October 31, 2020
संतो के अखाड़े ही है, भारतीय संस्कृति के रक्षक

संतो के अखाड़े ही है, भारतीय संस्कृति के रक्षक

आदि जगद्गुरु शंकराचार्य से पूर्व संतों-संन्यासियों के पद नाम नहीं थे, लेकिन विगत शताब्दियों में दशनाम संन्यासियों के पद नाम उनके नामों से जुड़ने पर विभिन्न अखाड़ों का गठन हुआ। अब संन्यासियों के ही सात अखाड़ों का वैष्णव संतों के अखाड़ों की हरिद्वार आदि तीर्थों में अहम भूमिका कुम्भों के दौरान होती है। इसी प्रकार कालांतर में कुम्भ स्नान परम्परा में निर्मल व उदासीन अखाड़े भी जुड़ गए।

कहा जा सकता है कि साधु-संन्यासियों के इन अखाड़ों के बिना कुम्भ पर्व अपूर्ण होता है। जाहिर है कि एक हाथ में शास्त्र दूसरे में संस्कृति व धर्म रक्षा के लिए शस्त्र संभाले संतों के लिए मेला प्रशासन प्राथमिकता पर व्यवस्थाएं भी करता है। संतों के अखाड़ों व पदनाम के विषय में इतिहास बताता है कि आदि शंकराचार्य भगवान ने अद्वैतवाद की स्थापना की। विधर्मियों से धर्म व संस्ड्डति की रक्षा के लिए उन्होंने संतों-संन्यासियों को शास्त्र के साथ शस्त्र भी सम्भालने का आह्नान किया। इसी के साथ सूत्रपात हुआ दशनाम संन्यासियों में दशनामी परम्परा का।

आदि शंकराचार्य महाराज ने भारतवर्ष की चारों दिशाओं में चार पीठ स्थापित कर अलग-अलग पदनाम से संन्यासियों को इनसे जोड़ दिया। शंकराचार्य के चार शिष्यों पद्मपाद, हस्तामलक, सुरेश्वर व त्रोटक का सम्बन्ध द्वारिका, जगन्नाथपुरी, जोशीमठ व श्रृंगेरी पीठ के क्रमानुसार रहा।

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शंकराचार्य भगवान ने पूर्व में जगन्नाथपुरी (उड़ीसा) पीठ को गोवर्धन पीठ नाम देकर ‘वन’ व ‘अरण्य’ पद इस पीठ से सम्बद्ध किए तो पश्चिम में द्वारिका (गुजरात) में शारदापीठ स्थापित कर इस पीठ से ‘तीर्थ’ व ‘आश्रम’ पदनाम इससे जोड़ दिए।

इसी प्रकार उत्तराखण्ड जोशीमठ (उत्तर) में ज्योर्तिपीठ स्थापित कर ‘गिरी’ ‘पर्वत’ तथा ‘सागर’ पदनाम इस पीठ से सम्बद्ध हुए। उन्होंने दक्षिण में स्थापित श्रृंगेरी पीठ से ‘पुरी’ ‘भारती’ व ‘सरस्वती’ पदनाम के संन्यासियों को जोड़ा।

यह सब कुछ आदि शंकराचार्य ने बिखरे हुए संत समाज को व्यवस्थित करने के लिए किया।

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कुम्भ पर सभी सम्प्रदाय पद नाम के संतों को एकत्र कर धर्मचर्चा व रीति-नीति निर्धारण की अनूठी परम्परा शुरू हुई जिसने कालांतर में विराट रूप ले लिया, जिसका वर्तमान स्वरूप हरिद्वार, नासिक, उज्जैन व प्रयागराज में लगने वाले कुम्भ पर दिखाई देता है। माध्यम चाहे कथा-प्रवचन हो या यज्ञ-अनुष्ठान लेकिन कुम्भ पर संत समाज लाखों-करोड़ों गृहस्थों के साथ मिलकर सामाजिक, धार्मिक व्यवस्था पर गहन चिन्तन करता है, जिसका निष्कर्ष रूप निकलने वाला अमृत ही आज भी भारतीय संस्ड्डति की अमरता को अक्षुण्ण बनाए हुए है।

संतो के अखाड़े ही है, भारतीय संस्कृति के रक्षक

श्री जूना अखाडा

जूना अखाड़े का महाकुम्भ पर्व में एक विशेष महत्व है। इस अखाड़े में नागाओं की सर्वाधिक संख्या होती है। इसके अलावा शाही स्नान की परम्परा के तहत यह अखाड़ा कुम्भ का ध्वजारोहण अखाड़ों में शामिल माना जाता है।

