घरू फूट और मृत्यु | नूरजहाँ का इतिहास

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लक्ष्मी को चंचल कहा गया है और स्त्री-स्वभाव को भी चंचल कहा गया है। यदि दैववशात् कहीं पर लक्ष्मी स्त्री-स्वभाव पर अवलम्बित हो जाय, तो चंचलता की मात्रा का दुगुना हो जाना स्वाभाविक है। शाहजहाँ भी इसी अनिष्ट मिश्रण का शिकार हुआ। जो प्रत्यक्ष में उसके भाग्यों की सर्वाधिक बढ़ती का समय था, वही उसके दुर्भाग्य की पराकाष्ठा का उद्योग पर्व बना। इधर खुर्रम अपने हृदय में राजगद्दी को सुरक्षित समझकर प्रसन्न हो रहा था और उधर दुर्दैव उसकी वर्तमान परिस्थिति को भी मिटाने का उपक्रम कर रहा था। जो शाहजादे के अभ्युदय के कारण थे, वही उसके अधःपात के साधन बने। उसके लिए फूल ही काँटे बन गये।

नूरजहाँ न खूसरो को चाहती थी और न खुर्रम को वह हुकूमत चाहती थी। वह गद्दी का अधिकारी ऐसे राजकुमार को बनाना चाहती थी जो उसकी अधीनता में-उसके असर में रहे । खुसरो से उसे कोई आशा नहीं थी। उससे बादशाह की बनती भी नहीं थी। जब तक खुसरो जिन्दा रहा, नूरजहाँ खुर्रम का साथ देती रही उसे आशा थी, कि यह राजकुमार रिश्ते के कारण अपने असर में रहेगा।

नूरजहाँ ने ही खूसरो को खुर्रम के सुपुर्द कराया। वह काँटा रास्ते से निकल गया और उसकी मृत्यु की उत्तरदायिता न नूरजहाँ पर आई न जहाँगीर पर । इस अंश में उस चतुर महिला की नीति सफल हुई। जब दोनों आमने-सामने खड़े हुए। नूरजहाँ ने खूसरों के मरने पर जब शाहजहाँ की ओर आँख उठाकर देखा तो उसे प्रतीत हुआ कि उसने जिस भूत को खड़ा किया है, वह उसके वंश का नहीं है। राजकुमार खुर्रम स्वभाव का उद्धत, चुपचाप और शान्त था। बहादुरी में वह नाम पा चुका था। भाई के प्रतिद्वन्द्विता नष्ट हो चुकी थी। अब उसे किसी दूसरे की जरूरत नहीं थी।

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नूरजहाँ की तीव्र बुद्धि ने देख लिया कि खुर्रम को औजार बनाकर उसकी मार्फत हुकूमत करना असम्भव है। वह अपना स्वयं स्वामी बनकर रहेगा। यह समझते ही उसने एक मोहरे को छोड़ दूसरे मोहरे को आगे बढ़ाकर वजीर बनाने का उपक्रम किया शेर अफ़गान से उसके एक लड़की थी। चौथे राजकुमार शहरयार के साथ धूमधाम से उसका विवाह कर दिया गया। शहरयार एक कमजोर और सीधा-साधा नौजवान था। वह बड़ी सुलभता से कठपुतली बन सकता था। भारत की भाग्यविधाती देवी को कृपादृष्टि हटते ही खुरम का मार्ग कण्टकाकीर्ण होने लगा।

कन्दहार को फारस के बादशाह ने जीत लिया। उसे फिर से जोतकर मुगल राज्य का हिस्सा बनाना आवश्यक था। शाहजहाँ की अपेक्षा अधिक योग्य सेनापति मिलना कठिन था। बस, एकदम हुक्म जारी हुआ कि दूसरा राजकुमार कन्दहार के लिए रवाना हो जाये। शाहजहाँ ने आज्ञा के पहुँचते ही उत्तर के लिए प्रयाण किया, और वह माण्डू के किले तक पहुंच भी गया, परन्तु वहाँ पहुँचते-पहुँचते उसकी नोंद खुल गई। कन्दहार भेजने का असली उद्देश्य उसकी समझ में आने लगा। कन्दहार उसके लिए विजय की भूमि नहीं थी, देश निकाले का स्थान था, जिन्दा जिस्म को गाड़ने का कब्रिस्तान था वह ठिठक गया।

