शाहजहाँ और जहाँगीर: अकबर के बाद के मुग़ल साम्राज्य की कहानी

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इस विवाह के पीछे हम जहाँगीर को ‘कैदी बादशाह’ कह सकते हैं। वह नूरजहाँ के रूप का कैदी था। इसमें आश्चर्य भी क्या है कि जो आदमी विषयों का और इन्द्रियों का दास हो, वह एक चतुर और सुन्दर स्त्री का दास बन गया फिर इसमें भी क्या आश्चर्य है कि जो बादशाह विषय, इन्द्रिय और सुन्दरता का कैदी हो, वह अपने नौकर का भी कैदी बन जाय। अकबर के पुत्र को यह दिन भी देखना था कि वह अपने सेनापति का कैदी बनकर रहे। कारण यह था कि जहाँगीर अपना स्वामी आप नहीं था। मद्य और विषय-सेवा ने उसे बहुत निर्वल कर दिया था। मुसलमान इतिहास लेखक मुहम्मद हाजी ने लिखा है

“धीरे-धीरे वह (नूरजहाँ) साम्राज्य की असली स्वामिनी बन गई और बादशाह उसके हाथ की कठपुतली बन गया वह प्रायः कहा करता था कि नूरजहाँ बेगम को देश के शासन के लिए चुना गया है और वह काफ़ी बुद्धिमत्ता से शासन को चला रही है मुझे तो शरीर रक्षा के लिए शराब की एक बोतल और कबाव के कुछ टुकड़ों को जरूरत है ।” जो मनुष्य अपने मुंह से ऐसी घोषणा कर रहा हो, उसे हम किदी बादशाह करें तो क्या आश्चर्य है ?

नूरजहाँ चतुर थी और हुकूमत करने के लिए पैदा हुई थी। प्रारम्भ में उसका आधिपत्य देश के लिए अच्छा ही सिद्ध हुआ। वह प्राय: अपने पिता की सलाह से काम करती थी। यह इस समय बजीरे आम था। एक वयोवृद्ध और बहुदर्शी अमात्य को सलाह से जो काम किये जाते है वह अच्छे ही होते हैं । जब तक मिर्जा गयास जिया, शासन की किश्ती भंवरों से बचती रही। नूरजहाँ की चतुरता और गयास की धोरता का मिश्रण राज्य के लिए अमृत सिद्ध हुआ परन्तु गयास की मृत्यु हो जाने पर नूरजहाँ को तीव्र प्रतिभा और रावण स्वभाव ने राज्य की किश्ती को किन-किन भवरो में फंसाया और किन-कनि चट्टानों से टकराया, यह इतिहास के पत्रों में पढ़िए। आगे हम जहाँगीर के राज्यकाल के इतिहास का जो सरसरी निरीक्षण करते हैं उससे इस सचाई की जोरदार पुष्टि हो जायेगो कि जिस राज्य में नाम का राजा एक और काम का राजा दूसरा है, वह एक ऐसे महल के समान है, जिसकी नींव एक जगह खुदी हुई है और दीवार दूसरी जगह बनी हुई है। ऐसा राज्य भूकम्प के छोटे-से धक्के को भी बर्दाश्त नहीं कर सकता। अकबर के राज्य-काल के अन्तिम दिनों में बंगाल विद्रोह का लीलास्थल बना हुआ था। जहाँगीर के राज्य काल के आरम्भ में विद्रोह का नेता उस्मान मर गया, जिससे विद्रोह भी शान्त हो गया।

