October 31, 2020
तीसरा साका

तीसरा साका

बहुत से लेखक अकबर की न्यायपरायणता और दयालुता पर इतना विश्वास करने लगे हैं कि वह उसके उग्र रूप को भूल गये हैं अकबर समझदार और दयालु था, पर समझ और दया उसके स्वभाव का केवल एक भाग था। उसके शरीर में चंगेज खान और तैमूर के वंशों का रुधिर बहता था। अन्दर की तह में वही क्रूर मुग़ल बैठा हुआ था जो लड़ाई और हत्या की खातिर पसन्द करता था। वह हाथियों की लड़ाई में खास मजा लेता था।

केवल सूनी तमाशा देखने के लिए हिन्दू फकोरों की पार्टियों को आँखों के सामने लड़ाता था, जब क्रोध से उन्सत्त होता तब आपे से बाहर हो जाता था लड़ाई के पीछे एक बार कत्लेआम बुलवा देना या मरे हुए शत्रुओं के मस्तकों का पहाड़ चुनवा कर उससे आँखों को तृप्त करना केवल दया के भाव से प्रेरित नहीं हो सकता। अकबर की महत्वाकांक्षा भी बहुत जबरदस्त थी ‘जीवो जीवस्य भोजनम्’ के सिद्धान्त का वह मानने वाला था। काबुल से लेकर समुद्र तक फैले हुए भारत को अपनी छत्रछाया के नीचे लाना उसके दिन का विचार और रात का स्वप्न था उस विचार की पूर्ति में जो काँटा दिखाई देता था, उसे उखाड़ फेंक देने में अकबर को कोई भी संकोच न होता था।

अकबर एक बहुत जबर्दस्त लड़ाकू था

उसके शासन सम्बन्धी और मजहबी सुधारों का वृत्तान्त पढ़कर बहुत से लेखक भूल जाते हैं कि अकबर एक बहुत जबर्दस्त लड़ाकू था। उसके शान्त साम्राज्य का आधार वह भयानक युद्ध थे, जिनमें उसे विजय प्रास होती रही। केवल एक चट्टान पर उसका पौरुष टकराकर रह गया। एक बार सफलता भी दिखाई दी, परन्तु अन्त में विफलता हो रही। एक मेवाड़ के कठोर फौलाद को छोड़कर शेष रियासतों या राज्यों की दीवार अकबर के तेज से शीघ्र ही मोम बन गई। यह समझना कि अकबर लड़ाई के लिए लड़ाई नहीं लड़ता था या उसके दृदय में महत्वाकांक्षी की कमी थी, मुगल-सगट के जीवन से अनभिज्ञता के कारण हो हो सकता है।

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यार अकबर और औरंगजेब में केवल इतना हो भेद है कि बाबर कवि योद्धा था, अकबर राजनीतिज्ञ योद्धा था, और औरंगजेब धर्मान्ध योद्धा था। शेष बातों में वह तीनों मिलते हैं। तीनों में अत्यन्त महत्वाकांक्षा थी, बहादुरी थी, युद्ध में प्रवीणता थी, रुधिर में गर्मी थी, और व्यक्त या छुपी हुई क्रूरता थी। बावर में कवियों की सी उपेक्षावृत्ति थी, अकबर में राजनीतिज्ञों की-सी मनुष्यता और उग्र बालों की दवा कर सोच समझ से कार्य करने की शक्ति थी, औरंगज़ेब के वीरता, सादगी, दृढ़ता आदि सब गुणों को एक धर्मान्धता दया देती थी।