उसने बादशाह को सन्देश भेजा कि पहले मुझे इस बात की गारण्टी दो जाय कि गद्दी का अधिकारी में समझा जाऊँगा, अन्यथा मैं देश से बाहर जाने को तैयार नहीं है। इसके जवाब में हुक्म मिला कि तुम सेनापति की पदवी से च्युत किये गये, कन्दहार जाने वाली सेना का सेनापति शहरयार बनाया गया है, तुम्हारे साथ जितनी फौज़ और धन-राशि है, वह शहरयार के पास भेज दो। हुक्म सुनते ही राजकुमार सन्न रह गया और जवाब भेजा कि मैं स्वयं खिदमत में हाजिर होकर सब मामले को साफ करना चाहता है। इस प्रार्थना के उत्तर में सब सेनापतियों को हुक्म दिया गया कि वह शाहजहाँ को छोड़कर शहरयार के पास आ जाएँ।

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इस आज्ञा ने खुर्रम को एकदम बागियों की श्रेणी में शामिल कर दिया। हिन्दुस्तान में शाहजहाँ के पास जितनी जायदाद थी, वह जब्त कर ली गई और उससे गुजरात में कोई जायदाद चुन लेने के लिए कहा गया। शाहजहाँ ने समझ लिया कि अब सुलह का रास्ता बन्द हो गया और केवल शक्ति से हो प्राण और अधिकार रक्षा हो सकती है। जैसे सलीम अकबर के विरुद्ध विद्रोही बनकर खड़ा हुआ था, वैसे ही खुरंम जहाँगीर के विरोध में खड़ा हुआ गृह युद्ध मुगल-साम्राज्य का स्थायी रोग था। शाहजहाँ ने भी कुल-प्रथा का पालन किया शाहजहाँ विद्रोहों सेनाओं को लेकर आगरे की ओर रवाना हुआ।

यह समाचार सुनकर जहाँगीर भी कश्मीर की शीतल जलवायु को छोड़कर मैदान में आने के लिए बाधित हुआ। आपत्ति के समय में नये मित्रों की तलाश होती है। नूरजहाँ ने भी नये मित्रों के लिए आँख दौड़ाई, तो बढ़ते हुए सेनापति महावतखाँ पर दृष्टि पड़ी। राजकुमार परवेज और महावतखाँ को शाहजहाँ के पछाड़ने के लिए भेजा गया। आपत्ति में बड़े-से-बड़े मित्र भी साथ छोड़ देते हैं। बहुत से सेनापति भीड़ के समय शाहजहाँ का साथ छोड़ गये। शाहजहाँ ने पहले बंगाल में और फिर दक्षिण में पाँव जमाने की चेष्ठा की, परन्तु सफलता न हुई। साथियों ने साथ छोड़ दिया।

हिम्मत टूट गई और सिवाय अधीनता के कोई उपाय न रहा। शाहजहाँ ने बादशाह के पास अधीनता स्वीकार करने का सन्देश भेज दिया। जहाँगीर ने इस शर्त पर अधीनता की प्रार्थना स्वीकार की कि जितने भी किले शाहजहाँ के हाथ में है, छोड़ दिये जाएँ और शाहजादे के दो लड़के दारा शिकोह और औरंगजेब जमानत के तौर पर राजधानी में भेज दिये जाएँ । राजकुमार ने दोनों शर्ते पूरी कर दी। इस प्रकार शाहजहाँ का विद्रोह समाप्त हो गया।

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शाहजहाँ की आँधी अभी दबने न पाई थी कि देश-भर को कंपाने वाला एक और अन्धड़ उठ खड़ा हुआ। नूरजहाँ के चंचल और अभिमानी स्वभाव ने नये शत्रु पैदा करने आरम्भ कर दिये। महावतखाँ एक पुराना सेनापति था, वह सल्तनत का पुराना सेवक था। अकबर ने उसे ५०० का सरदार बनाया था। जहाँगीर के समय में वह खूब ऊँचा उठा। उसे कई सूबों का सूबेदार नियुक्त किया गया।

