October 25, 2020
अमृतपर्व कुम्भ का इतिहास और ज्योतिष प्रमाण

अमृतपर्व कुम्भ का इतिहास और ज्योतिष प्रमाण

महाकुम्भपर्व का आयोजन आध्यात्मिक चेतना का यह महापर्व अपने देश की सामाजिक सांस्कृतिक अवधारणाओं का मूर्त रूप है। यह प्राचीनतम लोकपर्व राष्ट्र के समन्वयात्मक सांस्कृतिक जीवन का व्यावहारिक आधार है। इस पर्व से राष्ट्रीयता का भाव सुदृढ़ होता है। अमृतपर्व कुम्भ ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के विचारपक्ष को अग्रसर करता हुआ ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ में तदाकार हो जाता है चिरपुरातन से ही इसकी गौरव गरिमा अक्षुण्य है।

इसकी ठीक-ठीक शुरूआत का अनुमान लगाना कठिन है। आर्षसाहित्य के मर्मज्ञों एवं इतिहास विशेषज्ञों के इस विषय पर अलग-अलग मत हैं। श्रीमद्भागवत पुराण के सागरमन्थन प्रसंग में कुम्भ का उल्लेख मिलता है। इस विवरण के अनुसार सागर से चैदह रत्न निकले। ये थे-कालकूट-विष, कमधेनु, कल्पवृक्ष, कौस्तुभमणि, उच्चैःश्रवा-अश्व, ऐरावत-गज, रम्भा-अप्सरा, सुरा, लक्ष्मी, चन्द्रमा शर्ड़ग्धनुष, धनवन्तरी, पांचजन्य, शंख, एवं अमृत कुम्भ जनकल्याणार्थ भगवान सदाशिव कालकूट स्वयं पी गए

विश्वमोहनी बने विष्णु ने अमृत देवताओं को पिला दिया। हालाँकि यहाँ पुराणों में मतान्तर मिलता है। वामन पुराण के विवरण अनुसार,आचार्य बृहस्पति का संकेत पाकर इन्द्र का पुत्र जयन्त अमृत कुम्भ लेकर भाग गया। मोहान्ध दैत्यगणों ने उसका पीछा किया। फिर लगातार बारह वर्षों तक दैत्यों और देवताओं के बीच घनघोर युद्ध चला। युद्ध के समय जयन्त के हाँथों पकड़े अमृतकुम्भ से त्रिलोक के बारह स्थानों पर अमृत की बूंदे गिरी थीं। इनमें से आठ स्थान देवलोक और चार स्थान पृथ्वीलोक में अवस्थित हैं। पृथ्वी के चार स्थान हैं-हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन, और नासिक।

Advertisement

पुराणों में वर्णित एक अन्य कथा के अनुसार पक्षिराज गरूड़ अपनी माता विनिता को सर्पों की माता कद्रू की कैद से छुड़ाने के लिए शर्त के अनुसार स्वर्ग से अमृतकुम्भ लाए थे। उन्होंने सर्पों को अमृतकुम्भ सौंपकर अपनी माता को मुक्त कराया, परन्तु सर्प इसे पी पाए, इन्द्र इसके पहले ही वापस ले गये। इसी समय कुम्भ से अमृत की चार बूँदें पृथ्वी के चार स्थानों पर गिरी कालान्तर में इन्हीं चार स्थानों को कुम्भ पर्व के आयोजनों के लिए पवित्र माना गया।

वायु पुराण और नारदीय पुराण में सरस्वती नदी के तट पर स्थित कुम्भ और श्री कुम्भ तीर्थ का वर्णन किया गया है। वेदों की कई ऋचाओं में कुम्भ घट कलश के संदर्भ में अनेको आख्यान मिलते हैं। ऋग्वेद और अथर्ववेद में घृत और मधुपूरित कुम्भ का उल्लेख मिलता है। कालिदास ने ‘कांचन कुम्भ तीर्थ’ कहकर कुम्भपर्व की प्राचीनता एवं महत्ता प्रतिपादित की है। अथर्ववेद के एक मंत्र में कुम्भ के गुह्य अर्थ का प्रतिपादित हुआ है-

