October 31, 2020
कुम्भ और अर्ध कुम्भ

कुम्भ और अर्ध कुम्भ

क्या हैं-कुम्भ और अर्धकुम्भ? जाकी रही भावना जैसी के अनुसार और हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता की भांति बहुआयामी, बहुरंगी और बहुरूपी महापर्व है, कुछ इसे मेला भी कहते हैं और कुछ वृहद आयोजन या समागम भी।

कुम्भ और अर्धकुम्भ के समय धार्मिक श्रद्धालुओं को विशिष्ट नक्षत्रों के पुनीत संगम पर पतित पावनी माँ गंगाश्री में शु( अन्तःकरण से डुबकी लगाने से मोक्ष का मार्ग दीख जाता है, बौद्धिक जिज्ञासुओं को सन्तों, महात्माओं और विद्वानों के सम्पर्क से चर्चा अथवा बातों के माध्यम से अपनी अतृप्त ज्ञान-पिपासा को शान्त करने का सुअवसर मिल जाता है, सतत यायावरों के लिए अनन्त पथ की यात्राओं के द्वार खुल जाते हैं और प्रखर राष्ट्रवादियों के लिए राष्ट्रीय एकता, राष्ट्र भक्ति और राष्ट्रार्पण की अनुपम त्रिवेणी बहने लगती है जिसमें अवगाहन करके राष्ट्रीय एकात्मता और भी सशक्त रूप में प्रकट हो जाती है।

कुम्भ और अर्धकुम्भ अत्यंत अनुपम

कुम्भ और अर्धकुम्भ को किसी भी दृष्टि से क्यों न देखा जाए ये अत्यन्त ही अनुपम, अनूठे, अद्भुत, अनुपमेय और अतुलनीय समागम हैं, दृष्टि चाहे ऐतिहासिक हो या सांस्ड्डतिक, धर्मिक हो या सामाजिक अथवा राष्ट्रीय हो या अन्तर्राष्ट्रीय।

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कुम्भ और अर्ध कुम्भ

कुम्भ और अर्धकुम्भ ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यन्त ही प्राचीन हिन्दू-समागम हैं, सांस्ड्डतिक दृष्टि से आस्थाओं, मान्यताओं और विश्वासों के अत्यन्त ही महत्वपूर्ण प्रतीक हैं, धार्मिक दृष्टि से पवित्रता, दिव्यता और मोक्ष प्रदत्तता के अत्यन्त ही आवश्यक मेले हैं और राष्ट्रीय दृष्टि से वर्ण और क्षेत्रीय भेदोपभेदों से ऊपर उठे सर्वमतसमभाव, सार्वभौमिता और सार्वदेशिकता के अत्यन्त ही व्यापक प्रदर्शन है।क्यों हैं?

ये भारत के ऐसे पुरातन पर्व हैं जिनके आयोजन का समय ;बृहस्पति, सूर्य, चन्द्र और शनि नक्षत्रों का विशेष स्थिति में होनाद्ध, काल ;क्रमशः 12 और 6 वर्षद्ध और स्थान ;हरिद्वार, उज्जैन, नासिक और प्रयागराजद्ध हजारों-हजारों वर्ष पूर्व ही पौराणिक गाथाओं के आधार पर ज्योतिष शास्त्र की दृष्टि से निर्धारित किए जा चुके हैं। ये वृहद समागम देश, धर्म और समाज में व्याप्त दुष्प्रवृत्तियों का विनाश करके धर्म की स्थापना करने के लिए ही होते हैं।

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ऐसे अवसरों पर विरासत का लेखा-जोखा

ऐसे अवसरों पर महर्षियों और तत्वज्ञों द्वारा धार्मिक विरासत का लेखा-जोखा लेकर, सांस्ड्डतिक विचारों को सुदृढ़ता प्रदान करके उनके विस्तारण की योजना बनाकर, सामाजिक ढांचे में कालान्तर में उद्भूत विभिन्न अनियमितताओं, अतिवादों और अस्वाभाविक प्रवृत्तियों को धर्मदण्ड के भय से नियंत्रित कर, साहित्यिक रचनाओं में बिम्बों, प्रतीकों और उदाहरणों के माध्यम से प्रकृति-परमेश्वर के नए-नए रहस्यों का उद्घाटन कर आध्यात्मिक मनीषा को प्रकट किया जाता रहा है। सत्ता और जनता को नियंत्रित किया जाता रहा है और उन्हें एकता, अखण्डता और महानता का ज्ञान कराया जाता रहा है।कैसे हैं?

कुम्भ और अर्ध कुम्भ

कुम्भ प्रतीक है जल का, जल प्रतीक है जीवन का, जीवन प्रतीक है गति का और गति प्रतीक है गंगा की धारा का। ‘गुगच्छति इति गंगा’- गंगा गतिमान है। गंगा का सतत गतिमान रहना ही अमरता है। गंगा और कुम्भ दोनों ही अमरता प्रदान करने वाले हैं।

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कुम्भ और अर्धकुम्भ के अवसरों पर ऐतिहासिक तथ्यों की खोज, सांस्ड्डतिक स्थलों के उत्खनन, धार्मिक आयोजनों की पुनव्र्याख्या करके उनके पुनप्र्रतिष्ठापन की प्रक्रिया का प्रारम्भ, प्रकृति के अनखुले पन्नों का अनावरण और अन्धकार में आवृत वातावरण को स्पष्ट करने आदि के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाते रहे हैं जिनके माध्यम से देश, धर्म और समाज को सदा ही नई राह दिखाई जाती रही है।