October 25, 2020
कुम्भ की पौराणिकता, इतिहास क्या है? और कुम्भ तथा सिंहस्थ में क्या अंतर है?

कुम्भ का इतिहास, पौराणिकता क्या है? और कुम्भ तथा सिंहस्थ में क्या अंतर है?

मेरी रामकहानी से जैसे गंगामैया अलग नहीं हो सकती वैसे ही अलग नहीं किए जा सकते कुम्भ (Kumbh) और अर्द्धकुम्भ पर्व। गंगास्नानों के विभिन्न पर्व जैसे बैसाखी, संक्रातियों के पर्व, चन्द्र सूर्यग्रहणों के पर्व, पूर्णिमा अमावस्या एकादशी के स्नान पर्व और कांवड़ जैसे लक्खी मेले से मुझे अलग करके देखा ही नही जा सकता। साधु-सन्यासियों के साथ उनके मठ- आश्रम और अखाडे़ तथा तीर्थपुरोहित नामक वह ब्राह्मण वर्ग जो तीर्थ के कारण ही आबाद है, भी मेरी रामकहानी के हिस्से हैं। आइये इन सबकी क्रमशः चर्चा करें और आपबीती को आगे बढ़ाएं।

भारतवर्ष में जिन चार स्थानों पर कुम्भ के विराट मेले लगते हैं, उनमें प्रमुख मैं ही हूं। मेरे अलावा उत्तर प्र्रदेश के प्रयाग, महाराष्ट्र के नासिक और मध्य प्रदेश के उज्जैन में भी कुम्भ (Kumbh) के परम्परागत मेले भरते हैं। मेरे गंगातट के अलावा प्रयाग के संगम तट पर अर्द्धकुम्भ भी होता है। पर शेष दो स्थानों पर सिंहस्थ के नाम से केवल महापर्व ही आयोजित होता है। अतः योग कुछ इस तरह बन जाता है कि मेरे गंगातट पर पूर्णकुम्भ (Kumbh) होने के तीसरे वर्ष प्रयाग में पूर्णकुम्भ (Kumbh) होता है।

फिर छठे वर्ष मेरी धरती अर्द्धकुम्भ मनाती है तो नवें वर्ष प्रयाग में अर्द्धकुम्भ घटित होता है। मेरी धरती पर जिस वर्ष अर्द्धकुम्भ (Kumbh) होता है उसी वर्ष उज्जैन और नासिक में सिंहस्थ महापर्व मनाए जाते हैं। यही परम्परा चली आ रही है।

Advertisement

कुम्भ (Kumbh) या सिंहस्थ सामान्य वाणिज्य मेलों की तरह या पशु मेलों की तरह के मेले नहीं है कि लोग आए, व्यापार किया,मनोरंजन किया और खा-पीकर चले गये। कुम्भ (Kumbh) में तो आकाशीय ग्रह-नक्षत्रों की विशेष स्थितियां ही पर्व का निर्धारण करती हैं।

ज्योतिषीय गणना के आधार पर ग्रह-नक्षत्रों की कुछ विशेष स्थितियां हर बारहवें वर्ष उपस्थित होती हैं। इसीलिए प्रति बारहवें वर्ष विभिन्न स्थलों पर कुम्भ (Kumbh) का आयोजन हमारे मनीषीयों -चिन्तकों ने कई दृष्टियों से आरम्भ किया। आज जब हम अपनी इस विराट परम्परा को पूरे गौरव से निभाते आ रहे हैं तो इसके आरम्भ होने के विभिन्न कारणों और आधारों के परिप्रेक्ष्य में कुम्भ (Kumbh) की पौराणिकता, खगोल-शास्त्रीयता, ऐतिहासिकता और सामाजिकता पर चिंतन करना उचित की है।

 

Advertisement

कुम्भ की पौराणिकता (Origin Of Kumbh)

