दक्षिण की चट्टान : जिसे कोई कायर मुग़ल न जीत सका

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सदियों तक भारत में इस्लामी राज्य का तूफान दक्षिण की चट्टान से टकराकर उत्तरी भारत की ओर वापस आता रहा। कई विजेताओं का नेजा पेशावर से विन्ध्याचल तक घुसता चला गया, परन्तु उस पर्वत के कठोर देह को न छेद सका। उसमें लगकर खुण्डा हो गया कई विजेताओं ने दक्षिण के कई हिस्सों को जीतने का का किया, कई टुकड़ों के जीतने में सफलता भी प्राप्त की, परन्तु या तो उन्हें सफलता ही नहीं हुई और यदि हुई भी हो तो वह चिरस्थायिनी न हो सकी मुग़ल बादशाहों के लिए तो दक्षिण एक मृगतृष्णा के समान था।

अकबर से लेकर औरंगज़ेब तक जितने बादशाह हुए उन्होंने दक्षिण को साम्राज्य में मिलाने की चेष्टा की या तो उन्हें सफलता ही नहीं हुई, और यदि कुछ सफलता हुई भी, तो वह सफलता की अपेक्षा कहीं अधिक हानिकारक थी। उस सफलता ने साम्राज्य को नई-नई उलझनों में डाल दिया, जिसमें से निकलना मुश्किल हो जाता था ज्यों-ज्यों मुग़ल सम्राट दक्षिण में घुसते गये, त्यों-त्यों उनके मुँह को लहू लगता गया वह लहू उन्हें आगे हो आगे घसीटता गया, यहाँ तक कि दलदल में पाँव फंस गये, जान मुश्किल में भी, छोड़ना अपमानजनक हो गया, और पकड़ना असम्भव हो गया। दक्षिण ही अन्त में मुग़ल-साम्राज्य का कब्रिस्तान बना।

मुसलमान विजेताओं में से पहले-पहले दक्षिण में पाँव रखने का साहस अलाउद्दीन खिलजी ने किया। जिस क्रूर सिपाही ने अपने उपकारी चाचा के विश्वास और लाड़ का बदला हत्या से दिया और धोखे से गद्दी का रास्ता साफ किया, उसने यदि धोखे से ही दक्षिण में प्रवेश किया तो कोई आश्चर्य नहीं। वह राजपूताने से लौटता हुआ दक्षिण की ओर बढ़ गया। वहाँ देवगिरी-राज्य की सीमा के पास जाकर उसने मशहूर कर दिया कि “चाचा ने अपमानित करके मुझे निकाल दिया है, इस कारण मैं किसी का आश्रय ढूंढने आया हूँ।”

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देवगिरि का राजा रामदेव भोलेपन में पूरा हिन्दू था। उसने धूर्त शत्रु के लिए राजधानी के द्वार खोल दिये। अलाउद्दीन अपने पठान सिपाहियों के साथ अन्दर घुस गया और जाते ही किले पर कब्जा कर लिया। मूर्ख रामदेव ने अपनी अदूरदर्शिता का फल पाया। खजाना लूट लिया गया और प्रजा पर कठोर अत्याचार किये गये। बेचारे राजा ने अलाउद्दीन की अधीनता स्वीकार करके प्राण-रक्षा की। इस प्रकार देवगिरि या वर्तमान दौलताबाद को धोखे से जीतकर अलाउद्दीन खिलजी ने दक्षिण में मुसलमानी राज्य की बुनियाद डाली।

अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु पर दिल्ली की सल्तनत कमजोर हो गई। उसके समय में मलिक काफूर नाम के सेनापति ने दक्षिण में राज्य विस्तार की बात-सौ चेष्टा की। उसने वारंगल और द्वारसमुद्र तक की दौड़ लगाई, और इस प्रकार वर्तमान मैसूर तक के प्रदेश जीत लिये. परन्तु यह राज्य-विस्तार बिल्कुल अस्थायी और कमजोर था। सेनापति के पीठ फेरते ही प्रदेशों ने स्वतन्त्रता का झंडा खड़ा कर दिया। १३१६ ई० से लगभग ५ वर्ष तक दिल्ली में अव्यवस्था रही।