इस अखाड़े को भैरव अखाड़ा भी कहा जाता है। अखाड़े के ईष्टदेव भगवान दत्तात्रेय हैं। कुम्भ महापर्व पर संन्यासियों के सात, बैरागियों के तीन तथा उदासीन सम्प्रदाय के दो तथा निर्मल संतों का एक अखाड़ा शाही स्नान करता है। इन्हीं तेरह अखाड़ों के लिए कुम्भ क्षेत्र में मेला प्रशासन विशेष व्यवस्थाएं करता है। संतों के सभी अखाड़ों का अपना महत्त्व है, लेकिन जूना अखाड़ा में सबसे अधिक नागा साधु होते हैं।

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अखाड़े का इतिहास

पंचदशनाम जूना अखाड़ा की स्थापना उत्तराखण्ड स्थित कर्णप्रयाग में हुई। 1912 विक्रमी संवत कार्तिक शुक्ला दशमी मंगलवार को स्थापित जूना अखाड़ा का मुख्यालय हनुमान घाट है। सभी कुम्भ महापर्व में इस अखाड़े का प्रतिनिधित्व प्रभावी होता है।

हरिद्वार की अधिष्ठात्री मायादेवी, आनन्द भैरव व हरिहर महादेव मन्दिर इसी अखाड़े के आधीन हैं। पंचदशनाम संन्यासी अखाड़ों में सर्वाधिक नागा साधु इसी अखाड़े में बताए जाते हैं। हरिद्वार, वाराणसी, उज्जैन, नासिक, ओंकारेश्वर, जूनागढ़ व अमरकंटक में भी जूना अखाड़ा की शाखाएं हैं। वर्तमान में श्री महंत हरिगिरी महाराज अखाडे़ के महासचिव हैं।

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वर्तमान में इस अखाड़े के आचार्य महामण्डलेश्वर स्वामी अवधेशानन्द गिरी महाराज हैं। इनकी तपस्थली महामृत्युंजय आश्रम टेढ़ी नरम वाराणसी व हरिहर आश्रम पारद शिव मन्दिर कनखल है। हरिद्वार में यह अखाड़ा मायादेवी मन्दिर के पास हीस्थत है।

श्री निरंजनी अखाडा

कुम्भ मेला में निरंजनी अखाड़े का अपना महत्व है। इस अखाड़े में हजारों नागा संन्यासी हैं। हरिद्वार में इस अखाड़े से सम्बद्ध श्रवणनाथ मठ द्वारा पोस्ट ग्रेज्युएट कालेज का संचालन भी किया जा रहा है। निरंजनी अखाड़ा अपनी धार्मिक गतिविधियों के साथ शैक्षणिक क्रिया कलापों की वजह से नगर में खास पहचान रखता है। निरंजनी अखाड़ा की स्थापना विक्रमी संवत 960 में कार्तिक ड्डष्ण पक्ष षष्ठी तिथि को सोमवार के दिन हुआ था। इस अखाड़े की स्थापना कच्छ क्षेत्र में माण्डवी नामक स्थान पर बताई जाती है।

अखाड़े का मुख्यालय हालांकि इलाहाबाद में है लेकिन हरिद्वार में यह अखाड़ा मायापुर गंग नहर डाम के नजदीक गंगा किनारे स्थित है। मनसा देवी मन्दिर व विल्वकेश्वर महादेव मन्दिर इसी अखाड़ा के आधीन संचालित हैं। नगर का प्रमुख उच्च शिक्षण केन्द्र श्रवणनाथ मठ जवाहरलाल नेहरू पोस्ट ग्रेज्युएट कालेज व नगर की एकमात्र श्रवणनाथ मठ लाइब्रेरी तथा जय भारत साधु संस्ड्डत महाविद्यालय भी इसी अखाड़ा द्वारा स्थापित है, जिसका संचालन श्रवणनाथ मठ द्वारा किया जाता है। अखाड़े के आचार्य महामण्डलेश्वर तपोनिधि पुण्यानन्द गिरी महाराज हैं।

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अखाड़े का नियंत्रण एक 16 सदस्यीय कमेटी द्वारा किया जाता है। अखाड़े के महामण्डलेश्वरों का चयन उनकी विद्वत्ता के आधार पर किया जाता है। बताया जाता है प्रत्येक महामण्डलेश्वर के आधीन 20-25 संन्यासी होते हैं।

श्री पंचायती महा निर्वाणी अखाडा

कर्मकाण्ड व वेद विद्यालयों के द्वारा भारतीय संस्ड्डति व संस्ड्डत की अविरल धारा प्रवाहित रखने में श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। खास बात यह है कि नागा संन्यासियों की परम्परा में अग्रणी रहे इस अखाड़े की स्थापना हरिद्वार में ही हुई। दक्षेश्वर महादेव व नीलकण्ठ महादेव मंन्दिरों की व्यवस्था व संचालन महानिर्वाणी अखाड़े द्वारा ही की जाती है।