तीसरा साका

कई लेखकों ने चित्तौड़ पर अकबर आक्रमणों के कारणों की तलाश में बहुत-सा दिमाग खर्च किया है। राणा ने विद्रोही बाज बहादुर को आश्रय दिया था, मारवाड़ का सरदार भी मुगल बादशाह से डरकर मेवाड़ में घुस गया था, राणा का लड़का शक्ति सिंह पिता से बिगड़कर बादशाह के पास रहने लगा था और उसी ने बादशाह को भड़काया, इस प्रकार की बहुत-सी समूल का निर्मूल कल्पनायें की गई हैं, जिनका एक मात्र कारण यह प्रतीत होता है कि लेखक लोग अकबर को केवल विजय-कामना से आक्रमण करने के अयोग्य समझते हैं।

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यदि अकबर के चरित्र को पढ़ा जाय तो, उसमें ५० फीसदी आक्रमण केवल इस आधार पर किये गये है कि मुगल बादशाह हिंदुस्तान का जन्मसिद्ध मालिक है, जो भी कोई व्यक्ति हिन्दुस्तान की सीमा के अन्दर रहता हुआ, स्वतन्त्र रहने का दुःशाहस करता है, वह मृत्यु के योग्य है। राणा का यही दोष था कि उसने अकबर की सेवा में हाजिर होकर अधीनता स्वीकार नहीं की थी। अम्बर के राजा बिहारीमल, उनके पुत्र भगवानदास, और उनके गोद लिये पुत्र राजा मानसिंह ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली थी, और विवाह सम्बन्ध जोड़ लिया था उससे अकबर के हृदय में एक अपूर्व महत्वाकांक्षा पैदा हुई थी|

जो चित्तौड़गढ़ की दीवारों से जाकर टकराती थी पूर्व या दक्षिण में पाँच पसारने से पूर्व अकबर ने इस दिल के कांटे को निकाल डालने का निश्चय किया और १५६७ ई० को दिसम्बर मास में चित्तौड़ विजय के लिए सेनासनाह का हुक्म दिया। जैसे अकबर के पितामह बाबर ने मेवाड़ के महाराणा संग्राम सिंह को सौकरी के पास पराजित कर दिया, परन्तु उसे झुकाया नहीं था, उसी प्रकार मेवाड़ का प्रसिद्ध किला चित्तौड़गढ़ अलाउद्दीन और बहादुर शाह को सेनाओं से परास्त होकर भी झुका नहीं था। यह उसी प्रकार आकाश में सिर उठाये बहादुरों और अत्याचारियों को चुनौती दे रहा था।

आखिर भारत-विजय का स्वज देखने वाले अकबर को यह सहा न हुआ। प्रकता होता है कि उसका पहला आक्रमण असफल हुआ। पहले आक्रमण बारे में राजपूताने में यह प्रसिद्ध है कि जब मुसलमान सेना ने आक्रमण किया, तय राणाजी की प्रेमपात्र एक साधारण स्त्री ने हथियार बाँधकर शत्रुओं पर धावा किया और बादशाह के तब तक मार-काट करती चली गई। मुसलमान सेना में खलबली पड़ गई, जिसका परिणाम यह हुआ कि अकबर को लौट जाना पड़ा।

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स्त्री की सहायता से राज्य रक्षा करके उदयसिंह सरदार लोगों को ताना देने लगा कि जहाँ तुम लोगों से करते धरते कुछ न बन पड़ा वहाँ एक स्त्री ने विजय प्राप्त की। सरदारों ने इस ताने से नाराज होकर उस स्त्री को मरवा डाला। इससे राणा में और सरकार में तनातनी हो गई अकबर को जब इस घर विरोध का पता चला, तो उसने दूसरी बार चढ़ाई की इस कथा में कोई आश्चर्य नहीं उदयसिंह के चरित्र के साथ इसका मेल मिलता है। वह आलसी था, विषयासक्त था।

वह कुम्भा और सांगा के वंश के योग्य नहीं था, उसने राजपूत सरदारों को खिझाने के लिए राणा के अयोग्य ताना दिया हो, तो कोई आश्चर्य नहीं है। अक्टूबर के महीने में अकबर की सेनाओं ने चित्तौड़गढ़ को चारों ओर से घेर लिया। किले के बाहर लड़ना तो दूर रहा, उदयसिंह ने भागकर जान बचाना हो रानी मत समझा । अभागा है वह देश, जिसको आपत्ति के समय में मुखिया भाग जाते हैं ।