पूर्णः कुम्भोधि काल आहितस्तं, वै पश्यामो बहुधा नु सन्तः।
स इमा विष्वा भुवनानि प्रत्यड्. कालं तमाहुः परमे व्योमन्।।अथर्ववेद 15/53/3

अर्थात् एक कुम्भ काल के ऊपर भरा रखा है, हम उस घडे़ को विविध दृष्टियों से देखते हैं। वह घट सभी सत्तावालों के सम्मुख चलता है। उस काल को बुद्धिमान लोग अति ऊँचे सुरक्षित स्थान में बताते हैं। ऋग्वेद की एक ऋचा के अनुसार इन्द्र अपने बल से नवघट की तरह मेघों का भेदन करते हैं। यहाँ इन्द्र को सूर्य या विद्युतरूप मे व्यंजित किया गया है। इसका आशय यह है कि शरीररूपी घट में आत्मरूपी अमृततत्व रहता है। परन्तु इसे असद्भाव, लोभादि वृत्तियाँ आच्छादित किए रहती हैं, इसी कारण मानव अमृततत्व पाने से वंचित रहता है।

Advertisement

किन्तु विचारवान एवं विवेकी पुरूष शरीर रूपी घट में निहित ब्रह्मतत्व का साक्षात्कार नारायण रूपी महासागर में व्याप्त अमृततत्व से करते रहते हैं। सन्त कबीर ने ठीक इसी तरह कहा है-

जल में कुम्भ, कुम्भ में जल है, बाहर भीतर पानी।

फूटा कुम्भ जल जलहिं समाना, सन्तो यह अकथ कहानी ।।

 

अमृतपर्व कुम्भ का इतिहास

लिपिबद्ध प्रमाणों के अनुसार कुम्भ पर्व इतिहास के मध्यकाल में अपने पूर्ण विकसित रूप में था। इतिहासकार जदुनाथ सरकार के अनुसार सन् 1235 ई.में नागा संन्यासियों ने जोे निर्णायक विजय प्राप्त की थी, वह कुम्भ के अवसर पर थी, 17वीं शताब्दी के फारसी के धार्मिक ग्रन्थ ‘द बिस्तान ए मुजाहिब’ में भी 1640 ई. में हुए एक भीषण युद्ध का वर्णन है-जो कुम्भ के अवसर पर ही हुआ था।

Advertisement

एशियाटिक रिसर्चेज के छठवें खण्ड में कैप्टन टामस हार्डविक ने भी सन् 1796 ई. में आयोजित हुए हरिद्वार कुम्भ मेले का जिक्र किया है पहले भी ऐतिहासिक दस्तावेजों में सन् 1398 में हरिद्वार के कुम्भ मेले का विवरण मिलता है, जिसमें विदेशी आक्रान्ता तैमूर लंग ने भारी लूट-पाट की थी।

संतो के अखाड़े ही है, भारतीय संस्कृति के रक्षक

प्रयाग में कुम्भ महापर्व का उल्लेख चैतन्य महाप्रभु के जीवनवृत्त से ज्ञात होता है। इतिहासकारों के अनुसार सन् 1514ई. में चैतन्य महाप्रभु स्वयं प्रयाग के कुम्भ मेले में उपस्थित हुए थे। 15वीं शताब्दी के सरस्वती गंगाधर की मराठी पुस्तक ‘गुरूचरित्र’ में नासिक में आयोजित होने वाले कुम्भ मेले का विस्तृत विवरण मिलता है।

Advertisement

नासिक से ही प्राप्त एक ताम्रपात्र में नासिक में आयोजित होने वाले कुम्भ महापर्व का विवरण प्राप्त होता है। मध्यकालीन इतिहास के विशेषज्ञ बताते हैं कि अकबर बादशाह ने कुम्भ के महोत्सव पर तीर्थयात्रियों पर लगने वाले जजिया कर को सन् 1564 ई. में उठा लिया था। उन दिनों भारत के विभिन्न क्षेत्रों से लाखों की संख्या में धर्मप्रिय जनता हरिद्वार प्रयाग उज्जैन एवं नासिक में आयोजित होने वाले कुम्भ मेलों में भाग लेती थी।

