नूरजहाँ और जहाँगीर की कहानी की शुरुआत

Advertisement

जब ‘खुसरो’ की पार्टी की प्रबलता के कारण घबराकर सलीम ने मुसलमान सरदारों से मदद मांगी, तब उन लोगों ने दो शते पेश की। एक शर्त यह थी कि सलीम इस्लाम की फिर से स्थापना करेगा और दूसरी यह थी कि खुसरो के पक्षपातियों को कोई कड़ी सजा न देगा। सलीम ने दोनों शर्ते स्वीकार कर ली। राजगढ़ पर बैठकर बादशाह जहांगीर ने शाहजादा सलीम की प्रतिज्ञा का जिस प्रकार पालन किया, उससे उसका पूरा चरित्र समझा जा सकता है। उसने फिर से इस्लाम को राज-धर्म बना दिया, परन्तु वह इस्लाम केवल शरीरमात्र था, उसमें आत्मा नहीं थी, मस्जिदों में इस्लामी खुतबा पढ़ा जाने लगा, दरबार में मुसलमान धर्माचार्य को ऊंचा स्थान दिया गया और हिजरी संवत् जारी किया गया। परन्तु साथ ही शराब का दौर पहले से अधिक जोर से चलने लगा।

जिन दिनों में अकबर ने गोश्त खाना बन्द किया था उनमें वह बंद ही रहा; संगीत का आदर होता था, दरबार में तसवीरें लटकाई जाती थीं, ईसाई जेस्विट पादरियों को इनाम मिलते थे और इज्जत की जगह दी जाती थी, और हिन्दू सरदार ऊँचे ओहदों पर कायम रखे गये। दूसरी शर्त यह थी कि खुसरों के सहायकों को कोई दण्ड न दिया जाय। यह टोक है कि प्रत्यक्ष रूप में उन्हें कोई दण्ड नहीं दिया गया, परन्तु बेचारे खुसरो के साथ जो बीती उस पर उस समय की प्रजा रोती थी। वह बेचारा जितने दिन जिया, बेइज्जती से जिया, वह प्रायः जेल में रहा। उसकी आँखों के पपोटे सी दिये गये, ताकि वह देख न सके। इन अत्याचारों ने उसे बीमार कर दिया। बीमारी की दशा में ही क्ह छोटे भाई खुर्रम के सुपुर्द किया गया, जिसकी सुरक्षा में उसके दुःखित और घायल प्रामों ने शरीर का परित्याग किया।

जहाँगीर अकबर का पुत्र था। इसलिए सर्वथा राक्षस नहीं बन सकता था, परन्तु मुगल होते हुए अकबर की हार्दिक विशालता से विहीन था इस कारण विलासिता और क्रूरता को तिलांजलि नहीं दे सकता था वह न इतना गिरा हुआ था कि स्वयें अत्याचार करता और न इतना बलिष्ठ था कि अत्याचार होने से रोक सकता। उसके अपने जीवन के दो भाई थे एक होश का और दूसरा मदहोशी का। सुबह से शाम के तीन बजे तक वह पूरे होश में रहता था और उसके बाद बदहोशी में। उसका गुण था सरलतापूर्ण भलमनसाहत उसका दोष था विषयासक्ति और वंश परम्परागत क्रूरता। जब वह सावधानता में रहता था, तब अपने ढीले दंग पर अकबर की नीति को चलाने का यत्न करता था, परन्तु जब शराब या विषयासक्ति उस पर हावी हो जाती थी, तब वह अन्धा और क्रूर हो उठता था।

Advertisement

जहाँगीर की दिनचर्या सुनिए। हॉकिंस नामक अंग्रेज कुछ समय के लिए शाही दरबार में आकर रहा था। उसने जहाँगीर के साथ कई बार हम-दिवाली हम-प्याला होकर दिन गुजारा। उसने लिखा है कि प्रभात में बादशाह उठता है। उसका पहला काम है, माला फेरना। या काम एक प्रार्थना गृह में होता है, जिसमें जहाँगीर पश्चिम की ओर मुँह करके बैठता है प्रार्थना गृह में ईसा और मेरी के चित्र लगे हुए हैं उसके पश्चात् वह प्रजा को दर्शन देता है, जिसके बाद दो घण्टे तक आराम करता है। विश्राम के पश्चात् खाना खाकर बादशाह बेगमात में चला जाता है।

