पीपल का पेड़

पेड़ भी करते हैं पिण्डदान, पीपल का पेड़ होता है मोक्षदायक

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परिवार की परिभाषा के अनुसार अपने जनक को मुखाग्नि देने का अधिकार पुत्र का है। पुत्र ही तर्पण करता है। शास्त्रों ने इस मोक्षगामी तर्पण हेतु `तरूपत्रक´ का विधान दिया है और कहा है कि `पेड़ भी कर सकते हैं तर्पण’। पदम पुराण (सृष्टि खण्ड) में लिखा है कि वृक्ष, पुत्रहीन पुरुष को पुत्रवान होने का फल देते हैं, इतना ही नहीं वे अधिदेवता रूप में तीर्थों में जाकर वृक्ष लगाने वालों को पिण्डदान भी देते हैं।

अकेला पीपल का पेड़ हजार पुत्रों के बराबर फल देता है। पीपल की जड़ के पास बैठकर जो जप होम तर्पण आदि किया जाता है उसका फल लाखों-करोड़ों गुणा मिलता है। पीपल का पेड़ लगाने, रक्षा करने, स्पर्श करने तथा पूजा करने से क्रमश: धन पुत्र स्वर्ग और मोक्ष मिलता है। क्योंकि पीपल की जड़ में विष्णु तने में केशव शाखाओं में नारायण और पत्ते-पत्ते में श्रीहरि का वास है। फलों में विभिन्न देव अच्युत निवास करते हैं। पद्म पुराण के उत्तर खण्ड में लिखा है कि `वृक्ष लगाने वाला पुरुष अपने भूतकालीन पितरों तथा होने वाले वंशजों का भी उद्धार कर देता है इसलिए वृक्षों को अवश्य लगाना चाहिए। वृक्ष अपने फूलों से देवताओं का, पत्तों से पितरों का तथा छाया से समस्त अतिथियों का पूजन करते हैं।´

मनीषियों की धारणा है कि जलाशय के समीप पीपल का वृक्ष लगाकर मनुष्य जिस फल को प्राप्त करता है वह सैकड़ों यज्ञों से भी नहीं मिल सकता है। प्रत्येक पर्व में उसके जो पत्ते झड़ कर जल में गिरते हैं वे पिण्ड के समान होकर पितरों को तृप्त करते हैं। उस वृक्ष पर विश्राम करते हुए पक्षी अपनी इच्छानुसार जो फल खाते हैं उसका ब्राह्मण भोज के समान फल होता है। उस वृक्ष की शीतल छाया में जब ताप से आकुल-व्याकुल गउ आदि विश्राम करती है तो पितरों को अक्षय स्वर्ग मिलता है। पीपल के अतिरिक्त बरगद, नीम, आम, बिल्व, अशोक आदि वृक्षों की पूजा का विधान शास्त्रों में दिया है। यूं भी जहां पेड-पौधे पल्लवित-पुष्पित रहते हैं वहां आह्लापूर्ण शीतलता और शांति होती है। पूर्णता एवं संतुष्टि का भाव रहता है। पेड़ों के पास रहने से कोई कामना शेष नहीं रहती और मन रमता है।

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महाभारत में महर्षि वेदव्यास ने कहा है कि फल-फूलों से समृद्ध वृक्ष मानव को इस लोक में तृप्त करते हैं पर जो वृक्ष का दान करता है उसको वृक्ष पुत्र की तरह परलोक में तार देते हैं।

पुष्पिता: फलवंतश्च तर्पयंतीह मानवान्
वृक्षंद पुत्रवद वृक्षा स्तारयंति परत्र तु।।

श्री व्यास जी द्वारा उद्भाषित यह कथ्य आज और भी अधिक प्रासंगिक है। यह नश्वर संसार में अपने समान संतति उत्पन्न करने की अभिलाषा हर जड़चेतन जीव की होती है। मनुष्य भी यही कामना करता है परन्तु इस कामना की पूर्ति सभी जनों के लिए समान रूप से नहीं होती है। अत: कामना ही तुष्टि हेतु शास्त्रों में तरूपत्रक का प्रावधान है। तरू अर्थात वृक्ष एवं पुत्रक अर्थात संतान।

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अत: वृक्ष को संतान रूप में अपनाने एवं अंगीकार करने को तरूपत्रक संस्कार कहते हैं। आचार्यों ने नि:सन्तान वर्ग को संतुष्ट करने हेतु सोलहवीं शताब्दी में उत्पन्न हुए उद्भट विद्वान, शास्त्रकार कमलाकर भट्ट के कमलाकर ग्रन्थ को संदर्भित किया है, जिसमें कर्मकाण्ड की विरल पद्धति तरूपत्रक दी गई है। यह पद्धति कुल तारक एवं मोक्ष प्रदायक रूप में पेड़ों को प्रतिष्ठित करती है। इससे न केवल मनुष्य को संतुष्टि मिलती है वरन पर्यावरण भी पुष्ट होता है।