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अकबर के समय जो कार्य अधूरे ट गये थे, उसमें से एक उदयपुर रियासत को विजय करना था अपने राज्य के अन्तिम वयों में अकबर ने मेवाड़ की ओर से आँख फेर ली थी। उसने उपर देखना हो बन्द कर दिया था। कहाँ तो चित्तौड़ के लिए लालायित हो रहा था और कहाँ वर्षों तक उसकी सुध न ली। कई लेखकों का विचार है कि प्रताप की वीरता और आपत्ति ने मुगल-सपाट के ददय को मोम बना दिया था। अन्य लेखकों ने यह सम्मति दी है कि मेवाड के पहाड़ों और जंगलों में हजारों सिपाहियों को मरने के लिए भेजना अकबर को सार्थक प्रतीत नहीं हुआ। मेवाड़ पर आक्रमण करने में उसे व्यय अधिक लाभ कम दिखाई देता था। कोई भी कारण हो इसमें सन्देह नहीं कि राणा को आयु के अन्तिम वर्ष थेफिक्री से कटे महाराणा के प्राणान्त के पश्चात् उनका पड़ा पुत्र अमरसिंह गद्दी पर बैठा अमरसिंह भी अपने पिता की तरह बलवान् वीर था, यद्यपि यह कहना कठिन है कि उसमें पिता के समान ही धैर्य और तत्परता की मात्रा भी विद्यमान मी। राणा अमरसिंह के गद्दी पर बैठने के आठ वर्ष बाद सम्राट अकबर का भी देहान्त हो गया।

अमरसिंह ने शान्ति का अवसर पाकर राज्य-व्यवस्था स्थापित करने का प्रयत्न किया भूमि-कर नये सिरे से लगाया गया और सरदारों को राज्य की सेवा के अनुपात से जागीरें बाँटी गई सरदारों तथा अधिकारियों को सेना और योग्यता के अनुसार श्रेणियों में बाँटा गया। राज्य की स्थिरता को बढ़ाने के लिए और भी अनेक उपाय किये, जिनकी सूचना प्रजा को शिलास्तम्ी द्वारा दी गई थी। आज्ञाओं से अंकित शिलास्तम्भ राज्य के भिन्न-भिन्न भागों में खड़े किये गये थे।

इधर अकबर के उत्तराधिकारी के हृदय में यह लालसा उत्पन्न हुई कि जिस काम को पिता ने अधूरा छोड़ दिया है, उसे पूरा किया जाये । जहाँगोर अपने मुकुट में एक हीरा लगाना चाहता था जो अकबर को नसीब न हुआ था। उसने मेवाड़ का मान मर्दन करने का निश्चय करके खानखाना के भाई के अध्यक्षता में एक बड़ी सेना उदयपुर की ओर रवाना की।

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यह समाचार उदयपुर पहुँचा तो सरदार लोग सावधान होने लगे । उन्हें यह प्रतिज्ञा स्मरण हो आई, जो मृत्यु-शय्या पर लेटे हुए राणा प्रतापसिंह के सम्मुख उन्होंने की थी। राणा के हृदय में अपने पुत्र की ओर से सन्देह उत्पन्न हो गया था एक बार जब राणा का बसेरा जंगल की झोंपड़ियों में था तब अमरसिंह की पगड़ी का एक किनारा बॉस में फंस गया। अमरसिंह इतने ही से झुंझला उठा। शान्तिपूर्वक पगड़ी के छोर को छुड़ाने के स्थान पर वह उसे खाँचता हुआ चला गया इस दृश्य ने राणा के हृदय में अशान्ति पैदा कर दी। वह सोचने लगे कि क्या अमरसिंह उन सब कष्टों को धैर्यपूर्वक सहन कर सकेगा, जो मेवाड़ की मान-रक्षा के लिए आएंगे? इसी सन्देह को मिटाने के लिए राणा ने सरदारों से शपथ ली थी। राणा का सन्देह सच्चा सावित हुआ।

