जिन्हें मूल इतिहास लेखक मान लिया गया है, उनके बारे में कुछ तो जाने

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पाठ्यपुस्तक लिखने की सरकारी नौकरी भी कामचोरी के साथ करने वाले लोगों ने भारत जैसे महान और विराट राष्ट्र के बारे में नई पीढ़ी को बताने के लिये इतिहास की जो पाठ्य पुस्तकें लिखी हैं, वे भारत के मूल अभिलेखों और दस्तावेजों तथा साक्ष्यों को स्वयं जानने और पढ़ने की जगह 19वीं शताब्दी ईस्वी के उत्रार्द्ध और 20वीं शताब्दी ईस्वी के पूवार्द्ध में कतिपय अंग्रेज और अन्य यूरो ईसाई लेखकों की अपने चर्च के लिये समर्पित निष्ठा के साथ किये गये परिश्रम को ही पर्याप्त प्रमाण मानते हुये अब उन्हें ही भारत के इतिहास का मूल लेखक मान लिया गया है।

परंतु उन तथाकथित इतिहास लेखकों में से एक भी व्यक्ति इतिहासकार नहीं है और उसने कभी भी इतिहास का ये पुस्तकें लिखने से पहले कोई अध्ययन नहीं किया था तथा इतिहास विषय में कोई पढ़ाई नहीं की थी और इस अनुशासन का उन्हें कोई अभ्यास भी नहीं था। उनमें से कोई चर्च सेवक था, कोई कस्ट्रक्शन कंपनी में कर्मचारी था और कोई इसी प्रकार का अन्य कर्मचारी था।

यहां हम उनमें से कुछ का परिचय दे रहे हैं –

1. हेनरी मायर्स इलियट

हेनरी मायर्स इलियट का जन्म इंग्लैंड के वेस्ट मिनिस्टर्स शहर में एक चर्च के लॉज में हुआ था। वे स्वयंसेवकों के एक संगठन के कर्नल जॉन इलियट के 15 पुत्रों में से तीसरे बेटे थे। 1 मार्च 1808 को उनका जन्म हुआ। चर्च में पादरी की ट्रेनिंग लेने के बाद वे ईस्ट इंडिया कंपनी के नौकर हुये और उत्तरप्रदेश के बरेली शहर में कंपनी के टैक्स संग्राहक (कलेक्टर) के सहायक बनकर काम करने लगे।

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कंपनी की अच्छी सेवा करने के कारण वे कुछ समय बाद स्वयं ही टैक्स संग्राहक बना दिये गये और बाद में कंपनी के लिये लगान वसूली करने वाले बोर्ड के सचिव बने। फिर वे कंपनी की सुरक्षा टुकड़ी में भी शामिल हो गये और सिखों से कंपनी की लड़ाई में मध्यस्थता का काम किया। अपने निष्ठापूर्ण ईसाई आचरण के कारण उन्हें के. सी. बी. की उपाधि मिली। के. सी. बी. का अर्थ होता है नाईट कमांडर ऑफ बॉथ। नाईट इंग्लैंड की एक सामंत से मिलती जुलती उपाधि है जो पादरियों को ही दी जाती थी।

यह उपाधि जब दी जाती है तो एक पूरी मजहबी रस्म अदा की जाती है, उसे ही ‘बॉथ’ कहते हैं। इंग्लैंड में 20वीं शताब्दी ईस्वी से पहले वहां के अभिजात वर्ग के लोग भी नित्य नहीं नहा पाते थे। साल में कुछ ही दिनों नहाते थे। साधारण लोग तो वर्ष में एक बार या कई वर्षों में एक बार कभी नहाते थे। क्योंकि वहां पानी की बहुत कमी थी और बर्फ के पिघलने से जो पानी सुलभ होता था वह मुख्यतः पीने तथा अन्य कामों में ही खर्च हो जाता था।

20वीं शताब्दी ईस्वी में ही बिजली वहां सर्वसुलभ हुई

बिजली का अविष्कार होने के बाद भी उसे सर्वसुलभ होने में कई दशक लग गये और 20वीं शताब्दी ईस्वी में ही बिजली वहां सर्वसुलभ हो पाई। तो, ईसाई स्नान की एक विशेष पद्धति थी जो यह उपाधि देने के पहले करनी होती थी। शाम होने के बाद ऐसा व्यक्ति चर्च में जाता है और वहां निर्वसन नहाता है। इसके बाद नंगे बदन पर एक विशेष लबादा लपेट दिया जाता है और उसे चर्च में ही लिटा दिया जाता है।