१३२९ ई० में मुहम्मद तुगलक राजगद्दी पर बैठा। वह बादशाह अपनी योग्यता और अयोग्यता में सानी नहीं रखता था वह फारसी और अरबी भाषाओं का विद्वान् था, गणित और तत्त्व ज्ञान का पण्डित था कविता लिख सकता था और कवियों का आदर करता था उसकी दानशीलता मशहूर थी। राजा भोज का ‘प्रत्यक्षर लक्षं दर्द’ सच में सार्थक होता था।

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यह मुहम्मद तुगलक के गुण थे जितने विशाल गुण थे, दोष भी उतने ही विशाल थे यह हमेशा कोई न कोई कल्पना करता रहता था. नया मंसूबा बाँधता रहता था। कभी फारस को जीतने की धुन सवार हुई, तो कभी चीन को परास्त करने का ख्वाब उत्पन्न हुआ। जो राजा दान में इतना उदार था, उसके बारे में एक मुसलमान इतिहास-लेखक ने लिखा है कि, “उसके दरवाजे पर दो तरह के पुरुष अवश्य दिखाई देते थे-ऐसा याचिका जिसने भरपेट पाया हो, और ऐसा अभागा, जो बादशाह के घोर अत्याचार का सताया हो।” एक क्रूर अत्याचारी उदार दानी भी हो सकता है, यह मुहम्मद तुगलक ने अपने दृष्टान्त से सिद्ध कर दिखाया।

मुहम्मद तुगलक ने अपनी मौज की लहर में बहकर एक बार दक्षिण को भारत का केंद्र बनाने का भी यत्न कर डाला था। उस यल में उस योग्य शासक के गुण और दोष दोनों ही प्रतिबिम्बित दिखाई देते हैं। मुहम्मद तुग़लक के दिमाग में यह बात समा गई कि दिल्ली को भारत की राजधानी बनाने से सारे देश का शासन ठीक तरह से नहीं हो सकता। शायद दक्षिण की हरियाली पर कवि बादशाह लट्ट हो गया था।

दिल्ली में आज्ञा प्रचारित की गई कि बादशाह सलामत अपनी राजधानी दक्षिण में दौलताबाद नाम के किले में बनाएं। दिल्ली शहर में जितने रईस, अहलकार या दुकानदार रहते हैं, उन सब को घर-बार उठाकर दक्षिण की ओर कूच कर देना चाहिए। यात्रा के लिए सहूलियत पैदा करने की भी चेष्टा की गई थी। दिल्ली से दौलताबाद तक साफ और खुली सड़क बनाई गई थी, जिसके दोनों ओर छाया देने वाले वृक्षों की पंक्तियाँ थीं। सम्पूर्ण मार्ग ४० पड़ाव में बांटा गया था हरेक पड़ाव पर सराय थी। शाही हुक्म से सब दिल्ली निवासी हटा दिये गये शहर खाली हो गया और दौलताबाद की सड़क आबाद हो गई।

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शहर का शहर उठकर चल तो पड़ा, परन्तु लाखों आदमियों के ठहरने योग्य सराय और उनकी पेट पूजा के लिए अनाज का प्रबत्य हरेक पड़ाव पर कैसे हो सकता था? यात्रियों को अपार कष्ट सुआ। हरेक पड़े पर लाशें पड़ने लगी। बहुत से रास्ते में गये जो दौलताबाद तक पहुँच पाये. उनकी ऐसी दुर्दशा हो गई थी कि बेर हो गई थी कि वह किसी नये शहर को बसाने योग्य नहीं रह गए थे परिणाम यह हा कि दिल्ली उजड़ गई, और दौलताबाद आबाद न हुआ।

अब दूसरा हुक्म हुआ। दौलताबाद से सबको दिल्ली वापस जाना चाहिए। सरकारी हुक्म है, सबको मानना हो होगा। बेचारी प्रजा इण्डे खाकर फिर ४० दिन की नरक-यात्रा के लिए रवाना हुई कुछ लोग भूखे मरे, कुछ गर्मी-सर्दी के शिकार हुए, जो बेचारे भाग्यों से ठिकाने पर पहुँच गये, उनकी मुद्दों से बुरी हालत ची। एक पागल शासक को मूर्खता से हजारों घर बरबाद हुए। राजधानी उज़ बियावान हो गई और दक्षिण भी आबाद न हुआ। इस प्रकार दक्षिण पर बादशाहत करने की

