महाशिवरात्री पर्व विशेष

महाशिवरात्री पर्व का वैज्ञानिक महत्व

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आप सभी को अवगत कराना चाहूंगी कि 11 मार्च यानी गुरुवार के दिन महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाएगा।
जैसा कि हम सभी जानते हैं भारतवर्ष में हिंदुओ के तैंतीस कोटी देवी-देवता हैं जिन्हें हम पूजते हैं, परंतु उनमें प्रमुख स्थान भगवान भोलेनाथ जी का है, जिन्हें हम देवों के देव महादेव के नाम से भी पूजते हैं। पुराणों में भगवान भोलेनाथ जी को अनेक नामों से जाना जाता है, जिनमें से कुछ नाम अति प्रसिद्ध हैं, जो आप सब भी जानते होंगे।

भगवान शिव को शंकर, भोलेनाथ, पशुपति, त्रिनेत्र, महेश्रर,शम्भू, शशिशेखर आदि अनेक नामों से जाना व पुकारा जाता है।
शिवरात्रि को लेकर हमारे शास्त्रों और पुराणों में अनेक मान्यताएं प्रचलित हैं। ऐसा माना जाता है कि इस विशेष दिन ही ब्रम्हा जी ने रूद्र रूप में मध्यरात्र‍ि को भगवान शंकर रूप में अवतरण लिया था। वहीं यह भी मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव ने तांडव कर अपना तीसरा नेत्र खोला था और ब्रम्हांड को इस नेत्र की ज्वाला से समाप्त किया था। इसके अलावा कई स्थानों पर इस दिन को भगवान शिव के विवाह से भी जोड़ा जाता है और यह माना जाता है कि इसी पावन दिन भगवान शिव और मां पार्वती का विवाह हुआ था।

शिव पुराण के अनुसार भगवान शिव सभी जीव-जन्तुओं के स्वामी एवं अधिनायक है। ये सभी जीव-जंतु, कीट-पतंग भगवान शिव की ईच्छा से ही सभी प्रकार के कार्य तथा व्यापार किया करते हैं। शिव-पुराण के अनुसार भगवान शिव वर्ष में छ: मास कैलाश पर्वत पर रहकर तपस्या में लीन रहते हैं। उनके साथ ही सभी कीड़े-मकोड़े भी अपने बिलों में बन्द हो जाते हैं। उसके बाद छः मास तक कैलाश पर्वत से उतर कर धरती पर श्मशान घाट में निवास किया करते हैं। अवतरण का यह महान दिन शिवभक्तों में “महाशिवरात्रि” के नाम से जाना जाता है। महाशिवरात्रि के दिन गंगा-स्नान का भी विशेष महत्व है, क्योंकि ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव ने गंगा के तेज प्रवाह को अपनी जटाओं में धारण करके इस मृत्युलोक के उद्धार के लिए धीरे-धीरे धरती पर छोड़ा था।

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महा शिवरात्रि का वैज्ञानिक महत्व

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी महाशिरात्रि का पर्व विशेष महत्वूर्ण है दरअसल इस रात्रि ग्रह का उत्तरी गोलार्द्ध इस प्रकार अवस्थित होता है कि मनुष्य के भीतर की ऊर्जा प्राकृतिक रूप से ऊपर की ओर जाने लगती है। यानी प्रकृति स्वयं मनुष्य को उसके आध्यात्मिक शिखर तक जाने में मदद कर रही होती है। धार्मिक रूप से बात करें तो प्रकृति उस रात मनुष्य को परमात्मा से जोड़ती है। इसका पूरा लाभ लोगों को मिल सके इसलिए महाशिवरात्रि की रात में जागरण करने व रीढ़ की हड्डी सीधी करके ध्यान मुद्रा में बैठने की बात कही गई है।

पूजा विधि

प्रातः काल स्नान आदि कर पूरे घर को गंगाजल व गौ मूत्र से शुद्ध करें ।
भगवान भोलेनाथ को पंचामृत से स्नान करा कराएं। अखंड ज्योति जलाएं पीले चंदन का तिलक लगाएं। बेलपत्र, भांग, धतूरा, गन्ने का रस, जायफल, कमल गट्टे, फल, मिष्ठान, मीठा पान, इत्र व दक्षिणा चढ़ाएं सफ़ेद वस्त्र या बाघम्बर छाल अर्पित करें। शिवजी को तुलसी न चढ़ाएं। केसर युक्त खीर का भोग लगा कर प्रसाद बांटें।

ॐ नमः शिवाय रूद्राय् शम्भवाय् भवानीपतये नमो नमः मंत्र का जाप करें।

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महाशिवरात्री के अवसर पर ‘शिव पुराण’ का पाठ अतिशुभ फलकारक होता है।

इसके अलावा महाशिवरात्रि के दिन शिवजी को प्रसन्न करने हेतु अन्य उपाय भी कर सकते हैं जैसे शिव जी को तीन पत्तों वाला 108 बेलपत्र चढ़ाएं शंकर भगवान को भांग बहुत प्रिय है इसलिए इस दिन भांग को दूध में मिलाकर शिवलिंग पर चढ़ाएं। केशर युक्त दूध अर्पित करें इससे जीवन में सुख बढ़ता है जल में गंगाजल मिलाकर शिवलिंग पर 11 लोटा जल अर्पित करने से मन की शांति एवं प्रसन्नता बनी रहती है। जिन भी जातकों का विवाह नहीं हो रहा है शिवरात्रि के अवसर पर उपवास रखने, रुद्राभिषेक करने व माता पार्वती को सुहाग से संबंधित वस्तुएं चढ़ाने से अति शीघ्र विवाह संपन्न होगा। इस व्रत के करने मात्र से ही सभी तरह के पापों से मुक्ति मिलती है और आत्मा की शुद्धि होती है।

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