्ययन करने के लिहाज से उन्होंने उर्दू सीखी। बहुत बाद में थोड़े समय उन्होंने संस्कृत सीखी।

स्पष्ट है कि उनका भी संस्कृत का ज्ञान बहुत थोड़ा ही था पर कंपनी ने उन्हें इंग्लैंड में संस्कृत का जानकार प्रचारित किया क्योंकि तब तक इंग्लैंड में और यूरोप में भी संस्कृत के विशाल ज्ञानभंडार की चर्चायें चमत्कार की तरह होने लगी थीं और स्वयं को संस्कृत का जानकार बताने वाले का बहुत आदर होने लगा था क्योंकि बाईबिल में इंडीज का उल्लेख है और इंडिया सदा से यूरोप के लोगों के लिये चमत्कारी आकर्षण की चीज रही है।

उर्दू सीखने के बाद उन्होंने उर्दू व्याकरण पर अंग्रेजी में एक किताब 1862 ईस्वी में लिखी। फिर उन्होंने 1879 ईस्वी में ‘हिन्दू माइथालॉजी’ पर एक किताब लिखी और 1881 ईस्वी में वे चले गये।

Advertisement

1867 ईस्वी के बाद किया सम्पादन शुरू

इसी अवधि में उन्होंने 1867 ईस्वी के बाद इलियट द्वारा संग्रहित सामग्री का सम्पादन शुरू किया जो उनकी मृत्यु तक चलता ही रहा। वस्तुतः वे मुख्यतः उर्दू के ही जानकार थे और उन्होंने मुस्लिम लेखकों द्वारा लिखी पुस्तकों का ही अध्ययन किया था। पुस्तक का मूल नाम पहले था ‘हिनदोस्तान का इतिहास जो अरब इतिहासकारों द्वारा लिखा गया है’। इसे ‘हिस्ट्री ऑफ इंडिया’ नाम बहुत बाद में दिया गया।

जाहिर है कि संस्कृत पाठों का अधिक सहारा डाऊसन ने नहीं लिया है जिससे उसके संस्कृत विद्वान होने के बारे में शंका पैदा होती है। वस्तुतः यह समस्त इतिहास स्वयं इलियट और डाऊसन के शब्दों में ‘मुहम्मदन पीरियड’ के बारे में है।

परंतु 15 अगस्त 1947 ईस्वी के बाद आलसी सरकारी लिक्खाड़ों ने इन लोगों को भारत के इतिहास का ही जानकार प्रचारित कर दिया और उनकी नकल भी आधी अधूरी की तथा उसमें हिन्दुओं के भीतर ग्लानि जगाने वाले अंश और अधिक मिला दिये।

Advertisement

ऐसा उन्होंने किन्हीं मुस्लिम देशों से कुछ धन लेकर किया अथवा सरकारी नेताओं और अफसरों के कहने पर किया, यह जांच का विषय है।


 

Advertisement