शिव की ससुराल कही जाने वाली कनखल नगरी में अवस्थित दक्ष प्रजापति मन्दिर व हिमालय में स्थित नीलकण्ठ महादेव मन्दिर की पहचान देश/विदेश में भारत के प्रमुख देवस्थलों के रूप में है। इन दोनों मंन्दिरों की देखभाल, रखरखाव महानिर्वाणी अखाड़े द्वारा की जाती है।

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महानिर्वाणी अखाड़े की स्थापना 805 विक्रमी सम्वत् में अगहन मास की शुक्ल पक्ष की दशमी दिन बृहस्पतिवार को हुई। बताया जाता है कि अखाड़े का पुनर्गठन 1805 ईस्वी में हुआ। बताया जाता है कि अटल अखाड़े के सात साधु भगवान गजानन महाराज का प्रसाद न मिलने से नाराज हो गए थे। ये संत अखाड़े से अलग हो गए थे। उक्त संतों ने गंगासागर जाकर कपिलाश्रम में तप करना शुरू कर दिया।

इन्हीं संतों ने कपिल मुनि से आशीर्वाद व आज्ञा पाकर हरिद्वार में आकर महानिर्वाणी अखाड़े की स्थापना की, श्री महंत भवानन्द गिरी महाराज के नेतृत्व में 22000 नागा संन्यासियों ने कनखल में सन् 1260 में पहुंचकर विजय ध्वज स्थापित कर दिया। जिस स्थान पर यह विजय ध्वज स्थापित हुआ आज भी यह अखाड़ा उसी स्थान पर स्थित है। अखाड़े का प्रधान कार्यालय दारागंज प्रयागराज में है। अखाड़े की अन्य शाखाएं ओंकारेश्वर, कुरुक्षेत्र, नासिक व काशी में भी हैं। अखाड़े को व्यवस्थाओं की दृष्टि से चार सम्भाग में बांटा गया है। भगवान श्री कपिलदेव को महानिर्वाणी अखाड़े का ईष्टदेव माना जाता है।

अखाड़े में प्रत्येक कुम्भ के दौरान पंचायती प(ति से पदाधिकारियों का चुनाव होता है। अखाड़े की व्यवस्था के अन्तर्गत मुख्य नियंत्रण आठ श्री महंतों व आठ कारोबारी का रहता है। प्रत्येक कार्य में आठ-आठ सचिव होते हैं। खास बात यह भी कि अखाड़ा की गतिविधियों के संचालन के लिए विधायिका व कार्यपालिका की इस अखाड़े में अलग ही व्यवस्था है।

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संतो के अखाड़े ही है, भारतीय संस्कृति के रक्षक

श्री पंचायती बडा अखाडा उदासीन

यह अखाड़ा राजघाट पर कनखल में स्थित है। इसका मुख्य कार्यालय इलाहाबाद में है। इस अखाड़े का संचालन 3 महंतों की एक कमेटी करती है। इस अखाड़े की स्थापना श्री निर्वाण प्रियतमदास जी महाराज ने माघ सुदी पंचमी संवत् 1840 को हरिद्वार में उदासीन सम्प्रदाय के संतों/महंतों को एकत्र कर उदासीन पंचायती अखाड़ा की स्थापना की। श्री प्रियतमदास जी भस्म जटाधारण किए हुए निरंतर तपस्वी निर्वाण रहते थे, ये बड़े विद्वान व्यक्ति थे।

श्रीचन्द्र महाराज इस सम्प्रदाय के एक मात्र आचार्य हैं। उनके बाद कोई भी इस सम्प्रदाय में आचार्य पद प्राप्त नहीं कर सका। उन्होंने धूनी या धूने को निर्वाण संत की उपासना का प्रमुख प्रतीक बताया। बाद में इनके शिष्यों ने इस सम्प्रदाय की रक्षा की। श्रीचन्द्र महाराज के आशीर्वाद से पुरस्ड्डत पद पाने वाले साधु मण्डल बक्शीश के साधु कहे जाते हैं। इनमें 6 बक्शीश और 10 उपबक्शीश के साधु हैं। 6 बक्शीश में प्रथम नाम भक्त भगवान दरगाह परवान का आता है। इनको श्रीचन्द्र जी महाराज ने दीक्षा दी। इनके 360 शिष्य हुए।

उदासीन सम्प्रदाय में दीक्षित प्रत्येक व्यक्ति का धर्म है कि वह ओंकार सहित वेद अध्ययन करें। इनका गोत्र अच्युत, हंसवर्ण, अचल ध्वजा, निराशमठ और आत्मतीर्थ होता है। ये काषाय वस्त्र, अमृत, जल, भोजन, गुद्डी, अचला और चोला धारण करते हैं। उदासीन योग माला, तिलक, छत्र, रणसिंगा, चंवर आदि चिन्हों से सम्पन्न होते हैं।
उदासीन पंचायती अखाड़े की स्थापना के समय चारों धूणों तथा बक्शीश-उपबक्शीशों के महंत एकत्र हुए थे।