बारूद से शून्य किला बच सकता है, पर किलेदार से शून्य किला नहीं बच सकता। राणा संग्रामसिंह तो अपनी राजधानी से बहुत आगे जाकर सोकरी के मैदान में शत्रु से भिड़ते हैं, परन्तु उनका पुत्र अमेद्य दुर्ग को छोड़कर भाग जाता है-जब भाग्य फूटते हैं तब कैसे हो संयोग मिला करते हैं। राजपूताने के कुछ इतिहास-लेखकों ने उदयसिंह के इस कायरतापूर्ण कार्य के परिमार्जन में लिखा है कि केवल चित्तौड़गढ़ के भीतर बैठकर लड़ने से उन्होंने यह अच्छा समझा था कि बाहर रहकर मेवाड़ के अन्यान्य गदों को भी शस्त्र या सामान से दूढ करें।

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राणा उदय सिंह चित्तौड़ छोड़कर चले गये

जब एक बड़ी सेना से किला घिर जाता है तो लड़कर मारे जाने या अधीनता स्वीकार करने के सिवाय कुछ बन नहीं पड़ता। कदाचित् उसी विचार से राणा उदय सिंह चित्तौड़ छोड़कर चले गये हों, परन्तु मेवाड़ के अन्य गढ़ों को दूर करने के सिवाय और उसके भीतर की सेना को शस्त्रों से सुसजित कर देने और रसद इकट्ठी कर देने के सिवाय बाहर से कुछ सहायता न दी। इसका कलंक जो उनके सिर मदा जाता है सो इस कलंक का निवारण यों हो सकता कि अकबर की असीम सेना को घोड़े से आदमियों से सामना करना मृत्यु के मुंह में प्रवेश करना था  इतिहास का लेखक इस लेगड़े बहाने को पढ़कर भी उदयसिंह को काम नहीं कर सकता।

उदयसिंह भागना केवल एक ही दशा में न्तष्य हो सकता था।यदि वह चितौड़ गढ़ से बाहर जाकर अकबर को सेनाओं के रास्ते बन्द कर देता या उन्हें इतना तंग करता कि भागना पड़ता, तो राणा का चित्तौड़ को छोड़ जाना समझ में आ सकता था, परन्तु उदय सिंह ने बाहर जाकर जो कुछ किया, उसे देखते हुए यही कहना पड़ता है कि राणा सांगा के पुत्र ने रण से भागकर अपने पिता के नाम को भी कलंकित किया।

जिस चित्तौड़गढ़ से मेवाड़ का ही नहीं राजपूताने का मान था, देश के अनमोल मोतियाँ का लहू जिसको रक्षा में पानी की तरह वहां था, और बह रहा था, उदय सिंह ने उसके ध्यान को देखा और केवल अपनी चमड़ी बचाने पर संतोष किया। इससे अच्छा होता कि स्वनामधन्य जयमल और पत्ता की तरह यह भी चित्तौड़ की मान-रक्षा के लिए बलिदान हो जाता। यह भी असम्भव नहीं कि यह गढ़ में रहकर उसकी रक्षा कर सकता। राणा की उपस्थिति राजपूतों के बल को सौ गुना कर देती। यह ठीक है कि वह यदि चाहता, तो बाहर से चित्तौड़ को बहुत सहायता कर सकता था, परन्तु उसने जो कुछ किया, उसे देखते हुए यहो कहना पड़ता है कि उदयसिंह बप्पा रावल के वंश के उज्ज्वल मस्तक पर कलंक के समान था।

