October 31, 2020
साम्राज्य के आधार

साम्राज्य के आधार

अकबर ने अपने साम्राज्य की स्थापना बहादुरी से की और उसकी स्थिरता और रक्षा का प्रबन्ध पारदर्शिता पूर्ण नीति से किया। उसके जीवन में एक भी ऐसा युद्ध नहीं है, जिसमें अन्तिम विजय उसे प्राप्त न हुआ हो। हम देख आये हैं कि उस समय के सबसे बढ़िया वीर राजपूतों को साम्राज्य के आधार उसने किस धैर्य और वीरता से परास्त किया अन्य सब युद्धों में भी उसे सफलता है प्राप्त होती रही। वह भाग्य का लाडला बेटा था। मेवाड़ को छोड़कर और कहीं उसे विजय में सन्देह भी नहीं हुआ, और राणा प्रताप को छोड़कर और कोई ऐसा शत्रु उससे अपराजित नहीं रहा, जिसे उसने जीतने का उद्योग किया।

बड़ी से भी बड़ी सेना का संचालन करने में सक्षम

वह स्वयं वीर था, दूसरों में चोरता भर सकता था और इतना दिमाग रखता था कि बड़ी से बड़ी सेना का संचालन कर सके। यही कारण था कि वह प्रान्त के पीछे प्रान्त को जोतता गया, और जो एक प्रान्त एक बार हाथ में आ गया, उसे वापिस नहीं छोड़ा। जिस समय वह गद्दी पर बैठा, उसका राज्य शून्य के बराबर था। सरहद को लड़की ने उसे नाम मात्र को दिल्ली और पंजाब का हाकिम बना दिया था। परन्तु जय तक आसपास के प्रदेशों पर शत्रुओं का राज्य था तब तक इस छोटी-सी हुकूमत को सुरक्षित नहीं समझा जा सकता था।

१५५८ में ग्वालियर जीता गया १५६१ में अफगानों के हाथ से लखनऊ और कानपुर छीन लिये गये १५६२ में मालवा साम्राज्य में शामिल हो गया और १५६७ में चित्तौड़ फतह किया गया १५७२ में गुजरात और १५७५ में बंगाल को जीतकर मुगल-साम्राज्य में मिला लिया गया। गुजरात में फिर विद्रोह हो गया १५८४ में दूसरी बार उसे जोतकर अकबर ने कई वर्षों के लिए शान्त कर दिया। १५८७ में काश्मीर, १५९० में उड़ीसा, १५९२ में कन्दहार और १६०० में खानदेश मुगल-साम्राज्य के अंग बन गये इस प्रकार मृत्यु के समय भारत के दक्षिण भाग को और मेवाड़ के कुछ जंगली हिस्सों को छोड़कर शेष सम्पूर्ण भारतवर्ष अकबर के राजदंड के सामने सिर झुकाता था।

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साम्राज्य के आधार

अकबर को सब लड़कियों का मनोरंजन वृत्तांत सुनाना इस ग्रन्थ का उद्देश्य नहीं है। हमें अकबर के जीवन की पटनाओं से उतना ही सम्बन्ध है जितना एक साम्राज्य के उदय और अस्त के इतिहास-लेखक का साम्राज्य को स्थापना करने वाले के जीवन की घटनाओं से होना चाहिए। हमारे लिए इतना जान लेना पर्याप्त है कि अकबर वड़ा बहादुर और प्रतिभा सम्पन्न सेनापति था। वह अपने समय का सबसे अधिक बहादुर तो नहीं, परन्त सबसे अधिक युद्ध-कुशल योद्धा अवश्य था। वह हार को जीत में परिणित कर सकता था, दस को सौ से लड़ा सकता था और अपने पैरों से, घबराये हुये शत्रु को, बिना हथियार मार सकता था। मुगल साम्राज्य की स्थापना अकबर की योग्यता के बिना असम्भव थी।