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वह रात भर चैपेल में रहता है और बाईबिल के कुछ अंशों का पाठ करता रहता है। इसके बाद भोर में उठकर वह मुख्य पादरी के सामने ‘कन्फेशन’ करता है कि उसके जीवन में कब-कब काम संबंधी विचार आये और कब-कब उसने स्त्री-प्रसंग किया। ऐसा करने के बाद फिर उसे ‘मॉस’ नामक एक कर्मकांड करना होता है इसके बाद वह सो जाता है और फिर बहुत दिन चढ़ने पर उठता है। उठने के बाद हाथ मुंह धोकर कपड़े पहनकर उसे राजा के सामने हाजिर होना होता है। जहां राजा अपनी तलवार की नोक उसकी गर्दन पर गड़ाता है और फिर छोड़ देता है। यही नाईट ऑफ बॉथ बनने की पूरी रस्म है।

ईसाई स्नान के सामन्त

इस प्रकार ‘ईसाई स्नान के सामन्त’ (नाईट कमांडर ऑफ बॉथ) की उपाधि प्राप्त हो जाती है जिसे संक्षेप में के. सी. बी. कहते हैं। जब भारत में ब्रिटिश प्रभाव एक हिस्से में हुआ तब कुछ छोटे-मोटे राजाओं ने भी उत्साह में आकर इंग्लैंड के राजा से यह उपाधि इसी प्रकार प्राप्त की थी।
यह उपाधि प्राप्त कर इलियट भारत आये और कंपनी की सेवा करते रहे।

बाद में कंपनी के लिये उन्होंने एक अंग्रेजी पत्रिका मेरठ से चलाई। कंपनी के कर्मचारियों और अधिकारियों को भारत के उच्चवर्ग के विषय में भरपूर जानकारी सुलभ हो ताकि वे उनसे अच्छी तरह व्यापारिक वार्ता कर सकें इसके लिये उन्हेांने बहुत से काम किये। सबसे पहले उन्होंने ब्राह्मणों और राजपूतों की वंशावली अंग्रेजी में तैयार की। इसके बाद उन्हांेने फारसी व्याकरण सीखी और मुसलमान दरबारी लेखकों की भी एक इनडैक्स प्राप्त की।

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इसके बाद वे उन दरबारी लेखकों की किताब के आधार पर हिन्दुस्तान का इतिहास लिखने लगे। उन्होंने खूब सामग्री इकट्ठी की थी परन्तु वह सब मुस्लिम लेखकों द्वारा अपने-अपने नवाबों की तारीफ में लिखी गई प्रशस्तियां ही थीं। स्वयं इलियट और डाऊसन ने लिखा है कि ये सब मुस्लिम लेखक अतिरंजित कहानियां गढ़ते हैं और गप्पे गढ़ते हैं। इसलिये इनका संपादित तथ्य प्रकाशित करना आवश्यक है।

इलियट यह काम कर ही रहे थे कि पहला खंड तैयार होने के बाद जब वे अफ्रीका गये हुये थे तो वहीं उनकी 30 दिसंबर 1853 ईस्वी को मृत्यु हो गई और शेष संग्रहित सारी सामग्री लेकर उनकी पत्नी इंग्लैंड वापस लौट गईं। 16 वर्ष तक वह सामग्री उनके पास पड़ी रही बाद में उन्होंने डाऊसन को वह सब सामग्री दी जिन्होंने कई वर्षों में आठों खंडो के लेखन और प्रकाशन का कार्य पूरा किया।

