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महाराणा प्रताप और अकबर का युद्ध

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तूफान और चट्टान में से कौन बड़ा है ? तूफान मकानों को गिरा देता है, वृक्षों को उखाड़ देता है, स्थल को जलमय बना देता है और पशु-पक्षियों को वे-घरवार कर देता है उस समय उसके प्रवाह को रोकना असम्भव होजाता है। वह पानी में तेल की तरह आकाश में फैल जाता है, उसकी गति आगे ही आगे चलती है, यहाँ तक कि सैकड़ों कोसों तक हाहाकार मच जाता है। आकाश और पृथ्वी जलमय दिखाई देने लगते हैं। चट्टान अपने स्थान में खड़ी है वह न हिलतो है न डोलती है। वह न फैलती है और न आगे बढ़ती है।

तूफान आया-आज नहीं आज से सदियों पहले भी तूफान आया-थोड़ी देर के लिए चट्टान को ढंक लिया, उस पर चोटें की, उससे कुश्ती की, दो चार वृक्ष गिरा दिये, दो चार शिलायें लुढ़का दी-सिर पीटा, हाथ-पाँव मारे और थककर आगे चला गया। सैकड़ों तूफान आये और चले गये, पर चट्टान अपनी जगह खड़ी है। कहिए तूफान बड़ा है या चट्टान ? तूफान संसार की गति का उदाहरण है तो चट्टान स्थिति का। तूफान क्षण का सूचक है तो चट्टान सदियों का। तूफान एक मन का उबाल है, परन्तु चट्टान मनुष्य की स्थिर प्रकृति है। दोनों में बड़ा कौन है और छोटा कौन इसका उत्तर देना कठिन है।

अकबर तूफान था, तो प्रताप चट्टान। वह तूफान जब उमड़ा, तो बड़े-बड़े महलों और अटारियों के सिर झुक गये उसकी सेनायें पानी की बौछार की तरह आकाश में फैल गई। उसकी वीरता ने नदी की भाँति उमड़कर जंगलों को बहा दिया और ग्रामों को बरबाद कर दिया। उसको प्रतिभा बिजली की तरह कड़ककर जिस पर पड़ी, वह चकनाचूर कर गई। केवल वही बचे रहे, जिन्होंने तूफान को देखकर सिर झुका लिया और साष्टांग प्रणाम करके अधीनता स्वीकार कर ली, या बच रहा वह चट्टान, जिस पर तूफान ने ठोकर पर ठोकर मारी, बिजली फेंकी और गर्जकर डराया, एक न चली अन्त में तूफान उड़ गया, आकार साफ हो गया, न वह गर्जन रहा और न वह चमक, पर वह चट्टान जहाँ के तहाँ सिर उठाये खड़ी रह गई।

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अकबर की प्रतिभा और उसका सैन्य-शक्ति ने तूफान की तरह भारत को आच्छादित कर लिया-देश के शासकरूपी वृक्ष या तो झुक गये, या उखड़ गये, एक राणा प्रताप था जो न झुका और न उखड़ा। वह अपने मान पर और अपनी आन पर डटा रहा। तुफान उड़ गया, अकबर और अकबर के वंशज राजा आये और चले गये, आज उनके कई वंशज दिल्ली के कूचों में दर-दर के भिखारी बन मारे फिरते हैं, परन्तु राणा प्रताप की संतान तब से ग्दी पर विराजमान हैं।

राजपूताने के इतिहास लेखक कर्नल टाड ने अकबर और प्रताप के संघर्ष के सम्बन्ध में लिखा है कि अदम्य साहस, अटूट धैर्य, मान की रक्षा का भाव सहिष्णुता और वह स्वामिभक्ति जिसकी बराबरी दुनिया में नहीं है, बढ़ी हुई महत्वाकांक्षा, चमकदार गुण, अनन्त साधन और मज़हबी जोश के साथ टक्कर खा रहे थे, परन्तु उनमें से कोई भी उस अजेय आत्मा (प्रताप) का सामना नहीं कर सकता था।

