कब तक चलेगी अपने समाज से झूठ बोलने की राजनीति

कब तक चलेगी अपने समाज से झूठ बोलने की राजनीति

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इन दिनों विश्व के अनेक देशों में शासक लोग अपने समाज से सच छुपाते और झूठ बोलते हैं परंतु ऐसा शासन अधिक दिन नहीं टिक पाता। वस्तुतः वर्तमान के किसी भी शासकीय ढांचे को लंबे समय तक टिके रहने का कोई अनुभव प्राप्त है या नहीं, यह महत्वपूर्ण है। इस दृष्टि से देखें तो सर्वाधिक दीर्घ काल तक टिके रहने वाला राजकीय ढांचा तो हिन्दू शासन का ही रहा है। जहां एक-एक राजवंश शताब्दियों तक शासन करता रहा है। उसके बाद यूरोप में ऐसा ढांचा इंग्लैण्ड का है। जहां एक ही राजवंश विगत कुछ शताब्दियों से शासन में है।

इसके बाद अगर कोई अनुसरणीय राजकीय ढांचा है तो वह संयुक्त राज्य अमेरिका का ही हो सकता है परंतु वह अभी परीक्षण के दौर में है और उसके टिके होने को लेकर भांति-भांति के संदेह व्यक्त किये जाते हैं। परंतु तब भी वहां की मुख्य विशेषता यह है कि सच्चे अर्थों में लोकतांत्रिक चेतना शासकों ने फैलायी हैं और वहां व्यापक झूठ चल नहीं पाता।

इससे उलट, अस्थायी और भंगुर ढांचा कम्युनिस्टों का है। जिन्होंने समाज पर नियंत्रण के पक्के प्रबंध किये परंतु विश्व इतिहास से कुछ भी नहीं सीखा। उसके स्थान पर 19वीं शताब्दी ईस्वी के उत्तरार्द्ध में भौतिकी के क्षेत्र में हुई प्रगति से प्रेरणा लेकर मनुष्यों को भी अन्य प्राकृतिक उपादानों की तरह नियंत्रण योग्य मान लिया और यह समझा कि जैसे मशीनें चलाई जाती हैं, वैसे ही समाज को भी चलाया जा सकता है। बस, उसके अलग-अलग कलपुर्जों की बारीकी से जानकारी होनी चाहिये। विचारधारा पर आधारित सभी राजनैतिक दल इसी प्रकार के सोच का परिणाम हैं।

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इस सोच के अनुसार सोवियत संघ में कम्युनिस्टों ने पार्टी का अद्भुत ढांचा फैलाया और दो करोड़ लोग सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बना लिये। जासूसी और नियंत्रण का विकराल ढांचा बनाया और हर नागरिक के जीवन को नियंत्रित कर लिया। परंतु वह ढांचा थोड़े से जागृत अंतश्चेतना वाले संकल्पवान लोगों ने बिखरने को मजबूर कर दिया। चीन में अभी वही ढांचा चल रहा है। थियेनमन चौक में जो हजारों विद्यार्थियों को चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के शासन ने भून डाला था, वह तथ्य इस तरह चीन के भीतर छिपाया गया कि अभी आज तक अधिकांश चीनी युवा उस हत्याकांड के विषय में नहीं जानते।

कम्युनिस्टों से प्रेरणा लेकर भारत में भी विचारधारा आधारित दल बने हैं। यह विचारधारायें अपनी परंपरा और संस्कृति तथा शिक्षा और अपने शास्त्रों से अनजान कुछ नये पढ़े लिखे लोगों के द्वारा यूरोप के किसी न किसी मतवाद के अनुसरण में रची जाती हैं और इनमें सामान्यतः हिंदू होने के नाते कतिपय हिंदू संस्कार और हिंदू पदावली मिला दी जाती है। इस सब का प्रयोजन अपने ही समाज को छलना होता है।

पहले प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू ने यही किया। उन्होंने सोवियत संघ से और ब्रिटिश ढांचे से दोनों से प्रेरणा लेकर कतिपय व्यवस्थायें रचीं। परंतु साथ ही अपने दल के सदस्यों से स्वयं को पंडित जी प्रचारित होने दिया और ब्राह्मणों के प्रति हिन्दू समाज में व्याप्त सम्मान का भरपूर लाभ उठाया। उधर अपने समाज के बीच झूठ फैलाने की पराकाष्ठा कर दी। इसके कुछ उदाहरण हम यहां लेंगे:-

