पत्रकारिता की कसौटी की भी कसौटी होनी चाहिए

पत्रकारिता की कसौटी, चाटुकारिता है पत्रकारिता का अंत

पत्रकारिता का अस्तित्व ही सवाल पूछने और शासन में बैठे लोगों की जवाबदेही तय करना है। लेकिन इस जवाबदेही से मीडिया भी अछूती नहीं। अब समय आ गया है कि समूची दुनिया से अनवरत सवाल पूछते रहने वाले पत्रकार और मीडिया स्वयं से भी यह सवाल लगातार पूछे कि वे क्या कर रहे हैं, और पत्रकारिता का धर्म क्या है

 

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पत्रकारिता के प्राण तत्व

पत्रकारिता के प्राण तत्व हैं तटस्थता, निष्पक्षता और पारदर्शिता। लेकिन जब कोई पत्रकार या मीडिया अपने निजी स्वार्थ और हितों को साधने की खातिर इन प्राणतत्वों से ही खेलना शुरू कर दे, खेल खेल में उसे धीरे-धीरे उधेड़ने लगे, तो समझ लेना चाहिए इस खतरनाक खेल से वह न केवल समाज का अहित कर रहा है।

बल्कि वह स्वयं भी खुदकुशी करने पर आमादा है, क्योंकि पत्रकारिता प्रोफेशन तभी तक जिंदा है जब तक इसमें जनता का विश्वास है और इस विश्वास की पूंजी का बस एक ही आधार है निष्पक्षता

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पत्रकारों को इस बात का गर्व होना चाहिए कि किसी संविधान ने पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा खंभा नहीं बनाया बल्कि यह मुकाम पत्रकारिता की खुद की मेहनत, ईमानदारी और निष्पक्ष रुप से किये जाने वाले संघर्षपूर्ण काम का ही नतीजा है। और इस सम्मान व कीर्ति के साथ खिलवाड़ करना इस खंभे की नींव खोदने जैसा है, उसे ढहाने जैसा है।

आज भी जब सी. वाई. चिंतामणि, पंडित मदन मोहन मालवीय, के. रामाराव, बाबू विष्णु राव पराड़कर, एम. चलपतिराऊ आदि जैसे कई अन्य समर्थ संपादकों, पत्रकारों का नाम जहन में आता है, माथा गर्व से भर जाता है जो अपने जीवन के अंतिम क्षणों तक अपने पत्रकारीय मूल्यों, विचारों और सिद्धांतों पर अड़े रहे, उसके लिए लड़ते रहे।

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देश की एकता और अखंड़ता के लिए संघर्षरत रहे, सी. वाई. चिंतामणि ने तो इलाहाबाद से प्रकाशित समाचारपत्र “लीडर” के ‘बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स’ के चेयरमैन पं मोतीलाल नेहरु के 1910 के कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में गौहरबाई के गायन के आयोजन के विचार की अतितीखी निंदा करने से भी परहेज़ नहीं किया था।

और मोतीलाल जी अपने ही समाचारपत्र की इस भर्त्सना से उस कार्यक्रम को निरस्त करने को बाध्य भी हुए थे।

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आपको पं. मालवीय जी का किस्सा तो याद ही होगा, जब उन्हें कालाकांकर के राजा साहब रामपाल सिंह ने अपने अखबार हिंदुस्थान का संपादक बनाने के लिए उनसे खूब चिरौरी-विनती की थी। तब मालवीय जी ने एक ही शर्त रखी थी कि राजा साहब कभी उनसे नशे की हालत में बात नहीं करेंगे। यानी शराब पीकर मालवीय जी से बात करने की मनाही थी।

कहते हैं राजा ने उनकी यह बात मान ली और मालवीय जी की देखरेख में हिंदुस्थान अखबार खूब फला-फूला और देश के चुनिंदा प्रतिष्ठित अखबारों की अगली पंगत में आ खड़ा हुआ। इस अखबार की बढ़ी हुई शोहरत में राजा अपनी सुध-बुध खो बैठे। उन्हें लगा कि ये सबकुछ बस यूं ही हो गया।