कुछ घण्टे अन्तःपुर में बीतते हैं, जिसके बाद दरवार होता है। राज्य का सब काम उसी समय किया जाता है। अर्जियाँ सुनी जाती हैं और राजनीतिक मुलाकातें होती हैं। दरबार के बाद हाथियों को लड़ाई या ऐसे ही और तमाशे दिखाये जाते हैं, जिसमें इच्छानुसार बादशाह शामिल होता है फिर नमाज होती है, जिसके बाद दस्तर खान परोसा जाता है। भोजन में चार-पाँच तरह के व्यंजनों के अतिरिक्त विशेष हिस्सा शराब का रहता है। भोजन के बाद बादशाह अपने निज कमरे में पहुँच जाते हैं, जहाँ महफिल लगती है। महफिल में वही तोग सम्मिलित हो सकते हैं, जिन्हें बादशाह नियंत्रित करें। उस समय बातचीत, हँसी-मजाक, नाचना-गाना और मेल-मुलाकात के साथ-साम शराब का दौर चलता है। जहाँगीर हकीम के आदेशानुसार प्रायः पाँच प्याले बढ़ता है, परन्तु कभी-कभी सीमा का उल्लंघन भी हो जाता शेष निमंत्रण मसीहियों को भी थोड़ी बहुत शराब चढ़ानी पड़ता । रात होते होते सारी महफिल बेहोश हो जाती। जहाँगीर की मस्ती

पूरे जोबन पर होती, तब अफीम का गोला चढ़ाया जाता जिसके सिवा इसके कोई उपाय नहीं रहता कि नौकर अपने झूमते हुए बादशाह को पकड़कर चारपाई पर डाल दें। दो घण्टे तक बेहोशी सवार रहती, जिसके बाद आधी रात के समय उसे उठाकर थोड़ा बहुत खाना खिलाया जाता। उसे खिलाना नहीं, बल्कि बलात्कार से पेट में अन्न भरना कहा जा सकता है।

Advertisement

यह थी जहाँगीर की दिनचर्या, जो एक ऐसे दर्शक ने लिखी है, जिसे कई महफिलों में शामिल होने का अवसर मिला था। जिस आदमी का आधा दिन मद्यसेवा में जाता हो, उसे पूरा सचेत आदमी नहीं कह सकते, परन्तु जानने वाले ने लिखा है कि प्रात:काल के समय जहाँगीर का चित्त सावधान होता था। सावधान की दशा में वह इतना चौकन्ना रहता था कि यदि कोई सरदार रात की लीला की चर्चा दिन में करे, तो उसे कड़ी सजा दी जाती थी। यदि किसी दरबारी पर यह सन्देह हो जाये कि वह शराब पीकर दरवार में आया है तो उसे दण्ड दिया जाता था।

इस प्रकार जहाँगीर में भलाई और बुराई का मेल था वह युद्ध में वीर था। सावधान अवस्था में उदार और समझदार था, जानबूझकर प्रजा को सताना नहीं चाहता था, बल्कि यहाँ तक भी कहा जा सकता है कि यदि विशेष कष्ट उठाये बिना प्रजा का भला हो सके, करने को तैयार था। उसने दरबार में एक घंटा लगाया था, जिसकी रस्सी दरवाजे के पास ऐसी जगह बाँधी गई थी, जहाँ हरेक आदमी पहुंच सके। उद्देश्य यह था कि जिस किसी को बादशाह के पास कोई शिकायत पहुँचानी हो, वह रस्सी को खींचकर घण्टे को हिला सके, जिस पर बादशाह फायदे को बुलाकर फर्याद सुन सके। स्कीम चाहे कितनी ही अक्रियात्मक हो, परन्तु उद्देश्य के अच्छा होने में संदेह नहीं। अकबर के शासन सुधारों को उसने यथाशक्ति निभाने की चेष्टा की, परन्तु जहाँगीर के चरित्र के दुर्गुणों ने जो परिस्थिति पैदा की और जितने अंश में मुगल साम्राज्य को कमजोर किया, यह हम आगे दिखायेंगे प्रजा का प्रेम प्राप्त करने की चेष्टा करने पर भी वह लोकप्रिय नहीं था।

