कुम्भ आसुरी प्रवृत्तियों पर विजय का पर्व है

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कुंभ विश्व का विराट पर्व है जो तब से चला आता है जब मानव ने विधिवत् लिखना भी नहीं सीखा था। स्वाभाविक है कि ऐसे पर्व को केवल समाज की स्मृति ने ही जीवित रखा है। भारतीय समाज और कुंभ का साथ अनादि काल से ही है। तभी बिना किसी विज्ञापन के करोडों लोग अपनी अंतर की प्रेरणा से ही वहाॅं पहुँच जाते हैं जहाॅं कुंभ लगना होता है। इसे आधुनिक इतिहास की सीमित परिधि में बांधना व्यर्थ ही है। इतिहास लेखन मानव विकास की हाल ही की घटना है। एतिहासिक काल संसार की रचना काल का एक बहुत ही छोटा अंश होता है।

इस की प्राचीनता को समझने और महसूस करने के लिए हमारे लिए इतना ही पर्याप्त है कि यह आदि काल से ही नदियों के किनारे लगता रहा है जिनमें गंगा सब से महत्त्वपूर्ण रही है। कुंभ नक्षत्रों की गति और स्थिति के अनुसार आयोजित होता है। इसलिए कुंभ केवल इस धरती पर होने वाली घटनाओं के आधार पर ही आयोजित नहीं होता अपितु आकाशीय गतिविधियों पर भी निर्भर होता है। इसलिए कुंभ न केवल एक सार्वभौमिक पर्व है अपितु यह हमारे प्राचीनतम सांस्कृतिक प्रतीकों से जुड़ा है।

देवासुर संग्राम भारतीय पुरागाथाओं में युगारम्भ से भी प्रचीन है जो मानव जीवन की दो प्रवृत्तियों के बीच संग्राम की स्वाभाविक प्रक्रिया की द्योतक है। मानव और पशु के बीच अंतर केवल इतना है कि सामान्य पशु अपनी सामान्य आवश्यकताओं के अतिरिक्त कुछ और नहीं सोच सकता है। उन के आपसी व्यवहार नैसर्गिक हैं जिन्हें प्रकृति ने जन्म से ही उन में डाल दिया है। लेकिन मानव इस से आगे भी सोचता है और अपने और दूसरों के लिए अच्छे और बुरे का चुनाव कर सकता है।

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यही शुभ और अशुभ के बीच अंतर करने का सिद्धांत ही प्रतीकात्मक रूप से सुरासुर संग्राम का वास्तविक अर्थ है। सुर और असुर हर मानव के भीतर होते हैं। जिस प्रवृत्ति को हम पालते रहेंगे वही सबल होगी और वैसा ही स्वभाव हमारा बन जाएगा। इस संदर्भ में एक प्राचीन कथा है।

आसुरी प्रवर्त्तीयाँ और दो भेड़ियों की प्रवत्तियाँ

एक बूढ़ा व्यक्ति अपने पौते-पौतियों को कहानी सुना रहा था। कहानी अपने बारे में थी। उस ने कहा कि मेरे भीतर दो खूंखार भेड़िए लगातार लड़ते रहते हैं। एक भेड़िया हिंसा एक प्रतिशोध, अत्याचार और झूठ का है और दूसरा शांति, अहिंसा, न्याय और सहानुभति का है। एक बच्चे ने पूछा दादाजी इन में से कौन जीतेगा? दादाजी बोले बेटा वही जीतेगा जिसे मैं पालता रहॅूंगा। लेकिन दादा जी वह हमारे भीतर क्यों नहीं है? दूसरे ने पूछा। दादाजी बोले, इसलिए कि तुम अभी छोटे हो, आसुरी शक्तियों से तुम्हारा वास्ता नहीं पड़ा है।

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जिस बात को बूढ़े दादा ने दो भेड़ियों के प्रतीक से समझाने का प्रयास किया उसी बात को हमारे पूर्वजों ने देव और दानव के रूप में समझाने का प्रयास किया है।देवासुर संग्राम में दोनों समूहों के बीच संग्राम एक अमृत कलश के लिए होता है। जो इस अमृत को पाएगा वह अमर हो जाएगा। इस लिए सुर और असुर इस कलश को छीनने का प्रयास करते हैं। लेकिन वह मिलता है सुरों को। वास्तव में अमृत भी एक प्रतीक ही है। भारतीय संस्कृति में अमर तो केवल आत्मा होती है। आत्मा कोई स्थूल वस्तु नहीं होती। यह उसी परमात्मा का अंश होता है जो इस भौतिक जगत का मूल स्वरूप है। इसलिए अमृत कोई भौतिक वस्तु नहीं जिस के लिए छीना झपटी होती रहे। अगर सुर और असुर प्रवृत्तियाॅं हैं तो अमृत भी जीव की एक अवस्था ही होगी जिसे प्राप्त करना मानव का सर्वोच्च लक्ष्य होगा।

जिस प्रचीन समाज ने सर्व ब्रह्मांड को शिव और पार्वती की ही लीला माना हो उस के लिए आम जन को समझाने का सरल और बोधगम्य माग्र्र इन्हीं प्रतीकों का रहा होगा। कुंभ इस भौतिक संसार के आरम्भ और उस में मानव सभ्यता के अंकुरित होने की कथा को दुहराता है। इस से जुड़े अनेक प्रसंग और कार्यक्रम समय-समय पर जुड़ते रहे। यह भी मानव स्वभाव ही होता है कि वह पहले से चले आ रहे कार्यक्रम में लगातार नवीकरण करता रहता है।श्शाही स्नान जैसे कार्यक्रमों से लगता है कि इस में वर्णों का काफी महत्त्व रहा होगा, लेकिन कुंभ आरम्भ से ही सम्प्रदाय विहीन पर्व रहा है।

विशाल जन समुदाय को देखते हुए सन्यासियों को प्राथमिकता देने की प्रथा एक कुशल प्रबंधन के कारण हुआ नवीकरण रहा होगा, इस का किसी वर्ण या जाति के साथ कोई सम्बंध नहीं लगता। कुंभ का संदेश मानव स्वभाव में लगातार देवत्त्व जगाए रखना ही हैै और यही देवत्त्व अमृत्त्व होता है। अमृत्त्व किसी व्यक्ति को केवल तभी मिलता है जब वह अपनी भौतिक आकांक्षाओं से मुक्त होने की स्थिति में पहॅुंच जाए। इसलिए प्रतीकात्मक रूप से वह केवल देवों को मिला जिन में अपनी कामनाओं को नियंत्रित करने की क्षमता है।

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कुंभ के माध्यम से हम इस ब्रह्मांड की रचना और मानव मन निम्न से उच्च की ओर जाने की यह कथा बार-बार दोहराते रहते हैं ताकि हमें याद रहे कि इस भूलोक से मुक्ति के लिए इस लोक में हमें अपनी परीक्षा देनी होती है और उस में उत्तीर्ण भी होना होता है।

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