2. जान डाऊसन

जान डाऊसन को अंग्रेज लोग संस्कृत का अच्छा जानकार पहला अंग्रेज मानते हैं। विलियम जोन्स को स्वयं अंग्रेज वैसा जानकार नहीं मानते जबकि भारत में विलियम जोन्स के चेले भरे पड़े हैं। जान डाऊसन का जन्म 1820 ईस्वी में हुआ और 1881 में उनकी मृत्यु हुई।जान डाऊसन एक समर्पित पादरी थे। उनके पिता ईस्ट इंडिया कंपनी के निदेशको में से एक थे। वे उसी कंपनी के एक प्रशिक्षण केन्द्र में प्रशिक्षक बने और बाद में भारत का अध्ययन करने के लिहाज से उन्होंने उर्दू सीखी। बहुत बाद में थोड़े समय उन्होंने संस्कृत सीखी।

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स्पष्ट है कि उनका भी संस्कृत का ज्ञान बहुत थोड़ा ही था पर कंपनी ने उन्हें इंग्लैंड में संस्कृत का जानकार प्रचारित किया क्योंकि तब तक इंग्लैंड में और यूरोप में भी संस्कृत के विशाल ज्ञानभंडार की चर्चायें चमत्कार की तरह होने लगी थीं और स्वयं को संस्कृत का जानकार बताने वाले का बहुत आदर होने लगा था क्योंकि बाईबिल में इंडीज का उल्लेख है और इंडिया सदा से यूरोप के लोगों के लिये चमत्कारी आकर्षण की चीज रही है।

उर्दू सीखने के बाद उन्होंने उर्दू व्याकरण पर अंग्रेजी में एक किताब 1862 ईस्वी में लिखी। फिर उन्होंने 1879 ईस्वी में ‘हिन्दू माइथालॉजी’ पर एक किताब लिखी और 1881 ईस्वी में वे चले गये।

1867 ईस्वी के बाद किया सम्पादन शुरू

इसी अवधि में उन्होंने 1867 ईस्वी के बाद इलियट द्वारा संग्रहित सामग्री का सम्पादन शुरू किया जो उनकी मृत्यु तक चलता ही रहा। वस्तुतः वे मुख्यतः उर्दू के ही जानकार थे और उन्होंने मुस्लिम लेखकों द्वारा लिखी पुस्तकों का ही अध्ययन किया था। पुस्तक का मूल नाम पहले था ‘हिनदोस्तान का इतिहास जो अरब इतिहासकारों द्वारा लिखा गया है’। इसे ‘हिस्ट्री ऑफ इंडिया’ नाम बहुत बाद में दिया गया।

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जाहिर है कि संस्कृत पाठों का अधिक सहारा डाऊसन ने नहीं लिया है जिससे उसके संस्कृत विद्वान होने के बारे में शंका पैदा होती है। वस्तुतः यह समस्त इतिहास स्वयं इलियट और डाऊसन के शब्दों में ‘मुहम्मदन पीरियड’ के बारे में है।

परंतु 15 अगस्त 1947 ईस्वी के बाद आलसी सरकारी लिक्खाड़ों ने इन लोगों को भारत के इतिहास का ही जानकार प्रचारित कर दिया और उनकी नकल भी आधी अधूरी की तथा उसमें हिन्दुओं के भीतर ग्लानि जगाने वाले अंश और अधिक मिला दिये। ऐसा उन्होंने किन्हीं मुस्लिम देशों से कुछ धन लेकर किया अथवा सरकारी नेताओं और अफसरों के कहने पर किया, यह जांच का विषय है।

3. अलेक्जेंडर डाऊ

अलेक्जेंडर डाऊ स्काटिश मूल के थे। उनका जन्म 1736 ईस्वी में स्काटलैंड के पर्थशायर में हुआ। उनके पिता एक चुंगी नाके में चौकीदारी का काम करते थे। उन्होंने चर्च में थोड़ी शिक्षा प्राप्त करने के बाद नाविक का काम शुरू किया और बाद में 24 वर्ष की उम्र में सिपाही की नौकरी करने ईस्ट इंडिया कंपनी में भर्ती हुये तथा कोलकाता आकर अंग्रेजों की कोठी पर पहरा देने लगे। उन्होंने क्लाइव और वाटसन के साथ कंपनी की सेवा की और क्रमशः तरक्की पाते गये और कप्तान बना दिये गये।