जहाँगीर के सेना सन्नाह के समाचार ने अमरसिंह को फौजो शिविर में नहीं, विलास-भवन में मस्त पाया। यह दशा देखकर राजपूत सरदार इकट्ठे हुए और राणा को मोह-न्द्रिा से जगाने के लिए उसके अन्तःपुर में हाजिर हुए। वहाँ जाकर देखने पर राणा को आमोद प्रमोद में मग्न पाया। भवन में विलायत का बना हुआ एक बड़ा शीशा रखा था। सरदारों की दृष्टि उसकी ओर गई। चन्द्रावत सरदार ने प्रतापसिंह के पुत्र को ललकार कर पिता के आदेश को पालन करने के लिए कहा, परन्तु इतने से भी अमरसिंह में स्फूर्ति पैदा न हुई। सुख-निद्रा का भंग हो जाने से उसके माथे पर त्योरी दिखाई दी। सलुम्वरा का तेजस्वी सरदार अपने स्वामी के इस प्रमाद को न सह सका। गलीचे को दबाने के लिए पीतल का एक बोझ रखा हा था। उसे उठाकर उसने पूरे जोर से वीरता की शत्रु विलासिता के चिहस्वरूप उस आइने पर मारा, शीशा चकनाचूर हो गया, और उसके साथ अमरसिंह का मानो हृदय भी उत्तेजित हो उठा।

सलूम्बरा ने उत्तेजित राणा को हाथ से पकड़कर सिंहासन से नीचे खींच लिया और बाहर लाकर घोड़े पर सवार करा दिया। रण भेरी बजने लगी, राजपूत वीरों की तलवारें म्यान में खनखताने लगी और शत्रु पर चढ़ने के लिए अधीर हो घोड़े हिनहिनाने लगे राणा अमरसिंह अभिमान और तिरस्कार के भाव से अन्धा हो रहा था। उसने सलूम्बर को भला-बुरा कहा और द्रोही तक ठहराया, परन्तु सरदारों की इच्छा का प्रतिरोध करने की उसमें शक्ति न थी। बुत की तरह घोड़े पर सवार होकर सेनाओं के आगे चला जा रहा था राणा प्रतापसिंह के उत्तराधिकारी की आँखों से अपमानजनित क्रोध सूचक आँसुओं की धारा बह रही थी।

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अश्रुजल ने क्रोध के मैल को धो दिया। अभी दूर न गये थे कि अमरसिंह का हृदय शान्त हो गया। सारी परिस्थिति उसके सामने आ गई। उन रूखे परन्तु बहादुर सरदारों के प्रति कृतज्ञता का भाव चित्त में उत्पन्न हो गया और क्रोध के आंसुओं का स्थान कृतज्ञता के आँसुओं ने ले लिया। एक बार मोह-निद्रा के टूट जाने पर अमरसिंह ने अपने आपको प्रतापसिंह का योग्य पुत्र सिद्ध कर दिखाया। उसने शाही फौजों को कई लड़ाइयों में पराजित किया। रनपुर की लड़ाई में मुगल सेना का सर्वनाश हो ही गया। जहाँ कहीं मुसलमान सेनाओं की राजपूतों से मुठभेड़ हुई, वहीं उन्हें मुँह की खानी पड़ी। मुगल सेनायें समुद्र की लहरों की तरह उमड़कर आती थीं और राजपूती चट्टान से टकराकर लौट जाती थीं, परन्तु मुगल-सामाण्य को जनशक्ति और शक्ति इतनी अधिक थी कि एक लहर के टूटते ही दूसरी लहर फिर उठती थी। जहाँगीर ने मेवाड़ को जीतने का संकल्प कर लिया था। इस कारण यह सेना पर सेना भेज रहा था।

फिर भी मेवाड़ का सिर नीचा न हुआ। तब जहाँगीर ने भेद-नौति से काम लेने का निश्चय किया। राणा प्रताप के विद्रोही भाई सागरसिंह को मेवाड़ की गद्दी का प्रलोभन देकर मुट्ठी में कर लिया और राजतिलक करके मुसलमान फौजों के साथ चित्तौड़ के खण्डरात में हुकूमत करने के लिए भेज दिया। एक ही भूमि की कोख से कोयला और होरा दोनों उत्पन्न होते हैं। प्रताप और सागर भी भाई भाई थे सागरसिंह ने अपने देश और धर्म का द्रोह करते हुए जहाँगोर जहाँगोर की प्रेरणा से चित्तौर का राजा बनना स्वीकार कर लिया, परन्तु शाबाश है उन राजपूत सरदारों को जिन्होंने शाही प्रसन्नता का प्रलोभन होने पर भी अमरसिंह का साथ न छोड़ा। एक भी मशहूर सरदार सागरसिंह के पक्ष में न गया सात वर्ष तक जातिद्रोही सागरसिंह ने चित्तौड़ में राज्य किया।

