क्या राम मंदिर ने हिन्दू विरोधी राजनीति के विकल्प का अंत कर दिया?

क्या राम मंदिर ने हिन्दू विरोधी राजनीति के विकल्प का अंत कर दिया?

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जिस दिन से अयोध्या नगरी में भूमि पूजन की तिथि निर्धारित हुई उसी दिन से राजनीति में एक नई बदलाव की बयार देखने को मिली-हमरे राम, हमारे राम।
आज वह भी दंभ भर रहे है जिन्होंने दशकों से इस समस्या को जटिल बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया और सार्वजनिक तौर पर श्री राम के अस्तित्व पर भी  प्रश्न उठाया।

शायद गोस्वामी तुलसीदास जी को चार सौ वर्ष पहले ही वर्तमान की परिस्थितियों का मान रहा होगा तभी उन्होनें अपनी कृति तुलसी-रामायण में इस चौपाई की रचना की होगी-

सोइ जानइ जेहि देहु जनाई।
जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई।।

अर्थात् आए तो बहुत शासक जमाने में, परंतु जो तुम्हें भा गया वह सब कुछ पा गया।

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और यह श्रेय मिला वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र दामोदर दास मोदी जी को उन्होंने इस पल को जीवंत भी कर दिया श्री राम के चरणों में साष्टांग प्रणाम करके देश धन्य हुआ हर उन आंखों में उल्लास टपका जिनके पूर्वजों ने चार सौ बानवे साल तक अपनी अडिग आस्था को जीवंत कर रखा अनेको बार प्रयास हुए कितने ही बलिदान दिये गए कई कानूनी लड़ाईयां लड़ीं साथ ही धैर्य और निष्ठा को भी जीवंत रखा उसी का प्रतिफल है जन-जन के आराध्य भगवान श्री राम जन्मभूमि पर मन्दिर निर्माण हेतू भूमिपूजन।

हमें प्रतिपल स्मरण रखना होगा कि हमारे अन्तस् की गहराईयों में विद्यमान श्री राम कर्तव्य की प्रतिमान मूरत रहे जिस रामराज्य की चर्चा हो रही है उसकी परिकल्पना गूढ़ता से करनी होगी।

रामराज्य के भावार्थ को समझने के लिए महात्मा गांधी द्वारा 20 मार्च 1930 को हिन्दी पत्रिका नवजीवन के शीर्षक में लिखे इस अंश को समझना होगा-‘स्वराज के कितने ही अर्थ क्यों न किए जाएं तो भी मेरे नजदीक उसका त्रिकाल सत्य एक ही अर्थ है और वह है रामराज्य, इस शब्द का भावार्थ यह है कि उसमें गरीबों की संपूर्ण रक्षा होगी सब कार्य धर्मपूवर्क किए जाएंगे और लोकमत का हमेशा आदर होगा।

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यह याद रहे कि रामराज्य स्थापित करने के लिए हमें जिस गुण की आवश्यकता है वह तो सभी वर्गो के लोगों में मौजूद है।

सन् 1930 में महात्मा गांधी द्वारा की गई परिकल्पना पर न तो वर्तमान की राजनीति खड़ी दिखाई पड़ती है और न ही जनमानस रही बात मर्यादा पुरुषोत्तम राम के कर्तव्यनिष्ठ होने की तो इसके लिए प्रत्येक मानव को अपने सीने पर हाथ रख निष्कपट हो चिन्तन की आवश्यकता है। जो दिख रहा है उसमें सिर्फ और सिर्फ अधिकार का वर्चश्व है कर्तव्य सीमित।

इस पावन बेला पर जनमानस द्वारा की गई आतिशबाजी, दीप प्रज्वलन, दुग्धाभिषेक इत्यादि आयोजन भौतिक ही लगते हैं इससे उल्लास का प्रकटीकरण तो किया जा सकता है परन्तु इसे अन्तःकरण में जनमानस  जिस दिन उतार लेगा रामराज्य का स्वप्न स्वतः साकार  हो जाएगा। देखिए इसमें और कितने युग लगते हैं? राम संपूर्ण भारतीय संस्कृति और मूल्यों के प्रतीक हैं।