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अकबर को अक्षौहिणी सेनाओं ने मस्तक विहीन चित्तौड़ को मोर लिया। राणा भाग गया, परन्तु राजपूतों का खून ठंडा नहीं हुआ था। प्रायः लिखा जाता है कि उस समय की सेनायें राजा के मरने पर दमभर भी नहीं खड़ी होती थीं। चित्तौड़ का तीसरा साका इस नियम का अपवाद है। राजा गढ़ की तरह भाग गया, इससे राजपूत सरदार पराये नहीं। वह शेरों की तरह लड़े, और राजपूतों की तरह काम आये।

तीसरा साका

यह वीरतापूर्ण रक्षा द्वारा केवल राजपूताने का हो नहीं, सारे देश का मुख उज्जवल कर गये। जय तक संसार में चोरों का आदर होगा तब तक उन बहादुरों का यश गाया जायेगा, जिन्होंने राजा के भाग जाने पर भी हिम्मत न हारी और अकबर की अगणित सेनाओं और अपरिमित साधनों की परवाह न करके जान की बाजी लगा दी। वह हार गये तो क्या हुआ, लड़ाई में हार और जीत तो होती ही है असली चीज हैं मर्दानगी।

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इतिहास की गवाही है कि हरेक राजपूत दस गुणा होकर ल और सी दुश्मनों को यमलोक पहुंचकर शांत हुआ। अमरता के में नाम लिखाने के लिए यह पर्याप्त है। चित्तौड़ का किला उसी नाम के पर्वत की चोटी पर बना हुआ है चित्तौड़ नाम का पर्वत खुले मैदान में से ऊँचे वृक्ष की भांति सिर उठाये खड़ा है। उसकी लम्बाई सवा तीन मोल के लगभग है, और मध्य १२ गन के लगभग चौड़ाई है। आधार का पेरा आठ मोल से । अधिक है और ऊँचाई कहाँ भी पाँच सौ फीट से अधिक नहीं है।

अकबर के आक्रमण के समय रा पर्यंत की पर किला या की चारदीवारी के अन्दर महल, बाजार आदि भी वसे दुए थे चारों ओर से साला जीने पानी भरा रहता था और चीन के काम भाजपा। किले में प्रवेश करने के लिए चढ़ा ररता एक हीसा जो खूब दारू भा। बह देवा -मेला होकर पर को चढ़ था। मुख्य द्वार राम दरवाजा कहलाता  अन्य उह दरवाजों के नाम लखीतावाड़ी सूरजपुर आदि थे रास्ते बहुत विकट थे, दरवाजे बूत ये, इस कारण एका कि दुश्मन का आ जाना असम्भ या।

हिंदुस्तान की बादशाहत की पूरी ताकत लेकर आ दस विकट दुर्ग को फतह करने के लिए धौलपुर से रवाना हुआ। उसके पास बीरा पच्यीस हज़ार से कम सेना न थी। दीवारों को तोड़ने के लिए ३०० मरत हाथी के तीन तोपखाने थे और कई मशहर सेनापति थे।राजा टोडरमल का नाम उस समय के सेनापतियों में विशेष आदर से लिया जाता था वह अकबर की बगल में विद्यमान था। पर यह ताकती और उधर राणा से विहीन केवल ५ हजार वीर राजपूत थे, जिनके पास नहीं थे और तोपखाने, या केवल न मिटनेवाला वाधीनता से प्रेम और डरने लाल बहादुर दिला बस, इन्हीं दो का सहारा लेकर महाभारत राजपूत देशभर की शक्ति से भिड़ने के लिए कटिबद्ध हो गये छह मास तक अकबर ने चित्तौड़गढ़ भेरू रखा।

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राजपूतों की वीरता के सामने कुछ बस न चला

