मुग़ल साम्राज्य की घोर निष्फलता और उसके कारण

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यह विश्वास किया जाता है कि भारत की आर्य सभ्यता के अत्यंत प्रसाद का पहला बड़ा धक्का महाभारत के संग्राम से लगा। प्रासाद उस भयंकर युद्ध के कारण एकदम नहीं गिरा। सदियों तक उसके गगनभेदी शिखर संसार को चकित करते रहे, परन्तु प्रासाद की दीवारें हिल चुकी थीं। जरा-जरा-सी चोट से वह डोल जाती थीं। निर्वलता प्रतिदिन बढ़ती गई। यहाँ तक कि जब उत्तर दिशा से इस्लाम की प्रबल गावात आई, तब यह हिमालय की शाखाओं को चुनौती देने वाला प्रासाद धड़ाके के साथ भूमि पर गिर गया। जिसे यूनानियों, पारसियों, सीथियनों और हणों के आक्रमण गिराने में समर्थ न हुए यह योद्धा हो जाने पर इस्लाम की मार को न सह सका जिसे विश्व-विजेता सिकन्दर न हिला सका, उसे गौरी और मानवी ने चकनाचूर कर दिया। आखिरी वार किसी का हो, परन्तु नाश का असली कारण वही कहा जायेगा, जिसने भवन की दीवारों की जड़ को हिलाकर निर्मल कर दिया हो।

इस आलेख का उद्देश्य न किसी राजा या राजवंश की जन्म-पत्री है, और न घटनाओं का विस्तृत विवरण है इसका उद्देश्य उन कारणों को अन्वेषण और उन पटनाओं का विश्लेषण करना है, जिसके कारण मुगल साम्राज्य का नाश हुआ। साथ ही इस पुस्तक का उद्देश्य यह भी है कि लेखक जिस अनुपालन से साम्राज्य-नाश के कारणों को जानने में समर्थ हुआ है, उनका भी उल्लेख किया जाय न यह केवल फिलासफो है और न केवल कहानी है यदि इसे कुछ कहना ही है तो हम ‘कहानी को फिलासफी’ या ‘फिलासफी भरी कहानी कह सकते हैं ।

अब तक १५ परिच्छेदों में जो कहानी सुनाई गई है वह एक प्रकार से हमारे प्रस्तुत विषय की भूमिका थी। उन परिच्छेदों में हमने अकबर के समय से लेकर शाहजहां के समय तक का मुगल साम्राज्य के विस्तार और मानवृद्धि का इतिहास लिखा। अब हम जिस समय में प्रवेश कर रहे है, उसमें उस विस्तृत और सम्मानित सामान्य के क्रमशः क्षय का इतिहास प्रारम्भ होता है इसी इतिहास का अन्वेषण और यर्णन इस पुस्तक का लक्ष्य है। इस समय का प्रारम्भ मुगलों के महाभारत के साथ होता है।

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महाभारत की निम्नलिखित विशेषताएं हैं-

भाई का भाई से युद्ध हो। दोनों को सहायता देने के लिए देश देशान्तर के योद्धा एकता हो। हजारों के बारे त्यारे हो। सामाज्य के बजे हे स्तम्भ खोत रहें विजेता को राज सिंहासन पहुंचाने के लिए आपते पिताओं, गुरुओं, भाइयों और पुत्रों के रुधिर की नदी पार करनी पड़ी। एक दूसरे पर कोई दया न दिखाई जाए। युद्ध में धर्म और अधर्म का ध्यान न रखा जाय। दोनों ओर से ‘सूच्यग्रं नेव दास्यामि बिना युद्धेन केशव’ (लड़ाई के बिना में दूसरे को भूमि का उतना टुकड़ा भी न दूंगा. जो सुई के अग्रभाग से मापा जा सके) इस प्रतिज्ञा का पालन किया जाय। अन्त में अविश्वास और नाश का राज्य हो। इसका नाम महाभारत है।