जो राज्य वीरता से स्थापित किया गया, उनकी रक्षा और स्थिरता दूरदर्शिता पूर्ण नीति से की गई अकबर युद्धों के कारण उतना ख्यात नहीं है, जितना विचार और नोति के कारण राजकार्य में वह संसार घेरे के अन्दर नहीं रह सकता था “मेरी बात सर्वांश में सत्य है और दूसरे की बात सर्वांश में झूठी है” ऐसा समझने के लिए जो मूढ़तापूर्ण आत्मविश्वास चाहिए, अकबर में उसका अभाव था। इसका यह अभिप्राय नहीं कि उसमें धार्मिक पुरुषों के प्रति श्रद्धा नहीं थी। उसे विश्वास था कि उसका बड़ा पुत्र सलीम एक औलिया के आशीर्वाद से पैदा हुआ है, उसने उस औलिया की कुटिया की मूर्ति फतेहपुर सीकरी का महल और किला बनाकर अमर कर दी। अजमेर में चिश्ती की दरगाह पर सैकड़ों मील की दूरी से जाकर प्रति वर्ष नहीं तो दूसरे-तीसरे वर्ष सिर नवाना उसने अपने कर्तव्यों में समझ रखा था।

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उसे फलित ज्योतिष पर विश्वास था, वह कभी-कभी जादू-टोनों की ओर भी झुकता था, परन्तु इन बातों से केवल यह साबित होता है कि उसके हृदय की प्रवृत्ति धार्मिक थी, और कि वह अन्य सब महापुरुषों की भाँति समय का पिता होने के साथ-साथ समय का पुत्र भी था जो बातें उसमें और अन्य मुसलमान राजाओं में समान थीं; वह समय, कुल और मजहब की दी हुई थीं; जो बातें उसमें विशेष थी; वह उसकी थीं: अकबर उन्हीं के कारण महान था। अकबर भारतवर्ष के मुसलमान बादशाहों में से पहला बादशाह था, जिस के असली निवासियों के सहयोग को अंगीकार किया। राजा बिहारीलाल और राजा भगवानदास और बाद में मानसिंह ने अकबर की तन-मन से सेवा की।

अकबर ने अनुभव किया कि जहाँ बैरमखाँ और आदमियों जैसे कृत्न मुसलमान भी हो सकते हैं, वहाँ राजा भगवानदास और राजा मानसिंह जैसे स्वामिभक्त हिन्दू भी विद्यमान हैं। उसके हृदय ने कहा कि भलाई और सच्चाई किसी एक मज़हबी दायरे के अन्दर सीमित नहीं है, वह सब जगह पाई जाती है। यहाँ से अकबर के धार्मिक विचारों में क्रान्ति का बीज बोया गया। उस बीज को फैजी और अबुल फजल ने सूफी विचारों के जल से सींचकर अंकुरित और पल्लवित किया। यह दोनों भाई वेदांत मुसलमान थे दोनों ही मालिक के सामदी परन्तु और सब प्रकार से उदार थे यह दोनों अकबर के सलाहकार, मन्त्री और लेखक थे इनके विचारों की उदारता ने अकबर की धार्मिक विचार-क्रान्ति पर हुआ बड़ा असर डाला।

विचार-क्रान्ति का पहला अध्याय जिज्ञासा से आरम्भ हुआ। फतेहपुर छोकरी के मशहूर इबादतखाने में हर सातवें रोज भिन्न-भिन्न धर्मों के पण्डित इकट्ठा किये जाते थे मुसलमान मौलवी, हिन्दू पण्डित, ईसाई पादरी, बौद्ध भिक्षु और पारसी गुरु अपने-अपने पक्ष का समर्थन करते थे।बादशाह की ओर से अबुल फजल मन्त्री का कार्य करता था यह बहस के लिए सवाल सामने रखता था और मौका पाकर ऐसे शोशे छोड़ देता था कि भिन्न-भिन्न धर्मों के अनुयायो अपने पक्ष का समर्थन छोड़कर परस्पर गाली-गलौज पर उतर आते थे। अकबर मजहबी गुरुओं को मूर्खता का तमाशा देखता था। जब बादशाह फतेहपुर सीकरी में होता था, तब सातवें दिन के शास्त्रार्थ अवश्य होते थे। कई वर्षों तक जि्ञास बादशाह धर्मों के पण्डितों की युक्तियों को ध्यानपूर्वक सुनता रहा।