बाद के समय में औरंगजेब ने हरिद्वार में पड़ने वाले कुम्भ के पहले ही सन् 1678-79 में जजिया कर पुनः लगा दिया था।

ऐतिहासिक विवरणों में कई प्रख्यात व्यक्तियों के भी महाकुम्भ पर्वों पर आने एवं आयोजन में सम्मिलित होने का उल्लेख मिलता है। जगद्गुरू शंकराचार्य एवं समर्थगुरू रामदास के कुम्भ पर्व में सम्मिलित होने के बारे में इतिहासकार सांकेतिक विवरण देते हैं। सन् 1678 ई. में हरिद्वार महाकुम्भ पर्व पर प्रणामी सन्त महामति प्राणनाथ पधारे थे। यहीं पर उन्होंने विद्वानों से शास्त्रार्थ करके निष्कलंक बुद्ध की पदवी प्राप्त की थी।

Advertisement

आर्यसमाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द ने हरिद्वार महाकुम्भ के अवसर पर ही अपनी पाखण्ड खण्डिनी पताका फहराई थी। सन् 1915 में हरिद्वार के महाकुम्भ के अवसर पर महात्मा गाँधी जी भी स्वामी श्रद्धानन्द के साथ सम्मिलित हुए थे। देशभक्तों के महामिलन का यह अनोखा अवसर था। इसी अवसर पर इतिहास की धारा को मोड़ने वाले अनेकों विचार पुष्पित-पल्लवित हुए।

अमृतपर्व कुम्भ का ज्योतिष प्रमाण

ज्योतिषीय परम्पराओं में कुम्भ पर्व को कुम्भ राशि और कुम्भ योग से जोड़ा गया है। कुम्भ योग चार प्रकार का होता है। विष्णु योग के अनुसार जब बृहस्पति कुम्भ राशि में होता है और सूर्य मेष राशि में प्रविष्ट होता है तो कुम्भ पर्व हरिद्वार में लगता है। जब बृहस्पति मेष राशि चक्र में प्रवेश करता है और सूर्य तथा चन्द्रमा मकर राशि में, माघ अमावस्या के दिन होते हैं, तो कुम्भ का आयोजन प्रयाग में किया जाता है।

सूर्य एवं बृहस्पति सिंह राशि में प्रकट होने पर कुम्भ पर्व नासिक में गोदावरी तट पर लगता है। बृहस्पति कुम्भ राशि में होने पर उज्जैयिनी में कुम्भ का आयोजन होता है। इस प्रकार हरिद्वार में कुम्भ पर्व की महत्ता सर्वाधिक है, क्योंकि बृहस्पति के कुम्भ राशि में होने का श्रेय यहीं के आयोजन को प्राप्त है। 1695 ई. में रचित ‘सलासतुत तवारिसं’ में भी इसी तरह का उल्लेख है।

Advertisement

इस विवरण के अनुसार 12वें वर्ष जब बृहस्पति कुम्भ राशि में प्रविष्ट होता है और सूर्य मेष राशि में तब भारी संख्या में लोग हरिद्वार में इकट्ठे होकर पवित्र धार्मिक स्नान करते हैं और तत्वज्ञानियों से ज्ञानामृत का पान करते हैं।

कुम्भ पर्व अपने चरित्र और उद्भव में गंगानदी से भावपूर्ण संबद्ध है। गंगा परब्रह्म की प्रतिनिधि है। तत्वदर्शी उसे ब्रह्मा, विष्णु और महेश की समष्टिरूपा कहते हैं। भारतीय संस्कृति गंगाजल को देवत्व और शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करती है। गंगाजल अमरत्व का कोश है, तो कुम्भ अमृत पर्व है।