मुगल-साम्राज्य का आरम्भ १६वीं शताब्दी के आरम्भ में हुआ और अन्त १८ वीं शताब्दी के मध्य में। लगभग २५० वर्ष तक मुगलवंश के बादशाह भारत की गद्दी पर बैठते रहे। इस २५० वर्षों में से लगभग १५० वर्ष साम्राज्य के उदय और समृद्धि के हैं और लगभग १०० वर्ष क्षय और अधःपात के हैं। उदय और अस्त के बीच में मध्याह्न का स्थान है। शाहजहाँ के शासन का पूर्वार्ध वंशी का मध्याह्न काल था। उसके बाद सूर्य अस्तांचल की ओर रवाना हुआ। वह घटना जिसने साम्राज्य की उन्नति की ओर गति को अवनति में परिणत किया, उसका नाम हमने मुगलों का महाभारत रखा है।

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इस महाभारत में भी भाई-भाई का संग्राम हुआ है देश भर की युद्ध शक्ति एक स्थान पर एकत्र हुई, हजारों वीर मारे गये करोड़ों रुपया बरबाद हुआ, जिसे अन्त में सफलता मिली उसका हाथ बुजुर्गों भाइयों और भतीजे के निरपराध लहू से सना हुआ था। देश पर मुर्दानी-सी छा गई थी। देखने में साम्राज्य का शरीर था, परन्तु उसकी आत्मा निकल चुकी थी। उस महाभारत की कहानी का मूल-साम्राज्य के नाश में बहुत आवश्यक भाग है।

एक प्रकार से वह साम्राज्य के भाग्य-परिवर्तन को कहानी है। परन्तु उसे आरम्भ करने से पूर्व हमें थोड़ी-सी ऐसी घटनाओं की ओर भी निर्देश करना है, जो भारत के इतिहास में विशेष महत्त्व न रखती हुई भी, उस परिस्थिति को अवश्य स्पष्ट कर सकती है जो शाहजहाँ की शिथिलता के कारण पैदा हो गई थी। हम ऊपर बतला आये हैं कि दक्षिण रियासतों का उस समय के लिए सन्तोषजनक निपटारा कर देने के पश्चात् शाहजहाँ ने अपनी शक्ति को टुकड़ों में बांटकर पुत्रों के कन्धों पर डाल दिया था साम्राज्य का केन्द्रिय शासन दारा शिकोह के सुपुर्द कर दिया गया था बंगाल की सूबेदारी पर शुजा को नियुक्त कर दिया गया था।

दक्षिण की कठोर समस्या औरंगजेब के हिस्से में आई थी और मुराद को कई जगत लगाकर परखा जा रहा था कि वह किस स्थान को पूर्ण करने के योग्य है। बात यह थी कि शाहजहाँ अब अपने लगाये हुए पुष्पोधान में भ्रमण करना चाहता था, अपने बनाये हुए स्वर्ग में विलास करने की इच्छा रखता था, अपनी एकत्र की हुई लक्ष्मी के उपभोग का अभिलाषी था । इस कारण शोषण और युद्ध का उत्तरदायित्व पुत्रों पर डालना उसे उचित प्रतीत हुआ। इस निश्चय का यह भी एक कारण हो सकता कि वह पुत्रों को परस्पर झगड़ने से रोकने का यही उपयोगी उपाय समझता था कि सबको एक दूसरे से अलग रखकर किसी न किसी कठिन कार्य में लगाया जाय, ताकि उसकी महत्वाकांक्षा पूर्ण होती रहे।

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शाहजहाँ के राज्य-काल का शेष इतिहास उसके पुत्रों की सफलता या निष्फलता का इतिहास है। शाहजहाँ ने जिस नीति का अपने सुख और पुत्रों की सन्तुष्टि के लिए उपयोग किया, उसका परिणाम उसके और साम्राज्य के लिए भला हुआ या बुरा, यह अगले पृष्ठ स्वयं बतला देंगे उसने मुग़ल बादशाहों की इस पुरानी घटनाओं को जो कि सल्तनत का अन्तिम उद्देश्य उपभोग है, कार्य में परिणत किया, और जो नतीजा पहले निकला था वही अब भी निकला।