हविस ने मुहम्मद तुगलक को आपत्तियों के समुद्र में डाल दिया। मुहम्मद तुगलक के बाद दिल्ली की सल्तनत कमजोर होती गई। निर्बल शासकों ने तो उसे निर्बल किया हो था, ऊपर से दैवी आफत ने उसकी कमर ही तोड़ डाली। उस समय एशिया पर वह प्रलय-काल का बादल बरस रहा था, जिसका नाम तैमूरलंग था। तैमूरलंग और चंगेज खान को हम प्रलय-काल के बादल के सिवा दूसरा नाम नहीं दे सकते। उनका लक्ष्य न राज्य स्थापित करना था और न कर उगाहना। उनका लक्ष्य मार-काट और लूट द्वारा पृथ्वी के बोझ को हल्का करना या।

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महामारी की तरह वह जिधर निकल गये, उधर ही विधवाओं और अनाथों का हाहाकार सुनाई देता था। शहर के शहर कत्ले-आम के अर्पण कर दिये जाते थे। लूट का तो ठिकाना ही नहीं। जिसे देखा, लूट लिया। सर्वनाश की पूर्ति के लिए अन्त में सब कुछ अग्रिदेव के अर्पण कर दिया जाता था। तैमूरलंग भारत में आंधी की तरह आया और पेशावर से दिल्ली तक को पाँव तले राँधकर पागल हाथी की तरह हरिद्वार काँगड़ा आदि पहाड़ों में होते हुए वापस चला गया दिल्ली को उसने खूब लूटा। कई दिनों तक उसके सिपाहियों ने तलवार और आग की सहायता से भारत को राजधानी को तबाह किया।

अन्त को बरबाद शहरों और उजड़े हुए घरों को फूट और महामारी के अर्पण करके यह नर-पिशाच जिधर से आया था, उधर हो वापस चला गया। उस आफ़त के चले जाने पर भी दिल्ली की वैसी हो दशा रहो जैसी किसी भूतों वाले पर की हुआ करती है। दो महीने तक किसी का यह साहस न हुआ कि हिन्दुस्तान की राजधानी पर दावा करे। यह विना बादशाह के रहो, बाद में लोदी वंश ने राजगदी को संभाता, परन्त उनका शासन दिल्ली के मेरे से अधिक दूर तक फैला हुआ नहीं था। केंद्र की इस निर्मलता का परिणाम यह दुआ कि दूर के प्रान्तों ने दिल्ली के शासन का जुआ कन्धे पर से फेंक दिया।

दक्षिण का तो हलिया हो बदल गया। वहाँ पर इस समय कोन राज्य स्थापित हुए तैलिंगाना के राजा को मलिक काफूर ने वारंगल से खदेड़ दिया था। उसने फिर अपने राज्य पर कृष्णा कर लिया। वह राज्य तैलिंगाना के नाम से मशहर हुआ। दूसरा राज्य ‘विजय नगर’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यह राज्य लगभग दो सौ वर्षों तक कायम रहा मुसलमान रियासतों से घिरा रहने पर जो विजयनगर के राजाओं ने हिन्दू राज्य की ध्वजा को देर तक ऊंचा रखा। विजयनगर की समृद्धि को देखकर विदेशी यात्रियों और मुसलमान पड़ोसियों के मुंह में पानी आता था।

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इस प्रसिद्ध राज्य का इतिहास विजयनगर के उत्थान और पतन का वर्णन बड़ा ही मनोरंजक और शिक्षाप्रद है, परन्तु उसके लिए यह स्थान उपयुक्त नहीं है। यहाँ इतना ही कह देना पर्याप्त है कि दक्षिण में जो तीसरी स्वतन्त्र मुसलमानो रियासत स्थापित हुई, उसके साथ विजयनगर का संघर्ष बराबर जारी रहा। संघर्ष की समाप्ति इस प्रकार हुई कि अड़ोस-पड़ोस की सब मुसलमान शक्तियों ने मिलकर विजयनगर पर आक्रमण किया। वह युद्ध न रहा, वह जिहाद हो गया। उस जिहाद की बाढ़ में विजयनगर का प्रसिद्ध और बलिष्ठ राज्य भंग हो गया।