इस गीत में उसने उस समय प्रचलित नीतियों का प्रयोग करके किले को सर खाने का मन किया, परन्तु राजपूतों की वीरता के सामने कुछ बस न चला। सुरक्षित कुएँ बनाये गये, सुरंगे उड़ा गई और सामने की पहाड़ियों पर मरने जमाये गये। इधर से जो उपाय होता था, पीर जयमल के सेनापतित्व में राजपूत सेना उसी को नीला कर देती थी एक बार बहुत मेहनत के बाद मुगल सेना ने एक सुरंग उड़ाकर दीवार तोड़ दी  राजपूतों ने चमत्कार कर दिखाया कि एक ओर श से लड़ते जाते थे और दूसरी ओर दीवार बनाते जाते थे लड़ाई के बीच में हो उन्होंने लम्बी-चौड़ी पहले की सी दीवार बना ली। इस यहादुरी को देखर दुश्मन भी दाँतों तले अंगुली दबते थे। अकबर ने ६ माह तक मेवाड़ को घेरे रखा।

राणा के भाग जाने पर मेवाड़ की सेना ओं के नेतृत्व का यो बदनौर मे साठीर सरदार जयमल के कन्धों पर पा। यमल ने अपनी वीरता, परिश्रम और दूरदर्शिता से राणा को राजपूतों के हृदयों में से निकाल डाला। वह हर मो पर, हर द्वार पर दिखाई देता था। सेनापति के दृष्टान्त से उत्साहित होकर एक-एक राजपूत पाँच-पाँच के बराबर बल से लड़ा। अकबर की सेना बड़े सामान और सुरंगें तैयार करके किसी की दीवारों को उड़ाने कोयल कर रही थी राजपूत सेना के निशान किले की दीवारों पर से गोली चलाकर काम करने वालों को यमलोक पहुँचा रहे थे उनके जवाब में गूगल-सेना के निशानची भी निशाना लगाये बैठे रहते थे, ज्यों ही मौका पाते थे, गोली दाग देते थे। स्वयं अकबर बड़ा भारी निशानची था।

तीसरा साका

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वह भी दिन में कई राजपूतों को निशाने का शिकार बनाया करता था। एक दिन उसने एक सुर में से एक तेजस्वी राजपूत की सूरत देी और निशाना जमाकर गोली छोड़ दो। गोलो लक्ष्य पर लगी। राजपूत सेनापति जयमल अपने देश की रक्षा करते हुए स्वर्गलोक को सिधारे। जयमल के मर जाने पर राजपूत सेना का सेनापतित्व एक ऐसे युवा को सौंपा गया, जिसकी कहानी राजपूताने के परों पर गाई जातो है।

उस वीर योद्धा का नाम प्रतापसिंह या पता था। केलवा का युवा सरदार मां का लाडला बेटा था। पिता के मर जाने पर माता ने ही उसका पालन-पोषण किया था। सेनापति का स्थान रॉक होने पर राजपूतों ने पिताजी को अपना मुखिया चुना। पिताजी के मुंह पर अभी अच्छी तरह मैं भी नहीं आई थी। पराजय और उसके साथ मृत्यु निश्चित थी, तो भी चीर-माता के कोख से जनमा हुआ वीर पुत्र पीछे नहीं हटा, वीर-पनके निभाने के लिए खाई में कूदने को तैयार हो गया।

विजय या चीर-मृत्यु में से एक को प्राप्त करने का आशीर्वाद लेने के लिए पत्ता अपनी माता के पास पहुंचा माता का हृदय हैं से उद्ल पड़ा। यह जानती थी कि बेटा मरेगा, परन्तु वह यह भी जानती थी कि क्षत्राणो युद्ध में योर-मृत्यु प्राप्त करने के लिए हो सन्तान पैदा किया करती है। उसके हृदय ने कहा कि यदर्थ क्षत्रिय सूते तस्य कालोऽयमागतः अपने हाथ से पुत्र के शरीर पर केसरिया बाना पहिनाया, कमर में तलवार या सिर पर राजपूती फेटा गधा और युद्ध के लिए रवाना कर दिया।