अकबर के इतिहास-लेखक विन्सेण्ट स्मिथ ने लिखा है कि जिन चमकदार गुणों या अनन्त साधनों की सहायता से वह अपनी बढ़ी हुई महत्वाकांक्षा को पूर्ण कर सका, उनसे ऐसे चौंधिया जाते हैं कि उन बहादुर शत्रुओं के लिए उनके पास सहानुभूति का एक शब्द भी नहीं रहता जिनकी बरबादी पर अकबर का महल खड़ा हुआ था। वह पुरुष और स्त्रियों भी स्मरण के योग्य हैं। शायद वह पराजित स्त्री – पुरुष विजेता की अपेक्षा अधिक महान् थे।

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उदयसिंह की मृत्यु पर १५७२ ई० में प्रतापसिंह गद्दी पर बैठे उस समय मेवाड़ का राज्य हर तरफ खोखला हो रहा था खजाने में पैसे का, सेना में सिपाहियों का और दिलों में उत्साह का अभाव था। चित्तौड़ के अनमोल वीरों का हृदय निराशा के पाले से कुम्हला चुके थे प्रताप ने सिंहासनारूढ़ होकर चारों ओर दृष्टि उठाई, तो उसे याप्पा रावल की कीर्ति के खण्डहर मात्र दिखाई दिये।

वीर का हदय उस विनाश के हाथ को देखकर मुरझाया नहीं, प्रत्युत उसने दृढ़ संकल्प किया कि वह अपनी माँ के दूध की लाज रखेगा, और चित्तौड़ की गगनचुम्िनी चोटी पर राजपूती ध्वज को फिर से गाड़कर दम लेगा। कार्य बड़ा भारी था। एक ओर अकबर जैसा शक्तिशाली सम्राट् जिसके बढ़ते हुए छत्र के सामने वीर राजा भी सिर झुका रहे थे। सारे हिन्दुस्तान का खजाना, जिसमें करोड़ों रुपये थे. अनगिनत सिपाही, जो मुगल बादशाह की आवाज पर उमड़ पड़ते थे, और दूसरी ओर राजधानी से विहीन राज्य उजड़ी इलाका, खालो खजाना और मुट्ठीभर सिपाही। ऐसी दशा में वही वीर लड़ने की ठान सकता था जिसकी आत्मा प्रवल हो, जो भय किस चिड़िया का नाम है, हो न जानता हो, जिसके लिए सांसारिक चिप्न कोई सत्ता न रखते हो और जिसका धैर्य अटूट हो।

भाग्यवश महाराणा सांगा के नाती में वह गुण विद्यमान थे। प्रताप ने माँ के दूध की शपथ खाकर प्रण किया कि वह मेवाड़ को स्वाधीन करायेगा और सिसोदिया वंश की लाज रखेगा योर की ओर वीर खिचते हैं। वहादुर सेनापति को पाकर गुफाओं में सोये हुए राजपूत शेर भी जाग उठे और मेवाड़पति के झण्डे के नीचे इकट्ठा होने लगे परीक्षा का समय शीघ्र आ गया। उस समय अकबर राजपूत कन्याओं से विवाह करके राज्य की नींव को सामाजिक सम्बन्धों के वज्रलेप समान मसाले से भर रहा था। जब महाराज प्रताप के सामने यह प्रस्ताव रखा कि वह भी अपनी लड़की का डोला मुगलों के हरम में भेज दे, तो उसने प्रस्ताव को अपमानजनक समझा और घोषणा कर दो कि बाप्पा रावल के वंश का रुधिर पवित्र रहेगा। इस एक घोषणा द्वारा मेवाड़पति ने अपने आपको मुगल सम्राट का विरोधी बना लिया।

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प्रताप का पहला कार्य राज्य की सुव्यवस्था करना था। उस समय कुम्भलमेर का किला राजधानी का कार्य देख रहा था। राणा ने उसे सुरक्षित करने के लिए कई प्रकार के प्रयत्न किये। अन्य दुर्गों का भी पुन: संस्कार किया गया राज्य के कारखाने को यथा-सम्भव माजा गया। मेवाड़ के जो प्रान्त राणा के हाथ से निकल चुके थे, उन्हें शत्रु के लिए भी निकम्मा बना देने की चेष्टा की गई इस चेष्टा में प्रताप को बहुत कुछ सफलता प्राप्त हुई। यह आज्ञा प्रचारित की गई कि चित्तौड के नीचे के मैदानों में कोई किसान खेती न करे, कोई ग्वाला जानवरों को न चराये और कोई गृहस्थ दिया न जलाये। इस प्रदेश को बिलकुल उजाड़ कर दिया ताकि वहाँ शत्रु पैर न जमा सके इस प्रवन्ध से राणा ने अपने शत्रुओं को पास आने से रोके रखा।