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वह अनपढ़ था, कान ही उसकी आँखें थीं, और इतिहास की गवाही से मालूम होता है कि किसी आँख से किताबें पढ़ने वाले ने इतना विस्तृत अध्ययन नहीं किया जितना गहरा और विस्तृत अध्ययन अकबर ने किया था। भिन्न-भिन्न धर्मों के वाद-विवाद में से उसने यह सार निकाला कि हरेक धर्म में सच्चाई का अंश विद्यमान है; हरेक धर्म में सच्चाई को रूढ़ि, डोंग और कल्पना के खोल में ढकने का यत्न किया गया है। आँखों वाला आदमी उन ढकनों के अन्दर छुपी हुई सच्चाई को सब जगह देख सकता है। परन्तु ना-समझ लोग सच्चाई को छोड़ रूढि, दोग और कल्पना के जाल में ही उलझ जाते हैं।

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वाद-विवाद ने अकबर के धार्मिक उदारता को और भी अधिक पुष्ट कर दिया। इस्लाम उसे बहुत ही संकुचित और अधूरा प्रतीत होने लगा हिन्दू धर्म, जैन धर्म और ईसाइयत के धार्मिक विचारों में से उसने बहुत-सी काम की बातें चुन लो। वेदान्त के उपदेश उसे बहुत भाते थे जैसुइट सम्प्रदाय के पादरियों को उसने कई बार निमन्त्रण दिया। कभी-कभी तो लम्बी युद्ध यात्राओं में भी भिन्न-भिन्न धर्मों के विद्वान् पूरे लावलश्कर के साथ घसीटे जाते थे। विचारों का असर व्यवहार पर भी पड़ने लगा। मुसलमान बादशाहों की कट्टर इस्लाम भक्ति उन्हें मनुष्यों के चित्रों का विरोधी बनाती थी, परन्तु अकबर की ख्वायगाह में चित्रों की भरमार तो। अकबर चित्रकला का प्रेमी था।

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बड़े-बड़े कई चित्रकार उसके परिवार के साथ हमेशा रहा करते थे उस समय के मुसलमान इतिहास-लेखकों ने स्वीकार किया है कि हिन्दू पत्रकार अन्य सब पत्रकारों से उत्कृष्ट थे। यह दादी मुंडाकर रखता था, जो इस्लाम की दृष्टि में एक अपराध है। यह सूर्य की पूजा करने लगा था। जब दरवार में दिया जलाया जाता था, तब यह सब दरबारियों के साथ खड़ा हो जाता था विशेष अवसरों पर वह माथे पर टीका लगाकर और हाथ में ब्राह्मणों से जनेऊ बैधवाकर दरवार में आया करता था। मुसलमान फकीर उसके यहाँ जितना आदर पाते थे, हिन्दू युवा उससे कम आदर नहीं पाते थे। धीरे धीरे उसने गाय का ध कानून से बंद कर दिया, पवित्र अग्रि के जलाये रखने की आज्ञा दे दी, और महल में होम करवाने लगा।

नये सार्वजनिक धर्म की बुनियाद डाली

मुसलमानों के प्रचलित संवत और तौलको रह कर दिया, और सबसे बढ़कर ‘दीने इलाही’ नाम के नये सार्वजनिक धर्म की बुनियाद डाली जो यद्यपि अकबर के साथ ही दफन हो गया, तो भी कुछ समय के लिए धार्मिक मतभेद की आग से जलते हुए हिंदुस्तान पर पानी की घंटी फेंक गया। दीने इलाही धर्म का सारांश यह था। परमात्मा एक है। मस्जिद, मन्दिर और कर्जे में उसकी पूजा होती है। समय का बादशाह (अकवर) मजहब के बारे में अन्तिम प्रमाण है नये धर्म के अभिवादन की शैलो भी नई थी। एक ओर से कहा जाता था, ‘अल्लाहो अकबर’। दूसरो ओर से कहा जाता था? ‘जल्ला जलाल ह’।

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इन दोनों का शब्दार्थ इतना ही है कि ‘परमात्मा महान् है। उसकी शान दिनों तक चमके’, परन्तु विशेषता यह है कि बादशाह का ‘जलालुद्दीन अकबर’ यह नाम एक इंग से उसमें प्रविष्ट हो गया है। इस नये धर्म का खलीफा स्वयं अकबर हो बना। १५८० ई० के फरवरी मास में यह नया खुतबा, जो खास मौके के लिए तैयार हुआ था पढ़ा जाता था उस रोज सरकारी तौर से नये धर्म की बुनियाद डाली जाने को थी। हजारों आदमी बादशाह के मुँह से नये खाये को सुनने को इकट्ठे हुए थे अकबर मिम्बर पर आरूष् हुआ और खुत्बा पढ़ने लगा। परन्तु रास्ते में हो डगमगा गया। भीड़ का असर हुआ, या नये मजहब की जिम्मेदारी का, यह कहना कठिन है, परन्तु सदा विजय बादशाह हार गया और खुतवा दूसरे आदमी को पढ़ने के लिए देकर बैठ गया।