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इस अखाड़े की शाखाएं गोपीगंज, काशी, गया, वृन्दावन, कुरुक्षेत्र, अमृतसर, उज्जैन, त्रयम्बकेश्वर, पटियाला आदि जगहों पर हैं। अखाड़े द्वारा हरिद्वार में एक उच्चकोटि का उदासीन संस्ड्डत महाविद्यालय भी संचालित है।

पूज्य पुरुषों की समाधि पूजा, श्री चन्द्राचार्य जी की मूर्ति प्रतिष्ठा, गोला साहब की प्रतिष्ठा, तीर्थ, व्रत, उपवास, मन्दिर निर्माण अनुष्ठानों में विश्वास रखने के कारण उदासीन सम्प्रदाय सनातनी हिन्दू सम्प्रदाय है। पंचदेव मन्दिरों और यज्ञों की प्रतिष्ठा, लोकहित के कार्य इस अखाड़े के प्रमुख लक्ष्य हैं।

इस अखाड़े में अनेक महामण्डलेश्वर तथा मण्डलेश्वर हैं जो वेद तथा भारतीय संस्ड्डति के ऊपर प्रवचन करते हैं। ये लोग अन्य संन्यासियों के साथ धर्म प्रचार कार्य में रत रहते हैं। वर्तमान समय में इस अखाड़े के महन्त श्री मोहन दास हैं।

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श्रीपंचायती नया अखाडा उदासीन

श्री पंचायती नया अखाड़ा उदासीन भी कुम्भ मेला के शाही स्नान में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। बताया जाता है कि उदासीन सम्प्रदाय व श्रीचन्द्र भगवान का उपासक नया अखाड़ा उदासीन पहले बड़ा पंचायती उदासीन में ही था। बड़ा अखाड़ा की स्थापना के करीब दो सौ से भी अधिक वर्ष बाद नया अखाड़ा ने बड़ा अखाड़ा से अलग होकर अपना मुख्यालय झण्डा चैक कनखल में बना लिया। अखाड़े के प्रवर्तक गुरु संगत साहब सच्ची दाढ़ी वाले बताए जाते हैं।

नया अखाड़ा के भी आराध्य देव श्री श्रीचंद्र जी महाराज ही हैं, जिनकी स्वर्ण एवं रजत प्रतिमा लेकर यह अखाड़ा कुम्भ पर हरकी पौड़ी ब्रह्मकुण्ड में स्नान के लिए जाता है। बताते हैं कि 1902 ईस्वी में प्रयाग राज के महात्मा सूरज दास की प्रेरणा से प्रयाग में ही इस अखाड़े की स्थापना हुई थी। इस अखाड़े में केवल संगत साहब की परम्परा से जुड़े साधु ही सम्मिलित होते हैं। नया अखाड़ा का पंजीकरण 6 जून 1913 को आठ महंतों के हस्ताक्षरों से हुआ।

अखाड़े का संचालन चार रमता पंच महंतों द्वारा किया जाता है जो कुम्भ के समय भ्रमण करते हुए हरिद्वार आ जाते हैं। हरिद्वार में अखाड़े ने कई महत्वपूर्ण सामाजिक दायित्त्वों का निर्वहन किया है। अखाड़े के संचालन के लिए चार पदाधिकारी होते हैं, जो क्रमशः अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महासचिव व सचिव के पदनाम से जाने जाते हैं। अखाड़े की शाखाएं प्रयाग, कुरुक्षेत्र, वाराणसी, त्रयम्बकेश्वर, उज्जैन व अमृतसर आदि में हैं। इस अखाड़े में 1998 के महा कुम्भ में महज तीन महामण्डलेश्वर थे लेकिन अब अखाड़े में आठ महामण्डलेश्वर हैं।

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श्री पंच अग्नि अखाडा

कुम्भ मेला की भव्यता, पौराणिकता व संस्ड्डति के परिचायक अखाड़ों की अपनी-अपनी मान्यताएं व परम्पराएं हैं। श्री पंच अग्नि अखाड़ा की परम्परा व मान्यता बिल्कुल पृथक मानी जाती है।

इस अखाड़े के सदस्य केवल ब्राह्मण ही बन सकते हैं। इस अखाड़े में नैष्ठिक ब्रह्मचारियों को ही दीक्षित किया जाता है। हरिद्वार में अखाड़े का संचालन सि(पीठ दक्षिणा काली मन्दिर से ही होता है।

