Akbar

आम जनता का जीवन स्तर मुग़ल काल में

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वह मुगल-साम्राज्य का यौवन-काल था। बाबर के समय उसका जन्म हुआ, हुमायूँ ने अपनी निर्बलताओं से नवजात बच्चे को बीमार और कमजोर हालत में फेंक दिया, अकबर ने उस बच्चे को चारपाई पर से उठाकर दवा-दारु और पुष्टिकारक भोजनों द्वारा हप्टपुष्ट अवस्था तक पहुँचाया। बालक ने अच्छे संरक्षक की छत्र-छाया में पलकर युवावस्था में प्रवेश किया। अकबर के अन्तिम दिन में मुगल-साम्राज्य अपने भरे हुए यौवन में प्रवेश कर रहा था। मुग़ल-साम्राज्य का मध्याह काल समीप आ रहा था।

इस समय अकबर का राज्य काबुल से लेकर मध्यप्रदेश तक फैल चुका था। १५५५ में अकबर ने विजय का पर्व आरम्भ किया और १५९४ तक, वह राज्य की सीमाओं को आगे ही बढ़ाता गया। १५५५ में सरहिन्द की लड़ाई में पंजाब और दिल्ली मुगल-राज्य में शामिल हुए, १५५८ में ग्वालियर और अजमेर के किले जीत लिये गये, लखनऊ और जौनपुर पर मुगलों का फहराने लगा। उसी वर्ष मालवा पर अकबर का अधिकार हो गया, बुरहानपुर १५६२ में फतह किया गया, १५६७ में चित्तौड़गढ़ पर इस्लाम की ध्वजा गाड़ी गई, गुजरात १५७२ में और वंगाल १५७५ में मुगल साम्राज्य में प्रविष्ट किये गये।

कश्मीर की सुन्दर घाटी १५८७ में अकबर के हाथ में आई। तीन वर्ष पूर्व उड़ीसा और पाँच वर्ष पूर्व सिन्ध का प्रान्त अकबर के राज्य में शामिल हुए और कन्दहार १५९४ में सर किया गया इस प्रकार काबुल से अहमदनगर तक मुगलों का राजदण्ड प्रचलित होने लगा। अकबर इतने राज्यों से भी सन्तुष्ट नहीं हुआ अन्तिम वर्षों में उसने नर्मदा से दक्षिण की ओर भी दृष्टि उठाई और विजय का प्रयत्न किया। परन्तु कोई विशेष सफलता प्राप्त नहीं हुई। इतने बड़े राज्य में कहीं झगड़ा या विद्रोह नहीं था, यह कहना तो कठिन है, क्योंकि भारत में मुसलमानों के राज्यकाल के ७०० बषों में शायद ही कोई ऐसा वर्ष हो, जिसमें देश के किसी न किसी भाग में विद्रोह की चिनगारी न दिखाई दी हो, परन्तु उस समय शान्ति का जो आदर्श था, उसे दृष्टि में रखकर अकबर के राज्य का अन्तिम समय शान्तिमय ही कहा जा सकता है।

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धार्मिक संघर्ष मिटा तो नहीं था, परन सो अवश्य गया था जजिया-कर हट चुका था, हिन्दू सरदार सल्तनत के बड़े-से-बड़े ओहदों पर नियुक्त थे, मुसलमान सूबों के हिन्दू गवर्नर नियुक्त किये जा रहे थे मुगलों के अन्तःपुर में राजपूत रमणियाँ विराजमान थीं। मुसलमान सरदारों को हिन्दू प्रजा पर अत्याचार करते डर मालूम होता था। अकबर की कभी न हारने वाली तलवार के डर से बलवाइयों को दंगा करने की अभिलाषा दब रही थी। भूमिकर का न्यायपूर्ण प्रवन्ध हो जाने से किसान लोग पहले की अपेक्षा अधिक सुखी थे।