नये धर्म में सब तरह के लोगों को निमन्त्रण दिया गया था हिन्दू, मुसलमान, ईसाई किसी के लिए रास्ता बन्द नहीं था यद्यपि अकबर ने नये धर्म के लिए बलात्कार का प्रयोग नहीं किया, तो भी प्रतीत होता है कि ऊँचे स्थान पर पहुँचने के लिए नया धर्म एक सोढ़ी अवश्य समझा जाता था। सब लोग जानते थे कि दीने इलाही को अंगीकार कर लेने से बादशाह प्रसन्न होगा। इतना होते हुए भी आश्चर्य है कि वहुत कम लोगों ने नया धार्मिक चोला पहिनना स्वीकार किया। मुसलमान दरबारियों में से कुछ थोड़े से लोग दीने इलाही में प्रविष्ट हो गये, परन्तु हिन्दुओं में से केवल एक राजा बीरबल ने ही अकबर को खलीफा स्वीकार किया। उस समय के हिन्दुओं की धार्मिक दृढ़ता का यह भी एक प्रमाण है।दीने इलाही का अधिक प्रचार नहीं हुआ परन्तु इसमें सन्देह नहीं कि उसने उस समय की राजनीतिक परिस्थिति पर बड़ा भारी असर डाला।

अबुल फ़ज़ल और कई अन्य इतिहास लेखकों ने सिद्ध करने का यल किया कि दोने इलाही मजहब इस्लाम की ही शाखा थी परन्तु इस नये मजहब का भली प्रकार निरीक्षण किया जाता है, तो यही परिणाम निकलता है कि वह इस्लाम के साथ बहुत ही कच्चे धागे से बंधा हुआ था।नये मजहब में आने के समय जिज्ञासा को यह लिखकर देना पड़ता था कि वह इस्लाम का त्याग करके दीने इलाही को स्वीकार करता है। वह एक नया मजहब है, जिसका रसूल अकबर मालूम होता है कि अकबर ने बाधित होकर ही अपने रसूल होने का दावा किया था। वह इस्लाम में सुधार चाहता था, पर उस मज़हय के रो और कुरान हदीस और मुजाहिद के ऐसे पड़े पड़े हुए थे, किसी का बाहर कदम रखना ही मुश्किल था तब इसने पैरों को तोड़ गिराने का ही निश्चय किया। रसूल के स्थान पर अपने आपको रख दिया।

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हदीस और मुजाहिद के ढकोसलों को तोड़ डाला इसके दो नतीजे हुए प्रथम तो कट्टर मुसलमान अकबर से असन्तुष्ट हो गये, और दूसरे अन्य धर्मावलम्बी लोग बादशाह के समर्थक वन गये यह इसी का परिणाम था कि जहाँ अकबर को हिन्दुओं के साथ जीवन भर में चित्तौड़गढ़ छोड़कर और कहीं लड़ाई नहीं लड़नी पड़ी, वहाँ मुसलमान विद्रोहियों के साथ, जिसमें उसके अपने भाई भी शामिल थे, जन्म भर लड़ना पड़ा। यदि वह अकबर न होता, कभी तख्त पर बैठा न रह सकता, धर्मान्य मुसलमान उसे गद्दी से उतार फेंकते, परन्तु वह भाग्य का धनी था। उसने जिधर अपने घोड़े का मुंह किया, उधर ही विजय हाथ बाधकर खड़ी हो गई। जिसने सिर उठाया, वही कुचला गया। फल यह हुआ कि धर्मान्ध मुल्ला या उनके गीत विद्रोही अकबर का बाल भी बाका न कर सके। मुसलमानों के निरन्तर विद्रोह का यह परिणाम हुआ कि अन्त में अकबर मुसलमानों से बहुत खीझ गया।