शाहजहाँ के विद्रोह को दबाने के लिए नूरजहाँ ने राजकुमार परवेज के साथ उसे भी अपनाया था। शाहजहाँ परास्त हो गया, अब महावतखों की जरूरत न रही। जिसके लिए खुसरो के मरने पर शाहजहाँ व्यर्थ प्रत्युत भयंकर हो गया था, उसके लिए शाहजहाँ की शक्ति के बिखर जाने पर यदि महावत खाँ व्यर्थ और भयंकर हो जाय तो क्या आश्चर्य है? उसके कई अपराध थे। परवेज के साथ उसकी मुहब्बत थी।

शहरयार की सुहागरात में परवेज को हँसने का क्या अधिकार था ? किसी मुगल बादशाह के सरदार को तीसरे राजकुमार से सम्बन्ध रखने की क्या मजाल थी? फिर वह बहादुर था, प्रभावशाली था, इसलिये नूरजहाँ के भाई आसिफ़खाँ का प्रतिद्वन्द्वी बन सकता था, क्या यह छोटा अपराध था? नूरजहाँ ने फैसला कर लिया कि अब यह नींबू निचोड़ा जा चुका है, इसे फेंक देना चाहिए। पुराने मुर्दे उखाड़कर महावत के जुमों की सूची तैयार की गई। जब वह बंगाल का गवर्नर था, तब उसने रिश्वत ली थो और प्रजा पर अत्याचार किया था। क्यों न उससे जवाब माँगा जाये? हुक्मनामा पहुँचते ही बादशाह की खिदमत में हाजिर होकर सफाई पेश करने के लिए महावत खाँ रवाना हुआ।

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उस समय जहाँगीर काबुल की ओर यात्रा कर रहा था, क्योंकि काबुल से विद्रोह का समाचार आया था। जहाँगीर का डेरा बेहात नदी के किनारे पड़ा हुआ था। नदी के पार जाने की तैयारी थी। महावतखों पाँच हजार राजपूतों की सेना के साथ उस जगह पहुँचा और बादशाह के पास प्रार्थना भेजी कि सेवा में उपस्थित होकर सफाई पेश करने का अवसर दिया जाय। उत्तर मिला कि बादशाह का द्वार बागी के लिए बन्द है। महावत ने समझ लिया कि जादूगरनी का मन्त्र चल गया अब सर्वनाश में विलम्ब नहीं है। मरता क्या न करता। महावत ने द्वार को छोड़कर खिड़की से बादशाह तक पहुँचने का निश्चय किया।

नदी पर पुल तैयार हो चुका था। पहले दिन सेनायें उस पार पहुँच चुकी थी। भीड़ से बचने के लिए बादशाह का खेमा अभी इस पार ही लगा हुआ था। रात की पान लीला के कारण जहाँगीर की आँखों में खुमार भरा हुआ था। डेरे में सन्नाटा था। अचानक ‘मारो-काटो’ का शब्द सुनाई दिया। सिपाही आँखें मलते हुए बिस्तरों पर से उठकर इधर उधर देखने लगे ‘क्या हुआ?’ पूछने से पहले हो राजपूतों की तलवार उनकी गर्दन पर आ पहुंची। महावतखों ने पौह फूटने से पहले ही दो हजार राजपूत पुल पर कब्जा करने के लिए भेज दिये, और शेष तीन हजार को लेकर शाही खेमे पर चढ़ गया । बादशाह ने भी शोर सुना।

आँखे मलकर खोली ही थी कि नंगी तलवार हाथ में लिये खेमे में घुसता हुआ महावतखोँ दिखाई दिया। जहाँगीर बिस्तर पर से उठ बैठा और आश्चर्य और क्रोध से भरे हुए स्वर में चिल्ला उठा- ‘बागी महावतखों, यह क्या?’ महावत की तलवार एकदम जहाँगीर के चरणों के पास लेट गई और सेनापति ने बादशाह को झुककर सलाम करते हुए निवेदन किया कि ‘जब गुलाम के लिए सीधे रास्ते बन्द हो गये, तब उसे अपने मालिक के पास पहुँचने के लिए बलात्कार का रास्ता पकड़ना पड़ा।’ जहाँगीर ने शीघ्र ही परिस्थिति को समझ लिया। सामना करना या इन्कार करना व्यर्थ था, इसलिए उस समय महावत को खुश रखना ही उचित समझकर बादशाह ने भवितव्यता के सामने सिर झुका दिया। कपड़ा पहनने के बहाने ज़नाने में जाकर नूरजहाँ से सलाह करने की चेष्टा भी व्यर्थ हुई, क्योंकि महावत ने जनाने में जाने की इजाजत ही नहीं दी। वह जानता था कि बादशाह की नूरजहाँ से भेंट उसके लिए विप सिद्ध होगी। उन्हीं कपड़ों के साथ बादशाह को हाथी पर बिठाकर महावतखाँ अपने खेमे में ले गया। इस प्रकार तेजस्वी अकबर का बेटा विषयों का गुलाम बनकर औरत का गुलाम बना और फिर राजपाट औरत के सुपुर्द करके नौकर का कैदी बना।