हॉकिन्स लिखता है कि रियाया बादशाह से डरती है, जिसके दो कारण प्रतीत होते हैं। एक तो यह कि अपनी प्रारम्भिक प्रतिज्ञा की पूर्ति में उसे राजपूतों की अपेक्षा मुसलमानों-सरदारों का अधिक आदर करना पड़ता था, जिससे हिन्दुओं के हृदय में अविश्वास पैदा हो गया था दूसरा कारण यह था कि क्रोध की बदहवास में बह ऐसी-ऐसो क्रूरता में कर बैठता था कि प्रजा घर-थर काँपने लगती थी। एक जरा-सा शक होने पर उसने अपने एक वानर को मार डाला था और एक नौकर को प्याली तोड़ने के जुर्म में बेतों की सजा दी गई थी। शेर और आदमी की ऐसी लड़ाई देखने में यह बहुत मजा अनुभव करता था, जिसमें आदमी के टुकड़े-टुको हो जायें। ऐसे शासक के लिए प्रजा के हृदय में कोई गहरा प्रेम नहीं

Advertisement

हो सकता। संक्षेप में जहाँगीर का चरित्र वह था कि यह न जान-बूझकर किसी का बहुत भला करना चाहता था और न बहुत चुरा। वह निर्बल था इन्द्रियों के विषय उसे जिधर चाहते थे, खींचकर ले जाते थे। लोहे को चुम्बक मिला। हाथी को फीलवान मिल गया। जहाँगीर के महलों में नूरजहाँ ने कदम रखा। यह मेल अच्छा हुआ या बुरा, यह कहना तो कठिन है, परन्तु इसमें सन्देह नहीं कि इस जोड़ी को जुटाकर कुदरत ने अपने नियम को पूरा कर दिया। जो अपना मालिक है, उसे प्रजा मिलनी चाहिए, और जो अपना-अपनी इन्द्रियों का दास है-उसे मालिक की आवश्यकता होती है। जहाँगीर को एक स्वामी की जरूरत थी, वह नूरजहाँ के रूप में प्राप्त हो गयी।

नूरजहाँ का दादा तेहरान (फारस) का रहने वाला था। वह रियासत में अच्छा मान रखता था लेकिन उसका लड़का मिर्जा गयास गरीब हो गया। उसने सोने की चिड़िया के पास जाकर सुनहरे अण्डे द्वारा भाग्यों को पलटने का निश्चय करके भारत की ओर यात्रा की, परन्तु दुर्भाग्य ने साथ न छोड़ा। कन्दहार पहुँचते-पहुँचते उसकी जेब विल्कुल खाली हो गई। आफ़त पर आफ़त यह कि कन्दहार पहुँचने के साथ हो उसकी एक लड़की पैदा हुई। इसी लड़की का नाम आगे जाकर नूरजहाँ हुआ। गयास बड़ी आफत में फंसी। बच्ची को संभाले या उसकी माँ को। यात्रा को जारी रखना भी जरूरी था।

जब और कोई उपाय न सूझा, तो लड़को को सड़क के किनारे रखकर बोझ को हल्का किया, परन्तु ‘जाको राखे साइयाँ, मार सके न कोय’ नूरजहाँ के भाग्य उसके साथ थे। एक व्यापारियों का काफिला उधर से गुजर रहा था। काफिले के सरदार ने सड़क के किनारे पर चाँद के टुकड़े को पड़ा पाया, तो उसके हृदय में प्रेम उमड़ आया। उसने बच्चे को उठा लिया और अपना करके पालने का निश्चय किया। पहली आवश्यकता धाय की पड़ी। बेटी के भाग्यों की नाव पर चढ़कर उसके सम्बन्धी भी तर गये गयास और बोबी पास ही थे। नूरजहाँ की माँ ही उसकी धाय बनाई गई इस प्रकार सुलक्षणी लड़की के सहारे कुनबे का कष्ट निवारण हुआ।

