हरिद्वार में कुम्भ पर बृहस्पति का कुम्भस्थ होना जरूरी

हरिद्वार में कुम्भ पर बृहस्पति का कुम्भस्थ होना जरूरी

कुम्भ मेला का आयोजन केवल निर्धरित बारह साल की काल गणना के आधर पर ही नहीं होता, बल्कि खगोलीय ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति इस महापर्व की अन्नत कालीन प्रमाणिकता है।

मसलन प्रत्येक बारह वर्ष बाद जब हरिद्वार में कुम्भ का आयोजन होता है तो सौरमण्डल का सबसे बड़ा ग्रह बृहस्पति कुम्भ राशि में संचार करता है तथा सूर्य मेष राशि में स्थित होता है। कमोबेश इसी प्रकार की ग्रह स्थित अन्यत्रा जगहों पर भी होती है। जहां-जहां कुम्भ मेला आयोजित होता है।

हरिद्वार में कुम्भ पर बृहस्पति का कुम्भस्थ होना जरूरी

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विश्व का सबसे बड़ा सांस्कृतिक मेला कुम्भ भारतीय संस्कृति का विशेष आकर्षण है। इस पर्व का उत्साह सदियों से भारतवासियों में ही नहीं विदेशियों में भी रहता है। खास बात यह है कि कुम्भ किन स्थितियों में और क्यों रहता है यह जिज्ञासा लगभग सभी के मन में रहती है।

  • सिंह राशि में गुरु के विचरण के समय नासिक व उज्जैन में लगता है कुम्भ मेला
  • ग्रहों की स्थितियां भी तय करती है कुम्भ मेले का आयोजन

राजस्थान देवस्थान विभाग के गंगा मन्दिर के पुजारी पं. महेन्द्र जोशी का कहना है कि इस महापर्व के पीछे देव-दानव शक्ति परीक्षण में समुद्र मंथन का कथानक विभिन्न पुराणों में वर्णित है जिसमें निकले कुम्भ कलश को दानवों से बचाने के लिए जहां-जहां रखा गया वहीं-वहीं प्रति बारह वर्ष बाद कुम्भ मेला का आयोजन होता है।

कुम्भ मेला के लिए ज्योतिर्गणना का भी प्रमुख आधार है। ज्योतिर्गणना के अनुसार हरिद्वार में होने वाले कुम्भ मेला के लिए बृहस्पति, सूर्य व चन्द्रमा का योग महत्वपूर्ण होता है। जब बृहस्पति कुम्भ राशि में संचार करता है तथा सूर्य मेष राशि में प्रविष्ट होता है तो हरिद्वार में कुम्भ पर्व का मेला होता है। इसी प्रकार प्रयाग में कुम्भ के लिए दो ग्रहों का योग प्रभावित होता है।

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हरिद्वार में कुम्भ पर बृहस्पति का कुम्भस्थ होना जरूरी

बृहस्पति का मेष राशि में तथा सूर्य चन्द्रमा का मकर में होना अथवा बृहस्पति का वृष में और सूर्य का मकर में होना जरूरी है। वहीं बृहस्पति जब सिंह राशि में, सूर्य जब मेष राशि में अथवा शनि जब तुला राशि में और सूर्य एवं चन्द्रमा के भी उसी राशि में संचार होने पर महाकुम्भ का आयोजन उज्जैन में होता है।

कमोबेश नासिक में भी कुम्भ के दौरान सिंह राशि में बृहस्पति का संचार होता है। नासिक व उज्जैन को इसलिए कुम्भ के साथ सिंहस्थ स्नान भी कहा जाता है। कहा जा सकता है कि कुम्भ के लिए सौरमण्डल के सबसे बड़े ग्रह बृहस्पति की भूमिका सर्वाध्कि महत्वपूर्ण होती है।

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पौराणिक आख्यानों का आधर भी बताता है कि सूर्य की भूमिका जहां अमृत कुम्भ को पफूटने से बचाने में रही तो चन्द्रमा ने अमृत को नीचे नहीं गिरने दिया तथा बृहस्पति द्वारा अमृत कुम्भ को असुरों से स्पर्श करने से बचाया था। कमोबेश यह ग्रह स्थितियों आज भी सभी कुम्भ आयोजन तीर्थों पर होती है।

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