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नूरजहाँ के देखते-देखते महावत बादशाह को कैदी बनाकर ले गया। वह मानिनी औरत इस चोट का चुपचाप कैसे सहन कर सकता थी ? चोट खाई हुई नागिन की तरह उत्तेजित होकर वह अपने पति को बन्दीगृह से छुड़ाने के लिए उद्यत हुई। वह जितना शीघ्र हो सका, नदी के दूसरे पार शाही सेनाओं में पहुँच गई और उसने अपने भाई को तथा अन्य सेनापतियों को लड़ने के लिए उत्साहित किया। राजपूतों ने पुल जला दिया था, परन्तु इससे क्या तेजस्विनी स्त्री डरने वाली थी ? सेना को पानी में घुसने से घबराते देखकर नूरजहाँ ने सबसे पहले अपना हाथी नदी में डाल दिया। वह अपने ऊँचे हाथी की पीठ पर जंगी-भेस पहने, शहरयार की बेटी को साथ लिए तीर कमान बाँधे साक्षात् रणचण्डी प्रतीत होती थी।

महाराणा के पीछे-पीछे शाही फौज़ भी दर्या उतर गई। उस पार राजपूत सिपाही रास्ता रोके खड़े थे, बड़ा भयानक में परन्तु असमान युद्ध हुआ। पानी गहरा था। सैकड़ों डरब गये, सैकड़ों बह गये, सैकड़ों फिसल गये जो भाग्यशाली उस पार पहुँचे, वह बिल्कुल गीले हो चुके थे। बोझ के मारे उनका हाथ नहीं हिल सकता था। शत्रु आराम से खड़ा हुआ तीर बरसा रहा था और पार लगे हुओं को रोक रहा था।

सबसे अधिक जोरदार आक्रमण नूरजहाँ के हाथी पर किया गया। हाथी चारों ओर से घिर गया। तीरों की बौछार हो रही थी। शरीर रक्षक मारे गये। एक तीर आकर शहरयार की लड़की को लगा, जिससे खून जारी हो गया। मारे तीरों और गोलों के हौदा छलनी हो गया अन्त में हाथीवान मारा गया। निरंकुश हाथी तीरों से घबराकर उल्टे पाँव भागा और नदी में उतर गया। पानी इतना था कि हौदे के साथ हाथी ने कई डुबकियाँ खाई। कुछ समय के लिए तो सन्देह हो गया कि रानी जीती न बचेगी, परन्तु गिरता, पड़ता हाथी उस पार पहुँच गया। वहाँ औरतों का ठट्ठ जमा था। वह धाड़े मार-मारकर रो रही थीं। हाथी को पहुँचते ही सबने घेर लिया। इस आपत्ति में भी वह वोर महिला शान्त थी। उसके अपने शरीर पर भी कई घाव लगे थे, पर वह शहरयार को लड़की के कोमल शरीर पर पट्टी बाँध रही थी लड़ाई समाप्त हो गई। शाहो फौजों ने मुंह की खाई। बादशाह जहाँगीर महावतखा और उसके राजपूतों के पजे से न छूट सका।

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इस प्रकार बल-प्रयोग द्वारा पति को बन्धनमुक्त करने में नाकाम होकर नूरजहाँ ने सौम्य-नीति का अवलम्बन किया तलवार को छोड़कर नारी-प्रतिभा का आश्रय लिया। उसने महावतखों को कहला भेजा कि “मैं अपने शौहर को स्वतन्त्र नहीं करा सकी, इसलिए अब मेरा कर्त्तव्य उसकी सेवा करना और कैद में हिस्सेदार बनना है। मुझे बादशाह के पास रहने की इज़ाज़त दी जाय।” महावतखों विद्रोही नहीं बनना चाहता था।