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1. कांग्रेस की राजनीति मैं फस रहे हैं पंडित जी

कांग्रेेस के लोगों ने प्रचारित किया कि पंडित जी की दुनिया भर में तूती बोलती है और सारा संसार उनका सम्मान करता है। परंतु स्थिति क्या है? संयुक्त राष्ट्र संघ में कुल छः भाषायें अधिकृत भाषाओं के रूप मे स्वीकृत हैं:- इंग्लिश, फ्रेंच, स्पेनिश, रूसी, चीनी और अरबी। 1945 ईस्वी में संयुक्त राष्ट्र संघ का चार्टर बना जो अंग्रेजी, फ्रेंच, स्पेनिश और चीनी भाषा में था। चीनी भाषा में क्यों था? जबकि तब तक तो चीन बड़ी दीन-हीन दशा में था और वहां तब तक कम्युनिस्ट पार्टी शासन में नहीं थी। फिर क्या कारण था? 19वीं शताब्दी ईस्वी से चीन में ईसाई मिशनरियों का जाल बिछ गया था।

इस पर चीन के जो परंपरागत मार्शल आर्ट के योद्धा थे उन्होंने इसका प्रतिरोध किया। बदमाशी करने वाले पादरियों को जगह-जगह पीटा गया और फिर सभी ईसाई देशो के दूतावासों को बीजिंग में घेर लिया गया।

लगभग 1 लाख योद्धा तैयार हुये और सभी ईसाई मिशनरियों को जिन्होंने मांचू शासन से अनुमति प्राप्त कर अपने धंधे की रक्षा के लिये चीनियों के रक्षा दल गठित किये थे और उन्हें भय तथा प्रलोभन के द्वारा तेजी से ईसाई बना रहे थे, देश से मार कर भगाने की तैयारी की। इस पर अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस, स्पेन, हालैंड, पुर्तगाल और जर्मनी की संयुक्त सेना जर्मन सेनापति अल्फ्रेड ग्राफ वाल्डर सी के नेतृत्व में गठित की गई और दो लाख ईसाई सैनिक चीन में आकर चीनी मार्शल योद्धाओं से लड़ने लगे तथा अंत में विजयी हुये और फिर जितने चीनी योद्धा बच रहे थे ,,उनको मांचू शासकों के सामने ही फांसी पर लटका दिया जिससे

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कि चीनियों में भय पैदा हो।इसके साथ ही क्षतिपूर्ति के रूप में करोड़ों टन शुद्ध चांदी मांचू शासकों से किश्तों में वसूल करने की संधि हुई और कहा यह गया कि यह रकम चीन के छात्रों को शिक्षा और छात्रवृत्ति देने के काम में आयेगी। चीनी छात्र शिक्षा के लिये अमेरिका जाने लगे और वहां से ईसाइयत तथा कम्युनिज्म में दीक्षित होकर लौटे। ईसाइयत से प्रभावित लोगों ने सन यात सेन और चांग काई शेक के नेतृत्व में नेशनलिस्ट पार्टी बना ली और कम्युनिज्म से प्रभावित लोगों ने कम्युनिस्ट पार्टी बना ली। दोनों ही धड़ों को अमेरिकी गुप्तचर एजेंसी सी.आई.ए. संरक्षण और पोषण दे रही थी।

कब तक चलेगी अपने समाज से झूठ बोलने की राजनीति

भारत में भी ऐसे ही प्रयास किये गये थे परंतु हिंदू धर्म तथा हिंदू संस्कृति की गहरी जड़ों और हिंदू वीरता के कारण ईसाई मिशनरियों की योजना सफल नहीं हुई थी और अंततः उन्हें दोनों ही महायुद्धों में भारतीय (हिन्दू) सेनाओं का ही सहारा लेना पड़ा। इससे जहां युद्ध में उन्हें जीत प्राप्त हुई ,वहीं उन लोगों के मन में यह भय भी पैदा हो गया कि इतनी सुदृढ़ सेना कभी भी हमें उखाड फेंक सकती है।

