Krishna & Arjuna

सत्य अथवा धर्म की रक्षा का अभेद्य कवच गीता

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धर्म तथा सत्य दोनो एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं। धर्म का ही दूसरा नाम सत्य है तथा सत्य का ही दूसरा नाम धर्म है। सत्य से बढ़कर कोई दूसरा धर्म नहीं। वह सर्वोपरि धर्म है। उक्त सन्दर्भ में संस्कृत की सुक्ति फ्नाहि सत्यात् पगे धर्मःय् तथा तानस की पंक्ति फ्धर्मन दूसर सत्य समानाय् सतत् स्मरणीय है। सत्य के अन्तर्गत इस अन्नत कोटि ब्रह्माण्ड का सब कुछ समाहित है।

यदि सत्य सुरक्षित है तो सब कुछ सुरक्षित है और यदि यह असुरक्षित है तो सब कुछ असुरक्षित है। सत्य अपने आप में सबको समाहित कर लेता है। भगवान कृष्ण सत्य अथवा धर्म के सबसे बड़े रक्षक हैं तथा उनका गीता इसकी रक्षा करने का सर्वोत्तम मार्ग प्रशस्त करता है। कृष्णजी, समय-समय पर काल की आवश्यकतानुसार इस धरा धम पर अवतरित होकर अतीत काल से धर्म अथवा सत्य की रक्षा करते आए हैं। वर्तमान में भी कर रहे हैं तथा भविष्य में भी करते रहेंगे क्योंकि यदि वे इसकी न्यूनाधिक रक्षा न करें तो दुर्जन इसको मूल से ही समाप्त कर दें परन्तु ऐसा हो पाना सम्भव नहीं है। भगवान धर्म की रक्षा अवश्य करते हैं।

धर्म की ह्यासोन्मुखी अवस्था में वे इस धरा धम पर अवतरित होते हैं। भगवान इस पृथ्वी पर अवतरित होकर साधु अथवा सज्जनो की रक्षा, दुष्टों अथवा दुर्जनों का विनाश तथा धर्म की स्थापना ये तीन कार्य करते हैं। उन्होंने गीता के निम्न श्लोकों में उसको स्पष्ट किया हैः

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यदा यदा हि धर्मस्य गलानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।
परित्राणाय साध्ूनां विनाशाय च दृष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्धय संभवामि युगे-युगे।।
                                                     -गीता अध्याय-4, श्लोक 7 व 8

भगवान कृष्ण ने उक्त श्लोकों में अपने अवतार के कारणों में सर्वप्रथम संतों, साध्ुओं तथा सज्जनों की रक्षा के कारण को ही रेखांकित किया है। क्योंकि यदि इनकी रक्षा हो गयी तो समझना चाहिए कि सबकी रक्षा हो गई। क्योंकि संतों का तो सब कुछ परोपकार के लिए ही होता है। वे दूसरों के लिए ही जीते हैं। उनका सब कुछ दूसरेां के लिए ही होता है उनका अपना कुछ भी नहीं होता। संत जन सदैव दूसरों को देते ही रहते हैं। वे जगत को जगदीश्वर का स्वरूप समझकर उसके साथ तद्रूप व्यवहार करते हैं। भगवान संतों की रक्षा इसलिए करते हैं क्योंकि उनकी रक्षा होने पर सबकी रक्षा स्वतः हो जाती है क्योंकि दूसरों की रक्षा करना संत का सहज स्वभाव है। वे अपने मन, वचन तथा कर्म से सबका उपकार करते हैं। ऐसा करना उनका स्वभाव है। इसके प्रमाण स्वरूप मानस की पंक्ति “पर उपकार वचन मन काया। संत सहज स्वभाव खगराया।।” को उद्घृत करना सर्वथा उपयुक्त है। संत जगत् को जगदीश्वर का स्वरूप समझकर उसके साथ तद्रूप व्यवहार करते हैं।

अब प्रश्न उठता है कि किसकी किससे रक्षा? इसका उत्तर नितान्त स्पष्ट है कि दुष्टों, दुर्जनों अथवा राक्षसों से सज्जनों की रक्षा। संत पुरुषों की रक्षा करने के लिए दुर्जनों का विनाश करना आवश्यक है। क्योंकि उनके रहते हुए सज्जनों की रक्षा हो ही नहीं पाती। दानवों के द्वारा ही सज्जन अथवा देव असुरक्षित है। दुर्जनों से ही तो सज्जों की रक्षा करनी है। संत सबकी रक्षा करते हैं तथा संतों की रक्षा भगवान करते हैं। संतों की रक्षा होने पर सबकी रक्षा स्वतः हो जाती है। परमात्मा ही सत्पुरुषों की रक्षा करते हैं। यदि भगवान् सत्पुरुषों की रक्षा न करें तो जनसामान्य का धर्म पर से विश्वास तथा आस्था ही उठ जाए।