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कई लेखकों की तो सम्भति है कि अन्तिम दिनों में वह मुसलमानों पर जो दीने इलाही में शामिल नहीं हुए थे, अत्याचार करने लग गया था। जिसे मजहबी अत्याचार कहते हैं, वह अकबर ने कभी नहीं किया, परन्तु यह असंदिग्ध है कि मुसलमानों की धर्मान्धता से वह इतना तंग आ गया था कि साम्राज्य की रक्षा की खातिर कट्टर धर्मियों को ऊँचे पदों से अलग करने पर बाधित हो गया। मुसलमानों के विरोध ने अकबर को हिन्दुओं की गोद में फेंक दिया। वह स्वभाव से ही उदार था। दीने इलाही के जन्म से बहुत पूर्व हो राजा भगवानदास और राजा मानसिंह से उसकी दोस्ती हो चुकी थी। चित्तौड़गढ़ पर आक्रमण करने से पूर्व ही वह भावी जीवन के मार्ग का निर्माण कर चुका था।

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उसकी आयु २० वर्ष की थी, जब वह माहम अनगह की बेड़ियों से स्वतन्त्र हुआ। उसका पहला काम यह था कि लड़ाई में पकड़े हुए कैदियों को गुलाम बनाने की जो प्रथा प्रचलित थी, उसे बन्द कर दिया। कुछ समय बाद आम्बेर की राजकुमारी से उसका विवाह हो गया। १५६ में बादशाह शिकार के लिए मथुरा गया। वहां उसे बतलाया गया कि जितने यात्री स्नान के लिए हिन्दू तीर्थों पर जाते हैं. उनसे विशेषकर वसूल किया जाता है। अकबर को ऐसा कानून बिल्कुल वाहियात प्रतीत हुआ। उसने अपने वजीर को हुक्म दिया कि हरेक आदमी को अपने ढंग पर भगवान् की पूजा करने का अधिकार है, इस कारण केवल पूजा का तरीका भिन्न होने से कोई दण्ड का अधिकारी नहीं है।

अकबर एक कदम आगे बढ़ गया

सारी सल्तनत में हिन्दू यात्रियों पर जो कर लगाया जाता था, वह उसी दिन से मंसूख कर दिया गया। इस ‘कर’ के मंसूख होने से खजाने में करोड़ों रुपये की आमदनी कम हो गई एक वर्ष बाद अकबर एक कदम आगे बढ़ गया। हिंदुस्तान में मुसलमान बादशाहों ने सब गैर मुस्लिमों पर जजिया कर लगा रखा था यह कर खलीफा उमर के दिमाग से उपजा था। फिरोजशाह तुगलक ने कर लगाने के लिए ४०, २० और १० टंकों की तीन श्रेणियां बनाई हुई था। ब्राह्मणों को गरीब समझकर उनसे केवल १० टंक और ५० जीतल वसूल किये जाते थे इस ‘कर’ से खजाने को बेतहाशा आमदनी थी।

अकबर को यह एक धर्मान्धता का अत्याचार हो प्रतीत हुआ। उसने एक ही हुक्म से सारे देश से जजिया कर हटा दिया। यह याद रखने योग्य बात है कि उस समय अकबर की आयु केवल २१ वर्ष की थी। २१ वर्ष के अनपढ़ युवक का सदियों को इस्लामी रूढ़ि को एकदम तोड़ डालना सचमुच चमत्कार था। उस आदमी की इच्छा शक्ति फौलाद से भी अधिक मजबूत होनी चाहिए, जो चारों ओर से कट्टर मुसलमानों से घिरा रहकर भी गैर मुस्लिमों पर लगाये हुए कर को हटा सके। जिस प्रजा के क्षेम का श्रीगणेश ऐसा उत्तम हुआ, वह यदि दिनोदिन बढ़ता गया तो कोई आश्चर्य नहीं अकबर से पूर्व किसी मुसलमान बादशाह ने देश के असली निवासी-हिन्दुओं को सल्तनत में ऊँचा ओहदा देने का विचार नहीं किया था।

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उन्हें यह प्रस्ताव ही वहीदा प्रतीत होता, परन्तु युवा अकबर ने २१ वर्ष की आयु में ही समझ लिया था कि किसी देश पर तब तक स्थायी रूप से शासन नहीं हो सकता, जब तक उसके निवासियों को शासन में सम्मिलित न किया जाए। जो जाति हमेशा युद्ध के शिविर में बैठकर दूसरी जाति पर शासन करना चाहती है, वह सदा नाकामयाब होती है। अकबर ने शासन में ऊँचे से ऊँचे ओहदे देते हुए कभी यह विचार नहीं किया कि जिसे वह ओहदा दे रहा है, वह हिन्दू है या मुसलमान। अकबर के राज्य में सूबों के गवर्नर, या फौज की कमान का ऊँचे से ऊँचा पद हिन्दुओं के लिए बिल्कुल खुला था।

