महर्षि दुर्वासा से भी जुड़ी हैं हरिद्वार की कथाएं

महर्षि दुर्वासा से भी जुड़ी हैं हरिद्वार की कथाएं

हरिद्वार से महाभारत काल स रामायण काल की कथाएं जुड़ी हैं तो सतयुग की भी कई कथाएं जुड़ी हैं। महर्षि दुर्वासा की भी कथा हरिद्वार से जुड़ी है। हरिद्वार से महर्षि दुर्वासा से जुड़े एक कथानक में बताया जाता है कि उन्होंने इन्द्र को हरिद्वार में ही एक दिव्य माला प्रदान की थी। लेकिन देवताओं के राजा ने इस माला को यथोचित सम्मान नहीं दिया।

इस अपमान से महर्षि दुर्वासा क्रोधित हो गए। उनके श्राप से संसार में उथल-पुथल मच गई। संसार में भीषण अकाल पड़ गया। तब ईश्वरीय प्रेरणा से समुद्र-मंथन की प्रक्रिया शुरू हुई। समुद्र-मंथन में लक्ष्मी प्रकट हुई। लक्ष्मी की कृपा से पफसलें पुनः हरी-भरी हो गई। यह भी बताया जाता है कि समुद्र-मंथन से निकले अमृत कलश को नागलोक में छिपा दिया गया।

Advertisement

महर्षि दुर्वासा से भी जुड़ी हैं हरिद्वार की कथाएं

यहां से किसी तरह गरुड़ ने अमृत कलश को नागों से मुक्त कराया। बताया जाता है कि इसी प्रक्रिया के दौरान क्षीर सागर पहुंचने से पूर्व जहां-जहां गरुड़ ने अमृत कलश को रखा वहां-वहां के स्थल कुम्भ स्थल के रूप में विख्यात हो गए।

Advertisement

यह भी कहा जाता है कि प्रजापति कश्यप की दो पत्नियां थी कद्रु व विनीता। दोनों में इस बात को लेकर विवाद हो गया कि सूर्य के घोड़े काले हैं या सपफेद। काह जाता है कि नागवंश की कदु्र ने नागों की सहायता से सूर्य के घोड़ों को काले रंग से झंक दिया। शर्त में मुताबिक विनीता को कद्रु की दासी बनना पड़ा।

दास्तव से मुक्ति का एक ही उपाय था कि नाग लोक से यदि अमृत कलश लाकर देने पर ही विनीता का दासत्व समाप्त हो सकता था। इस कार्य के लिए गरुड़ को जिम्मेदारी दी गई। बताते हैं कि जब गरुड़ अमृत कलश लेकर आ रहे थे तो रास्ते में देवराज इन्द्र ने गरुड़ पर चार बार आक्रमण किया। इस युद्ध के दौरान चार जगह अमृत कलश छलक गया। जहां-जहां यह अमृत की बूंदें गिरी वहां-वहां ये चार स्थान हरिद्वार, प्रयागराज, उज्जैन व नासिक कुम्भ स्थल के रूप में विख्यात हो गए।

Advertisement

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *