October 31, 2020
आध्यात्मिक केन्द्र और कुम्भनगरी हरिद्वार का एक परिचय

आध्यात्मिक केन्द्र और कुम्भनगरी हरिद्वार का एक परिचय

हिमालय की तलहटी में शिवालिक श्रेणी के अन्तर्गत समुद्रतल से 294 मीटर ऊँचाई पर पवित्र गंगा के दाहिने किनारे पर हरिद्वार तीर्थ स्थित है। हरिद्वार को पौराणिक ग्रंथों में मायापुरी, गंगाद्वार, स्वर्गद्वार आदि नामों से जाना गया है। इस स्थान का नाम ‘हरद्वार’ या ‘हरिद्वार’ दोनों ही हैं अर्थात् ईश्वर का द्वार। यहां से हिमालय पर्वत शृखलाएँ शुरू हो जाती हैं।

शिव के उपासक जो केदारनाथ की यात्रा पर जाते हैं, इसे शिव से जोड़ते हुए ‘हरि-द्वार’ तथा वैष्णव मत वाले यात्री जो बदरीनाथ की यात्रा करते हैं, इसे ‘हरिद्वार’ नाम से पुकारते हैं। हिमालय की शिवालिक श्रृंखला से अलग होकर गंगा यहीं पर मैदान में प्रवेश करती है। अतः इसे ‘गंगाद्वार’ भी कहा गया है।

गंगा के तट पर बसा हुआ यह नगर हिमालय के चारों धामों का प्रवेश द्वार है। यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ तथा बद्रीनाथ धामों के लिए यहीं से यात्रा आरंभ होती है। पौने दो लाख से अधिक आबादी वाली इस देवनगरी में गंगा के दोनों ओर विशिष्ट प्राड्डतिक सौन्दर्य देखने को मिलता है। पौराणिक धर्म ग्रंथों में हरिद्वार के पांच स्थानों का महत्व बताया गया है।

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हरिद्वार, कुशावर्ते, नील के बिल्व पर्वते।
स्नात्वा कनखले तीर्थें, पुनर्जन्म न विद्यते।।

अर्थात् हर-की-पैड़ी, कुशावर्त, नीलधारा, कनखल तथा बिल्व पर्वत पर स्नान करने से पुनर्जन्म नहीं होता। बिल्व पर्वत के नीचे अब कोई नदी स्नान के लिए नहीं है। निश्चय ही गंगा कभी बिल्वकेश्वर तक बहती ही होगी।

यह स्थान उत्तराखंड के चारों धामों का प्रवेश द्वार तो है ही साथ ही अपने आप भी बड़ा महत्वपूर्ण तीर्थ है। शास्त्रों में सप्तपुरियों का विशेष महत्व बताया गया है। इन सप्तपुरियों में हरिद्वार भी एक पुरी है। इसका प्राचीन नाम ‘मायापुरी’ है।

अयोध्या, मथुरा, माया, काशी कांची अवन्तिका।
पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्ष दायिकाः।।

ये सात पुरियाँ बड़े महत्वपूर्ण तीर्थ माने गये हैं। यहां पर हर बारहवें वर्ष संसार का सबसे बड़ा मेला कुंभ मेला लगता है। हर छठे वर्ष अर्धकुम्भ मेला होता है। हरिद्वार के प्रमुख तीर्थ स्थलों में-

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हर-की-पौड़ी

हर-की-पौड़ी हरिद्वार

यहां पर स्नान का विशेष महत्व है। कहते हैं कि हर की पैड़ी ही वह स्थान है जहाँ पर ब्रह्मा जी ने सर्वप्रथम भागीरथी का स्वागत किया था। पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने गंगा तट पर हरकी पैड़ी को आज का यह भव्य रूप प्रदान कराया था। यहां पर गंगा धारा चौड़ी है पर गहरी कम है। इसी में यात्री स्नान करते हैं। चबूतरे पर एक विशाल घंटा घर है। स्नान के बाद गंगा की आरती की जाती है। पत्ते के दोने में फूल के साथ दीपक रखकर गंगा में चढ़ाये जाते हैं।