तीसरा स्वतन्त्र मुसलमानी राज्य, जो दिल्ली की निर्बलता के कारण स्थापित हुआ, वह ‘बहमनी’ राज्य के नाम से कहलाया बहमनी राज्य के संस्थापक का नाम हसन गंगू था। वह जन्म का पठान था। एक ब्राह्मण के यहाँ नौकर था। वहाँ से बढ़ता-बढ़ता वह सेनापति बना, यहाँ तक की दिल्ली के निर्बल होने पर उसने स्वतन्त्र राज्य की स्थापना की। इस विभूति के समय में भी उसने अपने पुराने मालिक की याद रक्खी और जिस राज्य की स्थापना की, उसे ‘बहमनी’ के नाम से पुकारा। अपने नाम के साथ गंगू जोड़कर भी उसने अपने मालिक के प्रति कृतज्ञता का भाव प्रकट किया। हसन गंगू के वंश ने १७१ वर्ष तक दक्षिण में राज्य किया। उसके

राज्य का विस्तार बिहार से लेकर कृष्णा नदी तक था। आजकल की परिभाषा के अनुसार कह सकते हैं कि हसन गंगू जफर खान के वंशजों ने बम्बई प्रेसीडेन्सी और दक्षिण हैदराबाद के प्रदेशों पर राज्य किया। १३४७ ई० से १४३७ ई० तक सारी रियासत एक ही शासक के अधीन रही, परन्तु इसके पश्चात् परिवार में फूट पड़ गई, जिससे बाहमनो राज्य निम्नलिखित हिस्सों में बँट गया

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  1. आदिल शाह ने बीजापुर में ‘आदिलशाही’ राज्य की बुनियाद डाली।
  2. निजामुल-मुल्क के लड़के अहमद ने अहमदनगर में निजाम शाही राज्य की स्थापना की।
  3. गोलकुण्डा में कुतुबशाह ने अलग राज्य स्थापित किया।
  4. बरार में एलिचपुर के आसपास की जगह इमादशाह नामक शासक की अधीनता में स्वतन्त्र हो गई। मुगलों की बढ़ी के समय दक्षिण इन चार स्वतन्त्र राज्यों में बटे चुका था। विजयनगर की रियासत मुसलमान रियासतों को सम्मिलित आक्रमण के सामने समाप्त हो चुकी थी और तेलंगाना का राज्य भी गोलकुंडा में मित्रित हो चुका था।

उत्तरी भारत को जीतकर अकबर के हृदय में यह उमंग पैदा हुई कि वह दक्षिण को भी साम्राज्य का हिस्सा बनाकर कश्मीर से कन्याकुमारी तक के भारत का सम्राट बने उसके बाद जहाँगीर के समय से भी मुगल-सेनाओं ने दक्षिण की ओर बढ़ने का का किया। उन्हें जितनी सफलता प्राप्त हुई, यह हम ऊपर देख आये हैं। खानदेश और बरार मुगल-साम्राज्य के हिस्से बन गये और अहमदनगर की घरेलू फूट के कारण कुछ समय के लिए अकबर के सामने सिर झुका दिया, परन्तु यह सिर झुकाना फिर ऊपर उठाने के लिए ही था मलिक काफूर ने फिर से अहमदनगर की निजामशाही रियासतों को जीवित करके मुगल साम्राज्य के मार्ग का कोटा बना दिया।

जिस समय का इतिहास हम लिख रहे हैं, उस समय बीजापुर, गोलकुंडा और अहमदनगर-यह तीन रियासतें अपने यौवन पर थीं। मुगलों के हाथ में केवल बरार और खानदेश थे शाहजहाँ गद्दी पर बैठने से पूर्व दक्षिण में कई लड़ाईयाँ लड़ चुका था। उसे थोड़ी बहुत सफलता भी प्राप्त हुई थी, परन्तु स्थायी सफलता अभी कोसों दूर थी। वोरांगना चांदबीबी के बाद मलिक अम्बर ने अहमदनगर की रियासत को यौवन पर पहुँचाया था।

