पंचतंत्र का पहला तंत्र- मित्रभेद - प्रस्तावना

पंचतंत्र का पहला तंत्र- मित्रभेद – प्रस्तावना

पंचतंत्र के पहले भेद के अनुसार हमे पता चलता है की किस प्रकार एक चालाक और लालची व्यक्ति दो सज्जन व्यक्तियों में बैर उतपन्न करके अपना फायदा करता है। पहले भेद में हमे पता चलता है की कैसे एक चुगलखोर और लालची गीदड़ ने एक सिंह और बैल की घनिष्ठ मित्रता का नाश कर दिया था।

वर्द्धमानो महान्स्नेहः सिंहगोवृषयोर्वने ।

पिशुनेनातिलुब्धेन जम्बुकेन विनाशितः ॥ १ ॥

 

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कहा जाता है कि दक्षिण देश में महिलारोप्य नाम का एक नगर है। वहाँ धर्मपूर्वक बहुत अधिक धन कमाने वाला वर्द्धमान नाम का एक बनिया रहता था। एक बार रात में पलंग पर लेटे लेटे उसे यह चिन्ता हुई कि “बहुत अधिक धन बढ़ जाने पर भी धन प्राप्ति का उपाय सोचना और करना ही चाहिये। कहा भी है

 

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न हि तद्विद्यते किञ्चिद्यदर्थेन न सिद्ध्यति ।

यत्नेन मतिमांस्तस्मादर्थमेकं प्रसाधयेत् ॥ २ ॥

संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो धन से नहीं मिलती हो। इस कारण बुद्धिमान मनुष्य को कोशिश के साथ धन कमाना चाहिये।

 

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यस्यार्थास्तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः।

यस्यार्थाः स पुमाँल्लोके यस्यार्थाः स च पण्डितः ॥ ३ ॥

जिसके पास धन है, उसके मित्र हैं। जिसके पास धन है, उसी के बंधु (आत्मीय लोग) हैं। जिसके पास धन रहता है, संसार में वही पुरुष है और जिसके पास धन है, वही पंडित होता है।

 

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न सा विद्या न तद्दानं न तच्छिल्पं न सा कला ।

न तस्य हि धनिनां याचकैर्यन्न गीयते ॥ ४ ॥

न वह विद्या है, न वह दान है, न वह कारीगरी है, न वह कला है, न वह नदियों की स्थिरता है, जिसको याचिका लोग न गाते हों।

 

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इह लोके हि धनिनां परोऽपि स्वजनायते ।

स्वजनोऽपि दरिद्राणां सर्वदा दुर्जनायते ॥ ५ ॥

इस लोक में बेगाने भी धनियों के स्वजन हो जाते हैं और दरिद्रों (गरीबों) के रिश्तेदार भी दुर्जन हो जाया करते हैं।

 

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अर्थेभ्योऽपि हि वृद्धेभ्यः संवृत्तेभ्यस्ततस्ततः ।

प्रवर्त्तन्ते क्रियाः सर्वाः पर्वतेभ्य इवापगाः ॥ ६ ॥

धन के बढ़ने और उसके इकट्ठे होने से सारी क्रियायें बैसे ही प्रवृत्त होती हैं, जैसे नदियां पर्वतों से निकलकर सब काम पूरा करती हैं।

 

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पूज्यते यदपूज्योऽपि यदगम्योऽपि गम्यते ।

वन्द्यते यदवन्द्योऽपि स प्रभावो धनस्य च ॥ ७ ॥

जब अपूज्य भी पूजित होता है, अगम्य के निकट भी जाया जाता है और वंदना के अयोग्य पुरुष भी वंदना योग्य हो जाता है, यह सब धन का ही प्रभाव है।

 

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अशनादिन्द्रियाणीव स्युः कार्याण्यखिलान्यपि।

एतस्मात्कारणद्वित्तं सर्वसाधनमुच्यते ॥ ८ ॥

भोजन करने से जैसे इन्द्रियां समर्थ होती हैं, इसी प्रकार सब कार्य धन से सम्पन्न होते हैं। इस कारण धन ही सारी सिद्धियों का साधन कहा जाता है।

 

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अर्थार्थी जीवलोकोऽयं श्मशानमपि सेवते ।

त्यक्तवा जनयितारं स्वं निःस्वं गच्छति दूरतः ॥ ९ ॥

धन की इच्छा से प्राणी श्मशान का सेवन करता है और वही प्राणी अपने पैदा करने वाले गरीब पिता को भी छोड़कर दूर चला जाता है।

 

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गतवयसामपि पुंसां येषामर्था भवन्ति ते तरुणाः।

अर्थेन तु ये हीना वृद्धास्ते यौवनेऽपि स्युः ॥ १० ॥

बूढ़े पुरुषों में भी जिनके पास धन है, वे जवान हैं। जो धनहीन हैं. वे युवावस्था (जवानी) में ही बूढ़े हो जाते हैं।