Advertisement

काफिले के साथ वह परिवार भारत की ओर रवाना हुआ। सरदार ने देखा कि नूरजहाँ का बाप और बड़ा भाई बुद्धिमान और कार्यकुशल है। उसने उन्हें अपने कारोबार में ले लिया। दोनों अपने गुणों से चमक उठे। यहाँ तक कि उनका जाना-आना अकबर के दरबार में भी हो गया। नूरजहाँ भी बड़ी हुई ज्यों-ज्यों उसको आयु बढ़ती जाती यो सुन्दरता उभरती जाती थी जवानी आते आते उसके सौन्दर्य की धूम चारों ओर मच गई। साथ ही वह चुलबुलो तबियत की भी थी। बोलने में प्रयोग थी। यात करते कविता कर डालती थी और कारोबार में चतुर थी। सलीम की चढ़ती जवानी थी, नूरजहाँ की देखकर मन हाथ से निकल गया। दोनों का मेल-जोल होने लगा। संसार में ऐसी बातें पानी में तेल की भांति फैल जाया करती हैं शाहजादा सलीम और गयास की लड़की के प्रेम की चर्चा भी दूर-दूर तक फैल गई अकबर ने उसे सुना।

शहजादे का एक गरीब आदमी की लड़की से मेल कैसा? अकबर ने लड़के को बुलाकर डाँट लगाई और हुक्म दिया कि नूरजहाँ की शादी शीघ्र किसी जगह कर दी जाय इसी हुक्म के अनुसार शेर अफगान नाम के युवा सरदार के साथ नूरजहाँ का विवाह किया गया और आफत को टालने के लिए बादशाह ने उसे बंगाल में जागीर देकर रवाना कर दिया। इस तरह मामला किसी तरह रफा-दफा हो गया। परन्तु गद्दी पर बैठते हो जहाँगीर ने बंगाल को ओर आँख उठाई। वह नूरजहाँ को भूला नहीं था। उसने अपने एक रिश्तेदार को प्रेम का दूत बनाकर शेर अफगान के पास भेजा।

उसने उस बहादुर परन्तु अभागे सरदार को लोभ दिया और धमकाया, परन्तु वह नूरजहाँ को छोड़ने पर राजी न हुआ। प्रत्युत उल्टा उसने यह समझकर कि सरकार का आश्रित होने से ही दबाव डाला जा रहा है। नौकरी पर लात मार और हथियार पहिनने छोड़ दिये। साम और दाम के उपाय को असफल हुआ देखकर जहाँगीर ने दूसरे उपाय का अवलम्बन किया बंगाल के सूबेदार ने शेर अफगान को मुलाकात के लिए बुलाया। वह धोखे से डरता था, इसलिए कपड़ों के अन्दर छुरा लेकर गया। सूबेदार ने शेर आफगान से नूरजहाँ को छोड़ देने का प्रस्ताव किया, जिसे उस बहादुर ने अपमानजनक समझा। दोनों में बातचीत की गर्मी बढ़ गई, यहाँ तक कि हथियार निकल आये। शेर अफगान ने सूबेदार को अपमानजनक प्रस्ताव का जवाब रे से दिया, परन्तु स्वयं भी सूबेदार के सिपाहियों के हाथ से काट डाला गया। इस तरह जहाँगीर का काम आसानी से बन गया।

Advertisement

शेर अफ़गान ने सूबेदार को मारकर जो राज-विद्रोह किया, उसकी सजा वह दी गई कि उसके अन्तःपुर को बादशाह के अन्तःपुर के साथ मिला दिया गया। कैदी होकर नूरजहाँ आगरे पहुंची। जहाँगीर ने प्रेम का प्रस्ताव किया, उस में नो ने पति के घटक के साथ बात करने से मुंह फेर लिया। यह मान पति के हत्यारे के साथ पुणा का सूचक था, या पुराने प्रेमी की परीक्षा का साधन था, यह कहना कठिन है।