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यहाँ रहते हुये उन्होंने फारसी सीखी और मुस्लिम लेखकों की लिखी किताबों के आधार पर हिन्दोस्तान की कहानी लिखी। इस पुस्तक के द्वारा इन्होंने भारतीय राज्य को निरंकुश और गैर जिम्मेदार राजाओं तथा नवाबों द्वारा संचालित बताया और ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा भारत के लोगों के हित में इन राजाओं और नवाबों को हटा कर अपने लोगों को शासन में बैठाना आवश्यक बताया।

बिहार में हुई मृत्यु

कंपनी के लिये काम करते हुये बिहार के भागलपुर में 1779 ईस्वी में उसकी मृत्यु हो गई। उसने कुछ नाटक और कहानियां भी लिखी।

15 अगस्त 1947 के बाद कांग्रेस सरकारों ने जिन लोगों को इतिहास के नाम पर कूड़ा और झूठ लिखने के काम में लगाया उन्होंने अलेक्जेंडर डाऊ, एडवर्ड सचाऊ, टॉड, हेनरी इलियट और जॉन डाऊसन को महान इतिहासकार और भारत विशेषज्ञ की तरह मानकर उनके प्रति ही प्रमाण भावना रखते हुये कचरा फैलाया और उसमें अपनी ओर से हिन्दुओं की निंदा तथा हीनता बढ़ाने वाली सामग्री और भी अधिक डाल दी।

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इस दुष्कर्म का नेतृत्व इरफान हवीब ने किया और उनके नेतृत्व में तैयार एक मंडली ने यह दुष्टतापूर्ण काम किया। भाजपा शासन में अभी तक इन दुष्टताओं के सुधार और सही इतिहास के लिखे जाने की तैयारी का कोई लक्षण नहीं है। केवल संगठन और शोर के बल से ही हिन्दुओं का गौरव प्रतिष्ठित हो गया बताया जा रहा है। परंतु पाठ्यपुस्तकों के रूप में हिन्दुुओं में हीनता और ग्लानि भरने और बढ़ाने वाले ही सारे कचरे फैलाये जा रहे हैं

4. जेम्स टॉड

जेम्स टॉड भी स्काटलैंड के निवासी थे। उनका जन्म 20 मार्च 1782 ईस्वी को इस्लिंगटन नामक स्थान में हुआ था। उनके पिता पहले ही कंपनी के साथ आ कर मीरजापुर में नील की खेती कर मुनाफा कमा रहे थे। जेम्स टॉड उनके दूसरे बेटे थे। 17 साल की उम्र में जेम्स टॉड एक सिपाही बनकर ईस्ट इंडिया कंपनी की नौकरी में आये। बाद में वे नाविक सिपाही के रूप में काम करने लगे और फिर दिल्ली के पास पुरानी नहर की पैमाइश करने का काम उनको दिया गया। इस बीच उन्होंने पढ़ने लिखने में अधिक रूचि ली और कंपनी ने उन्हें राजस्थान के राजाओं के पास जाकर उनसे राजस्थान के इतिहास की सामग्री और नक्शे जुटाने कहा ताकि कंपनी वहां अपना धंधा फैला सके।

तब तक यानी 19 वीं शताब्दी ईस्वी के आरम्भ तक , किसी भी अंग्रेज को राजस्थान के विषय में लगभग कोई भी जानकारी नहीं थी। अधिकांश अंग्रेज केवल मुसलमानों के संपर्क में आये थे और इस्लाम को अपने बहुत करीब मानते थे। बंगाल में धीरे-धीरे वे लोग हिन्दू व्यापारियों और राजाओं के संपर्क में आये। यद्यपि अपनी हीन भावना के कारण वे लोग केवल टुच्चे और नीच किस्म के हिन्दुओं से ही घुल मिल पाये। जैसा कि लंदन में ब्रिटिश सांसद एडमंड बर्क ने वारेन हेस्टिंग्स पर चले मुकदमें में विस्तृत बयान दिया था।

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इसलिए भेजा गया था राजस्थान

कोलकाता में पहली बार वे मारवाड़ी सेठों के संपर्क में आये और कुछ सेठों के लिये उन्होंने अपनी सेवायें भी दीं। इन सेठों के संपर्क में आने पर उनके मन में राजस्थान के प्रति अपार कौतूहल जगा और उनको लगा कि जिस इलाके के सेठ इतने प्रभुताशाली हैं, वह राज्य स्वयं में तो धन और समृद्धि का अनंत भंडार ही होगा। इसीलिये जेम्स टॉड को राजस्थान भेजा गया। (भारत के लोगों को गया गुजरा और अंग्रेजों को शुरू से महान रणनीतिज्ञ बताने वाले लल्लूओं को पढ़ना नहीं है, बस,बक बक करनी है।