चित्तौड़ चे- आबाद पड़ा था। राजपूतों ने उसे छोड़ दिया था इस नये राजा के ७ वर्षों के परिश्रम से भी उन इमारतों में जान न पड़ सकी। सागरसिंह उन मोनारों और राजपूतों की रक्तधाराओं से अभिषिक्त वह जाति के गौर-स्तम्भ सजने की जगह अधिक अधिक भयावने प्रतीत होते थे उन इमारतों के पीछे से मुंह निकाल कर ऐतिहासिक राजपूत वीर सागरसिंह को लज्जित करते थे और कहते हैं कि भैरों ने साक्षात् दर्शन देकर उसे धमकाया था। भैरोंजो ने दर्शन देने के लिए कैलाश से चित्तौड़ तक की यात्रा की हो या न की हो, पर इसमें सन्देह नहीं कि अपराधी की अपनी आत्मा उसे लज्जित कर रही थी। सात वर्ष तक बे आबाद चित्तौड़ के खण्डरात में हुकूमत चलाकर सागरसिंह की अन्तर्रात्मा में घृणा पैदा हो गई। उसने अपने भतीजे अमरसिंह के पास चित्तौड़गढ़ की चाबियाँ भेज दी और स्वयं जंगल का मार्ग ले लिया। कुछ दिनों बाद जय वह बादशाह के दरबार में हाजिर हुआ तो उसने सागरसिंह को ऐसे कुत्सित शब्दों में फटकारा कि वह सहन न कर सका और वहीं पर छुरा निकालकर अपनी हत्या कर डाली।

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भेद-नीति में निष्फल प्रयत्न होकर भी जहाँगीर ने हिम्मत नहीं हारी। पराजित भारत में एकमात्र स्वाधीन रियासत का मान-मर्दन करने के लिए उसका चित्त व्याकुल हो गया था। अजमेर में एक बृहद् सेना एकत्र को गई और राजकुमार परवेज को उसका नायक बनाया गया। बादशाह ने परवेज को युद्ध के लिए भेजते हुए निर्देश किया था कि यदि राणा दोस्ती करना चाहे, तो उसका आदर-सत्कार के साथ स्वागत किया जाय। इस बार मुगल-सेनाओं का सन्नाह जबर्दस्त था, पुराने और अनुभवी सेनाध्यक्ष परवेज के साथ भेजें गये थे। राजपूतों के सिरमौर ने खत्रोट में शाही सैन्य का स्वागत किया।

रक्त की नदियाँ बह गईं, दोनों हो ओर से वीरता के करिश्मे दिखाये गये शाही सेना संख्या से अधिक थी, परन्तु फिर एक बार शूरता ने संख्या पर विजय प्राप्त किया और मुसलमान सेना पीठ दिखाकर भाग निकली। राजकुमार पेचीदा घाटी में फंसकर दुश्मन के हाथ में पड़ते-पड़ते बचा। उसकी सेना में फूट पड़ गई। जिसे जिधर मार्ग मिला, उधर ही अजमेर की ओर भाग निकला। जहाँगीर को मेवाड़ का मान-मर्दन करने में फिर एक बार निराश होना पड़ा। मेवाड़पति का मस्तक उस समय सारे भारतवर्ष के शासकों से ऊँचा हो गया था यह उसके गौरव का यौवन काल था। जहाँगीर ने मेवाड़ के विरुद्ध १७ बार सेनायें भेजों और १७ बार हा