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विशेषकर नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के प्रति भारतीय सेना में उपजी निष्ठा और लोकप्रियता की सूचना स्वयं गांधीजी ने वायसराय को दी और जब वायसराय ने इस पर चिंता जतायी कि आप जैसा अहिंसक व्यक्ति इसकी काट नहीं कर पा रहा है तो गांधीजी ने कहा कि मैं क्या करूं, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस को तो आज सारा देश पूजता है। इसीलिये उन लोगों ने भारत से जाना तय किया और अपने सबसे अनुकूल समूह को सत्ता सौंप गये।

परंतु भारत के प्रति उस से ही ईसाई शक्तियों में गहरा भय पैठ गया है और वे भारत की उपेक्षा करने तथा भारत के लोगों में हीनता भरकर हिन्दू समाज में विघटन फैलाने की ओर विशेष ध्यान दे रहे हैं। इसी योजना के तहत चीन को विशेष और अतिरंजित महत्व दिया जाता रहा है तथा भारत की प्रत्येक विशेषता को चीन के ऊपर मढ़ दिया जाता रहा है। ईसाइयों और कम्युनिस्टों दोनों के भारतीय एजेंट इस काम में चुस्ती से लगे हैं।

कम्युनिज्म के साथ चीन की परंपरांगत धर्मनिष्ठा को समाप्त करना होगा सरल

इसीलिये इस योजना के तहत प्रारंभ में ही संयुक्त राष्ट्र संघ में चीनी भाषा को भी स्थान दिया गया। क्योंकि ईसाइयों को यह विश्वास है कि धीरे-धीरे, विशेषकर कम्युनिज्म के फैलाव के साथ चीन के लोगों की परंपरागत धर्मनिष्ठा को समाप्त करना और ईसाइयत की ओर आकृष्ट करते जाना सरल होगा। चीन को विशेष महत्व देने का यही सोचा समझा कारण है।भारत में श्री जवाहरलाल नेहरू, जो अंग्रेजों और कम्युनिस्टों दोनों के मित्र थे, इन सब तथ्यों को भलीभांति जानते थे। परंतु अपने समाज से उन्होंने लगातार यह सत्य छिपाया।

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अगर भारत के लोगों के ध्यान में यह बात आती कि संयुक्त राष्ट्र संघ में स्पेनिश फ्रेंच और चीनी भाषायें तो अधिकृत भाषायें स्वीकृत हैं और हिन्दी नहीं है, तो भारत के लोग इस बात पर दबाव बनाते कि भारत को संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्यता तब तक स्वीकार नहीं करनी है जब तक इतने बड़े देश की इतनी बड़ी जनसंख्या की भाषा को वहां उचित मान्यता नहीं मिलती।

कब तक चलेगी अपने समाज से झूठ बोलने की राजनीति

उल्लेखनीय है कि इसके बाद 1946 में संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा में प्रस्ताव पारित हुआ कि सभी पांच भाषायें – अंग्रेजी, फ्रेंच, रूसी, स्पेनिश और चीनी अधिकृत भाषायें हैं और अंग्रेजी तथा फ्रेंच ‘वर्किंग भाषायें’ हैं। 1968 ईस्वी में रूसी को भी वर्किंग भाषा मान लिया गया। 1973 में चीनी भाषा को भी अधिकृत मान लिया गया और उसके साथ अरबी भाषा जोड़ दी गई क्योंकि दूसरे महायुद्ध में तुर्की अंग्रेजों और फ्रेंच तथा अमेरीकि सेनाओं के विरूद्ध लड़ा था और इसलिये तुर्की भाषा को तथा उससे जुड़ी सभी भाषाओं को जिनमें फारसी, कजाक, उजबेक, किर्गिज, तुर्कमान और ताजिक भाषायें शामिल हैं, तुर्की सहित सभी भाषायें संस्कृत से ही निकली हैं|

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उन सब भाषाओं को दबाकर तथा मुसलमानों की तुर्क पहचान को मिटाकर अरबी पहचान को ही बढ़ाने के अभिप्रायः से अरबी भाषा को भी संयुक्त राष्ट्र संघ में अधिकृत भाषा तथा वर्किंग भाषा दोनों बनाया गया क्योंकि अरब लोग कमजोर हैं और उन्होंने कभी भी ईसाईयों से एक भी युद्ध नहीं किया है तथा उन पर यूरोपीय देशो का पूर्ण नियंत्रण है, इसलिये अरबी भाषा को यह महत्व दिया गया है। यदि भारत में एक सक्षम शासन होता तो संस्कृत को निश्चय ही संयुक्त राष्ट्र संघ की अधिकृत और वर्किंग भाषा आरंभ से ही बना दिया जाता।