परन्तु बहुत देर तक यह पैतरें बाजी जारी न रह सकी। राजा मानसिंह की नासमझी ने संघर्ष का अवसर शीघ्र ही उपस्थित कर दिया। राजा मानसिंह अकबर के लिए शोलापुर को जीतकर हिन्दुस्तान को वापस आते हुए कुम्भलमेर के किले पर राणा प्रताप से मिलने के लिए ठहरा। राणा ने स्वेच्छा से आये हुए मेहमान का विधिवत् सत्कार किया, परन्तु भोजन के समय स्वयं उपस्थित न होकर राजकुमार को भेज दिया। राजा मानसिंह ने थोड़ी देर तक राणा की प्रतीक्षा की जब देखा कि विलम्ब अधिक होता है, तो कुमार से पूछा। कुमार ने उत्तर दिया कि राणा की तबियत अच्छी नहीं है।

राजा मानसिंह ताड़ गये कि राणा ऐसे आदमी के साथ भोजन नहीं करना चाहते, जिसके परिवार ने मुसलमानों के पर में डोला भेजकर राजपूती शान पर बट्टा लगाया हो। वह शर्माने की जगह क्रोधित होकर उठ खड़ा हुआ और चावल के कुछ दाने पगड़ी पर रखता हुआ बोला कि तुम्हारी मान रक्षा की खातिर हमने इज्जत को खाक में मिलाया और अपनी बेटियाँ और बहनें तुकों को दीं। लेकिन अगर तुम्हारी यही इच्छा है, तो ऐसा ही सही-अब इस देश में तुम न रह सकोगे। अगर मैं तुम्हारे अभिमान को चूर-चूर न कर दें, तो मेरा नाम नहीं। इसी समय राणा प्रताप दरवाजे से निकल आये और शान्ति से बोले कि मैं तुमसे भेंट करने को बिल्कुल तैयार रहँगा। इसी समय किसी मजाकिया ने फवती उड़ाई कि “अपने फूफा को साथ लाना न भूलिएगा।”

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क्रोध से अंगार बना हुआ मानसिंह वहाँ से चला गया और राणाजी की आज्ञा से वह स्थान खोद और धोकर पवित्र किया गया, इस प्रकार हल्दी घाटी की प्रसिद्ध लड़ाई का सूत्रपात हुआ। मानसिंह ने अपना वचन पूरा किया थोड़े ही महीने बाद राणा ने सुना कि प्रसिद्ध सेनापति महावतखाँ आसफ़खाँ और अपने फूफे के लड़के सलीम (भावी-जहाँगीर) को साथ लेकर मानसिंह अरावली पर्वत की घाटियों में उतर रहा है। शाही सेनाओं में मुगल राजपूत और पठान योद्धाओं के साथ जबर्दस्त तोपखाना था। इस शानदार समारोह का सामना करने के लिए राणा प्रताप के पास २० हजार बहादुर राजपूत थे और निडर हृदय था। उसी हृदय और धर्म के बल पर खोखले खजाने का स्वामी प्रताप असंख्य धन के मालिक अकबर की विजयिनी सेना से टक्कर लेने के लिए उद्यत हो गया।

मुगल सेनायें अरावली के दक्षिण भाग में सिर उठाकर खड़े हुए। गोगुण्डा नाम के किले को लेने के उद्देश्य से आगे बढ़ी। गोगुण्डे को जो रास्ता जाता है, वह हल्दी घाटी नाम की घाटी में से होकर गुजरता है। राणा प्रताप अपनी सेनाओं का उसी स्थान पर सात्रह किया था। घाटी के सामने चुने हुए राजपूत घुड़सवारों के साथ स्वयं राणा विराजमान थे। पहाड़ों की चोटियों और रास्तों पर भील लोग तीर कमान और पत्थर लेकर खड़े हुए थे मुगल-सेना आगे बढ़ी, राजपूतों ने रास्ता रोका। भीषण संग्राम छिड़ गया। दोनों ओर जन-संहार होने लगा। राजपूत सरदार अपने कुल-गौरव और धर्म के नाम पर आगे बढ़-बढ़कर वार करने लगे। राजपूतों को वीरता देखकर दुश्मन दंग रह गये राजपूत जी तोड़कर लड़े। परन्तु तोपखाने और कई गुना सिपाहियों के सामने उनकी क्या चलती ?

