कुम्भ और अर्ध कुम्भ

क्या कोरोना रोक देगा इस बार का कुम्भ मेला?

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कुंभ काल आरम्भ हो चुका है लेकिन फिलहाल कुंभ पर अनिश्चितता के बादल छाए हुए हैं। अभी तक कुंभ कैसा होगा इसका स्वरूप भी सरकार तय नहीं कर पायी है। कागजों में कुंभ की तैयारियों जोरों पर हैं, किन्तु धरातल पर कुछ भी नजर नहीं आ रहा है। वहीं संत समाज भी कुंभ को लेकर अनिश्चितता में हैं। 12 वर्षों की अवधि में एक बार विश्व विख्यात हरिद्वार में कुंभ मेले का आयोजन होता है लेकिन इस बार वर्ष 2021 का कुंभ 11वें वर्ष में आयोजित हो रहा है।

तारा मंडल में बृहस्पति के राशि भ्रमण पर आधारित श्री गंगा से जुड़ा कुंभ बृहस्पति के कुंभ राशि में संचार के साथ होता है। इसके पौराणिक पहलुओं पर सदियों से चर्चाएं होती आयी हैं। और वर्तमान काल में महात्मा गाँधी द्वारा मेला में आना सर्वविदित है। विदेशी पत्रकारों द्वारा पूछे गये प्रश्नों के उत्तर में महात्मा गाँधी ने संक्षेप में इसकी महत्ता पर विचार प्रकट करते हुए कहा था कि असंख्य जन समुदाय की श्रद्धा जहाँ एक केन्द्र बिन्दु मेें समा जाती है उसी केन्द्र बिन्दु में घर-घर में रमण करने वाले भी श्री राम हैं और परमात्मा, खुदा, अल्लाह और ईशु के ईश्वर वहीं रहते हैं। इसलिए इस कुंभ मेला को समस्त मानव जाति की श्रद्धा का सूत्र माना जाता है।

महात्मा गाँधी से पहले भी स्वामी दयानन्द सरस्वती ने स्वतंत्रता का आवाहन करते हुए भारत की आजादी हेेतु जन जागरण करने के लिए इन्द्रप्रस्थ क्षेत्र के लोगों, बहुधा किसानों के द्वारा सेकी गयी चपाती के माध्यम से अपना संदेश स्वामी जी नीलधारा क्षेत्र तक पहुँचाते रहे हैं। ये वे प्रेरणा वाले संदेश थे जिनकी शुरूआत संभवतः कुंभ मेला से भी किसी न किसी प्रकार से जुड़ी रही।

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जहाँ कुंभ के आयोजन के लिए असीमित धनराशि का खुला व्यय हो रहा है, वहाँ हरिद्वार दाम्भिक, वैभव प्रदर्शक, तृष्णा व लोभ से ग्रसित लोगों का गढ़ एवं व्यवसायिक केंद्र मात्र बन गया है। शांत, सुखद, प्राकृतिक वातावरण को नष्ट-भ्रष्ट कर के बड़े-बड़े भवन बन रहे हैं। प्रदर्शन-मात्र प्रति-स्पर्धा व अहंकार की नींव पर प्रासाद खड़े हो रहे हैं। परंतु जन सुविधाओं, विशेषतः सड़कों, वाचनालयों स्वास्थ्य-सुविधाओं, जल व भोजन आदि की उचित व्यवस्थाओं की ओर किसी का ध्यान नहीं जा रहा। अभी भी कई स्थानों पर गन्दी नालियों का गंगा की जल-धाराओं से संगम हो रहा है। महामना पंड़ित मदन मोहन मालवीय सरीखे समाज-सुधारकों द्वारा प्रेरित तथा संगठित विद्या व शिक्षा के केंद्र पतन की ओर जा रहे हैं।

उनके द्वारा स्थापित भव्य पुस्तकालय, ज्ञानी व संतजनों के समागम के स्थान लुप्त होते जा रहे हैं। हरिद्वार नरक द्वार न बन जाए, इस पर सभी सज्जनों, श्रद्धालुओं, संतांे, पंड़ितों/विद्वानों, समाज सुधारकों को शीघ्र अति शीघ्र विचार करके ठोस पग उठाने की परम आवश्यकता है। शास्त्रोक्त कर्म, निष्काम कर्म, द्वारा गंगाद्वार की प्रतिष्ठा बनी रहे, ऐसी भक्ति-ज्ञान-कर्म-योग यज्ञ-शाला का संचालन करना अति-अनिवार्य है।

उत्तराखण्ड़ सरकार और विशेषकर मेला व नगर निगम से जुड़े नेता और अधिकारी शास्त्रों की चेतावनी पर ध्यान दें, और ये भी जान लंे कि हरिद्वार की जनता और बाहर से आने वाले श्रद्धालु ऐसे नेताओं और कार्यकर्ताओं की कार्यशैली से परिचित हंै, और ये सब जानते हंै कि ऐसे व्यक्ति छोटे-से-छोटे कामों को अधूरा छोड़कर भाग जाने के दोषी हंै। परन्तु ये बड़े खेद की बात है कि विकास तथा समाज उत्थान का नारा लगाने वाले आज के सत्ताधारियों ने अपनी मानसिकता को दलदल में धकेल दिया है। अब तक की प्रगति पर ध्यान दिया जाये तो ऐसा लगता है कि सब कुछ राम भरोसे है और राम भरोसे पर ही छोड़ना पड़ेगा। संभवतः भ्रष्टाचार के कीचड़ में ध्ँासते हुए सत्ता के सभी ठेकेदार ऊँचे से निचले स्तर तक इस कीचड़ में डूबकर पाप की गति पायेंगे या राम भरोसे ही उन सब का उद्धार होगा यह कहना कठिन है जो भी है महाकाल किस ओर अपना प्रभाव दिखाता है।

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