राजपूत-वीरता की दीवार से टकराकर उन्हें लौट आना पड़ा। परन्तु हरेक नई लड़ाई मेवाड़पति की तलवार को कमजोर करती जाती थी और उसकी दाल में छेद करती जाती थी हरेक युद्ध में जो वीर मर जाता था, उसको स्थानपूर्ति नहीं हो सकती थी, क्योंकि क्षेत्र परिमित था और धन का अभाव था। दूसरी ओर अनन्तकोप और विस्तृत भारतदेश का बल था। सी की जगह हजार और हजार की जगह लाख आने को तैयार थे। १७ लड़ाइयों में राजपूताने के चुने हुए यीर- रल काम आ गये, पर जहाँगीर की अगणित सेना पर कोई असर न पड़ा। वह बार-बार पराजय से खीझ गया, और अन्तिम फैसला करने के लिए उसने सब कठिनाइयों को हल करने वाले, सब मजों की दया भाग्यशाली पुत्र खुर्रम को मेवाड़-विजय के लिए रवाना किया।

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पहली सब सेनाओं की अपेक्षा बृहती सेना एकत्र की गई राजकुमार खुर्रम के चुनाव के लड़ाके उसके साथ दिये गये उधर राणा ने भी रण की भेरी बजाकर वीरों को इकट्ठा करने को चेष्टा की परन्तु वहाँ वीर थे कहाँ ? अधिकांश वीर युद्ध भूमि में काम आ चुके थे राजपुताने का खजाना या तो आक्रमणकारी के हाथों लुट चुका था या आत्म-सम्मान और वंशमर्यादा को त्यागकर दासता स्वीकार कर चुका था।

राणा अमरसिंह और युवराज करणसिंह के आमन्त्रण पर केवल मुट्ठी भर वीर इकट्ठे हुए। तो भी बहादुरों ने जी नहीं छोड़ा। धर्म और जन्मभूमि को रक्षा के लिए शत्रु से भिड़ गये, परन्तु खुर्रम परवेज नहीं था। वह अनुभवी और भाग्यशाली सेनापति था राणा के थोड़े से लड़ाके खुर्रम के जनप्रवाह के साथ न खड़े हो सके। वह बन्द, जो कई वर्षों तक मुगल-सेना के बरसाती नाले को रोक रहा था, अन्त को टूट गया। उस समय प्रताप और अमर में जो भेद था, वह प्रकट हो गया। अमरसिंह प्रताप नहीं था कि सर्वथा पराजित और निर्बल होकर पराधीन होने की जगह बनवासी बनना पसन्द करता । अमरसिंह ने पराजय को स्वीकार कर लिया, स्वयं खुर्रम के पास हाजिर गोर अधीनता स्वीकार की और अपने पुत्र कर्णसिंह को जहाँगीर के दरबार में भेज दिया।

इस प्रकार मेवाड़ के शासक मुगल-सम्राट् के सामन्तों को श्रेणी में सम्मिलित हो गया, परन्तु जिस बहादुरी से राजपूतों ने सुदीर्घ समय तक मुगल शक्ति का सामना किया, उसका सुफल मिले बिना न रहा। मेवाड़पति ने स्वयं राजधानी में जाकर सामन्तों में बैठने की अनिच्छा प्रकट की। इस इच्छा का आदर करके राणा को दिल्ली जाने से मुक्त किया गया। युवराज का दिल्ली में जो सम्मान हुआ, वह किसी दूसरों रियासत के प्रतिनिधि को प्राप्त नहीं हुआ था बादशाह की ओर से उसे प्रायः प्रतिदिन भेटें दी जाती थीं और दरबार में ऊँचा आसन प्राप्त होता या। जब युवराज कर्णसिंह कुछ दिनों तक दरबार में रहकर अपने घर की ओर वापस गया, तब वह सम्राट् की प्रसन्नता सूचक खिलतों और इनामों से लदा हुआ था। इस प्रकार यह मेवाड़ विजय का स्वर्ण पदक भी राजकुमार खुर्रम की छाती पर लटकाया गया।

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