इस समय वहाँ का बादशाह मुर्तिजा निजामशाह मलिक अम्बर के लड़के फतेहखों को शिष्यता से निकाल कर स्वतन्त्रता का दावा कर चुका था। कोई विशेष कारण नहीं था कि वह मुगल राज्य के साथ उलझता, परन्तु शाहजहाँ के सेनापति खानजहान के विद्रोह ने मामला पेचिदा कर दिया। खानजहान लोदी जहाँगीर के विश्वस्त सरदारों में से था। जब शाहजहाँ ने पिता के विरुद्ध विद्रोह किया तथ खानजहान ने शाहजहाँ का विरोध किया। इस प्रकार अविश्वास का बीज बोया गया। वह बीज शाहजहाँ को गद्दी पर बैठने पर वृक्ष के रूप में परिणत हुआ। पापी आत्मा स्वयं ही डरा रहता है खानजहान के अविश्वास का अन्त भी विद्रोह में हुआ।

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शाही फौजों ने विद्रोही सेनापति का पीछा किया, जब वह आश्रय पढ़ने के लिए बीजापुर पहुँचा, परन्तु मुहम्मद आदिलशाह को दूसरे के झगड़ों में पड़कर मुगल साम्राज्य से उलझने में कोई लाभ दिखाई नहीं दिया, तब खानजहान ने अहमदनगर के बादशाह के पास आश्रम तलाश किया। मुर्तजा निजामशाह स्वयं मुसीबतों में पिरा हुआ था। उसके दो हिन्दू सरदार दुश्मन से जा मिले थे। तो भी उसने लोहे सेनापति का पक्ष लेकर शाहजहाँ से लडाई ठानी। उसका भारी अदूरदर्शिता का परिणाम समझें, या ऊँची उदारता का, याह कहना कठिन है। दौलताबाद के पास लगभग दोनों सेनाओं में मुठभेड़ हुई, जिसमें निजामशाह की पराजय ई खानजहान अपनी जान बचाकर भाग निकला, और काबुल पहुँचकर विद्रोह खड़ा करने के उद्योग में भागता हुआ बुन्देलखण्ड में पकड़ा गया। वहाँ के राजपूत राजा ने उसकी सेना को परास्त कर दिया, वह स्वयं एक राजपूत के नेजे का निशाना बना।

विद्रोही का सर काट के पास नजराने के तौर पर भेजा गया। झरा का कारण समाप्त हो गया, परन्तु जोड़ा समाप्त न हुआ। मुगल-सेनाओं की अहमदनगर के बादशाह के साथ लड़ाई जारी रही। भर दक्षिण में भारी अकाल पड़ गया तो भी सेनाओं का संघर्ष हलका न हुआ। १६६० ई० से १६३५ ई० तक किसी न किसी रूप में युद्ध जारी रहा। पहले तो प्रतीत होता था कि निजामशाही सल्तनत का अन्त हुआ चाहता है। आपत्ति में आकर निजामशाह ने मलिक अम्बर के लड़के फतेहखाँ को कैद से निकालकर वजीर की पदवी पर बिठा दिया। फतेहखाँ ने अपमान का बदला लेने का सुअवसर जानकर स्वामि विद्रोह किया और मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली, परन्तु अन्त में उसे भी धोखा मिला, और इधर बीजापुर के बादशाह ने यह सोचकर कि यदि मुगलों ने अहमदनगर की जीत लिया तो फिर मेरी बारी भी आयेगी, मुगलों के साथ अहमदनगर के पक्ष में युद्ध छेड़ दिया।

खानजहान का पक्ष लेने पर जैसी अहमदनगर पर बीती, अहमदनगर का पक्ष लेने पर बीजापुर पर भी वैसी हो तो। झगड़े का कारण शीघ्र हो समाप्त हो गया, क्योंकि फतेह खान ने फिर अपने राज्य के साथ द्रोह किया। उसने हार मानकर रियासत शाहजहाँ के सुपुर्द कर दी और स्वयं मुगल-सेना में शामिल हो गया इस प्रकार निजामशाही रियासत को परास्त करके शाहजहाँ ने अपनी सारी शक्ति बीजापुर के विरुद्ध लगा दो।

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दक्षिण के झमेले को एक बार ही तय कर देने के लिए शाहजहाँ स्वयं दक्षिण में जाकर युद्ध का संचालन कर रहा था। १६६५ ई० तक इसी प्रकार बीजापुर के साथ मुगल सेनाओं का संघर्ष जारी रहा। इसी बीच में शाहजहाँ को आगरे जाना पड़ा। दक्षिण के युद्ध का संचालन मायावती के सुपुर्द या पाँच वर्षों की लड़ाई के बाद शाहजहाँ ने हिसाब लगाकर देखा, तो उसे मालूम हुआ कि दक्षिण की ऊसर भूमि में जो जन और धन का खर्च किया गया है, उसने कोई फल पैदा नहीं किया। बीजापुर अब भी युद्ध में उठा हुआ था और जिस निजामशाहो की ओर से शाहजहाँ निश्चिन्त हो गया था, यह एक नये दंग पर जीवित हो चुकी थी।