जेम्स टॉड ने जोधपुर, मेवाड़, कोटा, सिरोही, बूंदी, मारवाड़ और जैसलमेर के राजाओं का अभिवादन किया और उनसे बड़ी विनम्रता से अपने-अपने राज्य के जानकार कुछ पंडितों को कुछ दिन के लिये मांगा। टॉड ने राजाओं से यह कहा कि इससे हम आपकी प्रशस्ति इंग्लैंड और समस्त यूरोप में फैलायेंगे। राजाओं ने कुछ पंडितों को हर जगह जेम्स टॉड को बताने के लिये नियुक्त कर दिया। जेम्स टॉड को टूटी-फूटी हिन्दी आती थी और मारवाड़ी तथा राजस्थान की कोई भी भाषा बिलकुल भी नहीं आती थी।

उसने राजाओं से विनती कर ऐसे लोग भी देने कहा जो खड़ी बोली में उसे वहां का इतिहास समझा सकें। राजाओं ने यह काम सरलता से कर दिया। उनसे किसी तरह सुन समझकर और राजकीय अभिलेखों का उनकी सहायता से अध्ययन कर जेम्स टॉड ने राजस्थान का इतिहास कंपनी के अधिकारियों के लिये लिखा। साथ ही राजकीय अभिलेखागारों से नक्शे प्राप्त कर उनकी अनुकृति तैयार की और 11 बड़ी-बड़ी जिल्दों में उन नक्शों को लेकर दिल्ली आकर कंपनी को सौंपे। इसके साथ ही राजाओं से बात करते हुये अपनी भेद बुद्धि के प्रयोग के द्वारा उन्होंने राजाओं के बीच के टकराव के बिन्दुओं को भी नोट कर लिया और कंपनी को वहां बढ़ने के उपाय सुझाये।

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उन पर भ्रष्टाचार के अनेक गंभीर आरोप भी लगे। परंतु रायल एशियाटिक सोसायटी लंदन में भारत के बारे में अपने वक्तव्यों द्वारा उन्होंने भरपूर कौतूहल जगाया। 1835 ईस्वी में मात्र 53 वर्ष की अवस्था में उनकी मृत्यु हो गई। 1857 ईस्वी में राजपूत राजाओं ने अंग्रेजों का साथ दिया, इसका बड़ा श्रेय टॉड की बुद्धि को जाता है।

5. जेम्स मिल

जेम्स मिल भी स्काटिश थे और उनका जन्म 6 अप्रैल 1773 को नार्थ वाटर ब्रिज नामक जगह में हुआ था। उनके पिता जूता बनाने का काम करते थे। माँ ने किसी तरह उनको चर्च में अच्छी शिक्षा दिलाने का प्रयास किया। 16 साल की उम्र में वे पादरी बन गये।

परंतु पादरी का काम उन्हें पसंद नहीं आया और वे इंग्लैंड के लोगों को ट्यूशन पढ़ाने का काम करने लगे। बाद में वे एक ब्रिटिश सांसद के निजी सहायक बन गये और लेखन के काम में जुट गये। फिर वे समाज सुधारक जेरेमी बेन्थम के संपर्क में आये और उनसे बहुत प्रभावित हुये। इसके बाद उन्होंने भारत पर एक पुस्तक लिखने का काम अपने हाथ में लिया और ‘दि हिस्ट्री ऑफ ब्रिटिश इंडिया’ पुस्तक 1817 ईस्वी में प्रकाशित की।

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बिना अध्ययन के कैसे किया मिल ने उल्लेख ?