शास्त्रों के अनुसार केवल पुत्र की `पूत्र´ नामक नरक से जीव का उद्धार करता है। अत: जीव को समुद्धरण (मोक्ष) मिलने में सहायक होता है। अत: तरू पत्रक के पुरुषार्थ संस्कार में वृक्ष की पौध रोप कर उसकी देखभाल कम से कम पांच वर्ष तक की जाती है तथा उस वृक्ष के साथ शास्त्रोक्त विधि से सोलह संस्कार सम्पन्न कराये जाते हैं। शिवपुराण में भी वृक्षारोपण द्वारा पितृ तर्पण एवं संततियों के उद्धार का संकेत है।

अतीतानागतान सर्वान पितृवंशांस्तु तारयेत्।
कान्तारे वृक्षरोपी यस्तस्मादं वृक्षांस्तु रोपयेत्।।

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अर्थात जो व्यक्ति निर्जन एवं दुर्गम स्थलों पर वृक्षारोपण करते हैं वह अतीत की भी एवं आगत की भी अर्थात पूर्ववर्ती और आगामी पीढ़ियों का तारण करते हैं। मनीषियों ने शास्त्रों के अध्ययन के आधार पर बतलाया है कि तीनों कुल के उद्धार हेतु जैसा श्राद्ध है वैसा ही तरूपत्रक मोक्ष प्रदायक होता है।

मम महापापक्षय कुलत्रय समुद्धरण
प्रजापति पुरगमन निरय पित्र क्षरा मधुधारा
वृष्टि तृिष्त सिध्यर्थ, शत पुत्र सिद्धाचर्थ
पुत्रार्थ अमुक नामक वृक्षं अहं परिग्राहिष्ये।

देखा जाये तो पुत्र को हम स्वार्थ के कारण जन्म देना चाहते हैं। शास्त्र भी कहते हैं कि यह संसार से बंधा है किन्तु तरू को हम सदा परमार्थ के लिए रोपते और पालते हैं। क्योंकि हम जानते हैं कि संसार में सब कुछ स्वार्थ से नहीं सधता। परमार्थ जरूरी है। मत्स्य पुराण में विर्णत है कि दस कुओं के बराबर एक बावड़ी, दस बावड़ियों के बराबर एक तालाब, दस तालाबों के बराबर एक पुत्र तथा दस पुत्रों के बराबर एक वृक्ष है-

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दसकूपसमो वापी, दशवापीसमो हृद:।
दशहृदसमो पुत्र:, दशपुत्रसमो द्रुम:।।

पेड़ को इस बात से कोई सरोकार नहीं होता है कि उस पर घोंसला बनाने वाले पक्षी की प्रजाति क्या है। वह तो आश्रय और आधार देता है, पेड़ों के आत्मीय पक्ष के कारण पेड़ को काटने पर रक्त की धार निकलने का लोक विकास है। विष्णोई समाज में तो सैकड़ों वर्ष पूर्व पेड़ों की रक्षा हेतु अभूतपूर्ण बलिदान दिया है। अनेक स्थानों पर पेड़ों के राखी बांध कर बालिकाएं पेड़ों में भ्रातत्व पाती है। इस लोकगीत में नीम को न काटने की प्रार्थना करते हुए कन्या अपने पिता से कहती है-

बाबा निमिया के पेड़ जिन काटहु

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निमिया, चिड़िया बसेरे

सबरे चिरइया उड़ि जईहै

रहि जैहे निमिया अकेलि

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बाबा बिटियन के जनि दुख देहु

बिटिया चिरइया नाई

सबरे बिटियवें जइहे सासर

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रहि जैहै निमिया अकेली हो।

पूर्वी उत्तर प्रदेश में प्रचलित इस लोकगीत में वृक्ष और बेटी की व्यथा आत्मीय एवं एकाकार हो गई है। पेड़ तो परार्थ ही पैदा होता है। पुत्र कुपुत्र हो सकता है किन्तु पेड़ कोई गलत काम नहीं करता। उसमें शिव तत्व होता है। वह सदा कल्याण ही करता है। यदि तरूपुत्रक की अवधारणा को व्यापक समर्थन मिले तो वृक्षारोपण की प्रवृत्ति बढ़ेगी। धरती फिर से सस्य श्यामला होगी। एक पेड़ अनगिनत जीवों को आश्रय देता है। एक पेड़ उद्धारक भी है, तारक भी और मोक्ष प्रदायक भी।

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