भारत की इस शक्ति को जानते हुये ही यूरोपीय ईसाई शक्तियों द्वारा भारत में संस्कृत को मृत भाषा प्रचारित करने का प्रयास हुआ और हिन्दी के विरूद्ध आंदोलन खड़े किये गये तथा ब्राह्मणों के विरूद्ध आंदोलन चलाये जा रहे हैं। जबकि हिन्दी भाषा बोलने वालों की संख्या अरबी, फ्रेंच और स्पेनिश भाषायें बोलने वालों की संख्या से बहुत अधिक है। परंतु इस सब सच्चाई को जवाहरलाल नेहरू ने अपने लोगों से अर्थात भारतीयों से छिपाकर रखा। अपने समाज से सत्य को छिपाने और झूठ को फैलाने का यह एक बड़ा दृष्टान्त है।

2. नेहरू जी की पार्टी ने भारतीय समाज से बोले थे कई झूठ 

जिस समय दुनिया में विविध राजनैतिक शक्तियां विश्व आधिपत्य की होड़ में लगी थीं और इसके लिये अधिकाधिक शस्त्रास्त्रों तथा सैन्य बल की वृद्धि कर रहीं थीं, उस समय श्री नेहरू की पार्टी ने और उनके द्वारा संचालित राज्यतंत्र ने प्रचारित किया कि संपूर्ण विश्व में शान्ति और अहिंसा का वातावरण है तथा नेहरू जी इन शक्तियों के विश्व मान्य नेता हैं।

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इसके लिये श्री विनोबा भावे को नेहरू जी ने पटाया और उन्होंने भी इसकी आध्यात्मिक व्याख्या कर दी कि विश्व में अहिंसा की शक्तियां बढ़ रहीं हैं। जबकि सत्य इससे नितांत विपरीत है और विश्व में लगातार अधिकाधिक विनाशकारी और विघातक शस्त्रास्त्रों की होड़ लगी हुई है। नेहरू जी की पार्टी ने भारतीय समाज से इतना झूठ बोला कि सैनिक अधिकारी भी शान्ति और अहिंसा की बात करते देखे जाने लगे।

कब तक चलेगी अपने समाज से झूठ बोलने की राजनीति

जबकि यूरोप और अमेरिका इन शब्दों का प्रयोग केवल कूटनैतिक प्रयोजन से करते हैं और सदा अपनी सामरिक शक्ति को बढ़ाने में लगे रहते हैं। यह तो भगवत कृपा से भारत योद्धाओं का देश रहा है इसलिये सेना और वीरता भारतीयों के रक्त में है और इसीलिये भारत की सेनाओं में वीरता निरंतर प्रवाहित रही। अन्यथा अनर्थ हो जाता और भारत भी अफीमची चीन की तरह शांति की अफीम खाकर सोता हुआ देश बन जाता, जहां ईसाइयत और कम्युनिज्म दोनों ठाठ से फैलते और इसमें मुस्लिम अलगाववाद को भी घुसपैठ का भरपूर अवसर मिल जाता।

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3. कांग्रेस के पास झूठ को छिपाने के थे अनूठे सिद्धांत

भारत में सभी प्रबुद्ध लोग जान रहे थे कि सोवियत संघ और चीन में किसानोें और विद्वानों तथा निर्दोष नागरिकों की हत्याएं हो रही हैं और करोड़ो लोग मारे जा रहे हैं तथा यह सब समाजवाद के नाम पर हो रहा है। फिर भी भारत में समाजवाद की माला जपी जाती रही। अपने समाज से सच को छुपाने और झूठ को फैलाने का यह अनूठा ही दृष्टान्त है।