शिव पुराण; ज्ञान-संहिता, 54/9 से 19 श्लोक में उल्लेख है कि देवताओं ने गंगावतरण के बाद गौतमी-गंगा-गोदावरी से प्रार्थना की। जब-जब गुरु सिंह राशि में आएंगे तब-तब हम सब यहां अवश्य आएंगे और आप भी महादेव जी के साथ लोक के ग्यारह वर्षों में किये पापों का प्रक्षालन करने के लिये यहां अवश्य रहना। इसके अतिरिक्त तीर्थ दर्पण’, ’तीर्थेन्दुशेखर आदि पुस्तकों मे स्कन्दपुराण, ब्रह्माण्ड़पुराण, प़द्यपुराण, ब्रह्मवैवर्तपुराण आदि ग्रंथों से जो श्लोक उद्धृत किए गए हैं वे सभी श्लोक सिंहस्थ गुरु की स्थिति में गोदावरी स्नान के महत्व को बताते हैं।

पर मेरे गंगातटों पर जो कुम्भ (Kumbh) होता है वस्तुतः वह गुरु के कुम्भ (Kumbh) राशि में होने यानि ’कुम्भस्थ’ होने पर ही होता है। इसके लिए विद्वज्जन धर्मसाधन, मनुपर्व और विष्णुयाग आदि को प्रमाण मानते हैं। विष्णु योग की कलशोत्पत्ति कथा के अनुसार उत्तर में हिमालय पर्वत के समीप क्षीरसागर को मथने के लिए देवों और दैत्यों ने मिलकर किसी काल में एक साहसिक अभियान सम्पन्न किया था।

’कलशोत्पत्ति’

Advertisement

कच्छप अवतार भगवान विष्णु की पीठ पर विराट मन्दराचल को मथानी बनाकर रखा गया। नागराज वासुकि को रस्सी बनाया गया और एक ओर से देवों ने तथा दूसरी ओर से दैत्यों ने सागर को मथना शुरु किया। इस मंथन से चैदह रत्न निकले- विष, वारुणि, पुष्पक विमान, ऐरावत हाथी, उच्चैःश्रवा अश्व, लक्ष्मी, रम्भा, चन्द्रमा, कौस्तुभ मणि, कामधेनु, विश्चकर्मा, धन्वंतरि और अमृतकुम्भ (Kumbh)। सबसे अंत में धनवंतरि ही अमृत से पूरित कुम्भ (Kumbh) को लेकर अवतरित हुए।

अमृतकुम्भ को देखते हुए इन्द्र का पुत्र जयन्त झपटा और अमृतकुम्भ सबसे अंत में धनवंतरी के हाथ से छीनकर भाग निकला। देवता कुम्भ (Kumbh) की रक्षा के लिए सन्नद्ध हुए तो दैत्य इस घटना से बौखलाकर जयंत से कुम्भ (Kumbh) छीनने के लिए भागे। जयंत बारह दिन तक, जो कि मनुष्यों के लिए बारह वर्ष माने जाते हैं, कुम्भ (Kumbh) लिये-लिये भागता रहा। इस अवधि में उसने जिन बारह स्थानों पर वह कलश रखा उन्हीं बारह स्थानों पर बाद में कुम्भ (Kumbh) पर्व मनाया जाने लगा।

उक्त बारह स्थानों में चार तो पृथ्वी पर, वह भी भारत में ही हैं। शेष आठ स्थान देवलोकों में माने जाते हैं। क्योंकि देवगुरु बृहस्पति सूर्य और चन्द्रमा ने उक्त बारह दिनों में अलग-अलग स्थितियों में कुम्भ (Kumbh) की रक्षा की थी, अतः बृहस्पति, सूर्य और चन्द्रमा की विशिष्ट स्थिति ही विभिन्न स्थलों पर कुम्भ (Kumbh) का योग लाती है। कलशोत्पत्ति कथा के अंत में बताया गया कि मेष में सूर्य और कुम्भ राशि में बृहस्पति होने से गंगाद्वार यानी हरिद्वार अर्थात मेरे गंगातट पर ’कुम्भ’ का योग उपस्थित होता है।