वह बादशाही की अधीनता का स्वांग रच रहा था, फिर उस उचित प्रार्थना से इन्कार कैसे कर सकता था? उसने यह भी विचारा कि स्वतन्त्र नूरजहाँ कैदी नूरजहाँ से कहीं अधिक खतरनाक होगी नूरजहाँ भी जहाँगीर के तम्बू में कैद की गई। परन्तु कैदी नूरजहाँ स्वतन्त्र नूरजहां से अधिक खतरनाक सिद्ध हई. क्योंकि अब वह बादशाह को इच्छानुसार अधिक मोड़ सकती थी। बाहर वाह अकेली थी, अब वह दुगुनी हो गई उसने जहाँगीर की समझा दिया कि पहला काम महावतखों को निश्चिन्त कर देना है। जहाँगीर महावतखों की सलाह में शामिल हो गया उसने इस बात पर प्रसन्नता प्रकट की कि महावतयाँ ने उसे नूरजहाँ के भाई आसिफ़कों के पञ्चे से छुड़ाकर स्वतन्त्र कर दिया है।

फिर महावतखों को यह भी विश्वास दिलाया कि नूरजहाँ उसकी शत्रु नहीं है महावतखाँ ने आसिफ़खों और उसके साथियों को कैद कर लिया, तब भी बादशाह चुप रहा। इस प्रकार महावतखों को निश्चिन्त करके नूरजहाँ ने अपनी नीति का जाल फैलाना आरम्भ किया। उसने अपने एजेण्ट भेजकर आसपास के पठानों को अपने पक्ष में कर लिया, उनमें से बहुत को तरह-तरह की नौकरियाँ दिलाकर अपने समीप रख लिया और बादशाह के शरीर रक्षक आहदो नाम के घुड़सवारों को महावतखों और राजपूतों के विरुद्ध बरगला दिया। ऐसी दशा में महावतखों ने काबुल की यात्रा जारी रखी।

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कुछ पड़ाव चलकर वह ठेठ पठानों के मुल्क में पहुँच गया। राजपूत केवल पाँच हजार थे और महायतखाँ को केवल उन्हीं का भरोसा था। बीच-बीच में अहमदियों और राजपूतों में मारकाट भी होती रहती थी, जिसमें राजपूतों की संख्या कम हो रही थी। परिणाम यह हुआ कि शीघ्र हो महावतखों की शक्ति कम और नूरजहां की शक्ति अधिक हो गई हिन्दुस्तान दूर था, इसलिए वहाँ से विद्रोही सेनापति को किसी तरह की सहायता की आशा नहीं रही थी।

जहाँगीर ने हुक्म दिया कि कल सारी सेना का निरीक्षण होगा। हरेक सेनापति ने अपनी-अपनी भौज ठाट-बाट से सजाई । नूरजहाँ को गिनती सेनापतियों में भी थी। उसने भी अपनी फौज को सजाने की आज्ञा मांगी। आज्ञा दी गई। नूरजहाँ ने चारों ओर से अपने सहायको को बुलाकर फौज का ठाठ तैयार कर दिया। बादशाह और फौजों को देखने गये, तब नूरजहाँ की फौज को देखने जाना भी आवश्यक था। महावतखाँ साथ जाने लगा, तब बादशाह ने उसे समझा दिया कि नूरजहाँ की फौज के अन्दर जाना उसके लिए खतरनाक है बादशाह की ओर से वह निश्चिन्त था ही, उसने अपने आपको खतरे में डालना उचित न समझा बादशाह केवल एक राजपूत शरीर रक्षक के साथ नूरजहाँ को फोज में पहुँच गया। वहाँ पहुँचते हो राजपूत को तलवार के माट उतार दिया गया और बादशाह का जयकारा बुला दिया गया। जहाँगार स्वतन्त्र हो गया, अर्थात् महावतखों की कैद से निकलकर फिर से नूरजहाँ की कैद में आ गया। इस तरह उस चतुर महिला ने सेनापति महावतखों को उल्लू बनाया।