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हमारा इतिहास इस तथ्य का साक्षी है कि बलाबल न्यायेन दुर्जन सज्जनों की, दानव देवों की तथा राक्षस अथवा असुर देवताओं अथवा सुरों की अपेक्षा सदैव शक्तिशाली रहे हैं क्योंकि दानव अथवा असुर देवताओं अथवा सुरों से बड़े भाई है। तथा देवता उनके छोटे भाई। बड़े भाईयेां का छोटे भाईयों से अधिक शक्तिशाली होना स्वाभावित है। इसलिए देवताओं अथवा सज्जनों की सब प्रकार से रक्षा करने के लिए परमात्मा इस धरा धम पर अवतरित होते हैं।

वेदों के अनुसार असुर अथवा दानव देवताओं के बड़े भाई हैं इसलिए वे राक्षसों से सदैव दुर्बल पड़ते हैं। वे दुर्जनों के अकेले कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते हैं। इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब भी देवताओं तथा दानवों का परस्पर युद्ध हुआ तब तक देवताओं को पराजित होकर भागना पड़ा और उनको भगवान की शरण लेनी पड़ी तथा भगवान को उनकी रक्षा करने के लिए पृथ्वी पर आना पड़ और उन्होंने इस पर आकर उनकी रक्षा की तथा राक्षसों का सपफााय किया। कहने का अभिप्राय यह है कि सज्जनों की रक्षा करेन तथा दुष्टों का विनाश करने के लिए ही भगवान इस धरा धम पर अवतरित होते हैं वहीं उनकी सब प्रकार से रक्षा करते हैं।

गीता में सज्जों अथवा साधुओ की विधिवत् रक्षा करने के लिए भगवान कृष्ण ने ‘परित्राणाय’ शब्द का प्रयोग किया है। जिसका सीध-साध अर्थ है विध्वित् अथवा भलीभांति रक्षा करना। संस्कृत के त्राण शब्द का हिन्दे के रक्षा के अर्थ में प्रयोग होता है। यहां पर यह सतत् स्मरणीय है कि दुर्जनों के विध्वंस अथवा विनाश होने पर ही सज्जनों की रक्षा हो सकती है क्योंकि जब तक दुर्जनों का बोलबाला है तब तक सज्जन सुरक्षित रह ही नहीं सकते।

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गीता सबकी रक्षा करने का सर्वोत्तम मार्ग प्रशस्त करता है। यह मानव की बाह्य तथा आभ्यान्तर “काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद तथा मत्सर” ये षट अन्तः विकार हैं, का आत्यान्तिक रूप से शमन करना है। इनको समाप्त करने के लिए उसमें साध्ना का सर्वोत्तम पथ-प्रशस्त किया गया है। गीता मानव के आन्तरिक विकारों को समाप्त करके उसको अन्दर से सब प्रकार से शक्तिशाली बनाता है। अन्दर से शक्तिशाली होने पर वह अपनी बाह्य शत्राुओं से भी रक्षा करता है।

गीता ऐसा रक्षा कवच है जो मानव की सब प्रकार से रक्षा करता है। इसके लिए यह आवश्यक है कि वह इसको श्रद्धा तथा विश्वासपूर्वक अपने आप में धरण करें। इसको धरण करके भगवत्कृपा प्रसूत साध्ना के मार्ग पर गमन करें तो उसका कल्याण निश्चित है। सबकी रक्षा वही कर सकता है जो सर्वं समर्थ हो। दूसरा सर्वशक्तिमान हो। संसार में परमात्मा को छोड़कर कोई भी जिस रूप में भी है उसका आधर परमात्मा ही है। इस अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड के समस्त क्रियाकलाप भगवान की शक्ति के द्वारा संचालित हो रहे हैं। सबके मूल में वही है। शक्ति सदैव शक्तिमान अथवा परमात्मा के आश्रय रहती है यह उसके आधीन रहती है।

भगवान सर्व समर्थ हैं इसलिए वे सबकी सब प्रकार से रक्षा कर सकते हैं तथा करते भी हैं। वे इस धरा धाम पर अवतरित होकर उसको अपना क्रियात्मक अथवा व्यावहारिक स्वरूप प्रदान करते हैं। गीता में कृष्ण जी की यथार्थ अथवा वास्तविक शक्ति की सहज, सरल, प्राकृत, नैसर्गिक अथवा स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। यह उसका प्राकट्य है। यह अभिव्यक्ति साध्कों में उनकी अनुभूति जागृत करने के लिए है।