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कहाँ माता और उस राजपूत-बाला के स्नेह के कारण जिसका कुछ समय पूर्व उसने पाणिग्रहण किया था पुत्र का हदय न डोल जाय, इसलिए योर जननी ने अपने शरीर को भी शस्त्रों से सुसज्जित किया, अपनी पुत्र-वधू के शरीर पर अपने हाथों से शस्त्रों कार किया और दोनों वीरांगनायें घोड़ी पर सवार होकर उसी मैदान में हु जिसमें पताजी काम आये।

आश्चर्य और अभिमान के साथ मेवाड़ की रा में सत् राजपूतों ने उन योरांगनाओं को शत्त क गोलियों से आहत होकर गिर जाता। पिताजी अकबर के आखिरी में मरत दायियों से लेते हुए काम आये। उदय सिंह का कलंक मेमा के पर सेजल और पत्ता के रुधिर ने दे दिया। यह यु काम आया, करना उनका नाम मेवाड़ के ही ना, अपितु भारत के इतिहास में अमिट अक्षरों में लिखा जाकर अमर हो गया जादू यह है जो सिर पर चढ़कर बोले। वीरता यह है, जिसे शत्रु भी सराहे।

मेवाड़ को रक्षा में राजपूतों ने वीरता दिखाई, उसकी प्रशंसा मुसलमान लेखकों ने भी की है। अकबर तो उससे इतना प्रभावित हुआ कि जयमल और पत्ता की मूर्तियाँ बनवाकर अपने किले के द्वार पर स्थापित की यीर ही चोर का आदर कर सकता है अकबर ने वीर-युगल का आदर करके वह सिद्ध कर दिया कि वह सच्या वीर है। मेवाड़-विजय के अन्तिम दृश्य रोमांचकारी है। जब राजपूतों को निश्चय हो गया कि किले की रक्षा असाध्य है तब उन्होंने संसार का मोह त्यागने के लिए अपनी स्त्रियों को अग्रि देवता को अर्पण कर दिया।वह तोसरे साके में जौहर बड़ा भयंकर था।

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अंत में किले के दरबाजे खोल दिए गए

कई सौ राजपूतानियाँ राख के ढेर में शामिल हो गई इधर से निश्चिन्त होकर राजपूतों ने केसरिया थाना पहिना, विजया चढ़ाई और नंगी तलवारें हाथ में लेकर शहर में डट गए किले का दरवाजा खोल दिया गया ताकि शत्रु ये रोक-टोक अन्दर आ सके। पौह फटते ही मुगल सेना चित्तौड़ दुर्ग में प्रवेश करने लगी। दरवाजा खुला पाकर समझा कि बे रोक-टोक अन्दर तक चले जायेंगे, परन्तु अन्दर पुसकर देखा तो सामने राजपूतों की छातियाँ दीवार की तरह रास्ता रोके हुए है शाही फौज की गति रुक गई। जान पर खेलने वाले सूरमों को छातियों को लाँघकर जाना असम्भव प्रतीत होने लगा। तब अकबर ने दूसरे शस्त्र का प्रयोग किया।

लगभग डेढ़ सौ मस्त हाथी राजपूतों पर छोड़ दिये गये उन पर्वतों के साथ पैदल राजपूत जिस वीरता से लड़े उसकी प्रशंसा मुसलमान लेखकों ने भी शतमुख से की है। यदि एक-एक मस्त हाथी ने कई-कई राजपूतों को कुचला, तो एक-एक राजपूत ने भी कई कई हाथियों के सूँड काट डाले। मधुकर नाम का हाथी बेतरह हत्याकाण्ड मचा रहा था। ईश्वरदास चौहान हाथ में नंगी तलवार लिये लपककर आगे बढ़ा और महावत से हाथी का नाम पूछा। महावत के नाम बतलाने पर एक हाथ से हाथी का दाँत पकड़ लिया और दूसरे हाथ से भरपूर वार करते हुए कहा कि “राजाजी।

