October 25, 2020
मां मनसा देवी बारह नामों से भिन्न-भिन्न स्थानों पर पूजी जाती है

मां मनसा देवी बारह नामों से भिन्न-भिन्न स्थानों पर पूजी जाती है

उत्तराखंड में शिव के साथ-साथ शक्ति की पूजा का भी अत्यधिक महत्व है ।शिव के बिना शक्ति अधूरी है और शक्ति के बिना शिव। इसीलिए जहां शिव की पूजा होती है ,वहां शक्ति की पूजा भी बेहद जरूरी है।तभी वह पूजा पूर्ण मानी जाती है।

देवों के देव महादेव को पाने के लिए सती ने दूसरा जन्म लिया ,हिमालय की पुत्री पार्वती के रूप में। और पार्वती ने शिव को पाने के लिए तीर्थ नगरी हरिद्वार के गंगा के तट पर स्थित शिवालिक पर्वत में कई हजार वर्षों तक शिव की आराधना की और केवल विल्व-पत्रों का ही पान किया।

इसलिए यहां स्थापित शिवलिंग का नाम बिल्केश्वर महादेव का पड़ा ।इस विल्व पर्वत की तलहटी में बिल्केश्वर मंदिर स्थापित है ।वही शिवालिक पर्वतमाला के विल्व नामक पर्वत पर मां मनसा देवी का प्राचीन मंदिर स्थापित है। जहां पर मां भक्तों की मनसा पूरी करती है। मनसा देवी मंदिर के पास एक पेड़ प्राचीन काल से लगा हुआ है।

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लाल धागा बांधने से होती हैं भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण

जिसमें लाल धागा बांधने से भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। मां मनसा देवी के भक्त जब मां के मंदिर की यात्रा में आते हैं तो वह इस वृक्ष पर अपनी मन की कोई मनसा को पूर्ण करने के लिए लाल धागा बांधते हैं और जब उनकी मनसा पूरी हो जाती है ।तब वह यह धागा खोलने आते हैं और मां के श्री चरणों में मत्था टेक कर उनका आभार जताते हैं।

मां मनसा देवी बारह नामों से भिन्न-भिन्न स्थानों पर पूजी जाती है

स्कंद पुराण में मां मनसा देवी का विशेष महत्व बताया गया है ।मां मनसा देवी को नाग कन्या के रूप में ही माना जाता है और शिव की शिष्या के रूप में उसका नाम शेवी नाम से प्रसिद्ध है । बंगाल में मां मनसा देवी मनसा मंगल के नाम से प्रसिद्ध है और बिहार में विषहरी के नाम से प्रसिद्ध है ।पौराणिक मान्यता है कि ईश्वर के मन से उत्पन्न हुई इस देवी को मनसा देवी के नाम से जाना जाता है।

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जिसका नाम वैष्णवी सिद्ध योगिनी है। मां मनसा देवी ने तीन युगों तक तपस्या करके भगवान श्री कृष्ण को प्रसन्न किया ।मां मनसा देवी तीन लोकों स्वर्ग लोक, नाग लोक और पृथ्वी लोक मेंं पूजी जाती है। जगद् गौरी के नाम से इसकी सर्वत्र पूजा होती है।

भगवान विष्णु की मां मनसा ने अत्यंत भक्ति भाव से पूजा की तो इसका नाम वैष्णवी पड़ गया ।राजा जन्मेजय के यज्ञ में नागों की प्राण रक्षा करने के कारण यह नागेश्वरी के नाम से विख्यात हुई ।यह विषहरण करने वाली है। इसीलिए मां मनसा को विषहरी भी कहा जाता है। यह तपस्वी महर्षि आस्तिक की माता है और मुनि जरत्कारु की अर्धांगिनी है ।

श्री मनसा देवी मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष महन्त श्री रविंद्र पुरी महाराज का कहना है कि इस प्रकार पुराणों में मां मनसा देवी के बारह नाम है । इसलिए विभिन्न स्थानों पर मां मनसा देवी की 12 नामों से पूजा होती है ।मान्यता है कि मां मनसा देवी की पूजा करने से नाग भय समाप्त हो जाता है ।मनसा देवी का स्तोत्र सिद्ध करने से मनुष्य महासिद्ध हो जाता है और मोक्ष को प्राप्त करता है।

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