इस समय का पहला युद्ध बल्ख और बद्री के दूदरवर्ती प्रान्त में हुआ। यह प्रान्त काबुल के उत्तर में हिन्दूकुश पर्वत और औक्सस नदी के मध्य में फैला हुआ है इस प्रान्त का भारत के साथ कोई सम्बन्ध नहीं था। और यह मुगल बादशाहों की पुरानी सम्पत्ति थी, परन्तु जिनके पास शक्ति है उनकी महत्वाकांक्षा ऐसी सीमाओं से कहाँ रुकती है? वहाँ के शासकों में परस्पर झगड़ा हुआ। शाहजहाँ के मुंह में पानी भर आया, और उस प्रान्त को साम्राज्य के लिए जीतने के निमित्त अलीमर्दान खाँ नाम के प्रभावशाली वज़ीर और योद्धा को हिन्दुस्तानी रुपया और हिंदुस्तानी सिपाहियों के साथ भेजा गया।

अलीमर्दान खाँ को पूरी सफलता न हुई, तो राजा भगत सिंह को १४ समस्त राजपूतों के साथ बलख के विजय के लिए रवाना किया गया जब इन पराये काम में लह बहाने वाले सूरमाओं से भी काम न चला तो शाहजहाँ ने राजकुमार मुराद को अलीमर्दान खाँ की देख-रेख में युद्ध क्षेत्र की ओर प्रेपित किया, और स्वयं शाहजहाँ बहुत-सी सेना और धनकोट के साथ काबुल में डेरा डालकर बैठ गया। इस बार उद्योग सफल हुआ और मुगल-सेना ने बल्ख पर कब्जा कर लिया। शाहजहाँ विजय से प्रसन्न होकर दिल्ली वापस लौट गया।

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परन्तु इतना धन और जन का व्यय करके जो प्रान्त जीता गया, वह देर तक हाथ में न रखा जा सका। राजकुमार मुराद का उस सुद्रवती शिशिर उजाड प्रान्त में जी न लगा उसने स्नेही पिता से प्रार्थना की कि उसे बल्ब के उजाड़ को छोड़कर हिंदुस्तान की आबादी में वापस आने की इजाज़त दो जाय। इजाजत तो न मिली, परन्तु अधिक आग्रह करने पर मुराद को सेनापति के पद से च्युत कर दिया गया। उसके स्थान पर अगले वर्ष शाहजादा औरंगजेब को प्रधान सेनापति का अधिकार देकर फिर बल्ख के विजय के लिए भेजा गया। इस बार क्या सेना को दृष्टि से और क्या युद्ध सामग्री की दृष्टि से गतवर्ष की अपेक्षा कहीं अधिक तैयारी की गई थी, परन्तु काबुल में बादशाह के स्वयं उपस्थित रहने पर भी स्थान की कठोरता और प्रबन्ध की शिथिलता का यह परिणाम हुआ कि जहाँ मुराद ने ५० सहस्त्र सिपाहियों के साथ संग्राम- भूमि में प्रवेश किया था, वहाँ औरंगजेब २५ हजार से अधिक सिपाहियों को युद्ध के समय कार्य में न ला सका।

उज्चक लोग जिनसे मुगलों का युद्ध था, मराठों की नीति से युद्ध करते थे। बढ़ते हुए शत्रु का रास्ता छोड़ देते थे, दायें-बायें और पीछे से वार करते थे, रसद की सामग्री लूट लेते और रास्ते रोक देते, और जब मुगल नोंद में होते तब छापा मारते थे। मुगलों की ओर से सिपाही और पैसे पानी की तरह बहाये गये, औरंगजेब ने दूध साहस दिखलाकर शत्रु को चकित किया, परन्तु फल कुछ न निकला। अन्त में मुगलों को पिण्ड छुड़ाना मुश्किल हो गया। शीतकाल सिर पर आ रहा था, विजय श्री कोसों दूर तक दिखाई नहीं देती थी, रास्ते में हिन्दुकुश पर्वत को हिमाच्छादित पाटियाँ मानो ग्रास करने के लिए मुंह बाये खड़ी थीं, अन्त में होन सन्धि द्वारा पिण्ड छोड़कर मुगलों को भागने के सिवाय रक्षा का कोई उपाय न सूझा।