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एक सौम्य राम हैं, एक धनुर्धारी राम है, एक भक्तों के भक्त राम हैं जो शबरी के बेर खाते हैं, एक भ्राता की मूक्र्षापर विलाप करते हैं, एक पत्नी के वियोग  में पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों से उनका पता पूछते हैं, एक राम अहिल्या का उद्धार करते हैं, एक सागर को चेतावनी देते हैं, एक अपने आराध्य की अराधना हेतू महापण्डित रावण जिससे युद्ध करना है को पूजन हेतु आमंत्रित करते हैं, एक वानर भालुओं की सेना लेकर उसपर आक्रमण करते हैं जो त्रिलोकी का शासक कहलाता रहा। इसलिए कहा गया है हरि अनंत हरि कथा अनंता।

क्या राम मंदिर ने हिन्दू विरोधी राजनीति के विकल्प का अंत कर दिया?

राम की स्तुति ऋषि-मुनि से लेकर अनेकों शास्त्र पुराणों के माध्यम से उपलब्ध है, गोस्वामी तुलसीदास रचित रामायण अनेक संप्रदायों के पूजा स्थल की शोभा है-परन्तु! आवश्यकता है व्यवहार में राम को उतारने की अन्तःकरण में उन्हें स्थापित करने की वर्तमान शासक ने अपने कर्तव्य का निर्वहन कर दिया देखें हम कब कर पाएंगे।

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पांच अगस्त एक नया इतिहास रचे जाने की तारीख बनती दिखती है-370 हटाने और मंदिर निर्माण के बाद आगे क्या क्यूंकि अभी वर्तमान शासन में तीन 5 अगस्त बाकी हैं। आचार्य चाणक्य ने शासक का जिक्र करते हुए लिखा है कि उसे कछुए की तरह होना चाहिए।

जैसे कछुआ जब जितना जरुरी होता है उतना ही अंग अपने खोल से बाहर निकालता है। इसलिए राजा को भी जब जितना जरुरी हो उतना ही प्रजा को बताना चाहिए। सवाल फिर वही है आगे क्या? एक नज़र भाजपा और संघ के प्रमुख मुद्दों पर-समान नागरिक संहिता, जनसंख्या नियंत्रण, पाक अधिकृत कश्मीर इन मुद्दों के साथ हमें काशी, मथुरा को भी नहीं भूलना चाहिए।

इन सब मुद्दों के मूल में है सांस्कृतिक राष्ट्रवाद। कैसा संयोग है सोमनाथ मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा का कार्यक्रम तत्कालीन राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद के हाथों सम्पन्न हुआ और राम मंदिर भूमिपूजन प्रधानमंत्री मोदी के हाथों।

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मोदी के अश्वमेध घोड़े को वर्तमान में कोई रोकने वाला दिखाई नहीं दे रहा है। हिन्दू विरोध की राजनीति का विकल्प समाप्त हो चला है।

वीर सावरकर ने कहा था कि भारत को पितृ भूमि और  पुण्य भूमि मानने की प्रवृत्ति ही हिन्दुत्व का लक्षण है। राम मंदिर का निर्माण भारत की गरिमा की पुनर्स्थापना का पर्व है। कहते हैं धर्म की रक्षा दो तरह से होती है शस्त्र और शास्त्र से पर यह दौर बताता है कि धर्म की ऱक्षा उसके सहनशील अनुयायियों की आस्था से भी की जा सकती है। 492 साल तक राम भक्तों की आस्था अडिग रही। अयोध्या में भव्य एवं दिव्य राम मंदिर निर्माण उसी आस्था का प्रतिफल है। सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार के अवसर पर स्वर्गीय राजेन्द्र प्रसाद ने कहा था कि विध्वंस से बड़ी ताकत निर्माण की होती है। आज पूरी दुनिया अयोध्या में निर्माण की इस शक्ति की साक्षी बनी है।

इसलिए राम न हमारे न तुम्हारे जन जन के हैं राम। जै सियाराम…………..

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