तीसरा साका

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हमारी मुठभेड़ का हाल कदरदान बादशाह को जरूर सुनाना।” एक हाथी ने १५ राजपूतों को मारा और २० को घायल किया या। एक निडर राजपूत को यह देखकर क्रोध आया। उसने एक हो हाथ में उसका सूड का डाला। इस तरह की अमानुपिक वार्ता देखाकर अकबर भी चकरा गया. और उसने ३००० और मस्त हाथियों को छोड़ने का हुक्म दिया। यह काले बादल राजपूतों पर बुरी तरह उमड़ पड़े। राजपूत पोखे नहीं हटे, परन्तु कीण हो गये आखिर यह इन अम्ये पहाड़ों से कहाँ तक लड़ते।

राजपूत सेनापति पिता ने जय देणा कि हाथियों के मारे सर्वनाश हुआ चाहते हैं, तब वह अपने आपको न रोक सका। कुछ चुनेहुए सरकार को साध लोफर उन पर टूट पड़ा। वह अमानुषिक बहादुरी से लड़ा, परन्तु हाथियों का पार न पा सका। थकान से चूर होकर गिर पड़ा। उसे महावत ने हाथी के सूँ में लपेटकर बादशाह के सामने हाजिर किया। बहादुर पत्ता थोड़ी देर बाद मर गया। सेनापति के मारे जाने पर राजपूत और अधिक जोश में आये और बाघों की तरह शाही सेना पर टूट पड़े। अब तो अकबर भी घबरा गया और उसने अपनी सेनाओं को कत्लेआम का हुक्म दे दिया।

वह कत्लेआम अकबर के यश पर काला धब्बा बनकर बैठा है उस घोर हत्याकाण्ड में ३० हजार आदमी काम आये, जिनमें लड़ाकू राजपूतों के अतिरिक्त साधारण प्रजा भी बहुत थी। कहते हैं कि उस दिन के संग्राम में जो हिन्दू मारे गये, उनके जनेउओं का तोल साढ़े सत्तावन मन था। उसी दिन से राजपूताने में साढ़े सत्तावन का अंक अनिष्ट हो गया है। यदि किसी लिफाफे पर यह निशान कर दिया जाय तो उसे कोई दूसरा नहीं खोल सकता, समझा जाता है कि जो खोलेगा, तो उसे तीसरे साके का पाप लगेगा। धीरे-धीरे चित्तौड़ का किला जनविहीन हो गया। उसमें लाशें ही लाशें दिखाई देती थी। एक ओर राजपूतानियों की राख के देर पड़े थे, दूसरी ओर राजपूतों का लह नदी की तरह बह रहा था सारे किले में एक भी ऐसा राजपूत जीवित नहीं था, जो हाथ में तलवार से सकता। सब धर्म और देश की रक्षा में काम आ चुके थे।

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उस समय अकबर का चित्तौड़गढ़ पर अधिकार हुआ। संसार के इतिहास में वोर के दृष्टान्त तो बहुत हैं, परन्तु चित्तौड़गढ़ के रक्षक राजपूतों को योर की समानता उनमें से शायद ही कोई कर सके। वह हार गये तो क हुआ, पर इतिहास में वही विजयी समझे जायेंगे, क्योंकि उन्होंने अप घरवार की रक्षा में बहादुरी से आत्मसमर्पण कर दिया। जिन्हें प्रत्यक्ष विजय प्राप्त हुआ इतिहास उन्हें हारे हुए मानेगा, क्योंकि उन्होंने हामि की दीवार के पीछे खड़े होकर दूसरों के अधिकारों को कुचला अपराध वीरों और वीरांगनाओं की हत्या का पाप सिर पर लिया। इतिहास में इस दिन के शहीद राजपूत हो जीवित रहेंगे।