हर की पौड़ी पर भगवान के चरण चिन्ह वाला एक मंदिर बना हुआ है। गंगा जी का भी एक मंदिर यहां है। इसके अतिरिक्त यहां बारह खम्भा मंदिर तथा शंकराचार्य मंदिर है। हर की पैड़ी के विशाल लम्बे चैड़े घाट पर एक बाजार जैसा लगा रहता है। वहीं पूजा के लिए फूल, दूध तथा अन्य छोटी मोटी वस्तुएं मिल जाती हैं। यहां के घाट बड़े सुंदर बने हुए हैं। यहां गंगा जी का जल बर्फ जैसा शीतल है।

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गंगा के आगमन से पूर्व हरिद्वार ब्रह्मा का तीर्थ था जहां आज हर की पौड़ी है, वहां कभी ब्रह्मा कुंड था| अभी भी हर की पौड़ी को ब्रह्मकुंड कहा जाता है | यही वह स्थान है जहां समुद्र मंथन के पश्चात अमृत कलश को रखा गया ऐसा माना जाता है | मान्यता है की तभी से यहाँ ६ वर्ष में अर्ध कुम्भ तथा १२ वर्ष पश्चात पूर्ण कुम्भ लगता है | स्कंद पुराण में चार स्थानों पर कुम्भ की परम्परा का उल्लेख कुछ इस प्रकार किया है |

हरिद्वार प्रयागे च धारा गोदावरी तटे।
कलशान्यो हियोशोयं प्रोच्यते शंकरादिभिः।।

मान्यता है कि हरिद्वार में कुम्भ राशि के बृहस्पति तथा मेष राशि पर सूर्य के होने पर गंगा में स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। हर की पौड़ी को दिव्य घाट के नाम से जाना जाता है। यात्रियों की सुरक्षा एवं सुविधा को देखते हुए घाट पर लोहे की सांकल लगाई गई हैं।

संध्या के समय गंगा की आरती कई जलते हुए दीपों को प्रवाहित कर की जाती है। गंगा की आरती का यह दृश्य आकर्षक लगता है। हर की पैड़ी पर ही गंगा मंदिर, शंकराचार्य मंदिर, लक्ष्मी-नारायण मंदिर, नवग्रह तथा गंगाधर मंदिर दर्शनीय हैं।

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कुशावर्त

कुशाघाट पर दत्तात्रेय ने तपस्या की थी। गंगा जब हरिद्वार पहुंची तो वह ऋषि के दंड, कमंडल तथा कुशाएं लेकर चलती बनी। दत्तात्रेय की तपस्या भंग हो गई। उनके तेज से गंगा आगे नहीं बढ़ पाई तथा आवर्तमय होकर यहीं बहने लगी। बाद में गंगा की प्रार्थना पर ऋषि ने गंगा को जाने दिया। कुशावर्त घाट पर आज भी गंगा सीधी जाकर वापस आवर्त बनाते हुए लौटती है। यात्री यहां पर श्राद्ध तथा पितृ तर्पण आदि करते हैं। माना जाता है कि यहां पर पितरों को पिण्ड दान करने से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है।

नीलधारा

नीलधारा हरिद्वार

नील नामक एक तपस्वी की तपस्या के कारण इस पर्वत का नाम नील पर्वत पड़ा। यहां बह रही गंगा की धारा को नीलधारा कहते हैं। गंगा की लहर के बाहर नील पर्वत की तलहटी में स्नान के बाद नीलेश्वर महादेव के दर्शन का विशेष महात्म्य माना जाता है। नील शिखर पर ही 4 किमी. चढ़ाई के बाद चण्डी मंदिर है। यहां चण्डी चौदस पर भव्य मेला लगता है।