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इस गुमान में वह अपनी दी हुई शर्त भूल बैठे और नशे की हालत में मदन मोहन मालवीय जी से संवाद कर लिया।

इस व्यवहार से मालवीय जी इतने दुखी हुए कि बिना एक पल गंवाए उसी क्षण हिंदुस्थान समाचार पत्र के संपादक पद से इस्तीफा दे दिया । कहते हैं नरेश ने इस गलती के लिए बार-बार माफी मांगी, पर मालवीय जी अपनी बात पर अडिग रहे और फिर उस ऑफिस में कदम नहीं रखा।

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पत्रकारिता की कसौटी की भी कसौटी होनी चाहिए

 

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जब प्रधानमंत्री को करना पड़ा इंतजार

ठीक इसी तरह नेशनल हेराल्ड के संस्थापक थे पंडित जवाहरलाल नेहरू। 1938 में स्थापित यह अपने समय का बड़ा ही तेजतर्रार अखबार था, जो लखनऊ से प्रकाशित होता था।

बात उन दिनों की है जब पं नेहरू प्रधानमंत्री थे। कहते हैं की नेहरु जी का कोई कार्यक्रम लखनऊ में था और कार्यक्रम खत्म होने के बाद वह अचानक अपने ही नेशनल हेराल्ड समाचारपत्र के दफ्तर पहुंच गये। नेशनल हेराल्ड के तत्कालीन संपादक एम. चलपति राऊ को जब यह सूचना दी गई कि पंडित नेहरू जी आए हैं। आपसे मिलना चाहते हैं, तो उन्होंने मिलने से साफ इनकार कर दिया।

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कहा कि उनको बता दीजिए कि मैं अभी संपादनकार्य में व्यस्त हूं। एक घंटे बाद मिल पाऊंगा। कहते हैं पंडित नेहरू जी 1 घंटे तक वहां रूके, तब जाकर अपने ही अखबार के संपादक महोदय से मुलाकात हो पायी।

कलम के इन सिपाहियों का यह अपना कद-पद था जिन्होंने पत्रकारिता को हथियार बनाया सामाजिक बदलाव का, जनचेतना क्रांति का, सामाजिक अन्याय, शोषण, हिंसा और हरेक दासता के खिलाफ पुरजोर ढंग से आवाज उठाने का। पर जब कोई पत्रकार या संपादक इस तरह सरकार से गलबहियां करता हुआ किसी व्यावसायिक मुनाफा या सत्तासुख की आस में अपने मूल पत्रकारिता गुण-धर्म की तिलांजलि देकर सत्ताधुन पर नाचने लगे, बिरूदावली गाना शुरू कर दे।

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पत्रकारिता  अन्य राजनीतिक दलों व वरिष्ठ नेतृत्वजनों को नीचा दिखाने का षडयंत्र रचने लगे और अपना आपा खोकर अपशब्द बोलने लगे, तो उस हेठी सोच को आसानी से समझा तो जा सकता है, पर माफ नहीं किया जा सकता।

वैसे गांधी जी ठीक ही कहते थे कि अच्छाई और बुराई की तरह अच्छे-बुरे अखबार और पत्रकार भी हरेक समाज में यूं ही मिलते और दिखते रहेंगे, जिनसे घबराने की जरूरत नहीं बल्कि ये बुराई आपतक न पहुंचे, सतर्क रहना जरूरी है। अब ऐसे कुछ लोग जो मान बैठे हैं कि हरेक बात की कसौटी वही हैं, तो मैं समझता हूं कि इस कसौटी की भी एक कसौटी होनी चाहिए जिस पर इनलोगों को तनिक ठीक से कसा जाय। और जो कसौटी पर खरा उतरे, उसे पत्रकार वरना पत्रकार के नाम पर इन्हें रंगा सियार कहने में कोई हर्ज नहीं है।

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