Advertisement

 

पद्मिनीनायके मेषे कुम्भ राशि गतो गुरु

गंगाद्वारे भवेद्योगः कुम्भ नामा तदोत्तमः

                                                                                                                                       –विष्णु योग

 

Advertisement

जयंत द्वारा अमृतकुम्भ को लेकर भागने की घटना वाली हमारी पुराकथा के साथ एक और किंवदंती इस सन्दर्भ में प्रचलित है और वह है गरुड द्वारा कुम्भ को उड़ा ले जाने की बात। लोकचर्चा है कि सागर मंथन के बाद अंत में धनवंतरि अमृतकुम्भ लेकर प्रकट हुए तो उस कुम्भ को लेकर छीना-झपटी हुई। देवों और दैत्यों के बीच विवाद बढ़ा तो भगवान विश्वमोहिनी रुप लेकर आए।

उन्होंने मध्यस्थ बनकर अमृतकुम्भ स्वयं ले लिया और वितरण करना आरम्भ किया। उन्होंने पहले से ही निश्चय कर रखा था कि यह अमृत केवल देवताओं को ही मिलना चाहिए, अतः उन्होंने देवताओं की पंक्ति में ही सारा अमृत समाप्त कर खाली कलश फेंक दिया। इस कलश को गरुड़ ने उड़े और थोड़ी बहुत शेष बची बूदों को उन्होंने चार स्थलों पर गिरा दिया।

कुछ जनश्रुतियां कहती हैं कि गरुड़ भरा हुआ अमृत कुम्भ ले उड़े और चोंच में पकड़े होने के कारण कुम्भ टेढ़ा हो गया इसीलिए वह चार स्थानों पर छलक गया। गरुड़ और कुम्भ का सम्बन्ध यूं तो शतपथ ब्राह्मण में भी है। कहा गया है कि गायत्री श्येन होकर दिव से सोम को लाई। इसी से वह श्येनभृत है। श्येन और सोम का यह सम्बन्ध प्रतीकार्थ में है और कुम्भपर्व से तो नहीं ही जुड़ता।

Advertisement

श्रीमद्भागवत, विष्णुपुराण, महाभारत, वाल्मीकि रामायण आदि ग्रन्थों में भी सागर मंथन, अमृत कुम्भ का धनवंतरि के हाथों में प्रकट होना और विश्वमोहिनी वेश में महाविष्णु द्वारा उसके वितरण की तो चर्चा है पर कहीं भी जयंत या गरुण द्वारा उस अमृत कुम्भ को लेकर भागने की जगह-जगह रखने की चर्चा नहीं है।

इसी तरह मत्स्य, कूर्म, गरुड़, पद्म और नारदीय पुराणों में गंगा स्नान का महत्व तो लिखा गया है कि और उसके साथ ही लिखा गया है गंगाद्वार और प्रयाग आदि तीर्थों का महत्व। पर इनमें कहीं भी कुम्भपर्व की चर्चा नहीं है। हां, कुम्भ की चर्चा अथर्ववेद 4-34-7 और 19-53-3 में अवश्य आई है। उसमें कहा गया है कि ब्रह्माजी कहते हैं कि हे मनुष्यों! मैं भोजन, बुद्धि एवं पोषण साधनों से पूर्ण पृथ्वी को पूर्ण करने वाले चार कुम्भों को (कुम्भ पर्वों को) चार स्थानों में प्रदान करता हूं।

 

Advertisement

कुम्भ की खगोल शास्त्रीयता (Geographical Aspects Of Kumbh)

 

