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आतंकवाद का मनोविज्ञान, समाज के विभिन्न स्तरों पर आतंकवाद

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दुनिया में जब आतंकवादी गतिविधियां फैलने लगीं तो अन्य विषयों की तरह यह भी वैज्ञानिक अनुसंधान का मुद्दा बन गया। शुरू में यह माना जाने लगा था कि एक आतंकवादी मनोवैज्ञानिक रूप से अस्थिर या विकार ग्रस्त व्यक्ति होता है। उसके व्यक्तित्व की यह रोगग्रस्त स्थिति ही उसे आतंकवाद की ओर ले जाती है। साउथ ईस्टर्न ओकलहोमा स्टेट विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रिचार्ड पेइरिस्टीन का मानना है कि `आतंकवादी पूरी तरह तर्कसंगत व्यक्ति होते हैं, वे विक्षिप्त नहीं होते। उनके लक्ष्य होते हैं और उन लक्ष्यों की ओर वे बढ़ते रहते हैं।´

इसी तरह अमेरिकी विदेश विभाग के विशेषज्ञ डेविड लोंग का भी मानना है कि आतंकवादी विक्षिप्त नहीं होते हैं, उन सबका व्यक्तित्व एक जैसा नहीं होता। `अभी तक कोई तुलनात्मक मनोवैज्ञानिक अनुसंधान यह बात साबित करने में सफल नहीं हुआ कि आतंकवादियों की कोई एक ही विशेष मन:स्थिति होती है।´ फिर भी लोंग का मानना है कि उन्हें अपने बारे में एक तरह की हीनभावना सताए रहती है, जिसकी वजह से वे अपने जैसे लोगों का समूह तलाशते रहते हैं।

अगर आतंकवादी विक्षिप्त होते तो इस समस्या से निपटना बहुत आसान था। क्योंकि तब हम मानसिक रूप से अस्थिर अपराधियों की तलाश कर रहे होते और उनकी व्यक्तिगत और सामूहिक विशेषताओं की भी हमें पर्याप्त जानकारी होती। इसके अतिरिक्त उनकी संख्या सीमित रहती। लेकिन पिछले एक दशक का अनुभव हमें बताता है कि ऐसा नहीं है। न उनकी संख्या कम है, न वे एक ही प्रकार के लोग हैं और न ही उनका व्यक्तित्व एक सांचे में ढला हुआ है।

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वर्दीवाला आतंकवाद

मनोवैज्ञानिक स्तर पर हिंसा या हिंसात्मक प्रवृति कई तरह की हो सकती है। लेकिन दो प्रकार की हिंसात्मक प्रवृति को हम आसानी से पहचान लेते हैं। एक तो हम आक्रोश, क्रोध या गुस्सा जैसे शब्दों को जानते हैं, जिसमें आवश्यक नहीं कि व्यक्ति हाथ उठाए या हथियार उठाए। शब्दों और व्यवहार से भी दूसरे को क्षति पहुंचाने की कोशिश की जा सकती है और की जाती रही है। इस सिलसिले में एक फिल्म के एक दृश्य की मिसाल दी जाती है, जिसमें एक नाजी सैनिक अफसर अपनी प्रेमिका के साथ शयनकक्ष में बैठा है, अचानक वह उठता है और बाहर बंदी बनाए गए कई कैदियों को गोली से भून देता है।