श्री पंच अग्नि अखाड़ा को श्री दशनाम पंच अग्नि अखाड़ा भी कहा जाता है। बताया जाता है कि श्री पंच अग्नि अखाड़ा की स्थापना आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को विक्रमी संवत 1192 सन् 1136 में हुई। अखाड़े का मुख्यालय नया महादेव राजघाट मकान नम्बर ए-11/30 सी वाराणसी में है।

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अखाड़े की शाखाएं हरिद्वार के अलावा प्रयागराज, त्रयम्बकेश्वर उज्जैन, बरेली, बिलावा, इन्दौर, अहमदाबाद, मऊरानीपुर, कामाख्या, जूनागढ़, भोपाल, गोरेगांव, रेणुका जी व राजस्थान में जयपुर, जोधपुर आदि स्थानों पर हैं। अखाड़ा के आचार्य महामण्डलेश्वर श्रीमद् रामड्डष्णानन्द महाराज हैं जो अमरकंटक में निवास करते हैं। सचिव महामण्डलेश्वर कैलाशानन्द महाराज हरिद्वार में चण्डीदेवी पर्वत के पैदल मार्ग स्थित दक्षिण काली मन्दिर में निवास करते हैं।

अन्य अखाड़ों में जहां संन्यासी नागा साधु होते हैं वहीं इस अखाड़े में चतुर्नाम्ना कर्मकाण्डी नैष्ठिक ब्रह्मचारी होते हैं। ब्राह्मण परिवार में जन्मे साधु ही इस अखाड़े के सदस्य हो सकते हैं।

श्री पंचायती आनन्द अखाडा

कुम्भ मेले में शाही स्नान में शामिल होने वाले संन्यासी अखाड़ों में श्री पंचायती आनन्द अखाड़ा का नाम भी महत्वपूर्ण है। खास बात यह है कि इस अखाड़े की धर्म ध्वजा स्थापना, रमता पंच का आगमन व छावनी प्रवेश जहां अन्य अखाड़ों की तरह अलग-अलग होते हैं वहीं कुम्भ पर्व पर यह अखाड़ा तपोनिधि श्री निरंजनी अखाड़ा के साथ ही शाही स्नान करताहै। हालांकि इस अखाड़े में संतों-नागाओं की संख्या अन्य संन्यासी अखाड़ों की अपेक्षा कम है लेकिन अपने शौर्य गाथाओं पर अखाड़े के संतों को आज भी गौरव महसूस होता है।

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श्री पंचायती आनन्द अखाड़ा महानिर्वाणी की स्थापना आज से करीब ग्यारह सौ से भी अधिक वर्ष पूर्व विक्रमी सम्वत् 912 में हुई। ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि दिन रविवार को अखाड़े का गठन हुआ। हरिद्वार में आनन्द अखाड़ा श्रवणनाथ नगर में गुंजरावाला भवन के पास स्थित है। इस अखाड़े के आचार्य महामण्डलेश्वर तपोनिधि स्वामी देवानन्द सरस्वती महाराज का नाम विद्वान सन्तों में लिया जाता है।

अखाड़े का मुख्यालय वाराणसी में स्थित है तथा देश में विभिन्न जगहों पर आनन्द अखाड़ा की शाखाएं हैं। अखाड़े का संचालन एक कमेटी द्वारा किया जाता है जिसमें अष्ट कौशल के श्री महंतों के अलावा कारोवारी महंत भी शामिल होते हैं।

पूर्व में आनन्द अखाड़ा के नागा संन्यासियों ने विधर्मियों से कई युद्ध जीत कर भारतीय संस्ड्डति व सनातन धर्म की रक्षा में अपना अहम योगदान किया। उन्होंने बताया कि आनन्द अखाड़े के रमता पंचों के आगमन, अखाड़ा परिसर में धर्म ध्वजा की स्थापना व छावनी प्रवेश आदि सभी कार्यक्रम अलग से होते हैं लेकिन शाही स्नान के लिए आनन्द अखाड़ा तपोनिध् श्री पंचायती निरंजनी अखाड़ा के साथ ही निकलता है।

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संतो के अखाड़े ही है, भारतीय संस्कृति के रक्षक

श्री दिगम्बर अणी अखाडा

वैष्णव संतों के अखाड़ों में श्री पंच रामानन्दीय दिगम्बर अणी अखाड़ा का मुख्यालय अयोध्या में है। भगवान श्री राम इस अखाड़े के ईष्ट देव हैं। इस अखाड़े के पूर्व श्री महंत रामचन्द्र परमहंस महाराज थे जिनका नाम अयोध्या के श्रीराम जन्मस्थल पर मन्दिर निर्माण आन्दोलन में सुर्खियों में रहा। उनके ब्रह्मलीन होने के बाद अखाड़े के श्री महंत का दायित्त्व श्री महंत केशव दास महाराज सम्भाल रहे हैं। हरिद्वार में इस अखाड़े के दो प्रतिनिधि हैं जिनमें महंत भगवानदास महाराज व गरुड़ आश्रम के संचालक महंत बलरामदास बाबा हठयोगी हैं। महंत भगवान दास महाराज की देखरेख में श्रवणनाथ नगर स्थित रामानन्द आश्रम का तथा बाबा हठयोगी द्वारा गरुड़ आश्रम का संचालन हो रहा है।