प्रजा को तीन हिस्सों में बाँटा जा सकता है। रईस मध्यम वृत्ति के लोग और सर्वसाधारण जनता। उस समय भी प्रजा में यही तीन श्रेणियाँ थीं। इन तीनों के ऊपर राजवंश को समझना चाहिए। उस समय के लिखित ग्रन्थों और विदेशी यात्रियों के यात्रा-वृत्तान्तों से राजा और प्रजा की दशा का कुछ परिचय प्राप्त होता है, उससे विदित होता है कि सामान्यतया-मुसलमान काल में जो अनावस्था रहती थी अकबर के अन्तिम दिनों में उसका बहुत कुछ अभाव हो गया था राजकोप में धन की राशि जलप्रवाह की तरह प्रवेश कर रही थी। विदेशी यात्रियों की सम्मति है कि इतने युद्धों का व्यय कर चुकाने पर भी १६०५ में मुगल बादशाह के खजाने में लगभग ६० करोड़ रुपया विद्यमान था। केवल भूमि कर से जो आय होती थी, वह प्रतिवर्ष १७५० करोड़ से अधिक थी। बिना किसी आपत्ति के कहा जा सकता है कि अकबर और उसके वंशज रुपयों में लौटते थे।

रईस श्रेणियों में उस समय अधिकतर मुसलमान ही ऐसे थे जो अपनी धन सम्पत्ति को जाहिर कर सकते थे हिन्दू रईस तो ऐश्वर्य को पाने में हो भला समझते थे। इन्हें डर था कि उनके धन को हवा लगी कि उन पर कर लगा जिन रईसों को लुटने का या बलात्कारपूर्ण कर का भय नहीं था, वह आनन्द और विलास में स्नान करते थे। विदेशी यात्रो उनके ऐश्वर्य को देखकर चौंधिया जाते थे उनके ऐश्वर्य से सम्राट के ऐश्वर्य का अनुमान लगाया जा सकता है।

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विलियम हार्किस नाम का अंग्रेज यात्री जो बादशाह जहाँगीर के समय में भारत में आया था, लिखता है कि राज्य की वार्षिक आय ५० करोड़ रुपये थी सरकारी खजाने में नगद सिक्कों के अतिरिक्त अनगिनत जवाहरात सोने और चांदी के बर्तन भरे हुए. हैं, जो विशेष अवसरों पर निकाले जाते हैं। बादशाह के महलों और दरबार से सम्बन्ध रखने वाले नौकरों की संख्या ३६००० से कम नहीं थी। दरवार के साथ १२ हजार हाथी थे, जिनमें ३०० केवल बादशाह के काम आते थे दरबार का रोजाना खर्च ५० हजार रुपया और हरम (अन्त:पुर) का रोजाना खर्च ३० हजार रुपया था।

बादशाह की देखा देखी रईस लोग भी पैसे को पानी की तरह बहाते थे। रईसों का एक प्रधान हिस्सा सूबों के शासन कार्य में लगा हुआ था। सूबों के शासक स्वतन्त्र राजाओं की हैसियत रखते थे आगरे के प्रति उनका यही कर्तव्य था कि वह वर्ष भर में एक निश्चित राशि धन की और युद्ध के अवसर पर एक निश्चित संख्या युद्ध सामग्री की उपस्थित करें। युद्ध-सामग्री में सिपाही, घोड़े और शस्त्र सभी कुछ सम्मिलित था। बादशाह के हिस्से के अतिरिक्त वह जो कुछ कमा सकते थे, अपने पास रखते थे। उनके दरबार और हरम सम्राट के दरबार और हरम की प्रतिमूर्ति होते थे।