इस बीच उसकी प्रेमिका न केवल इस सब दृश्य को महसूस करती है और देखती भी है, शायद कुछ-कुछ डरती भी है, लेकिन कमरे में ही बैठे-बैठे अपने प्रेमी का इंतजार करती रहती है। मनोवैज्ञानिक व्यवहार के स्तर पर दोनों हिंसक है। नाजी अफसर व्यवहार में हथियार का इस्तेमाल करके आक्रमण करता है, उसकी प्रेमिका इस सबको बहुत आसानी से केवल इस लोभ में झेल लेती है कि उसे अपने प्रेमी से सुख मिलता है या पैसा। लेकिन जब हम यह दावा करते हैं कि आतंकवाद एक संगठित प्रयास है तो अचानक हमारे मन में एक तरह की सेना की तस्वीर पैदा होती है। किसी अधिनायकवादी शासक द्वारा संगठित सिपाहियों का इस्तेमाल करते हुए हजारों निर्दोष लोगों को मरवाना क्या आतंकवाद नहीं है? कुछ लोग इसे वर्दीवाला आतंकवाद कहते हैं। लेकिन जिस आतंकवाद की आज हमें चुनौती मिल रही है वह बिना वर्दीवाला आतंकवाद है।

सरकारी आतंकवाद

सरकारी आतंकवाद में शामिल सिपाही स्वेच्छा से नहीं मारते। एक तो वेतनभोगी होते हैं और किसी हद तक उनमें अपने देश और अपने समाज की सुरक्षा की भावना भरी जाती है। लेकिन जो आतंकवादी संगठन सरकारी तंत्रा के हिस्से नहीं होते, उनकी प्रेरणा का स्रोत क्या है? धर्म या मजहब एक महत्वपूर्ण स्रोत है, लेकिन हर स्थिति में केवल यही एक प्रेरणा स्रोत नहीं है। नक्सलबाड़ी में आरम्भ हुए नक्सली आंदोलन और उसके नाम पर चलने वाले बाद के अनेक हिंसक आंदोलनों का प्रेरणा स्रोत मजहब नहीं रहा। लेकिन उनके पीछे भी एक तरह की विचारधारा की प्रेरणा मौजूद थी।

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उन्हें लगता था कि हिंसा का रास्ता अपनाने से वह उस व्यवस्था पर चोट करेंगे जिसे वह गरीबों और सर्वहारा की दुश्मन मानती थी। यह चोट भले ही सीधी सरकार पर न होती हो लेकिन उन्हें विश्वास था कि कुछ जमींदारों, कुछ अफसरों, कुछ पुलिसवालों या कुछ मुखबिरों की हत्या करने से सत्ता हिल जाएगी। इसके अतिरिक्त इससे त्रस्त दमित जनता के मन में एक आशा की किरण विकसित होगी कि इस सर्वशक्तिमान आततायी सत्ता के विरूद्ध भी कोई एक शक्ति खड़ी हो रही है जो उनकी मित्रा है। हिंसा का रास्ता अपनाने वाले इन युवकों को उम्मीद थी कि अंतत: वह ऐसी स्थितियां पैदा करेंगे कि सरकार चरमरा कर अपने बिखर जाएगी।

तर्कातीत विचारधारा

धर्म और मजहब को भी विचारधारा ही माना जाना चाहिए। अंतर केवल यह है कि यह विचारधारा किसी वैज्ञानिक और तर्कसंगत चिंतन प्रणाली का परिणाम नहीं होती। इसकी मुख्य शक्ति आस्था है और क्योंकि आस्था तर्कातीत है, इसलिए किसी भी तर्क से इसे खारिज नहीं किया जा सकता। स्पष्ट है कि यह विचारधाराओं में सबसे सशक्त विचारधारा है। जिसके सामने आधुनिक विश्व की तथाकथित लोकतांत्रिक शासन प्रणालियां कमजोर पड़ती जा रही हैं।

व्यक्तिगत तौर पर यहां भी एक व्यक्ति के मन में शिकायत या वंचित होने की भावना ही महत्वपूर्ण कारक होती है। लेकिन वंचना और आक्रोश की इन मूलभूत भावनाओं को मजहब विधिवत एक व्यापक और दूरगामी विचारधारा के मनकों के रूप में इस्तेमाल करता है। मजहब के साथ-साथ अगर जाति और क्षेत्रा की भावना भी जुड़ जाए तो आतंक का सहारा लेने के लिए एक जबरदस्त प्रेरणा स्रोत बन जाता है। फिलीस्तीन में अरबों की लड़ाई यहूदियों के अतिक्रमण के खिलाफ ही आक्रोश नहीं है, वह यहूदी और इस्लाम के टकराव के अतिरिक्त एक जातीय समस्या भी है। कश्मीर में हाल के दशकों में आतंकवाद के पीछे भी ये दोनों कारक है। मजहब तो है ही, कश्मीरी जाति की अलग पहचान का मुद्दा भी उसमें शामिल हो चुका है।