श्री आवाहन अखाडा

कुम्भ मेला पर नागा संन्यासी अखाड़े का एक से बढ़कर एक महत्त्व है। आवाहन अखाड़ा की गौरव गाथा आज भी साधु-संतों में बखान की जाती है। अखाड़े के काशी स्थित दशाश्वमेध घाट का अपना पौराणिक महत्त्व व गौरवपूर्ण प्राचीन इतिहास है। अखाड़े की शाखाएं मुख्यतः उज्जैन, नासिक व प्रयाग में हैं। हरिद्वार में इस अखाड़े का मुख्यालय भूपतवाला में )षिकेश मार्ग पर स्थित है।

नागा संन्यासियों के आवहान अखाड़े की स्थापना विक्रमी संवत 706 ज्येष्ठ मास के ड्डष्ण पक्ष की नवमी तिथि दिन शुक्रवार बताई जाती है। अखाड़े का पुनर्गठन भी करीब चार शताब्दी पूर्व वर्ष 1606 में हुआ। अखाड़े के स्वामी अनूप गिरि व उमराव गिरि महाराज की शौर्यगाथाएं अखाड़े को गौरवान्वित करती हैं।

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आवाहन अखाड़े के आचार्य महामण्डलेश्वर स्वामी शिवेन्द्र पुरी महाराज हैं, उनका निवास स्थान ओंकारानन्द संन्यासाश्रम उल्लासनगर मुम्बई में स्थित है।

इसी अखाड़े के दूसरे महामण्डलेश्वर स्वामी ड्डष्णानन्द सरस्वती का निवास कैलाश टीकरी देवली गुजरात में है। अखाड़े का मुख्य केन्द्र दशाश्वमेध घाट वाराणसी में है। अखाड़ा के सभापति वर्तमान में श्री महंत भोला गिरी महाराज हैं। अखाड़ा के महासचिव का पद स्वामी शिवशंकर गिरी महाराज सम्भाले हुए हैं जो हरिद्वार से ‘देवात्मा’ नाम से एक साप्ताहिक समाचार पत्र के भी प्रकाशक/सम्पादक हैं।

इसके अलावा अखाड़े के चार अन्य सचिवों में स्वामी सत्यनारायण पुरी व स्वामी कैलाश पुरी शामिल हैं। अखाड़ा संचालन के लिए गठित 18 सदस्यीय कमेटी में सभापति व महासचिव के अलावा चार सचिव, वाराणसी के चार श्री महंत स्थानापति तथा रमता पंच परमेश्वर के एवम् चार श्री महंत अष्ट कौशल के होते हैं। अखाड़े के ईष्टदेव सिद्धि गणेश गजानन भगवान हैं जिनकी प्रतिदिन भव्य आरती पूजा अखाड़े की दैनिकी में अनिवार्य रूप से शामिल है।

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श्री शम्भू पंचायती अटल अखाड़ा

संन्यासी संतों के अखाड़े में श्री शम्भू पंचायती अटल अखाड़ा का नाम बड़ी शिद्दत के साथ लिया जाता है। इस अखाड़े की शौर्य गाथाओं का बखान भी प्रायः किया जाता है। अखाड़े के श्री महंत संन्यासी अटल अखाड़े को अखाड़ों में सबसे प्राचीन अखाड़ा बताते हैं। बताया जाता है कि इस अखाड़े के नागा संन्यासियों ने कई यु( भी लड़े और विजय श्री प्राप्त की।

श्री शम्भू पंचायती अटल अखाड़ा की स्थापना के बारे में बताया जाता है कि विक्रमी सम्वत् 703 में मार्ग शीर्ष माह के शुक्ल पक्ष चतुर्थी दिन रविवार को हुई थी। इस अखाड़े की शौर्य गाथाओं में सत्रहवीं शताब्दी में अखाड़े के वीर संन्यासी राजेन्द्र गिरि द्वारा झांसी के 117 गांवों पर आधिपत्य जमाने का जिक्र विशेष रूप से होता है। बताया जाता है कि अद्भुत वीरता के लिए इन्हें जोधपुर रियासत की ओर से नागौर ताल्लुका दान में दे दिया था।