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कनखल

हरिद्वार के पास ही कनखल है। यह स्थान दक्ष प्रजापति से संबंधित है। दक्ष प्रजापति ‘सती’ के पिता थे। इस स्थान के पास ही वह स्थल है जहां पर दक्ष प्रजापति ने यज्ञ किया था और उस यज्ञ में भगवान शंकर को नहीं बुलाया था। सती अपने पति का यह अपमान नहीं सह सकीं उन्होंने यज्ञकुंड में कूद कर आत्मदाह कर लिया। यहां पर दक्षेश्वर महादेव का मंदिर बना हुआ है। थोड़ी दूरी पर ‘सतीकुंड’ है। इस स्थान पर शिवरात्रि के अवसर पर एक विशाल मेला लगता है।

किसी समय यह स्थान ब्रह्मा के मानस पुत्र दक्ष प्रजापति की राजधानी था। ऐसा माना जाता है कि रामायण काल में ब्राह्मण हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए भगवान श्रीराम यहां पधारे थे। यहां स्नान के पश्चात् राम ने देवप्रयाग तथा लक्ष्मण ने ऋषिकेश में तपस्या की थी। हरिद्वार में कुछ सौ वर्ष पूर्व तक कोई आबादी नहीं थी। हरिद्वार के आदि निवासी तीर्थ पुरोहितों के मकान हरिद्वार में न होकर अब भी कनखल या ज्वालापुर में हैं। गंगातट पर गृहस्थोचित कार्य करना पाप माना जाता है। तीर्थ यात्री तथा साधु-संतों के अखाड़े भी कनखल में ही थे। कनखल में शीतला देवी और हनुमान मंदिर भी दर्शनीय हैं।

मनसा देवी

यह हरिद्वार का प्रसिद्ध मंदिर है। एक पहाड़ की चोटी पर यह मंदिर बना हुआ है। हर की पौड़ी से आगे मनसा देवी के ऊपर जाने का मार्ग आ जाता है। पहले मंदिर तक 2-3 कि.मी. का चढ़ाई वाला मार्ग, यात्री पैदल चलकर ही जाते थे। परंतु अब रज्जुमार्ग बन गया है।

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अतः बहुत से यात्री इसी से, पर्वत शिखर पर पहुंच जाते हैं। कुछ यात्री पैदल चलकर ही देवी के दर्शन करते हैं। मनसा देवी में पहाड़ी के ऊपर एक विशाल वृक्ष है। जिसमें लोग पताकाएं तथा रंगीन वस्त्र बांधकर मनौतियां माँगते हैं।

शांतिकुंज

हरिद्वार से छः किलोमीटर दूर ऋषिकेश मोटर मार्ग पर गंगा के तट पर एक शांत एकांत स्थान पर यह आश्रम है। जो बड़ी महत्वपूर्ण गतिविधियों का केन्द्र है। इस आश्रम को एक तपोवन का रूप दिया गया है। यहां आश्रमवासियों को तप, स्वाध्याय के साथ ही साथ स्वावलम्बन की शिक्षा भी दी जाती है।

आश्रम की एक विज्ञानशाला (ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान) भी है जहाँ पर वैज्ञानिक ढंग से, ध्यान और प्रार्थना का मन, मस्तिष्क और शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है, इसका अध्ययन किया जाता है। यहीं पर नीचे के कक्ष में गायत्री की 24 शक्तिधाराओं की मूर्तियां प्रतिष्ठित हैं और ऊपर के कक्ष में प्रयोगशाला है।

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चंडी देवी

हरिद्वार के सामने गंगा के उस पार बायें तट पर पहाड़ी के ऊपर वनों के बीच चंडी देवी का मंदिर है। गंगा को पार करके मार्ग पहाड़ी के ऊपर चढ़ने लगता है। पहाड़ी के शिखर पर प्राचीन मंदिर बना हुआ है। घनी हरियाली के बीच शांत एकांत स्थान में यह मंदिर बड़ा दिव्य लगता है।