जैसा कि मैं पहले भी बता चुका हूं कि हरिद्वार में कुम्भ योग, बृहस्पति, जिन्हें देवताओं का गुरु भी माना जाता है, के कुम्भ राशि में संक्रमण के समय आता है। सामान्यतः यह माना जाता है कि बृहस्पति एक राशि में एक वर्ष में रहता है और बारह वर्ष में घूमकर पुनः उसी राशि में पहुंचता है। पर वस्तुस्थिति यह है कि बृहस्पति 357 दिनों में या 11 महीने और 27 दिनों में बारह राशियों की परिक्रमा पूरी करता है। इसी तरह बारह वर्षों में 55 दिन कम हो जाते हैं। यह कमी बढ़ते-बढ़ते सातवें और आठवें कुम्भ के बीच पूरे वर्ष के लगभग हो जाती है। इसलिए हर आठवां कुम्भ बारह के स्थान पर ग्यारह वर्ष के अंतराल पर होता है।

बीसवीं शताब्दी का मेरा तीसरा कुम्भ 1927 में हुआ था। सामान्य गणना के अनुसार इसके बाद 1939 में कुम्भ में कुम्भ आना चाहिए था, पर बृहस्पति की चाल के कारण 1927 के बाद ग्यारह वर्ष में ही यानि सन् 1938 में ही कुम्भ आ गया था। इसी तरह इक्कीसवीं शताब्दी में मेरा पहला कुम्भ तो 2010 में ही आएगा पर दूसरा कुम्भ सन् 2021 में संपन्न करना होगा। 1938 के बाद का वह आठवां कुम्भ ग्यारह वर्ष में ही आ जाएगा। हर शताब्दी में ऐसा कम से कम एक बार अवश्य होता रहा है।

Advertisement

गुरु बड़ा प्रभावशाली ग्रह है और इसकी प्रकृति कल्याणकारी मानी गई है। अतः हमारे ज्योतिर्विदों ने विभिन्न राशियों में गुरु या कहें बृहस्पति के प्रवेश को अत्यन्त मांगलिक माना है। जब सूर्य मेष राशि में हों और गुरु कुम्भ राशि में हों तो हरिद्वार में गंगा किनारे स्नान का पूण्य मनाने की परम्परा के पीछे निश्चय ही ज्योतिषियों की यह अवधारणा रही है कि उक्त ग्रह स्थिति में सूर्य किरणें जल को अधिक औषधियुक्त व मांगलिक बनाती हैं।

कुल मिलाकर 12 कुम्भ कल्पित है जिनमें से चार भारत वर्ष में होते हैं। इन चारों स्थानों पर बृहस्पति के विभिन्न राशियों में संक्रमण और उसमें उपस्थिति को अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। प्रयाग में बृहस्पति का वृषस्थ और सूर्य का मकरस्थ होना पर्वयोग लाता है तो उज्जैन में बृहस्पति का सिंहस्थ एवं चन्द्र-सूर्य का मेषस्थ होना पर्व का सुयोग बनता है।

नासिक में बृहस्पति तो सिंहस्थ ही रहते हैं पर सूर्य और चन्द्रमा भी सिंहस्थ हो जाते हैं। इसीलिए नासिक में वास्तविक ’सिंहस्थ’ योग बनता है। उसी वर्ष उज्जैन में भी सिंहस्थ कुम्भ आयोजित होने से आम जनता की यह धारणा भी टूटती है कि हर तीसरे वर्ष कहीं न कहीं यह महापर्व होता ही है। दरअसल मेरे बाद तीसरे वर्ष प्रयाग में तथा और छठे वर्ष और नासिक दोनों जगह सिंहस्थ मनाया जाता है। उज्जैन और नासिक के सिंहस्थों के बीच कुछ महीनों का ही अंतर होता है।

Advertisement

यह भी उल्लेख मिलता है कि उज्जैन में पहले सिंहस्थ होता ही नहीं थी। वह तो सिंधिया राजघराने के संस्थापक राणोजी थे जिन्होंने 1740 में नासिक जाकर साधुसंतों के अखाड़ों को आमंत्रित किया कि वे उनके राज्याधीन तीर्थनगर उज्जैन में भी सिंहस्थ को आयोजित करें। उन्होंने आश्वस्त किया कि वे आयोजन कर सारा व्यय स्वयं करेंगे। तभी से इन महामेलों की व्यवस्था शासन प्रशासन के द्वारा किए जाने की शुरुआत हुई।

कुम्भ की पौराणिकता, इतिहास क्या है? और कुम्भ तथा सिंहस्थ में क्या अंतर है?

