'परशुराम की प्रतीक्षा' में भारतीय लोकतंत्र!

‘परशुराम की प्रतीक्षा’ में भारतीय लोकतंत्र!

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उत्तर प्रदेश में तीर धनुष वाले राम की एकाधिकारवादी संस्कृति की राजनीति के विरुद्ध फरसा वाले परशुराम के विस्तार की सांस्कृतिक राजनीति ‘हिंदू राष्ट्रवाद की मोनोपली’ को पॉपुलर चुनौती है। यह चुनौती सिर्फ राष्ट्रवाद की धुरी के गिर्द ही नहीं है बल्कि राष्ट्रवाद के कट्टर स्वरूप को ‘अस्मिता बनाम अस्मिता’ के संघर्ष में बदल देने की रणनीति है।

मिथकों के देश में मिथक की तानाशाही को मिथक से धक्का देने की पहल है।21 वीं सदी के समाज में लोकतंत्र को बचाए रखने के लिए ‘प्लुरल स्पेस’ की खोज का यह एक प्रयास है।

ज्ञानकोश के पैमाने को स्वदेशी ढंग से देखें

दिलचस्प है कि अबतक उच्चवर्गीय मिथक को निम्नवर्गीय मिथक से चुनौती दी जाती थी जबकि इस बार ओबीसी दलित राजनीति ने उच्च जाति के बीच ही दो मिथकों को आमने सामने कर दिया है।यह भारतीय परंपरा में अंतर्निहित मूल्यों की शक्ति का एक नमूना है।आने वाले समय में ज्यों ज्यों राजनीति पर एकाधिकार बढ़ेगा,लोकतंत्र के स्पेस को कुचला जाएगा,इस तरह के नए नए प्रयोग सामने आएंगे।

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आक्रामक राम के सर्वव्यापी मिथक का इतिहासीकरण औपनिवेशिक इतिहास निर्माण की क्रूर प्रक्रिया की प्रतिक्रिया की देन है।परंपरा में सौम्य और स्त्रैण तत्व का नाश धीरे धीरे हुआ। खास कर अंग्रेजीराज के प्रभाव में। हमारे देश के सहज लोक में मिथक जीवन व्यवहार और मानस बोध का सामान्य हिस्सा रहा है।जब आप एक मिथक का दुरुपयोग करेंगे तो दूसरे के प्रयोग लिए भी यह अवसर बन सकता है। हमें स्वीकार करना चाहिए कि जैसे पश्चिम के पूँजीतन्त्र में नस्ल अंतर्निहित है, भारतीय लोकतंत्र में जातिवाद एक अनिवार्य दुर्गुण है। हमें ज्ञानकोश के पैमाने को स्वदेशी ढंग से देखने की जरूरत है। निरपेक्ष सेकलुरिज्म भारतीय मानस में घुसाने और खोजने की कोशिश आदमी में पूंछ खोजने की कोशिश है।

'परशुराम की प्रतीक्षा' में भारतीय लोकतंत्र!

‘परशुराम’ भारत के दो महत्वपूर्ण क्लासिक साहित्यिक ग्रन्थ ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ में शक्तिशाली ढंग से मौजूद हैं। वे रामायण में जहां राम और लक्ष्मण को उनकी सीमा का ज्ञान कराते हैं,वहीं महाभारत में भीष्म(क्षत्रिय),द्रोण(द्विज) और कर्ण(सूत) के गुरु बनते हैं।

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फिर आये चर्चा मैं श्री परशुराम 

परशुराम योग और भोग संस्कृति से अलग संघर्ष,कर्म व कृषि श्रम की संस्कृति रचते हैं।हिमालय से कन्याकुमारी तक कृषि संस्कृति,जल संरक्षण और कृषि सभ्यता के विस्तार में परशुराम का योगदान है।धर्म ग्रन्थों और लोक में तो आख्यान का खजाना मिलता है।

यह संयोग है कि 1962 के भारत चीन युद्ध के वक्त सुविख्यात कवि दिनकर भारत की शक्ति युक्ति के लिए ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ करते हैं।वे भूमिका में परशुराम की मिथक यात्रा के तथ्य भी रखते हैं कि कैसे हिमालय से सुदूर दक्षिण तक यह किसान लड़ाकू ऋषि हमारी कर्मचेतना और युद्ध चेतना के प्रतीक हैं। 2020 में भारत चीन सीमा संघर्ष के बाद फिर एक बार परशुराम चर्चा में हैं।देश की सीमा पर भी और राम के घर में भी।नेहरू,मोदी,अखिलेश और मायावती के परशुराम से अलग कवि दिनकर के अवचेतन में मौजूद ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ को जानेंगे तो वह बिल्कुल अलग है।मुझे लगता है कि 21वीं सदी की राजनीति में टेक्नलॉजी और मिथक दो आभासी तत्व प्रमुख होंगे और जो इसमें जीतेगा वह ‘सिम्बोर्ज मानव’ के तरलचित्त पर राज करेगा। ठोस सबकुछ भाप बनकर उड़ जाएगा।

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