चंडी देवी हरिद्वार

भीम गोडा

हरिद्वार से ऋषिकेश जाने वाले मोटर मार्ग पर हरिद्वार से दो किलोमीटर दूर भीम गोडा नामक स्थान है। कहते हैं कि पांडव भीम ने इस स्थान पर तपस्या की थी। धर्मराज युधिष्ठिर के कहने पर भीम ने उत्तराखंड की यात्रा पर जाते हुए प्रतिज्ञा की थी। अपना पैर जमा कर प्रण किया था कि मैं आज से शस्त्र नहीं उठाऊंगा। इसी कारण इस स्थान का नाम भीमगोडा हो गया। इस स्थान पर एक तालाब है और एक शिव मंदिर भी है।

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सप्तऋषि आश्रम

भीम गोडा से तीन किलोमीटर दूर यह सुरम्य स्थल है। यहां पर गंगा की सात धाराएं दिखाई पड़ती हैं। इस स्थल पर कश्यप, अत्रि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज तथा गौतम इन सात ऋषियों के आश्रम बने हुए थे। ये ऋषि इस स्थान पर तपस्या कर रहे थे। गंगा जब पृथ्वी पर आयीं और इस स्थान के पास पहुंचीं तो उनके मन में विचार आया कि वे किस मार्ग से आगे बढ़ें।

इन ध्यानरत ऋषियों की सुविधा के लिए गंगा इन सातों ऋषियों के आश्रम के निकट से होकर आगे बढ़ी, जिससे सभी ऋषियों को जल की सुविधा हो जाये। इस कारण यहां पर गंगा की सात धाराएं हो गयीं। यहां पर सात ऋषियों का एक-एक मंदिर है। यहां पर संस्ड्डत का महाविद्यालय भी है। इस स्थान को सप्तसरोवर भी कहते हैं।

नीलेश्वर मंदिर

पहाड़ की चोटी पर एक अति प्राचीन मंदिर बना हुआ है। नील नाम के एक व्यक्ति ने यहां पर कठोर तपस्या करके भगवान शंकर को प्रसन्न किया था। उसी के नाम पर इस मंदिर का नाम नीलेश्वर हो गया। मंदिर के पास ही गंगा की मुख्य धारा बहती है। इसे नीलधारा भी कहते हैं।

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बिल्वकेश्वर

विल्व नामक पर्वत के नीचे भगवान शंकर का यह मंदिर बना हुआ है। इसके पास ही थोड़ी दूरी पर गौरी कुंड है जहां पार्वती जी ने तपस्या की थी। इस पर्वत में एक गुफा है जिसमें कुछ वर्षो पहले एक सिद्ध संत निवास करते थे और अध्यात्म चिन्तन करते थे। इस गुफा में उस संत की एक संगमरमर की मूर्ति बनी हुई है। गुफा के अंदर एक जल की धारा बहती है। पता नहीं चलता कि यह जल की धारा कहां से निकलती है। आगे चलकर जल की यही धारा गंगा में विसर्जित हो जाती है।

इन पवित्र स्थलों के अतिरिक्त रामघाट, विष्णुघाट, भैंरों अखाड़ा, माया देवी मंदिर, गणेश मंदिर, श्रवण मंदिर, नारायणी शिला के दर्शनों का भी महात्म्य माना जाता है।। इस देवनगरी में अन्य दर्शनीय स्थल गुरूकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, भारत हैवी इलैक्ट्रीकल्स, देव संस्ड्डति विश्वविद्यालय, गोरखनाथ गुफा, गीता भवन, काल भैरव मंदिर तथा कई अखाड़े व धर्म-साहित्य की अभिवृद्धि करने वाले दर्शनीय स्थल मौजूद हैं। प्राचीन काल से हरिद्वार आध्यात्मिक साधनाओं के साथ-साथ भारत के प्रमुख पर्यटन स्थलों में भी गिना जाता है।

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