सूर्य और चन्द्र के साथ बृहस्पति को ही सर्वाधिक महत्व दिया गया है। पुराकथाओं में बृहस्पति देवताओं के गुरु भी है। उन्होंने ही दैत्यों से अमृत घट की रक्षा भी की थी। सूर्य चन्द्र ने राहु को देवपंक्ति में बैठा देख उसकी चुगली की थी और विष्णु ने चक्र से उसका सिर काट दिया था। जनमान्यता है कि तभी से राहु केतू और धड़ और सिर दोनों जीवित हैं और मौका पाकर सूर्य चन्द्र को ग्रस लेते हैं। अस्तु, लगता है बृहस्पति का विभिन्न राशियों में संक्रमण का काल त्योतिषीय दृष्टि में मांगलिक होता है और यह मांगलिकता सरिता तटों पर ही अधिक प्रभावकारी होती है।

Advertisement

यहां यह प्रश्न सहज भाव से मन में उठता है कि बृहस्पति तो कुम्भ, वृष और सिंह राशियों के अतिरिक्त भी अन्य राशियों में सवंमित और उपस्थित होते हैं और करीब-करीब हर राशि में बारह वर्ष बाद ही आते हैं तो फिर वे कौन से स्थान हैं और कहां हैं जहां बृहस्पति के अन्य राशियों में स्थिर होने पर मंगलपर्व का सुयोग उपस्थित होता है?

धर्मग्रंथों में तो उन स्थानों को देवलोक में बताकर छुट्टी पा ली गयी है। पर यह ज्योतिषीय खोज का विषय हो सकता है कि पृथ्वी के अन्य देशों में ग्रह-नक्षत्रों की कुम्भ जैसी मांगलिक स्थिति कहां और कब होती है। विश्व के अन्य भागों में लगने वाले नदी किनारे के मेलों की खोजबीन शायद इस दिशा में सहायक हो। मैं तो चाहूंगा कि विश्व का जनमानस हम चारों के अलावा भी शेष आठ कुम्भस्थलों से परिचित हो।

ज्योतिषीय सन्दर्भों में यह समझ लेना बहुत जरुरी है कि कुम्भ तो वस्तुतः मेरे ही गंगातटों पर होता है, अन्यत्र कहीं नहीं। मुझसे ही यह परम्परा आरम्भ हुई क्योंकि शेष तीन स्थलों पर बृहस्पति कुम्भस्थ होता ही नहीं है। तात्पर्य यह है कि कुम्भ विशेषण इस महापर्व के लिए मेरे साथ जुड़कर ही अधिक सार्थक, उपयुक्त और सटीक बैठता है।

Advertisement

 

कुम्भ ऐतिहासिक सन्दर्भ (History Of Kumbh)

 

यूं तो कुम्भ पर्व शताब्दियों से भारत के चार नगरों में, जो कि चार दिशायों में विभिन्न नदियों के किनारे बसे हैं, धार्मिक स्नान पर्व के रुप में मनाया जा रहा है। पर इसका ऐतिहासिक और प्रामाणिक दस्तावेज बहुत पुराना उपलब्ध नहीं है। महंत लालपुरी जी ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि कुम्भ मेलों के वर्तमान रुप में विकास के विषय में एक मत यह भी है कि भारतीय इतिहास के स्वर्ण युग गुप्त साम्राज्य (320-600 ई0) के समय में जैसे पुराणादि साहित्य पुनः सम्पादित होकर वर्तमान रुप में आए उसी तरह पुराण एवं ज्योतिष साहित्य के आधार पर कुम्भ पर्वों के स्थान तथा काल स्थायी रुप से निर्णीत होकर वर्तमान रुप में विकसित हुए।