जहाँगोर ने भी मान का जवाब मान से दिया और नूरजहाँ को अपनी माता की परिचारिकाओं में स्थान दिया। कुछ समय तक मान-लीला जारी रहो,परन्तु प्रेम असली था, इस कारण मान के मिटने में देर न लगी गाप्ी पर बैठने के छठे साल जहाँगीर और नूरजहाँ की शादी धूमधाम से हो गई। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि जहाँगीर के स्थान पर हिन्दुस्तान को गधे पर नूरजहाँ बैठी। वह पति और पति का राज्य दोनों की स्वामिनो बनी। इसके पश्चात् जहाँगीर के राज्य की जितनी बड़ी घटनाएँ हैं, उन सबकी तह में ‘नूरमहल’ का हाथ दिखाई देता है जहाँगीर के अपने चरित्र पर भी इस विवाह का कुछ कम असर नहीं पड़ा। उसका चरित्र अंकुश के वश में आ गया पान- लीला सौमा में बाँध दी गई। नूरजहाँ के अन्तःपुर को फालतू फालतू सुन्दरियों से खाली कर दिया। जहाँ नूरजहाँ की राज-काज के प्रति उदासीनता के लिए उत्तरदाता है, वहाँ वह एय उद्दण्ड प्रकृति के मनुष्य की उग्रता को कम करने के श्रेय की रागिनी भी हैं।

राज-कार्य में धीरे-धीरे नूरजहाँ का दखल बढ़ने लगा इस्लामी शासन में यह एक अपूर्व बात थी कि जहाँगीर ने अपने और नूरजहाँ के नाम से सिक्के जारी किये। नूरजहाँ का बाप प्रधान मन्त्री बनाया गया, भाई को ऊँचे ओहदे पर बिठाया गया। दरवार की सजावट हो या सूबेदार का चुनाव हो, अन्तःपुर का प्रवन्ध हो या दरबार के योग्य वेष का निश्चय हो, सब जगह उसकी राय प्रिवी कौंसिल के फैसले के समान थी। कहा जाता है कि उसने औरतों के वेश में बहुत सुधार किया, सुगन्धित इत्र बनाने की शैली उसी से आरम्भ हुई और दरबार की सजावट को उसी ने खूबसूरती को हद तक पहुँचाया।

Advertisement

Recent Posts

आयुर्वेद में नींबू के फायदे और इसका महत्व

भले ही बात अतिश्योक्ति में कही गई हो पर नींबू के बारे में एक किंवदन्ती…

1 week ago

महाभारत के महान योद्धा अश्वत्थामा, जो आज भी जीवित है

अश्वत्थामा, जिनको द्रोणी भी कहा जाता है, क्यूंकि वे गुरु द्रोण के पुत्र थे। वह…

2 weeks ago

मुक्त, स्वच्छन्द परिहास व मौज मस्ती की त्रिवेणी ‘होली’

जितने अधिक पर्वों-त्यौहारों का प्रचलन हमारे भारतवर्ष देश में है उतना सम्भवतः संसार के किसी…

3 weeks ago

मुग़ल साम्राज्य की घोर निष्फलता और उसके कारण

यह विश्वास किया जाता है कि भारत की आर्य सभ्यता के अत्यंत प्रसाद का पहला…

4 weeks ago

शाहजहाँ की क्रूर संतान औरंगजेब, जिसने अपने भाई दारा शिकोह को भी मार दिया

जिस पड़ाव पर हम पहुँच गये हैं, कहाँ शाहजहाँ का अकेला रास्ता समाप्त होता है…

4 weeks ago

दक्षिण की चट्टान : जिसे कोई कायर मुग़ल न जीत सका

सदियों तक भारत में इस्लामी राज्य का तूफान दक्षिण की चट्टान से टकराकर उत्तरी भारत…

1 month ago

This website uses cookies.