वह धन लोगों को छः उपायों से मिलता है- भिक्षा राजसेवा, खेती, विद्योपार्जन, लेनदेन या वाणिज्य कर्म (व्यापार) से। इन सब में वाणिज्य (व्यापार) से सबसे अधिक धन लाभ होता है।

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कुत्ता भिक्षाऽनेकवितरति नृपो नोचितमहो

कृषिः क्लिष्टा विद्या गुरुविनयवृत्त्यातिविषमा ।

कसीदा दारिद्रयं परकरगतग्रन्थिशमना

त्र मन्ये वाणिज्यात्किमपि परमं वर्त्तनमिह ॥ ११ ॥

पहले भी अनेक पुरुषों ने भिक्षा वृति की है, राजा योग्य वृत्ति नहीं देता, खेती का धंधा कष्टदायक है, विद्योपार्जन गुरु की विनय वृत्ति के कारण बहुत कठिन है, ब्याज के धन से भी मनुष्य अंत में गरीब हो होता है, क्योंकि अपना धन दूसरों के हाथों में फंस जाता है। इस कारण मैं तो व्यापार से अधिक अच्छी कोई भी जीविका को नहीं मानता।

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उपायानां च सर्वेषामुपायः पण्यसंग्रहः ।

धनार्थ शस्यते होकस्तदन्यः संशयात्मकः ॥ १२ ॥

सब उपायों में बेचने योग्य द्रव्य को इकट्ठा करके व्यापार करना ही एक उत्तम साधन है और बाकी सब संदेहात्मक हैं।

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पण्यानां गान्धिकं पण्यं किमन्यैः काञ्चनादिभिः ।

यत्रैकेन च यत्क्रीतं तच्छतेन प्रदीयते ॥ १३ ॥

धन कमाने के लिए वाणिज्य सात प्रकार का होता है-गंध-द्रव्य (इत्र-तेल) का व्यवसाय, निक्षेप प्रवेश अर्थात दूसरे की वस्तु अपने यहां गिरवी रखना और ब्याज पर रुपये देना, गाय-बैल आदि का व्यापार, पहचाने हुए ग्राहकों को खींचना, कम मूल्य में खरीदी चीज का अधिक दाम पर बेचना, कम तोलना और दूसरे देशों से बरतन आदि वस्तुयें लाना।

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बेचने योग्य वस्तुओं में सुगंधित वस्तु का व्यापार सर्वश्रेष्ठ होता है, जो कि एक से खरीद कर सौ लोगों को बेचा जाता है। तब दूसरे-सोना आदि वस्तुओं के व्यापार से क्या लाभ।

 

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निक्षेपे पतिते हम्म्ये श्रेष्ठी स्तौति स्वदेवताम् ।

निक्षेपी म्रियते तुभ्यं प्रदास्याम्युपयाचितम् ॥ १४ ॥

धरोहर घर में रखकर सेठ अपने देवता की पूजा करता है कि यदि धरोहर रखने वाला मर जाये तो मैं मनचाही वस्तु से तुम्हारी पूजा करूगा।

 

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गोष्ठिककर्मनियुक्तः श्रेष्ठी चिन्तयति चेतसा हृष्टाः ।

वसुधा वसुसंपूर्णा मयाद्य लब्धा किमन्येन ॥ १५ ॥

गाय-बैल के व्यापार में लगा हुआ सेठ मन-ही-मन सोचता है कि मैंने धन से सारी पृथ्वी प्राप्त कर ली है। अब और क्या चाहिये।

 

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परिचितमागच्छन्तं ग्राहकमुत्कण्ठया विलोक्यासौ।

हृष्यति तद्धनलुब्धो यद्वत्पुत्रेण जातेन ॥ १६ ॥

पहचाने ग्राहक को आता हुआ देखकर उसके धन का लोभी व्यापारी उत्सुकता के कारण इस तरह खुश होता है, जैसे उसके यहां पुत्र पैदा हुआ हो।

 

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पूर्णापूर्णे माने परिचित ने वञ्चनं तथा नित्यम् ।

मिथ्याक्रयस्य कथनं प्रकृतिरियं स्यात्किरातानाम् ॥ १७ ॥

कम तोलकर हमेशा पहचान वाले लोगों को ठगना और गलत दाम बताना, यह जंगलियों की प्रकृति है।

 

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द्विगुणं त्रिगुणं वित्तं भाण्डक्रयविचक्षणाः ।

प्राप्नुवन्त्युद्यमाल्लोका दूरदेशान्तरं गताः ॥ १८ ॥

बरतनों को बेचने में चतुर और दूर देश में ले जाने वाले व्यापारी अपने उद्योग-धंधे से दुगना-तिगुना धन प्राप्त कर लेते हैं। ऐसा विचार करके वह बनिया मथुरा में बिकने लायक बरतन लेकर शुभ दिन में गुरुजनों की आज्ञा से रथ पर चढ़कर चल दिया।