रईसों के घरों में भी बीसियों बोबियाँ और सैकड़ों लाडियों की भीड़ लगी रहती थी। उनके अस्तबल में भी बीसियों हाथी और घोड़े बंधे रहते थे। उनके डेरों में भी मखमल की छतरी और रेशम के रस्सों की बहार रहती थी। उनके रसोई घर में भी हर रोज बोसियों तरह के व्यंजन बनते थे। उनके यहाँ भी बदखशान के खरबूजों, ढाके की मलमल और यूरोप के कौमतो हीरों की माँग रहती थी। उस समय के मुसलमान उमरा भी छोटे बादशाह थे। वह प्रजा से खूब खींचते थे और खूब खर्चते थे कुछ हिन्दू रईस तो मुसलमान रईसों का अनुकरण करते थे, परन्तु कुछ ऐसे भी थे, जो अपने जीवन काल में हो अपनी सम्पति लड़की-लड़कों में या धर्म के खाते में बाँट जाते थे।

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अधिकांश रईस ऐसे थे जो प्रजा से सब लेते थे और रब खर्चते थे। ऐसे उमरा के सम्बन्ध में डी लेट (De Leat) ने १६३१ में लिखा था कि “रईसों के ऐश्वर्य उपभोग का वर्णन नहीं किया जा सकता। क्योंकि जीवन में उनका केवल एक यही लक्ष्य है कि विषय-भोग की सामग्री कैसे एकत्र की जाए।” सर टामस रो ने १६१५ में लिखा था कि “ऐश्वर्य और विषय-लोलुपता को मिला देने से उस समय का रईस बन जाता है।”

कारीगरी और व्यापार का पेशा करने वालों की मध्यम दर्जे में गिनती है। इस समय मध्यम दर्जे के लोगों की संख्या कुछ कम नहीं थी। नौकरों के अतिरिक्त बादशाह तथा रईसों के कारिन्द भी काफी बड़ी-बड़ी तनख्वाएँ पाते थे। कारीगर लोग केवल दरबार में नहीं, अन्या भी आदर की दृष्टि से देखे जाते थे। विदेशी यात्रियों के ल से विदित होता है कि कारीगरी को वस्तुओं का बड़ा मान होता था। राज-दरबार में शिल्पी लोग इजत पाते थे, व्यापार भी कुछ कम नही था।

नगरों और प्रान्तों के व्यापार के अतिरिक्त समुद्र तट का व्यापार भी दिनों दिन बढ़ रहा था। पुर्तगाल तथा इंग्लैण्ड के व्यापारी तथा राजदूत अकबर के अन्तिम दिनों में भारत के कोनों पर व्यापार के जाल विणने को चेष्टा कर रहे थे इस प्रकार नौकर, शिल्पी और व्यापारी काफी संख्या में विद्यमान थे उन लोगों की दशा किसी प्रकार से भी बुरी नहीं कही जा सकती। वह अच्छी तरह खाते-पीते और पहिनते थे। यह ठीक है कि कहीं-कहीं बदमाश और लोभी हाकिम को देखकर मध्यम वृत्ति के लोग अपनी सम्पत्ति को छुपाने की चेष्टा करते थे यह रुपयों को गाड़ देते थे, मैला पहिनते और रूखा-सूखा खाने लगते थे। पर यह दशा अपवादरूप में थी, नियम रुप में नहीं।

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शेष समस्त प्रजा, जिसमें किसान और सेवावृत्ति के लोग शामिल थे, साधारणतया सुखी दशा में थी। प्रजा के न कोई राजनीतिक अधिकार थे और न साधारण रैयत को पूरा न्याय पाने के खुले मार्ग मिल सकते थे। इस कारण वह लूटते हों और उन्हें चूसा जाता हो, तो कोई आश्चर्य नहीं सर टामस रो ने सतरहवीं सदी के आरम्भ में लिखा था कि “हिन्दुस्तान के लोग वैसा जीवन व्यतीत करते हैं, जैसा जल में मछलियों को व्यतीत करना पड़ता है। बड़े छोटों को खा जाते है। किसानों को जमीन-मालिक खा जाता है, जमीन के मालिक को महाजन खा जाता है, छोटे को बड़ा खा जाता है और बादशाह सबको लूट खाता है।