राणा प्रताप इस दशा को सहन न कर सके। उस वीर ने एक हो हाथ में संग्राम जीत लेने का निश्चय किया, और स्वामिभक्त चेतक की एडी लगाई। चेतक अपने वोर सवार को लिये मागालों की सेना को चीरता हुआ आगे बढ़ने लगा। राणा का लक्ष्य मानसिंह के हाथो तक पहुँचकर राजपुत्र को यमलोक पहुँचाना था। दायें और बायें दोनों ओर वार करते हुए राणा आगे ही आगे बढ़ते जाते थे मुगल अपने सेनापति की रक्षा के लिए टूट पड़ी। उधर राजपूत सरदार राजपुताने की शान को शत्रुओं के घेरे में घिरता हुआ देखकर प्राणों की ममता छोड़ आगे बढ़ने लगे।

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शत्रु और मित्र में पहचान करना कठिन हो गया मुसलमान इतिहास – लेखक बदायूनी भी दर्शकरूप से मुग़ल सेना के साथ आया था। उसने अपने सेनापति आसफखाँ से जाकर पूछा कि “शत्रु और मित्र की पहचान कठिन हो रही है ऐसे समय में यह कैसे जाना जाय कि अपना राजपूत कौन-सा है और पराया कौन-सा?” ‘ आसफखों ने उत्तर दिया कि “तुम राजपूत को गोली मारो, वह अपना हो या पराया। काफिर किसी ओर का मरे, इस्लाम के लिए अच्छा है” इस प्रकार जहाँ राणा के राजपूतों का नाश मुसलमानों और मानसिंह के राजपूतों ने मिलकर किया, यहाँ मुसलमान सिपाहियों ने दोनों ही ओर का नाश करके जन्नत का रास्ता साफ किया।

राणा का घोड़ा शत्रुओं के समुद्र को चीरता हुआ आगे बढ़ता गया, यहाँ तक कि वह मानसिंह के हाथी के सामने पहुँचा। सवार का इशारा पाकर चेतक कूदकर हाथी के सामने जा खड़ा हुआ और उसने अपने अगले पाँव उसके मस्तक पर रख दिये। राणा प्रताप ने समय अनुकूल देखकर नेजे का भरपूर वार किया अगर भाग्य अनुकूल होता, तो नेजा मानसिंह की छाती में लगता, परन्तु भारत का भाग्य चन्द्रमा चिरकाल से डूब चुका था, हाथी डरकर पीछे हट गया और नेजा हाथीवान पर ही रह गया। हाथीवान के गिरने पर हाथी जी तोड़कर भागा| मैदान राणा के हाथ रहा, परन्तु शिकार भाग निकला। इस प्रकार फिर एक बार भारत के इतिहास का निर्माण वीरता ने नहीं, भाग्यों ने किया।

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राणा का घोड़ा चारों तरफ से घिर गया। मुगल सेनायें सूर्य की ध्वजा का निशाना ताककर वार करने लगी अपने सरदार की प्राण रक्षा के लिए राजपूत भी दोनों हाथ से तलवार चलाने लगे, परन्तु उस टीडी दल में से निकल जाना सरल नहीं था। राणा प्रताप का जीवन खतरे में पड़ गया। उस कठिन समय में राजपूतों की वही स्वामिभक्ति फिर से काम आई, जो कई परीक्षाओं में उत्तीर्ण हो चुकी थी झाला सरदार मानसिंह ने मेवाड़ का राज्य-छत्र अपने ऊपर तान लिया और मुट्ठीभर सिपाहियों को साथ लेकर राणा से दूर शत्रुओं को ले चले जाने में सफलता प्राप्त की।