उसके घर में ही उत्पन्न संजीवक तथा नंदक नाम के दो अच्छे और भार खींचने वाले बैल थे। उनमें संजीवक नाम का बैल यमुना के कछार प्रदेश में पहुंचकर दलदल में फंसने के कारण लंगड़ा हो गया। तब उसने जुआ (बैलगाड़ी, हल आदि के लकड़ी, जो पशुओं के कंधे पर रखी जाती है) फेंक दिया और चुपचाप लेट गया।

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उसकी हालत देखकर वर्द्धमान बहुत दुःखी हुआ और उसके लिये प्रेम से नम दिल होकर तीन रातों तक आगे नहीं बढ़ा। उसको इस प्रकार दुःखी देखकर उसके साथियों ने कहा-“सेठ जी! एक बैल के लिए सिंह-बाघ से भरे तथा अनेक मुसीबत वाले इस जंगल में सब साथियों को आपने क्यों संकट में डाल दिया है। कहा भी है

 

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न स्वल्पस्य कृते भूरि नाशयेन्मतिमान्नरः ।

एतदेवात्र पाण्डित्यं यत्स्वल्पाद् भूरिरक्षणम् ॥ १९ ॥

बुद्धिमान मनुष्य को थोड़े के लिये बहुत का नाश नहीं करना चाहिये। यही समझदारी है कि थोड़े से ही बहुत की रक्षा करें। इस बात को सोचकर बनिया संजीवक के लिये रक्षकों को नियुक्त करके सब साथियों को लेकर आगे चल दिया नियुक्त रक्षक भी उस जंगल को कष्टों से भरा देखकर संजीवक को वहीं छोड़कर चले गये।

वे दूसरे दिन बनिये के पास जाकर झूठ-मूठ कहने लगे-“स्वामी! संजीवक मर गया। हमने आपका प्यारा समझकर उसका अग्नि संस्कार भी कर दिया”। यह सुनकर वनिये ने कृतज्ञता और प्रेम से नम दिल होकर उसकी शांति के लिये क्रिया संपन्न की।

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इधर संजीवक आयु शेष रहने के कारण यमुना के जल से मिली ठंडी हवा के लगने से थोड़ा स्वस्थ हो गया और किसी तरह उठकर यमुना के किनारे पहुंच गया। वहां हरी घास चरने से कुछ ही दिनों में वह शिवजी के बैल नंदी के समान विशाल तथा बलवान् होकर रोज वर्मा के शिखर के अगले भागों को सींगों से तहस-नहस करता हुआ गर्जन करने लगा।

ठीक ही कहा है

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अरक्षितं तिष्ठति दैवरक्षितं सुरक्षितं दैवहतं विनश्यति ।

जीवत्यनाथोऽपि वने विसर्जितः कृतप्रयत्नोऽपि गृहे विनश्यति॥ २०॥

अरक्षित वस्तु भी भगवान की कृपा से रक्षित होकर बची रहती है और अच्छी तरह रक्षित वस्तु भी भगवान की कृपा से अरक्षित होकर नष्ट हो जाती है। जंगल में त्यागा हुआ अनाथ भी जिंदा बच जाता है, किंतु कोशिश करने पर भी घर में पैदा हुआ बालक जिंदा नहीं बचता।

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एक दिन पिंगलक नाम का सिंह सारे हिरणों के साथ प्यास से व्याकुल होकर पानी पीने के लिए यमुना के किनारे पहुंचा। एकाएक उसने दूर से संजीवक की बहुत तेज गर्जन सुनी। जिसे सुनकर बहुत व्याकुल हृदय हो और डर को छिपाकर वटवृक्ष के नीचे चतुर्मण्डलावस्थान के क्रम से बैठा।

चतुर्मण्डलावस्थान उसको कहते हैं जिसमें सिंह सिंह के अनुयायी, कौए के जैसी आवाज करने वाले और के वृत्त अर्थात् क्या विषय उपस्थित है, इसे जानने वाले बैठे हों। करटक दमनक नाम के दो सियार मंत्री पुत्र अधिकार से भ्रष्ट होकर भी हमेशा उसके साथ रहते थे। ये दोनों आपस में सलाह करने लगे।

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दमनक बोला-“भाई करटक! हमारा स्वामी पिंगलक पानी पीने के लिये युमना के तट पर गया था। फिर क्या कारण है कि प्यास से व्याकुल होने पर भी यह अपनी सेना का घेरा बनाकर दुखी मन और तिरस्कृत होकर इस वट वृक्ष के नीचे आकर बैठा है?” करटक बोला-“भाई! इस बेकार के काम के बारे में सोचने से क्या लाभ? कहा भी है

 

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अव्यापारेषु व्यापारं यो नरः कर्तुमिच्छति ।

स एव निधनं याति कीलोत्पाटीव वानरः ॥ २१ ॥

जो मनुष्य बिना काम का काम करने की इच्छा करता है, वह वैसे ही नष्ट हो जाता है जैसे कील को उखाड़कर वह बंदर नष्ट हो गया था। दमनक ने पूछा-“वह कैसे? तब करकट ने मुर्ख बंदर की कथा सुनाई।

 

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मुर्ख बंदर की कहानी पढ़ने के लिए यह क्लिक करे।

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