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विरक्त जीवन

किसी भी क्षेत्र में आतंकवादी गतिविधि के आरम्भ में प्रशासनिक या स्थानीय कारण हो सकते हैं। हो सकता है कि किसी क्षेत्रा में कुछ लोगों ने असंवेदनशील प्रशासन व्यवस्था के विरूद्ध बगावत करने के लिए हथियार उठाया हो। या उसकी जड़ में छोटा-मोटा लाभ या लोभ काम करता हो। भिन्ड और मुरैना के डाकू अपने आपको बागी कहते हैं। उनका दावा था कि वे अन्यायपूर्ण व्यवस्था के खिलाफ बगावत कर रहे हैं।

लेकिन चम्बल के डाकू उस मायने में आतंकवादी नहीं बन सकते, क्योंकि उनके सामने उनकी निजी समस्याएं हैं, अपने आक्रोश हैं, जिसका बदला वे समाज के पैसे वाले लोगों को लूटकर ले लेते हैं। इसके आगे सोचने और योजना बनाने की उनकी औकात नहीं है। संभवत: वे इसी सफलता से संतुष्ट हैं। कोई ऐसी विचारधारा उन्हें प्रेरित नहीं करती जो उन्हें चम्बल से बाहर पूरे मध्य प्रदेश या पूरे हिन्दुस्तान में छा जाने को उकसाती रहती हो। लेकिन अगर बगावत की इस आरिम्भक अवस्था में कोई व्यापक सपना जुड़ जाए तो सामान्य डाकू भी एक बड़े उद्देश्य के लिए लड़ने वाले स्वयंसेवक बन सकते हैं।

व्यक्तिगत तौर पर एक सामान्य आतंकवादी की शिकायतें भी बहुत छोटी-छोटी होती हैं। अपने गांव के जमींदार, अफसर या शक्तिशाली विधायक के खिलाफ। लेकिन जब उसे यह समझाया जाता है कि यह छोटी समस्याएं दरअसल एक बड़ी समस्या के छोटे आयाम हैं, जब तक उस बड़ी समस्या को हल नहीं किया जाता तब तक यह छोटी समस्याएं बनी रहेंगी। मजहब और जाति अक्सर वह दायरा प्रदान करती है जिनके भीतर उन बड़ी समस्याओं को देखा जा सकता है। अन्याय व्यक्ति के विरूद्ध ही नहीं हो रहा है, अन्याय पूरे समूह के विरूद्ध, जाति या सम्प्रदाय के विरूद्ध हो रहा है।

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व्यक्ति के असंतोष और आक्रोश को एक नया आयाम मिल जाता है। व्यक्तिगत सपना एक जातिगत या सम्प्रदायगत सपने में बदल जाता है। यह बात बहुत से अध्ययनों से सिद्ध हो चुकी है कि जब समूह के मूल्य अपना लिए जाते हैं तो व्यक्तिगत मृत्यु का भी अर्थ मिल जाता है। यानी जितना-जितना व्यक्ति अपने मृत्यु के बारे में सोचता है उतना ही वह अपनी जाति, अपनी संस्कृति और अपने मजहब की ओर खिंचता चला जाता है। व्यक्ति के अपने मूल्य शायद कभी भी समाप्त नहीं होते, लेकिन आतंक का रास्ता चुनने के बाद जिस तनावपूर्ण स्थिति में आतंकवादियों को गुप्त रूप से रहना पड़ता है उसमें व्यक्तिगत मूल्यों के उपर समूह के मूल्य प्राथमिकता प्राप्त कर लेते हैं।