Advertisement

हरिद्वार के महाकुम्भ मेले की व्यवस्थाओं का पहला उल्लेख हमें मुगलकाल के इतिहास ग्रंथ ‘खुलासातुत्तवारीख‘ जो संभवतः 1695 में लिखा गया, में मिलता है। तरीखकार इसमें लिखता है कि, हालांकि धर्मग्रन्थों के अनुसार गंगा अपने स्त्रोत से गंगासागर तक सर्वत्र पूजनीय है पर हरिद्वार इसके तट पर बसे सभी नगरों में सर्वप्रमुख है। हर साल जब सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है यहां बैशाखी का वार्षिक मेला लगता है और इसी के साथ विशेषकर बारह साल बाद जिस साल गुरु कुम्भ राशि में प्रवेश करता है तब यहां दूरदराज से भारी संख्या में लोग एकत्र होते हैं।

वे मानते हैं कि यहां आकर अपने दाढ़ी-मूंछ और बाल मुंडवाना, गंगास्नान करना, दान देना आदि श्रेष्ठ करणीय कार्य हैं। यही नहीं अपने मृत परिजनों की अस्थियों का प्रवाह गंगा में करना भी मृतकों की मुक्ति का साधन है। इसी तरह का मिलता जुलता वर्णन 1759 में लिखे गए ‘‘चहर-गुलशन‘‘ नामक इतिहास ग्रंथ में मिलता है। ग्रंथकार लिखता है, ‘‘हरिद्वार में बैसाखी का मेला बहुत बड़ी तादाद में भरता है जब सूर्य मेष और बृहस्पति कुम्भ राशि में प्रवेश करता है। तब यह मेला कुम्भ कहलाता है। तब लाखों सामान्यजन, फकीर और संन्यासी यहां एकत्र होते हैं। जो बैरागी फकीर आते हैं वे संन्यासीयों के साथ ही जुड़ जाते हैं।

इन आरंभिक वर्णनों के अलावा कोई ऐतिहासिक दस्तावेजी प्रमाण मेरे कुम्भ के विषय में उपलब्ध नहीं होता है। यूं मेरे इतिहास और परम्पराओं पर अनेक लोगों ने कलम चलाई है पर प्रायः उस सारी सामग्री में मौलिकता और शोध की कमी दिखाई पड़ती है। समग्रता और पूर्णता का अभाव है। इस दृष्टि से मुझे अमरीकी शोधकर्ता डाॅ0 जेम्स जी0 लाॅख्टफेल्ड का कार्य प्रेरक और प्रभावशाली लगता है, जिन्होंनें 1992 में कोलम्बिया विश्वविद्य़ालय में अपना शोधप्रबंध मुझे यानी ‘हरिद्वार‘ को ही अपना मुख्य विषय बनाते हुए प्रस्तुत किया था। उनके अनुसार हरिद्वार कुम्भ के 1867 के ही दस्तावेज प्रमाण उपलब्ध हैं, उससे पूर्व के नहीं।

Advertisement

वैसे कुछ लोग इन पर्वों की शुरुआत सम्राट हर्षवर्धन (612-647ईसवी) में मानते हैं। सातवीं शताब्दी के चीनी यात्री ह्वेनत्सांग ने अपने यात्रा वर्णन में लिखा है कि ‘पांच साल तक संग्रह की हुई अपनी सारी सम्पत्ति को राजा शीलादित्य हर्षवर्धन अपने पूर्वजों की तरह प्रयाग की पुण्यभूमि में सर्वप्रथम भगवान बुद्ध की प्रतिमा के सामने समर्पित करता था तथा फिर उस सम्पत्ति को स्थानीय पण्डों, पुजारियों, फिर बाहर के पण्डों-पुजारियों, फिर प्रमुख विद्वज्जनों, फिर विधर्मियों, को और अंत में विधवाओं, असहायों, भिखारियों, अपंगों, गरीबों और साधुओं को बांट देता था।