जब बादशाह ही लूटने वाला हो, तो राज्य के शेष कर्मचारियों का क्या कहना है?’ साधारण प्रजा लुटती थी, परन्तु यह लूट प्रत्यक्ष थी, इस कारण उससे बचाव के उपाय भी थे। बहुत से अंग्रेज लेखक यह दिखाने का यत् करते हैं कि उस समय प्रजा की दशा बहुत हीन थी, आजकल की दशा उससे कहीं अच्छी है ऐतिहासिक प्रमाण उन लेखकों के दावे को सिद्ध नहीं करते। यह प्रमाणों से सिद्ध किया जा सकता है और किया जा चुका है कि उस समय की साधारण प्रजा आजकल की अपेक्षा अधिक सुखी थो। क्षणिक आँधियाँ अधिक आती थी, परन्तु इस समय की गु्त और नियमबद्ध लूट की अपेक्षा वह धियाँ कहाँ कम भयानक था। जमीन पर लेटकर क्षणिक आँधी से प्राण बचाये जा सकते हैं, परन्तु दिन-रात खाने वाले क्षयरोग से बचने का कोई उपाय नहीं है।

साधारण प्रजा की सबसे बड़ी आवश्यकता, जिसके पूरा होने या न होने पर उनका सुख-दुःख अवलम्बित है, अन्न है पेट भर गया तो सब कुछ मिल गया, पेट न भरा तो जीना दूभर है। उस समय साधारण प्रजा कितना सुख भोग सकती भी इसका हिसाब लगाना हो तो हम यह देखना चाहिए कि-(१) उनको आय कितनी थी, (२) और उस आय से कितना अन्न खरीद सकते थे। अधिक विस्तार में न जाकर हम विन्सेण्ट ए० स्मिथ लिखित अकबर की जीवनी से निम्नलिखित अंक उद्धृत करते हैं, इनसे उस समय की आर्थिक दशा का अनुमान लगाया जा सकता है।

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यूरोपियन यात्रियों और अबुलफजल आदि सामयिक लेखकों के वर्णनों से जो सारांश निकलता है, वह यह है कि उस समय मजदूर की दैनिक मजदूरी पैसे से कुछ कम थी, और अच्छे कारीगर की दैनिक मजदूरी तीन आना थी। यह मजदूरी देखने में बहुत कम मालूम होतो है, परन्तु जब हम वस्तुओं के दामों की निम्नलिखित तालिका पर दृष्टि डालते हैं, तो हमारी आँखें खुल जाती है और हम किसी सही नतीजे पर पहुँच सकते हैं, हम नीचे तीन मुख्य अनाजों के मूल्य की तालिका देते हैं।

एक रुपये की लगभग खरीद

 अनाज                            अकबर के समय                    १८८६ ई०                        १९०१ ई०                      १९३१ ई०                                                                                                  १६०० ई०

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गेहूँ                                      ९७ सेर                               २० सेर                             १४ सेर                         १६ सेर

जौ                                       १३९ सेर                             २९ सेर                             २१ सेर                         २३ सेर

ज्वार                                    १११ सेर                             २७ सेर                             २१ सेर                         २२ सेर

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चना                                     ६७ सेर                              २४ सेर                             २७ सेर                         १७ सेर

इन संख्याओं के मिलाने से विदित होता है कि १९०१ में गेहूँ के जो दाम थे, वह १६०० के दामों की अपेक्षा ७ गुना से भी अधिक थे। इसी तरह सब अनाजों की दशा है। महंगाई कम से कम छह गुना बढ़ गई है। जो सामग्री उस समय एक रुपये में प्रास होती थी वह कठिनता से आज छह रुपयों में प्राप्त हो सकती है। सभी वस्तुओं के मूल्यों को यही दशा है। उस समय की अल्पमूल्यता का अनुमान नीचे दी हुई मूल्यों की तालिका से किया जा सकता है।