यद्यपि मिल कभी भी भारत नहीं आये थे और संस्कृत सहित भारत की किसी भी भाषा का उन्होंने कभी भी अध्ययन नहीं किया। परंतु इसका उन्होंने गौरव के साथ उल्लेख किया कि ‘एक सुयोग्य व्यक्ति इंग्लैंड के किसी एक घर के किसी एक कोने में बैठकर भी एक वर्ष में भारत की सभ्यता, संस्कृति, धर्म, इतिहास, विधि, परम्परायें और रीतिरिवाज सबको भली-भांति जान सकता है अगर वह अपनी आंख और कान खुले रखे और भारत में चल रही गतिविधियों को जानता रहे’।

मिल ने लिखा कि भारत की संस्कृति बहुत पिछड़ी है, अधंविश्वास और अज्ञान से भरी हुई है तथा हिन्दू लोग स्त्रियों के साथ बहुत अत्याचार करते हैं। वे विधवाओं को जिंदा जला देते हैं। इसलिये भारतीयों के हित में ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत के अधिक से अधिक क्षेत्रों पर अधिकार कर लेना चाहिये ताकि वहां अंग्रेजी सभ्यता और संस्कृति को फैलाया जा सके और अज्ञान तथा अंधविश्वास में घिरे हिन्दू समाज का इंग्लैंड के प्रकाश से उद्धार किया जा सके।

मिल की पुस्तक इंग्लैंड के शिक्षित वर्ग में बहुत लोकप्रिय हुई और उसे भारत का प्रामाणिक इतिहास मान लिया गया। इस पुस्तक का इंग्लैंड के अभिजन वर्ग का गहरा प्रभाव पड़ा और 15 अगस्त 1947 के बाद यह पुस्तक सरकारी सरंक्षण में लिखे जाने वाले इतिहास का एक मुख्य आधार मान ली गई और उसमें छोटे-मोटे सुधार किये जाते रहे।

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6. एच.एच. विल्सन

होरेस हेेमेन विल्सन का जन्म 1786 ईस्वी में हुआ था और लंदन में डाक्टरी की पढ़ाई कर 22 साल की उम्र में वे ईस्ट इंडिया कंपनी में डाक्टर की हैसियत से भर्ती होकर कोलकाता आ गये। यहां उन्होंने कोलकाता में संस्कृत कालेज की स्थापना में गहरी रूचि ली और उनका प्रयास था कि धीरे-धीरे संस्कृत के अधिकृत विद्वान भी अंग्रेज तथा अन्य यूरोपीय लोग भी मान लिये जायें क्योंकि सम्यक रूप से ज्ञान तो उन्हें ही हो सकता है। हिन्दू पण्डित तो अंधविश्वासी और अज्ञानी ही होते हैं और वे अपने ही शास्त्रों का सही अर्थ नहीं जानते।

उन्हें आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में बोदेन के नाम से स्थापित संस्कृत विद्यापीठ का पीठाध्यक्ष 1832 ईस्वी में बनाया गया। हेनरी थॉमस कुलब्रुक की सिफारिश पर उन्हें बंगाल की एशियाटिक सोसायटी का सचिव बनाया गया।

कालिदास की मेघदूत का अंग्रेजी अनुवाद

उन्होंने सर्वप्रथम कालिदास के मेघदूत का अंग्रेजी अनुवाद पद्य में प्रस्तुत किया और फिर भारत के पंडितों की सहायता से संस्कृत-अंग्रेजी डिक्शनरी तैयार की जिसमें अपनी ओर से बहुत से नोट जोड़े।

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विलसन ने आयुर्वेद का भी अध्ययन किया और हैजा तथा कुष्ठरोग की चिकित्सा में उससे बहुत सहारा भी उन्हें मिला। बाद में उन्होंने भारतीय रंगकर्म का भी अध्ययन किया। इसके साथ ही उन्होंने विष्णुपुराण पर अंग्रेजी में टीका भी लिखी।

ब्रिटिश शासन और बाद में कांग्रेस तथा अन्य पार्टियों के शासन के द्वारा मोनियर विलियम्स और एच.एच. विलसन के सपने साकार हुये और संस्कृत साहित्य तथा भारतीय शास्त्रों के विषय में 15 अगस्त 1947 के बाद भारत सरकार और राज्य सरकारों के द्वारा संस्कृत के अंग्रेज तथा अन्य यूरोपीय विद्वानों के द्वारा ही प्रामाणिक संस्कृतज्ञ के रूप में प्रमाण भावना से लिया जाता है।

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