परू फूट और मृत्यु

जहाँगीर स्वतन्त्र हो गया और नूरजहाँ के हाथ में बागडोर आ गई, पर भाग्य का उलट-फेर किसी के हाथ में नहीं। इस समय से नूरजहाँ का भाग्य-चन्द्रमा अस्तोन्मुख हुआ और शाहजहाँ का भाग्य-सूर्य उदयोन्मुख। बेचारा शाहजहाँ धन और जन की शक्ति से होन होकर निराशा की दशा में सिन्ध की खाक छानता फिरता था और वहाँ से फारस की ओर भाग जाने का मंसूबा बांध रहा था, जब उसे समाचार मिला कि यादशाह महावत के हाथ से छूट गया है और महावतखां शाही फौज के डर से दक्षिण की ओर भागा जा रहा है शाहजहाँ की जान में जान आई। उसने फारिस का रास्ता छोड़कर दक्षिण को ओर मुंह मोड़ा, और शीग्र ही नूरजहाँ के क्रोध के दोनों शिकार मिलकर गद्ी को छीनने के उपाय सोचने लगे।

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उनके इस संकल्प में भाग्य भी सहायक हुआ जहाँगीर की बराबरी में प्याला चढ़ाने का अभिमान करने वाले राजकुमार परवेज का बुरहानपुर में देहान्त हो गया, यह बोतल और अफीम के गोले का शिकार हुआ। जहाँगीर काबुल से लौटकर लाहौर होता हुआ कश्मीर चला गया था, जहाँ शहरयार को सख्त बीमारी ने आ घेरा। उसे पहाड़ की सर्दी छोड़कर मैदान की ओर भागता पड़ा। कुछ दिनों बाद स्वयं जहाँगीर बीमार हो गया उसे दमे का रोग था बहुत से इलाज किये गये, परन्तु कोई लाभ न हुआ। अन्त को जलवायु-परिवर्तन का निश्चय किया गया। शाही काफिला कश्मीर से लाहौर की ओर रवाना हुआ, परन्तु जहाँगीर का विषय-सेवा द्वारा जर्जर और बीमारी से घायल शरीर यात्रा के कष्ट को बर्दाश्त न कर सका। रास्ते में ही उसका देहान्त हो गया।

इस प्रकार इस भले परन्तु निर्बल बादशाह का राज्य-काल समास हुआ। उसके राज्यकाल के २२ वर्षों का पूरा लेखा तैयार करें, तो परिणाम में घाटा ही दिखाना पड़ेगा। समकालिक देशी और विदेशी सभी इतिहास-लेखकों का मत है कि अकबर के समय में जो युद्ध शक्ति और प्रबन्ध की खूबसूरती थी, जहाँगीर के समय में वह बहुत घट गई थी। यह ठीक है कि कोई प्रदेश सल्तनत से जुदा नहीं हुआ था, परन्तु साथ ही यह भी सर्वसम्मत सच्चाई है कि राज्य का संगठन बहुत शिथिल हो गया था। राज्य की नीव अकबर के दूरदर्शितापूर्ण उदार कार्यों से पूरी तरह मजबूत होने भी न पाई थी, कि जहाँगीर के कमजोर हाथों से वह खोदी जाने लगी यह ठोक है कि उस मनमौजी बादशाह ने कोई ऐसे कार्य नहीं किये, जो सोधे तार से अकबर के विरोधी हों, परन्तु उसने ऐसे कार्य भी नहीं किये, जो साम्राज्य की रक्षा या वृद्धि में सहायक हों। परिणाम यह हुआ कि सल्तनत का शरीर तो रह गया. परन्तु उसमें आत्मा न रही।

जहाँगीर गुणों से होन नहीं था। वह हप्टपुष्ट था। यह कहना इस कथन के अन्तर्गत आ जाता है कि वह वावर का वंशज था । वह सौम्य अवस्था में उदार और मिलनसार था, परन्तु दोषों ने गुणों को आच्छादित कर दिया था। विपय-सेवा ने, जिसमें मद्य और स्त्री दोनों शामिल हैं उसके दिल को कमजोर कर दिया था वह अपनी इच्छा का आप मालिक नहीं रहा था। कहाँ वह अकबर, कि जो बुढ़ापे में भी यह हिम्मत रखता था कि जवानी के मद में मस्त सलीम को भरे दरबार में हाथ से पकड़कर घसीट ले और मुंह पर चपत रसीद करे, और कहाँ यह जहाँगीर कि विद्रोही पुत्र या विद्रोही सेनापति से आँख मिलाने का साहस नहीं करता था। जहाँ बादशाही की इच्छा ही कानून है, वहाँ इच्छा-शक्ति से हीन बादशाह यदि राज्य के लिए जहर सिद्ध हो, तो क्या आश्चर्य है?

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