१६०० ई० के समय की मूल्यों की तालिका एक रुपये की लगभग खरीद

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वस्तु                                                                                     तोल

माँस                                                                                      १७ सेर

दूध                                                                                       ४४ सेर

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चावल अच्छा                                                                          २० सेर

चावल पटिया                                                                         ५२ सेर

मूंग                                                                                      १८ सेर

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उड़द                                                                                   ६९ सेर

मोठ                                                                                    ९७  सेर

बूरा                                                                                     ९ सेर

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शक्कर                                                                                १९ सेर

घी                                                                                      ७ सेर

तेल                                                                                    १४ सेर

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नमक                                                                                  ६९ सेर

इस तालिका का महत्व हम उस समय समझ सकते हैं, जब हम यह देखें कि जो मजदूर १ आने से कम दैनिक तलब पाता था, वह उतने में क्या कुछ खरीद सकता था। वह अपना दैनिक मजदूरी में ५॥ सेर के लगभग गेह, या ३ सेर के लगभग चावल या ३ सेर के लगभग मूंग दाल, एक आने के लगभग शक्कर या आध सेर के लगभग घी , या ३॥ सेर के लगभग नमक खरीद सकता था। आज के दामों को देखें तो इतनी वस्तु खरीदने के लिए बारह आने या रुपये की आवश्यकता है। जो खाद्य वस्तु आज बारह आने में मिलती है, वह उस समय एक आने से कम में मिल जाती थी।

कहा जा सकता है कि यदि १६०० ई० और १९०० ई० के दामों में भेद है, तो मजदूरी और तन्याहों में भी भेद है। मजदूरी भी बहुत बढ़ गई है। परन्तु दोनों का मिलान करके देखें तो प्रतीत होगा कि जहाँ वस्तुओं के दाम कई अंशों में चौदह या पन्द्र गुना हो गये हैं, वहाँ मजदूरी की मात्रा आठ या नौ गुना से अधिक नहीं बढ़ी। स्पष्ट है कि साधारण प्रजा की आमदनी सिक्के के रूप में बढ़ जाने पर भी उनकी असली आमदनी बहुत कम हो गई है। उन्हें प्राण-रक्षा की सामग्री न्यूनता से प्राप्त होती है।

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उस समय की निर्धनता को सूचित करने के लिए यात्रियों के वाह लेख उद्धृत किये जाते हैं, जिनमें लिखा है कि ग्रामीण लोग प्रायः नंगे रहते थे। केवल लंगोट उनके शरीर पर रहती थी शरीर पर कपड़ों का अधिक रखना धनिकता का चिह्न नहीं है। यह किसी देश के जल-वायु और रहन-सहन के रियाज पर अवलम्बित है कि कितने कपड़े पहने जायें। विदेशी यात्री सर्द देश से आये थे हिन्दुस्तान एक गर्म देश है विशेपतया दक्षिण में जहाँ अय भी कपड़ा बहुत कम पहना जाता है, उष्णता की प्रधानता है। हम उन विदेशी यात्रियों की बुद्धि की प्रशंसा नहीं कर सकते, जो कपड़े पहिनने का सम्बन्ध सर्दी या गर्मी के साथ न समारकर अमीरी या गरीबी के साथ सकते हैं। वह तो शायद आज भी फेवल दो वस्त्र धारण करने वाले उदास के जगो, बकीलों या रईसां को निर्धन ही कहेंगे।

उस समय को आर्थिक स्थिति की हीनता को सिद्ध करने के लिए दुर्मियों की बहुतायत और उनकी गंभीरता को प्रमाणरूप में पेश किया गया है। उस समय भारत में दुर्मित होते थे, आज भी होते हैं। जो देश कृषि प्रधान होगा, यहाँ आवाश के रूठ जाने पर दुर्भिक्ष का हाना अवश्यंभावी है। आकाश रूठता होी रहता है और दुर्भिक्ष होते ही रहते है। भेद केवल इतना हो है कि वर्तमान सरकार रेल तथा अन्य वाहनों द्वारा अनाज को दुर्भिक्ष पंडित प्रान्तों में आसानी से मिल सकती है।