4. धर्म की अधिक जानकारी के कारण मजहबी उन्माद के सामने हुआ था बटंवारा 

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नेहरूजी सहित सभी बड़े राष्ट्रीय नेताओं को अच्छी तरह पता था और पता है कि विश्व में सबसे बड़ी शक्ति धर्म या रेलिजन या मजहब की ही है। उसी के लिये जीने और उसके लिये ही प्राण दे देने के लिए विश्व में सर्वाधिक लोग तैयार होते हैं। इसी जानकारी के कारण तो उन्होंने मजहबी उन्माद के सामने सिर झुकाकर भारत का बटंवारा कर दिया था और इसी उन्माद का महत्व जानकर भारत के उत्तर-पूर्व में ईसाईयत के आगे कांग्रेस सरकारों ने सिर झुका लिया तथा वहां चर्च का राज्य फैलने दिया। परंतु हिन्दुओं के बीच शासकीय संस्थाओं और शिक्षा तथा संचार माध्यमों द्वारा लगातार यह बताया जाता रहा कि धर्म अब बीते दौर की चीज है और अब तो विज्ञान का युग है, धर्म, मजहब आदि की बातें भुला देनी चाहिये।

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5. कांग्रेस के बहुत से नेता लन्दन ही जाकर पढ़े

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नेहरूजी तथा कांग्रेस के अधिकांश बड़े नेता लंदन जाकर पढ़े थे और जो वहां नहीं गये थे उन्होंने भी अंग्रेजी साहित्य का तथा इंग्लैण्ड के इतिहास का पर्याप्त अध्ययन किया है और सभी जानते हैं कि इंग्लैण्ड में शासन का सर्वोच्च अधिकारी बहुसंख्यकों के रिलीजन का भी सर्वोच्च अधिकारी है और इस प्रकार बहुसंख्यकों का प्रोटेस्टेंट चर्च और प्रोटेस्टेंट ईसाइयत इंग्लैण्ड का राजधर्म है।

इसी प्रकार यूरोप के प्रत्येक राष्ट्रराज्य का राजधर्म ईसाइयत का ही अपने यहां का सबसे बड़ा पंथ होता है। परंतु भारत में इसे छिपाया गया और बहुसंख्यकों के धर्म को कोई संरक्षण नहीं दिया गया तथा बहुसंख्यकों के धर्म को लगातार दबाव में रखने के लिये अल्पसंख्यकों के मजहब को विशेष संरक्षण दिया गया। अपने समाज से सत्य को छिपाने और समाज में झूठ को फैलाने का यह भी एक अनोखा दृष्टांत ही है।

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6. सब पता होने के बाबजूद भी अंग्रेजों ने संसाधनों का एकतरफा हस्तांतरण किया

सभी को पता था कि अंग्रेजों ने भारतीय संसाधनों का एकतरफा हस्तांतरण किया है और उसी के कारण भारत में गरीबी और कंगाली आई। परंतु इसके बावजूद यह भी सबको पता था कि अभी भी भारत में अकूत धन संपदा और अकूत प्राकृतिक संसाधन हैं। अतः न्यायभावना, करूणाभावना और दानवृत्ति का पोषण करके ही संपूर्ण समाज को समृद्ध किया जा सकता है। परंतु यह तथ्य छिपाकर धनियों से मनमाना टैक्स वसूल करते हुये धनियों को खलनायक की तरह प्रस्तुत किया गया और धनियों से गहरी ईर्ष्या के कारण नये शासकों ने दान देने का काम राज्य के हाथ में केन्द्रित कर दिया जिससे कि परंपरागत समाज को शासक ही दानी दिखें।

कब तक चलेगी अपने समाज से झूठ बोलने की राजनीति

इसके साथ ही इष्ट और पूर्त कर्मों का जिम्मा भी समाज से छीनकर स्वयं शासकों ने अपने हाथ में ले लिया जिससे कि दलाली की मात्रा बढ़ गई और काम पर स्थानीय लोगों का सीधा नियंत्रण भी नहीं रहा।समाज से यह तथ्य छिपाया गया कि अपने यहां हजारों वर्षों से इष्ट और पूर्त कर्मों को स्वयं समाज द्वारा किये जाने की परंपरा रही है। जो टिकाऊ सिद्ध होती है। इस प्रकार वर्तमान भारतीय राजनैतिक दल अपने ही समाज से सच को छुपाने और झूठ को रचने तथा फैलाने की भूमिका में हैं। ऐसा किसी भी समाज के लिये अच्छा नहीं होता।

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