अखाड़े का प्रशासनिक कार्यालय विशेश्वर गंज चैक हनुमान काशी में है तथा कई अन्य जगहों पर भी अखाड़े की शाखाएं हैं। हरिद्वार में इस अखाड़े के क्रिया कलापों का संचालन शंकराचार्य चैराहा के पास स्थित अटल अखाड़ा से होता है। इस अखाड़े के आचार्य महामण्डलेश्वर स्वामी गीता मन्दिर के संचालक व अध्यक्ष भी हैं।

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बताया जाता है कि अखाड़े में गिरि-पुरी नामे की दावेदारी रहती है, लिहाजा दो सेक्रेटरियों में एक सचिव गिरि नामा से तथा दूसरा सचिव पुरी नामा से होता है। सचिव को ही अध्यक्ष की मान्यता होती है। वर्तमान में अटल अखाड़े के सेक्रेटरी पुरी नामे से स्वामी हरिचेतन पुरी तथा गिरि नामे से स्वामी राजगिरि महाराज हैं।

अखाड़ा संचालन कमेटी में रमता पंच के अष्टकौशल के आठ श्री महंत होते हैं जिनका निर्णय सर्वमान्य होता है। इसके अलावा अखाड़ा के अन्य कार्यों के संचालन की जिम्मेदारी आठ कारोबारी श्री महंतों पर होती है। अटल अखाड़े का पुनर्गठन 1704 ईस्वी में हुआ था।

अखाड़े के वीर नागा संन्यासियों द्वारा मुगल शासकों की ओर से युद्धों में भाग लेकर विजय श्री को प्राप्त करने की कथाएं आज भी संतों के बीच चर्चाओं में रहती हैं। अखाड़े की ओर से अनेको स्कूलों, चिकित्सालय व गौशालाओं का संचालन किया जा रहा है।

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श्री निर्मल अखाडा

कुम्भ मेला में जितना महत्त्व संन्यासी व वैष्णव अखाड़ों का है उतना ही महत्त्व उदासीन सम्प्रदाय के अखाड़ों का भी है। सिक्ख साधुओं को भी कुम्भ के शाही स्नान के लिए इन्हीं अखाड़ों के समान सम्मान दिया जाता है, लेकिन यह संत श्री निर्मल अखाड़े के अन्तर्गत ब्रह्मकुण्ड पर कुम्भ का शाही स्नान क्रम में शुमार नहीं किया जाता था लेकिन 1796 ईस्वी में पटियाला नरेश साहेब सिंह महाराज ने हरिद्वार में सशस्त्र संघर्ष कर सिख साधुओं के लिए कुम्भ में शाही स्नान के लिए सम्मानपूर्ण व्यवस्था कराई थी।
श्री निर्मल अखाड़ा में अधिकांश सिख साधु होते हैं। इस अखाड़े के मूल प्रवर्तक गुरु नानकदेव जी माने जाते हैं।

अखाड़े के साथ गुरुवाणी व संस्ड्डत-संस्ड्डति सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार में गुरु गोविन्द सिंह ने व्यापक योगदान किया। बताया जाता है कि गुरु नानक देव जी के प्रथम शिष्य संत भाई भागीरथ सिंह जी ने निर्मल मत का भारत की चारों दिशाओं में प्रचार किया। 1807 ईस्वी के कुम्भ मेला के दौरान ही कनखल स्थित डेरा बाबा दरगाह सिंह में निर्मल साधु इकट्ठा हुए। विक्रमी सम्वत् 1912 ;सन् 1856द्ध की भाद्रपद शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को पटियाला व संगरूर आदि नरेशों की मौजूदगी में अखाड़े की स्थापना हुई थी।

सन् 1796 में पटियाला के तत्कालीन नरेश साहेब सिंह महाराज द्वारा सिख साधुओं के लिए सम्मानपूर्ण कुम्भ स्नान की व्यवस्था सशस्त्र संघर्ष के बाद की गई थी। 1806 में श्रीमहंत बाबा मेहताब सिंह जी महाराज इस विरक्त अखाड़े के पहले श्री महंत बने। उन्होंने अपने कुरूक्षेत्र में लिए गए दृढ़ निश्चय के आधार पर ही निर्मल अखाड़े की विशिष्ट पहचान बनाने में महत्वपूर्ण योगदान किया। अखाड़े का मुख्यालय कनखल सती घाट पर हैं यहां अखाड़े की भव्य इमारत है।

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कुम्भ के समय निर्मल अखाड़े का ध्वजारोहण अपनी छावनी में ही होता है। अखाड़ा की छावनी रेलवे स्टेशन के पीछे निर्मला छावनी में होती है। अखाड़े के ईष्ट देव गुरु नानक देव हैं। शाही स्नान जुलूस में यह अखाड़ा गुरु ग्रन्थ साहिब लेकर चलता है।