उस समय वाहन-कला इतनी बढ़ी हुई नहीं थी। अनाज को दुर्भिक्ष के स्थान पर और भूखों को सुभिक्ष के स्थान पर सुलभता से नहीं पहुँचाया जा सकता था। इसलिए इच्छा होने पर भी राजा की और से प्रजा को पर्याप्त सहायता नहीं दी जा सकती थी। देव का दण्ड प्रजा पर जोर से पड़ता था। यह नहीं कि अकबर प्रजा के दुःख की ओर से सर्वथा उदासीन था। १५९५ से १५९८ तक देश में घोर दुर्भिक्ष रहा। अकबर ने बुखारा के शेख फरीद को प्रजा की सहायता के लिए नियुक्त किया। इतिहास से हमें यह विदित नहीं होता कि उसने किन-किन उपायों से दुर्भिक्ष पीड़ितों की सहायता की, परन्तु अकबर ने प्रजा के खको मिटाने का यत्न किया, यह असन्दिग्ध है ।

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देश के साहित्य और अन्य ललित कलाओं की वृद्धि के लिए जिस वातावरण की आवश्यकता होती है, वह उस समय उपस्थित था। राजगद्दी पर एक उदार और बलवान् राजा स्थिरता के साथ विराजमान था। धार्मिक विद्वेष को ज्वालायें प्रायः दव चुकी थीं। जजिया कर के हट जाने और धार्मिक स्वतन्त्रता की नीति के उद्घोपित हो जाने से हिन्दु प्रजा सापेक्ष रूप से सन्तुष्ट थी। किसी विदेशी विजेता को भारत की ओर आँख उठाने की हिम्मत नहीं होती थी सूबों के शासक भी विद्रोह का झण्डा खड़ा करने से डरते थे अकबर की प्रतिभा ने विप्लव के काँटों को तोड़ डाला था। उनकी नोक जातो रही थी ऐसी ही ऋतु में साहित्य की लता हरी-भरी होकर लहराया करती है। अकबर का समय रोम के सम्राट् ऑगस्टस और इंग्लैंड की रानी एलिजावेथ के समय के समान कलाओं का बसन्तकाल कहा जा सकता है।

अकबर के समय में हो गोस्वामी तुलसीदास ने अपने अमर गीत रामचरित मानस का गान किया था। रामचरित मानस के सम्बन्ध में एक अंग्रेज लेखक ने लिखा है कि-“यह (तुलसीदास) हिन्दू भारत में अपने समय का सबसे बड़ा आदमी था वह अकबर से भी अधिक बड़ा था, क्योकि उस कवि ने लाखों नर-नारियों के हृदयों और मनी पर जो विजय प्राप्त की, वह बादशाह की सांसारिक विजयों की अपेक्षा कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण था।” अकबर के समय में ही भगत सूरदास ने अपनी मनमोहिनी बंशी बजाई थी। अकबर स्वयं हिन्दी का कवि था। उसके बनाये कई पत्र मिलते हैं । उनकी सादगो देखिए। अकबर कहता है-

जाको, जस है जगत में, जगत सराहे जाहि । ताको जीवन सफल है, कहत अकब्बर साहि॥

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अकबर ने अपने बेटे जहाँगीर को हिन्दी सिखाई और अपने पोते खुसरो को हिन्दी और संस्कृत सीखने के लिए बहन भट्टाचार्य के सुपुर्द कर दिया।