वस्तुतः वे चार स्थान जहाँ पौराणिक आख्यानों के अनुसार, अमृत कुम्भ से अमृत की बूँदें गिरी थीं, मूल रूप से सुसरिता गंगा से ही जुड़े हुए हैं। हरिद्वार एवं प्रयाग गंगा के तट पर अवस्थित हैं। नासिक गोदावरी के किनारे बसा है। ब्रह्मपुराण की मान्यता है कि विन्ध्य पर्वत के दक्षिण में गंगा का नाम गौतमी व गोदावरी पड़ा। इसी प्रकार का मत उज्जैन में क्षिप्रा नदी के विषय में भी है।

Advertisement

क्षिप्रा नदी उत्तर प्रवाह के कारण पवित्र हो जाती है। स्कन्दपुराण के एक विवरण के अनुसार क्षिप्रा उस स्थान से पूर्व वाहिनी हो जाती है, जहाँ वह एक बार गंगा द्वारा आलिंगन बद्ध हुई थी। इस तरह कुम्भ तमाम रूपों में किसी न किसी प्रकार गंगा से सम्बन्धित मिलता है। गंगाद्वार होने के कारण हरिद्वार के महाकुम्भ पर्व का वैशिष्ट्य अपने ढंग का और अनोखा है।

कुम्भ की पौराणिकता, इतिहास क्या है? और कुम्भ तथा सिंहस्थ में क्या अंतर है?

पुराणों में हरिद्वार का गंगाद्वार; हिम प्रदेश और मायापुरी के नाम से उल्लेख किया गया है। यह मायापुरी, अयोध्या, मथुरा, काशी, कांची, पुरी एवं अवन्तिका आदि छह अन्य पवित्र पुरियों से श्रेष्ठ एवं पवित्रतम मानी गयी है। पौराणिक कथा-गाथाओं के अनुसार, हरिद्वार लोक प्रसि( महर्षियों की तपस्थली है। कहा गया है कि कश्यप, अत्रि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि, भारद्वाज आदि सप्तऋषि यहीं तप करते थे।

Advertisement

वायुपुराण के अनुसार, गंगा ने सप्तऋषियों को तप करते देखा और असमंजस में पड़ीं कि उन्हें कष्ट देने से कैसे बचा जाय? अन्ततः गंगा सात धाराओें में विभक्त हो गयीं। इसलिए इसे सप्तऋषि क्षेत्र भी कहा जाता है, जिसका गौरव अद्यावधि अक्षुण्ण है।

महायोगी गोरखनाथ का भी हरिद्वार में उग्र तप करने का उल्लेख मिलता है। वैराग्य शतक के रचनाकार योगी भर्तृहरि ने भी यहीं कठोर तप-साधना सम्पन्न की थी। भगवान दत्तात्रेय ने भी इसी स्थान पर तप और योग की अलौकिक साधनाएँ पूरी कीं। शास्त्रकारों ने इसकी महत्ता प्रतिपादित करते हुए लिखा है-

सहस्त्रं कार्तिके स्नानं माघे स्नानिशतानि च।
वैशाखे नर्मदा कोटि कुम्भस्नानेन तत्फलम्।।

यानि कि कार्तिक मास के एक हजार स्नान, माघ मास के सौ स्नान, वैशाख मास के करोड़ों स्नानों का फल कुम्भ के एक स्नान के फल के बराबर होता है।
एक अन्य स्थान पर कहा गया है-

Advertisement

अश्वमेध सहस्त्राणि वाजपेयशतानि च।
लक्षं प्रदक्षिणा भूमेः कुम्भ स्नानेन तत्फलम्।।

अर्थात् एक हजार अश्वमेध यज्ञ, सौ वाजपेय यज्ञ तथा एक लाख बार धरती की परिक्रमा करने से जो पुण्य फल होता है वह कुम्भ स्नान करने से हो जाता है। प्रयाग में कुम्भ महापर्व का उल्लेख चैतन्य महाप्रभु के जीवनवृत्त से ज्ञात होता है।