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गीता के सिद्धांतो तथा आदर्शों पर अनुगमन करके विनाश के कगार पर खड़े विश्व को सब प्रकार से सुरक्षित किया जा सकता है। परन्तु इसके लिए अपने आपको पूर्ण रूपेण बलिदान करना अनिवार्य है। यहां तक कि यह मानव की जीवन-मरण से भी रक्षा करता है। यह उसको उक्त दोनों के द्वन्दों की परिधी से ऊपर ले जाता है। यह उसको अमर जीवन प्रदान करता है।

गीता का श्रद्धा तथा विश्वासपूर्वक स्वाध्याय करने वाला साधक आवागमन से बंधन से मुक्त हो जाता है। यह उसकी आवागमन से रक्षा करता है। यह जन्म तथा मृत्यु दोनों को सार्थक बनाता है। यह मानव को उक्त दोनों की द्वन्दात्मक परिधिसे ऊपर उठाकर उसे सत्यम्, शिवम् तथा सुन्दरम् के धरातल पर प्रतिष्ठित करता है। गीता जिसका जितना महत्व है उसको उतना ही महत्व प्रदान करता है। यह उसे न्यूनाध्कि नहीं होने देता। गीता में कृष्ण जी ने सभी की रक्षा करने का डिम-डिम उद्घोष किया है।

मानव को मात्रा उसके शरणागत् होने की आवश्यकता है। जो भगवान के शरणागत हो गया जो उनकी शरण में आ गया समझ लो कि पूर्णरूप से सुरक्षित हो गया। जिसने गीता माँ का अवलम्बन ग्रहण कर लिया समझ लो कि वह सब प्रकार से रक्षित हो गया। जिसको प्रभु अपने घेरे में ले लेते है। उसके पास विध्वंसकारी तत्व कभी नहीं पहुंच पाते। गीता में सत्य, धर्म, न्याय, स्वत्म, स्वाभिमान, संस्कृति तथा सभ्यता सभी की रक्षा करेन का मार्ग प्रशस्त किया गया है। इसके लिए मानव को कठोर साधना करना आवश्यक है।

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आज हमारा राष्ट्र अपने संक्रमण काल से गुजर रहा है। आज इसकी रक्षा कासबसे ज्वलंत प्रश्न हम सबके समक्ष है। यह हमारे वर्तमान जीवन का यक्ष-प्रश्न है। आज बाह्य तथा आभ्यान्तर दोनों रूपों में इसकी एकता तथा अखण्डता के लिए गम्भीरतम् संकट उत्पन्न हो गया है। इसकी रक्षा के लिए हमें अपने अन्दर तथा बाहर सर्वत्रा युद्ध करना है।

आज हम सबको मिलकर अपनी सामूहिक शक्ति के द्वारा इसकी सब प्रकार से रक्षा करनी है। अर्थात् राष्ट्र देवो भवय् अर्थात् राष्ट्र को देवता समझकर उसकी पूजा, अर्चना तथा वन्दना करनी है। उक्त् सन्दर्भ में स्वामी विवेकानन्द के निम्न शब्द सतत् स्मरणीय हैंः अपने देश से सच्चे अर्थों में प्रेम करो वही आपका भगवान है। गीता के अनुसार यह सम्पूर्ण जगत सूत्रा में सूत्रा के मणियों के सदृश मुझसे ;परमात्मा में गुंथा हुआ है।

इसके प्रमाण स्वरूप गीता के 7वें अध्याय के 7वें श्लोक की पंक्ति फ्मयि सव्रमिदं प्रोतं सूत्रो मणिगणा इवाय् को उद्घृत करना सर्वथा उपयुक्त है। इससे हम सबको यह प्रेरणा मिलती है कि हम सब भी इसी प्रकार से एकात के सूत्रा में आबद्ध् हों। राष्ट्र को एकता के सूत्रा में, आबद्ध् करने के लिए, परस्पर देवो भव अर्थात् एक-दूसरे को परस्पर देवता समझ कर उससे प्रेम करो। सूत्रा को हमें अपने जीवन में क्रियात्मक अथवा व्यावहारिक स्वरूप प्रदान करना है। आज हमें राष्ट्र में परस्पर प्रेम तथा सौहार्द की भावना को जागृत करना है। जब हम एक-दूसरे से प्रेम करेंगे, एक-दूसरे को गले लगाएंगे, एक-दूसरे की रक्षा करने में सतत् संलग्न होंगे तब सम्पूर्ण राष्ª स्वतः ही सुरक्षित हो जाएगा। प्रेम ही राष्ट्र को एकता के सूत्रा में आबद्ध् करने का सर्वोत्तम माध्यम है। इसका इसके अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं।

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