अकबर के दरबार में फारसी के कवियों और लेखकों की कमी नहीं थी अकबर नामे का लेखक अबुलफजल अकबर का मित्र, मन्त्री, सलाहकार और इतिहास-लेखक था। वह अपने समय का सबसे बड़ा फारसी लेखक था उसका लिखा हुआ आईने अकबरी’ नाम का ग्रन्थ अपने समय का बिल्कुल सच्चा तो नहीं, परन्तु उज्वल चित्र अवश्य है। अबुलफजल का भाई फैजी दरबार का कवि था। यदि अबुलफजल के लेख पर विश्वास करें तो अकबर के दरबार में हजारों कवि आते थे, यदि उसे इतना समय नहीं मिलता था कि वह उनकी कविता से लाभ उठाये। उनमें से बहुत से तुक्कड़ भी होते होंगे अबुलफजल की राय में ५१ प्रतिष्ठा के योग्य थे।

राजा टोडरमल और राजा बीरबल अकबर के दरबार के नव रत्नों में से थे। वह दोनों हिन्दी कवि थे। राजा टोडरमल का पद्य देखिए गुन बिन धन जैसे, गुरु चिन ज्ञान जैसे, मान बिन दान जैसे, जल बिन सर है। कण्ठ विन गोत जैसे, हित बिन प्रीत जैसे, वेश्या रस रोत जैसे, फल बिन तर है। तार विन जन्त्र जैसे, स्याने बिन मन्त्र जैसे, पुरुष बिन नारि जैसे, पुत्र विन घर है । टोडर सुकवि तैसे, मन में विचारि देखो, धन बिन धर्म जैसे, पंछी बिना पर है।

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राजा बीरबल की कविता का एक नमूना लीजिए पूत कपूत, कुलच्छनि नारि, लराक परोस, लजायन सारो। बन्धु कुबुद्धि, पुरोहित लम्पट चाकर चोर, अतिथि धुतारों ।। साहव सम. अराक तुरंग, किसान कठोर, दिवानल कारो । ‘ब्रह्म’ भनै सुन शह अकबर, चाराहों यांधि समुद्र में डारो। बोरवल का उपनाम ‘ब्रह्माया। बया महाराज १२ प्रकार के व्यक्तियों को बांधकर समुद्र में डालने की अकबरशाह से सिफारिश कर रहे हैं।

साहित्य और संगीत जोडे भाई हैं। एक के बिना दूसरे का फलना फूलना असम्भव है। अकबर के राज्य-काल में संगीत की भी खूब उन्नति हुई। इस्लाम में संगीत निषिद्ध है, परन्तु अकबर का विशाल हृदय इस संकुचित और युक्ति विरुद्ध नियम को मानने के लिए उद्यत नहीं था। वह रूढ़ि की साँकलों को तोड़ चुका था, वह बुद्धि-विरुद्ध ढकोसलों को ‘मजहब’ का अंग नहीं समझता था। अकबर के बारे में अबुलफ़जल ने लिखा है-“(अकबर) संगीत की ओर बहुत रुचि रखता है और अच्छे गायकों का संरक्षक है। दरबार में हिन्दू, इंरानो तुरानी, कश्मीरी, पुरुष और स्त्री दोनों ही प्रकार के गायक बहुतायता से रहते हैं। यह गायक ७ हिस्सों में बांटे गये हैं और सप्ताह में एक दिन एक जत्थे की बारी आती है।”

संगीत में अकबर का गुरु लाल कलावन्त नाम का हिन्दू गवैय्या था। ऐसे संगीत प्रेमी महाराज के राज्य में संगीत विद्या का आदर और विस्तार हो, तो आश्चर्य ही क्या है ? भारत का प्रसिद्ध गवैय्या तानसेन अकबर के दरबार की शोभा को बढ़ाता था। राजा मानसिंह ने ग्वालियर में एक संगीत का शिक्षणालय खोला था, जिसमें स्वयं तानसेन शिक्षा देता था। ग्वालियर में मियाँ तानसेन का जो मकबरा है, वह उस कला प्रेमी शासक के गुणों का एक स्मारक है।

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