यहीं पर एक बड़े समूह का नियंत्राण एक छोटे संचालक गुट के हाथ में आ जाता है जो लगभग सैनिक या अधिनायकवादी अंदाज में समूह पर न केवल अपनी समरनीति ही नहीं थोपता, अपने नैतिक मूल्य और विश्व दृष्टि को भी थोपते हैं। हर सैनिक संगठन अपने सैनिकों को युद्ध के दौरान अपने पारिवारिक और सामाजिक परिवेश से काट लेता है, ताकि उस पर पूरे संगठन, देश या राष्ट्र के मूल्यों को थोपा जा सके और लड़ते समय वे ही सर्वोपरि हों। यह बात गैर सैनिक आयुद्धजीवि संगठनों या आतंकवादियों पर और ज्यादा शिद्दत के साथ लागू होती है, क्योंकि एक सामान्य आतंकवादी को ऐसे काम करने पड़ सकते हैं जो उसके पारिवारिक और सामाजिक परिवेश में अस्वीकार हो। वह एक तरह से विरक्त जीवन जीने को मजबूर होता है।

“आरम्भ में आतंकवादी गुट भले ही व्यापक समाज से अलग-थलग रहने पर मजबूर रहते हों, लेकिन अपनी विचारधारा के आधार पर वे अपने चारों ओर एक समर्थन मंडल तैयार करने में सफल हो जाते हैं। समर्थकों का यह दायरा जितना व्यापक होता है, उतनी ही सफलता आतंकवादी गुटों को मिलती है। समर्थक भले ही हथियार न उठाते हों लेकिन वे एक ऐसा कवच उपलब्ध कराते हैं जिससे काफी हद तक आतंकवादी उस सत्तारूढ़ शक्ति से बचे रहते हैं जिसके खिलाफ उन्होंने युद्ध का ऐलान कर रखा होता है।

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प्रशासन और सेना में भी सेंध लगाने, उसमें घुन की तरह छिपकर खोखला करने, खुफिया जानकारी देने और आवश्यकता पड़ने पर राजनैतिक प्रश्रय देने की व्यवस्था, यही समर्थक मंडल करता है। अधिनायकवादी व्यवस्थाओं में सत्ता और आतंकवादियों के बीच मोर्चाबंदी बिल्कुल स्पष्ट होती है लेकिन लोकतांत्रिक देशों में शासन व्यवस्था की विसंगतियों के कारण आतंकवादियों और उनके समर्थक मंडल को एक अराजकता की स्थिति पैदा करने में अधिक सफलता मिल जाती है। ऐसे समाज में सीमा रेखाएं स्पष्ट नहीं होतीं।”

आतंकवादी का मुख्य हथियार डर होता है। हिंसा के माध्यम से वह केवल उन लोगों में ही डर पैदा नहीं करता जिनके मित्रा, नाती-संबंधी मारे जाते हैं। बल्कि आतंक की लहरें काफी दूर-दूर तक जाती हैं। आतंक का दायरा जितना बड़ा होता है उतनी आतंकवादी की सफलता होती है। वह उम्मीद करता है कि उसकी कार्रवाई से उसके विरोधियों की प्रतिक्रिया भी तीव्र और हिंसक होगी। इस प्रतिहिंसा का शिकार केवल आतंकवादी ही नहीं होंगे, उनके साथी और हमदर्द भी होंगे और कुछ ऐसे लोग भी होंगे जिनका आतंकवाद से कोई लेना-देना नहीं है। इससे आतंकवादी का समर्थन मंडल विस्तृत होता है। उनके मित्रा और नाती-रिश्तेदार तो उत्तेजित होते ही हैं, वे भी होते हैं जो एक तरफा हिंसा को सही नहीं मानते।