राज्य-छत्र को देखकर मुगल सेनायें झाला सरदार पर टूट पड़ी। वह स्वामिभक्त बहादुर प्राणों की ममता छोड़कर अन्त तक लड़ा। कहते हैं कि जिस जगह झाला सरदार की लाश गिरी, वहाँ सौ से अधिक शत्रुओं की लाशें पड़ी थी और वोर के दोनों हाथों में तलवारें थी। इसमें सन्देह नहीं कि अपने बान्धवों सहित स्वामी के लिए बलि देकर झाला सरदार ने उन अमर बहादुरों में नाम लिखा लिया, जिनके कारण राजपूताने का इतिहास उज्जवल हो रहा है। शत्रु का झुकाव दूसरी ओर होते देखकर राणा भीड़ में से निकलकर सुरक्षित स्थान में चले गये।

यद्यपि इस युद्ध में मुग़लों को सफलता न हुई और उन पर राजपूतों की वीरता का त्रास बैठ गया, फिर भी मेवाड़ की युद्ध-शक्ति इस लड़ाई में बहुत कुछ कम हो गई। राणा ने उसे बहुत सम्भालने का यत्न किया, परन्तु शीघ्र सफलता प्राप्त न हुई। किले के बाद किला हाथ से निकलता गया, यहाँ तक कि बड़े-बड़े सभी दुर्ग मुगलों के हाथ में चले गये। राणा को महलों और किलों से निकल, जाकर पहाड़ों और जंगलों का निवासी बनना पड़ा। जाओ और राजपूताने के गायकों और भाटों के मुँह से उस क्षत्राणी के पुत्र की वीर-कथाओं का श्रवण करो।

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जिस समय भारत के ताजधारी वीर दिल्ली के बाजारों में अपनी बहू-बेटियों की इज्जत को बेच रहे थे, जिस समय राजपूताने के कुलीन छत्रपति अपनी कुलमर्यादा को अकबर की भेंट चढ़ा रहे थे, जिस समय भारत का सौभाग्य-सूर्य काले बादलों से आच्छादित हो रहा था, और अकबर की गति अनिवार्य प्रतीत होती थी खाली खजाने और मुट्ठी भर सिपाहियों का स्वामी प्रतापसिंह बाप्पा रावल के नाम सीसोदिया के राज्य-छत्र और कुल-मर्यादा की ध्वजा को हाथ में लिए कटीले जंगलों और भीषण घाटियों में अपने परिवार और थोड़े से साथियों को घसीटता फिरता था।

पाँच-पाँच समय बिना खाये निकल जाते थे, पूरी रात सोने नहीं मिलता था, गुफाओं में छुपकर प्राण- रक्षा करनी पड़ती थी, परन्तु दिल में यही संकल्प था कि क्षत्राणी के दूध का मान न पटे, समरसिंह के कुल की ध्वजा नीची न हो और हिन्दू धर्म की शान पर पव्या न लगे। प्रतापसिंह ! तुम सच्चे राजपूत थे, उस समय के शेष राजपूत तो राजपूतानी की कोख को लजाने के लिए हो पैदा हुए थे। तुमने मनुष्य जाति के सामने वीरता, आत्म-सम्मान और धैर्य का ऐसा दृष्टान्त रखा है कि यदि मुर्दा जातियाँ उसका थोड़ा-सा भी अनुकरण करें तो उनका बेड़ा पार हो सकता है। शत्रु को भी तुम्हारे गुणों का गान करना पडेगा।

राणा को भाग्य-नदी कुछ समय के लिए सर्वथा सूखती हुई प्रतीत होने लगी और शत्रु जीतते गये, परन्तु सद्गुणों की विजय शस्त्र की विजय से कहीं ऊँचा होती है जो धर्म पर जमा रहता है, उसे आशातीत स्थानों की सहायता मिल जाती है। प्रतापसिंह को भी एसी सहायता मिली। जब परिवार की विपत्ति को देखकर राणा का जो पवरा उठा. तो अकबर-दरबार के कवि राठौर राजकुमार पृथ्वीराज ने उसे एक काव्यमयो चिट्ठी लिखी, जिसने टूटा हुआ साहस बँधा दिया।