शाहजी भोंसला निजामशाही सरकार का पुराना नौकर था। उसने मलिक अम्बर के समय में वीरता द्वारा अच्छा नाम कमाया था। अब फतेह खान के विद्रोह से खिन्न होकर उसने निजामशाही राज्य जीवित रखने का संकल्प किया और राजवंश के एक लड़के को बादशाह उद्घोषित करके उसके साथ पहाड़ी इलाके में जाकर आश्रय लिया। इस प्रकार पाँच वर्ष की निरन्तर धन-जन-वृष्टि के पश्चात् भी दक्षिण के जंगलों में आग की चिनगारियाँ पूर्व की भाँति दिखाई देती थीं।

इस आग को बुझाने के लिए १६३५ ई० के अन्त में शाहजहाँ ने फिर दक्षिण को प्रयाण किया। इस बार बीजापुर का मर्दन करने के लिए साम्राज्य की सम्पूर्ण शक्ति लगा दी गई इधर शाहजी ने यह देखकर कि मैदान में मुगल-सेनाओं से भिड़ना कठिन है, पहाड़ों की कन्दराओं का आश्रय लिया, परन्तु वहाँ भी उसे शाही सेनाओं ने आराम से बैठने न दिया। बीजापुर के बादशाह आदिलशाह ने बड़ी बहादुरी से कई गुना शाही-बल को देर तक रोकने में सफलता प्राप्त की, परन्तु क्या आदिलशाह और क्या शाहजी दोनों में से किसी के लिए भी उस अनन्त धन-राशि और टिड्डी दल की भांति उमड़ते हुए सैन्य-दल का देर तक सामना करना कठिन था। अन्त में दोनों को हार माननी पड़ी। दोनों को हथियार फेंकते हुए देखकर गोलकुण्डा के शासक ने भी भलाई इसी में देखी कि मुग़ल-छत्र के सामने सिर झुकाया जाय। इस प्रकार तौनों रियासतों के साथ मुग़ल-साम्राज्य की निम्नलिखित शर्तों पर सन्धि हो गई

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  1. बीजापुर के बादशाह ने मुग़ल-सम्राट् की अधीनता स्वीकार की। साथ ही वार्षिक कर देने का वादा किया उसके बदले में अहमदनगर की रियासत के कुछ भाग जो बीजापुर से मिलते थे, उसे अर्पण कर दिये गये।
  2. शाहजी ने हार मानकर उस कठपुतली को शाहजहाँ के सुपुर्द कर दिया, जिसे वह अहमदनगर का बादशाह बनाना चाहता था। वह स्वयं शाहजहाँ की अनुमति से बीजापुर की रियासत की सेवा में आ गया। शाहजी प्रसिद्ध महाराष्ट्र विजेता शिवाजी का पिता था।
  3. गोलकुण्डा की रियासत ने भी मुगल-सम्राट की अधीनता स्वीकार करके साप्ताहिक प्रार्थनाओं में से फारिस के शाह का नाम निकालकर उसके स्थान पर मुगल-सम्राट का प्रविष्ट करने का वादा किया।

इस प्रकार, उस समय के लिए दक्षिण में मुगलों का आधिपत्य स्वीकार किया गया। भर्ती कहाँ तक कायम रहे और आधिपत्य कितने दिनों जीवित रहा यह तो हमें आगे प्रतीत होगा, परन्तु यहाँ पर इतना सूचित कर देना आवश्यक है कि यह अन्तिम युद्ध था जिसका संचालन शाहजहाँ ने स्वयं किया। इसके आगे जितनी बड़ी लड़ाइयाँ हुई, उनमें शाहजहाँ के पुत्रों द्वारा ही युद्ध का संचालन करवाता रहा। उन युद्धों को हम शाहजहाँ के जीवन-चरित्र का भाग बनाने की जगह यदि उसके पुत्रों की जीवनी का भाग बनायें, तो अनुचित न होगा।

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