अखाड़े के संत रामायण, गीता, वेद-पुराणों के साथ गुरु नानक देव जी के आदर्शों का प्रचार करते हैं। संत बनने के लिए अखाड़े में पांच वाणी के पाठ के साथ अमृतपान कराए जाने का विधान है। इसके बाद ही कोई संन्यासी निर्मल संत बनता है। अखाड़े के महामण्डलेश्वरों में श्री महंत सच्चिदानन्द साक्षी महाराज सांसद, श्री महंत संजीव हरी महाराज व श्री महंत भजनानन्द महाराज शामिल हैं। इस अखाड़े के महंत आजीवन रहते हैं।

अखाड़े के संचालन के लिए एक जनरल बाॅडी के अलावा एक वर्किंग कमेटी होती है। अखाड़े की देशभर में 28 शाखाएं हैं जिनमें कुरुक्षेत्र, उज्जैन, प्रयागराज, अमृतसर, पटियाला व समाना मुख्य हैं। समाना में अखाड़े द्वारा एक पब्लिक स्कूल का संचालन किया जा रहा है जबकि अखाड़े द्वारा कनखल में निर्मल संस्ड्डत महाविद्यालय व बनारस में भी संस्ड्डत महाविद्यालय संचालित हो रहा है। निर्मल अखाड़ा द्वारा समय-समय पर समाज के बीच जनोपयोगी कार्यक्रम संचालित किए जाते हैं।

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संतो के अखाड़े ही है, भारतीय संस्कृति के रक्षक

श्री पंच निर्वाणी अणी अखाडा

वैष्णव संतों के अखाड़ों में अखिल भारतीय श्रीपंच निर्वाणी अणी अखाड़ा का विशेष महत्व है। इसी अखाड़े के स्वामी ज्ञानदास महाराज अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं। अखिल भारतीय श्रीपंच निर्वाणी अणी अखाड़ा के संचालन का मुख्य कार्यालय हनुमानगढ़ी अयोध्या से होता है। अखाड़े के वर्तमान श्रीमंहत धर्मराज महाराज हैं। महासचिव पद का दायित्त्व स्वामी गौरीशंकर दास महाराज के पास है। अखाड़े से अन्य सात अखाड़े भी सम्ब( हैं जिनके अलग-अलग जगह कार्यालय हैं।

श्री बैरागी सम्प्रदाय

जगद्गुरु रामानन्दाचार्य महाराज ने ही बैरागी ;वैष्णवद्ध सम्प्रदाय की स्थापना की थी। रामानन्दाचार्य महाराज का प्रादुर्भाव भारत में ऐसे समय हुआ जब समाज, ऊंच-नीच व जात-पात की विकृतियों से ग्रसित था। जगद्गुरु रामानन्दाचार्य महाराज ने सभी लोगों में समानता का भाव रखते हुए 12 प्रधान शिष्य बनाए। ये सभी शिष्य निर्गुण भक्ति के प्रमुख प्रणेता रहे। इनमें कबीरदास, भक्त रैदास, सैन भक्त तथा धन्ना जाट आदि प्रमुख रूप से शामिल थे।

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गोस्वामी तुलसीदास के कारण यह सम्प्रदाय विश्वविख्यात हो गया। गोस्वामी जी ने सामाजिक क्रान्ति को नए आयाम देते हुए महिलाओं को भी भक्ति व शिक्षा के लिए दीक्षित किया। बताया जाता है कि महारानी पद्मावती को स्वामी रामानन्दाचार्य ने ही दीक्षित किया था।

वैष्णव संतों का इतिहास बताता है कि 17वीं शताब्दी में प्रतापी वैष्णव संत बालानन्द महाराज ने ही ‘रामादल’ का गठन किया था। बालानन्द महाराज ने ही अणी अखाड़ों की स्थापना की थी। बताते हैं कि विक्रमी सम्वत् 1729 में रामादल में स्वामी बालानन्द महाराज ने माधव, विष्णु स्वामी तथा निम्बार्क मत के अनुयायी वैष्णव संतों को भी मिला लिया।

बालानन्द महाराज ने क्रमशः तीन अणियों दिगम्बर अणी, निर्वाणी अणी व निर्मोही अणी के अलावा सात अखाड़ों की स्थापना की थी। तीन अणियों के अलावा जिन अखाड़ों की स्थापना की उनमें दिगम्बर, निर्वाणी, निर्मोही खाकी, निरावलम्बी, संतोषी तथा महानिर्वाणी शामिल है। वर्तमान में अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद जिसमें संन्यासी, उदासीन निर्मल व सभी वैष्णव अखाड़े सम्मिलित रहते हैं उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष वैष्णव संत स्वामी ज्ञानदास महाराज हैं जिनका आश्रम भी बैरागी कैम्प

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