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जब खजाने के बिलकुल खाली हो जाने से सेना को संभालना मुश्किल देखकर राणा ने निश्चय किया कि राज्य की आशा छोड़ स्वाधीनता के लिए पहाड़ी गुफाओं या जंगलों का रास्ता लिया जाय, उस समय वंश के प्राचीन खजांची भामाशाह ने बाप-दादों की सब कमाई स्वामी के चरणों में रख दो। इस प्रकार देवी इच्छा से सहायता पाकर प्रतापसिंह ने फिर सेनाओं को इकट्ठा किया और किले जीतने आरम्भ किये थोड़े समय में उदयपुर का बड़ा भाग राणा के हाथ में आ गया। किलों में जो मुसलमान छावनियाँ पड़ी हुई थी, वह या तो काट डालो गई, या पीठ दिखाकर भाग गई। अजमेर, चित्तौड़ और मंडलगढ़ के किलों को छोड़कर शेष समस्त मेवाड़ धीरे-धीरे राणा के हाथों आ गया।

अन्तिम दिनों में अकबर ने प्रतापसिंह की बढ़ती हुई शक्ति को रोकने का कोई यत्न नहीं किया। यह सुनकर भी कि बहुत से किले राजपूत सरदार के हाथ पड़ गये हैं, न कोई सेना भेजी और न छावनियों को हो मजबूत किया। कई इतिहास-लेखकों का विचार आया है कि अकबर के हृदय में प्रतापसिंह को वीरता के लिए आदर और दुर्भाग्य के लिए दया का भाव उत्पन्न हो गया था, इस कारण उसने छेड़छाड़ करने का विचार छोड़ दिया। यह भी लिखा गया कि जो राजपूत सरदार अकबर की गाड़ी के पहिये के साथ अपने भाग्यों को बाँध चुके थे, वह भी अन्तरात्मा में राणा की वीरता का आदर करते थे, उसे राजपूताने की नाक समझते थे और अकबर से सिफारिशें करते थे. जिसमें मुगल बादशाह का रोष ठण्डा होता रहे।

इन सब कल्पनाओं की अपेक्षा अधिक सम्भव कल्पना यह भी है कि उस समय अकबर की सेनायें दूसरे सूबों के विद्रोह को दबाने में लगी रही, इस कारण मेवाड़ पर आक्रमण करने के लिए जितनी शक्ति का एकत्र होना आवश्क था उतनी एकत्र नहीं हो सकती थी। अकबर यह देख चुका था कि मेवाड़ को जीतना दाल-भात का खाना नहीं, लोहे के चने चबाना है जिस दाल को मानसिंह, महावत खाँ और आसफखों मिलकर न तोड़ सके, उसे छोटी-मोटी शक्ति कैसे तोड़ सकती थी?

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उदयपुर की रियासत का अधिकांश भाग राणा के हाथ में आ गया. परन्तु राणा को सन्तोष होता भी कैसे, जब कि मेवाड़ का हृदय- चित्तौड़गढ़ शत्रु के कब्जे में था। महाराणा प्रताप ने प्रण किया था कि चित्तौड़गढ़ को स्वाधीन न कर लेंगे, तब तक खाट पर न सोयेंगे, सोने चाँदी के बर्तनों में भोजन न करेंगे और फौज की शहनाई आगे न बजकर पीछे बजा करेंगी। चित्तौड़गढ़ की चिन्ता राणा के शरीर को खा रही थी।

मानसिक चिन्ताओं और शारीरिक कष्टों ने राणा के मजबूत शरीर को थका दिया था। परिणाम यह हुआ कि जवानी के यौवन में स्वतन्त्रता के पुजारी ‘पत्तो’ (प्रतापसिंह) को मृत्यु-शय्या पर लेटना पड़ा। जो जीवन का विचार था, वह मृत्यु काल की भावना हुई। प्राण छोड़ते हुए राणा ने अपने सरदारों से यह शपथ ले ली कि वह न स्वयं मेवाड़ को स्वाधीन कराने के कार्य को भुलायेंगे और न राजकुमार अमरसिंह को कर्त्तव्य से विमुख होने देंगे। इस प्रकार मातृभूमि और कुल-मार्यादा का चिन्तन करते हुए राजस्थान के वन-केसरी प्रतापसिंह ने प्राण विसर्जन किया। आज प्रतापसिंह नहीं हैं, परन्तु उसकी वीरता का विमल यश राजपूतों के ही नहीं, भारत के ही नहीं, प्रत्युत संसार के मुख को उज्ज्वल करता हुआ विद्यमान है।

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