यही आतंकवादियों का उद्देश्य होता है। वह इक्का-दुक्का हिंसा की घटनाओं को बाकायदा युद्ध में बदलने की कोशिश करता है। अक्सर ऐसी स्थिति में सत्तारूढ़ पक्ष आवश्यकता से अधिक हिंसा का इस्तेमाल करता है। लेकिन इस हिंसा के साथ आतंकवादियों को उसके सम्प्रदाय या वर्ग का प्रतिनिधि घोषित करके पूरे सम्प्रदाय या वर्ग को दोषी ठहराने की प्रवृति बढ़ जाती है। यह आतंकवाद से लड़ने का सबसे गलत तरीका है। मध्य एशिया में इराक में और अफगानिस्तान में अमेरिकी नीति का असर यही हुआ है कि अधिकतर देशों के मुसलमान अमेरिका के खिलाफ एकजुट होते दिखाई दे रहे हैं।

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असाधारण विशेषताएं

जो आतंकवाद आज भारत समेत अनेक देशों के लिए गंभीर समस्या बना हुआ है उसकी कुछ विशेषताएं असाधारण हैं। बीसवीं सदी में मुसलमानों में नवजागरण की लहर आरम्भ हुई। इसके कुछ अच्छे परिणाम निकले और कुछ मुस्लिम देश आधुनिक राष्ट्रों की पंगत में जा पहुंचे। वहीं मुस्लिम समाज को कट्टरपंथ की ओर ले जाने के अभियान भी चले। यह अभियान उन देशों में ज्यादा प्रभावी दिखाई दिए जिनमें राजनैतिक कारणों से पश्चिम का आधिपत्य था। पश्चिम में मुसलमानों और ईसाईयों के बीच क्रूसेड और जेहाद का इतिहास रहा है, इसी टकराव की भावना में जेहाद का वह नया रूप विकसित किया जो अधिकतर आतंकवादी संगठनों या आंदोलनों का मूल प्रेरणा स्रोत है।

इस्लाम के शुरूआती दौर में जब टकराव यहूदी और ईसाई समुदायों से था और जब मुसलमानों को अपने पांव जमाने के लिए नए मजहब को सख्ती से लागू करने की जरूरत महसूस हुई थी, तब जेहाद गैर मुस्लिमों के लिए युद्ध घोष के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा। लेकिन बाद के समय में विभिन्न जातियों और सम्प्रदायों के साथ मेलजोल का दौर चल पड़ा जिसमें जेहाद की इतनी स्पष्ट परिभाषा नहीं रह गई।

अधिकतर प्रगतिशील और उदारवादी मुसलमान नेताओं ने जेहाद को विधर्मियों के खिलाफ युद्ध नहीं माना। लेकिन कट्टरता के लौट आने के साथ ही जेहाद एक धर्म युद्ध का रूप लेने लगा। अपनी शक्तिशाली या बहुसंख्यक विरोधियों के खिलाफ मुसलमानों को एकजुट करने के लिए इस हथियार का इस्तेमाल राजनैतिक स्तर पर किया जाने लगा है। भारत के विभाजन में इसी मजहबी हथियार का उपयोग हुआ। हालांकि मोहम्मद अली जिन्ना स्वयं परंपरागत रूप से कट्टरवादी मुसलमान नहीं थे। लेकिन उन्हें भी यह समझ में आ गया कि इस हथियार के इस्तेमाल से भारत का बंटवारा संभव है और कोई तर्क काम नहीं कर सकेगा।

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हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग सम्प्रदाय हैं। दोनों की संस्कृतियां अलग हैं। दोनों अलग-अलग सभ्यताओं की उपज हैं, इसलिए अलग-अलग राष्ट्र हैं। मुस्लिम लीग का तर्क था कि अगर भारत को आजाद होना है तो मुसलमानों के लिए अलग देश की व्यवस्था हो जानी चाहिए। लेकिन यही राजनैतिक हथियार बाद के वर्षों में एक नए अवतार के रूप में सामने आया, जिसे हम आतंकवाद के नाम से जानते हैं।

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