इस तरह राजा अपना सारा कोष और भोजन-भण्डार बांटने के बाद अपना कीमती राजमुकुट, जडाउ कण्ठहार और यहां तक कि पहन हुए कपड़े तक दान कर देता था। अन्त में सब कुछ दे चुकने के बाद राजा प्रसन्नतापूर्वक कहता था कि, ‘मैने अपना सब कुछ ऐसे कोष में दे दिया है जो कभी खाली नहीं होगा। इस सारे वर्णन में इतनी बात तो पता चलती है कि राजा शीलादित्य हर्षवर्द्धन अपने पूर्वजों की तरह ही पांच साल के बाद हर छठे वर्ष प्रयाग में यह महादान महोत्सव त्रिवेणी के किनारे आयोजित करता था। पर इससे यह कहीं सिद्ध नहीं होता कि इस आयोजन को कुम्भ कहते थे या कि इसे हर्षवर्द्धन ने आरम्भ किया था।

लगता यह है कि बौद्धकाल में कुम्भपर्व का प्रचलित रुप बदलकर ‘महादान पर्व‘ के रुप में आ गया होगा जिसे बाद में आदिशंकराचार्य के आविर्भाव के बाद संन्यासियों की दशनाम परम्परा के द्वारा पुनः व्यवस्थित किया गया होगा। आज भी संन्यासियों और अन्य साधु सम्प्रदायों के बीच अपने सम्प्रदायों-संगठनों के चुनावों और अन्य प्रमुख निर्णयों के लिए विभिन्न कुम्भों की प्रतीक्षा की जाती है और जब कुम्भ पर सम्पूर्ण देश का साधु समाज अपने-अपने अखाड़ों और विभिन्न सम्प्रदायों के साथ एक स्थल पर जुड़ता है तो आगे के बारह वर्षों के लिए धर्म, समाज व संस्कृति विषयक निर्णय लिये जाते हैं।

Advertisement

आज भले ही यह परम्परा प्रतीकात्मक अधिक हो गई हो, पर किसी समय में निश्चय ही साधु-संन्यासियों का इस तरह एकत्र होना, देश-विदेश से आए हुए गृहस्थ समाज के साथ मिल बैठना, धर्मशास्त्रों से सम्बद्ध विविध विषयों की समालोचना और दार्शनिक प्रश्नों पर विचार-विमर्श करना तथा अन्न-धन, दान, यज्ञादि धार्मिक अनुष्ठान सम्पन्न करना सारे समाज के लिए अत्यन्त प्रभावोत्पादक और प्रेरक रहता होगा।

कुम्भ ऐतिहासिक सन्दर्भ

आदिशंकराचार्य ने जिस तरह चार दिशाओं में चार आम्नाय स्थापित करके हिन्दू संन्यासियों को संगठित करते हुए अपने अद्वैत मत के प्रचार के लिए समाज को संगठित किया, लगता है उसी तरह उन्होंने जोगियों के लिए यह अनिवार्य किया कि वे भोगियों से मिलने के लिए तथा उन्हें चिंतन-मनन से दिशा दान देने के लिए बारह बरस में एक बार एक दिशा में अवश्य एकत्रित हों।

Advertisement

उत्तर मे हरिद्वार, पूरब में प्रयाग, पश्चिम में उज्जैन और दक्षिण में नासिक में गंगा, संगम, क्षिप्रा और गोदावरी के तीर पर सारे समाज के एक साथ जुड़ने की इस परम्परा को राष्ट्रकी भावानत्मक एकता की दृष्टि से भी आवश्यक माना गया होगा। शंकराचार्य ने आसेतु हिमालय यात्राएं करके धार्मिक दृष्टि से विखण्डित और विश्रृंखलित होते जा रहे भारत को भीतर से एकता के धर्मसूत्र में बांधने का जो उपक्रम एक हजार वर्ष पूर्व किया था, लगता है कि कुम्भ पर्व उनके अभियान में सहायक होकर आज के स्वरुप को प्राप्त हुए होंगे। कुम्भ के साथ साधु-संन्यासियों का इतना नैकट्य तो कम यही सिद्ध करता है।