यह सुनकर हिन्दुओं का सर अवनत 

हिन्दू का मस्तक यह सुनकर अवनत हो जाएगा कि चित्तौड़गढ़ के जीतने में बादशाह को जितनी मदद राजा भगवानदास से मिली, उसको किसी दूसरे सेनापति से नहीं मिली, परन्तु इससे उस उदार बादशाह की नीति सफलता अवश्य हो औौति होती है। राजा भगवानदास, राजा मानसिंह, राजा टोडरमल, राजा बीरबल और तानसेन ने अपने-अपने ढंग पर अकबर की जो सेवा की और सहायता पहुँचाई, वह इतिहास के पृष्ठों में सूर्य की रोशनी की तरह चमक रही है।

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जिस समय मुसलमानों के मजहब जोश का तूफान अधिक से अधिक उम्र जाता था, उस समय बादशाह जिन लोगों पर भरोसा रखता था, उनमें हिन्दू सरदारों के नाम मुख्य हैं। ज्यों-ज्यों कट्टर मुसलमान अकबर से बिगड़ते गये त्यों-त्यों वह अपनी नीति पर मजबूत होता गया। राज्यकाल में एक क्षण के लिए ऐसा प्रतीत नहीं होता कि अकबर बता दिया देश के असली निवासियों पर विश्वास करने में शिथिल हुआ हो।

कई हिन्दू लेखकों ने अकबर की नीति को ‘हिन्दूकुश’ नीति लिखा है। वह औरंगजेब की अपेक्षा अकबर को अधिक खतरनाक समझते हैं। उस समय भारतवर्ष की असली प्रजा हिन्दू ही थी मुसलमान विजेता बनकर राज्य करते थे, इस कारण इसमें तो सन्देह नहीं कि जो नीति मुसलमानों के राज्य को मजबूत करने वालो होगी, वह हिन्दुओं के लिए बुरी और जो मुसलमानों के राज्य को निर्वल करने वालो हो, यह हिन्दुओं के लिए अच्छी समझी जायेगी।

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एक अपमान यदि अपमान समझा जाय, तो हट सकता है, परन्तु यदि वह मान समझा जाने लगे तो उसके हटने की आशा नहीं रहा तो। सिर पर नंगा जूता लगने से मूर्ख भी समझ सकता है कि मेरे सिर पर जूता लग रहा है, परन्तु रेशम में लपेटकर जूता लगने पर राणा प्रताप जैसे तेजस्वी पुरुष ही अपमान का अनुभव कर सकते हैं।

इस कारण कहा जा सकता है कि अकबर की नीति हिन्दुओं के लिए अधिक हानिकारक थी, परन्तु एक इतिहास लेखक को केवल एक पक्ष के हानि-लाभ से गुण-दोष का फैसला नहीं करना है। यदि एक शासक की दृष्टि से देखें तो अकबर आदर्श के समीप पहुंच जाता है एक ऐसी जाति पर राज्य करने का जो सभ्यता, धर्म और इतिहास सभी में भिन्न हो, जो रास्ता अकबर ने दिखलाया है, उससे दुनिया भर के शासक उपदेश ले रे हैं सुदीर्घकाल तक यह एक आदर्श साम्राज्य-संस्थापक माना जाएगा इसका यह अभिप्राय नहीं कि उसमें दो नहीं थे, परन्तु साम्राज्य की स्थापना और दृढ़ता के लिए प्रजा के साथ जैसा व्यवहार करना चाहिए |

अकबर ने उसका आदर्श स्थापित कर दिया है इतिहास- लेखक हिन्दुत्व का अभिमान रखता हुआ भी यह कहने के लिए बाधित है कि भारतवर्ष के इतिहास में से यदि हमा सात महान् शासकों के नाम चुने जाये, तो अपन सफल नीति के कारण अकबर का नाम उनमें रखना पड़ेगा। अपने समय में एक राणा प्रताप को छोड़कर कोई दूसरा व्यक्ति उसको कमर तक भी नहीं पहुँचाना था।

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