इतना तो तय है कि कुम्भ पर्वाें पर नदी किनारे के चार प्रमुख तीर्थस्थलों में प्रति बारहवे वर्ष विशिष्ट ज्योतिषीय स्थितियों में स्नान-दान की परम्परा भले ही पहले से रही हो पर उसे राष्ट्रीय एकता की दृष्टि से उपयोग में लाने का महत् कार्य आद्यजगदगुरु श्रीशंकराचार्य के समय से ही हुआ है। आज भी शंकराचार्य के अनुयायी दशनामी संन्यासियों को ही कुम्भ स्नान का प्रथम अधिकार प्राप्त है। यह तथ्य भी उपरोक्त बात को पुष्ट करता है।

जिस तरह व्यक्ति ठोकर खाता रास्ता पहचानता और उस पर चलना सीखता है, उसी तरह इन महापर्वों ने समय-समय पर जनता और प्रशासन दोनों को कुछ न कुछ सिखाया ही है। यही कारण है कि उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में जनहितकारी विकास की जो परम्पराएं कुम्भ के माध्यम से आरम्भ हुई, वे आज भी जारी हैं।

Advertisement

हरिद्वार में सीवर की व्यवस्था, रेल का आना, बार-बार ब्रह्मकुण्ड, हर की पौड़ी के विस्तार होना, पक्की सड़कोें की उपलब्धि, बिजली-पानी की अन्य नगरों की तुलना में अधिक और अच्छी व्यवस्था, हरिद्वार शहर को बचाते हुए दो-दो बाईपास मार्गों का निर्माण, सुविधायुक्त रेलवे स्टेशन, एक दर्जन से अधिक पक्के पुलों का निर्माण जिलमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण सहारनपुर-बिजनौर जिलों को जोड़ने वाला गंगा पर निर्मित चण्डीघाट पुल तथा लक्सर पुरकाजी मार्ग पर रेलवे का पुल है, गंगनहर के किनारे पूरे शहर की लम्बाई में फैले 15 किलोमीटर से अधिक पक्के घाट आदि अनेक ऐसी उपलब्धियां गिनवाई जा सकती हैं जो पिछले डेढ़-सौ वर्षों में इन्हीं महापर्वों के बहाने मुझे हासिल हुई हैं। उपलब्धियोें का यह इतिहास ही वस्तुतः कुम्भ के पिछले डेढ़ सौ वर्षों का इतिहास है।

लेकिन कुम्भ के अवसर विकास और उपलब्धियों के साथ-साथ कभी-कभी दुखद भी हो गए हैं। सारे देश से लाखों लोगों के एक साथ इस छोटी-सी जगह में आ जाने के कारण और तत्कालीन असुविधाओं के कारण कुम्भ मेलों में दुर्घटनाएं भी हुई और बीमारियां भी फैली जिनमें अनेक लोगों की जानें गई हैं।

सन् 1962 के टैªफिक सुधारों के बाद 1986 के कुम्भ को छोड़ दे तो सभी कुम्भ-अर्द्धकुम्भ प्रायः निर्विघ्न ही सम्पन्न होते रहे है, पर आबादी की वृद्धि और विभिन्न निर्माण कार्य लगातार होने से मेरे कुम्भक्षेत्र में स्थान का अभाव बढ़ता गया है। इस अभाव ने कुम्भ जैसे विराट जनपर्वों के सफल संचालन में असुविधा ही पैदा की है। आजादी के बाद हरिद्वार की जनसंख्या में भी भारी वृद्धि हुई है। व्यवसाय बढे़ हैं, उद्योग पनपे हैं और हजारों की संख्या में निर्माण हुए हैं। परिणामस्वरुप भूमि कम होती चली गई है। उन्नीसवी शताब्दी के अंत में जिस हरिद्वार की जनसंख्या मात्र पांच हजार थी वही इक्कीसवीं शताब्दी के आरम्भ में सवा लाख से उपर हो रही हैं। इतने लोंगों के रहने और काम करने के लिए अधिक भूमि की आवश्यकता है।

Advertisement