बल को शत्रु के हाथ में सौंपकर औरंगजेब और उसके सेनापति धको हुई और पराजित सेना को पीटते हुए काबुल की ओर भागे। औरंगजेब और अलीमर्दान खाँ तो घोड़े से सिपाहियों को लेकर लम्बी मंजिलें करते हुए आसानी से पार निकल गये, परन्तु मुगल-राज्य का यह अभागा सेवक राजा जयसिंह और बहादुर खान अपनी-अपनी सेनाओं के साथ हिन्दकुश की ब्लू घाटियों में फँस गये। उन्हें असहनीय दुःख। आदमी और जानवर बर्फ की पगडंडियों से फिसलकर गर्हे में गिरते ये, तो उनका कहीं पता नहीं चलता था। घके हुए ऊँट और घोडे बर्फ पर बैठ जाते थे, तो फिर उठने का नाम न लेते थे समकालीन लेखका का कथन है कि इस पचित्र यात्रा में शाही फौज के कम से-कम ५ सहस सिपाही और ५ सहल पश बर्फ की भेट चढ़े बल्ख के युद्ध पर शाही खाने से लगभग ४ करोड रुपया व्यय हुआ यल् के किले में लाख का अन्न का कोप था, वह राष्ट्र के लाथ पढ़़ा और लगभग ७२ सहा रुपया शत्रु के लोगों को अपने पक्ष में खरीदने के लिए खर्च किया। यह ५ करोड़ रुपये किस वस्तु पर कुर्बान हुआ? बादशाह इस मनमौज पर कि बलय मुगल साम्राज्य का एक हिस्सा होना चाहिए।

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भारत की इतनी प्रजा और सम्पत्ति एक ताजपारी मनुष्य की तचिस बलि चढ़ गई। बीच में से निकला क्या? पराजय और अपमान। परन्तु बल का पराजय अकेला ही नहीं आया। अगले वर्ष १६४८ ई० में फारिस के बादशाह शाह अब्बास द्वितीय ने कन्दहार के किले पर आक्रमण किया। यह किला फारिस और भारत का मिलाप-स्थल होने के कारण दोनों देशों के शासकों में झगड़े का बीज बना हुआ था। कभी वह ले जाते थे और कभी यह।

शाह अब्बास द्वितीय एक साहसी और विजय भिलाला बादशाह था। उसने कन्दहार पर हमला कर दिया। उस समय किले को मुगल-सेनापति दौलत खा था। उसने शाहजहाँ के पास सहायता के लिए प्रार्थना भेजी, परन्तु सर्दी के दिन थे, बाबर का वंशज दिल्ली के विलास-पूर्ण भवन में रहकर इतना शिथिल हो गया था कि शीतकाल में काबुल की यात्रा करना उसे उचित प्रतीत न हुआ। परिणाम यह हुआ कि कन्दहार फारिस निवासियों के हाथ आ गया। कहाँ तो मुग़ल-सम्राट बल्ख और बदख़्शान के सपने ले रहे थे और कहाँ घर पर ही छापा पड़ गया। मुग़लों का यश देश-विदेश में फैला हुआ था।

कन्दहार के हाथ से निकले जाने के कारण उसे मानो ग्रहण लग गया। जिनकी युद्ध-शक्ति से अड़ोस-पड़ोस की शक्तियों कापती थीं, उनके घर में आकर एक विदेशी शासक पाँव जमा ले, यह शाहजहाँ को कैसे सहन हो सकता था? सर्दी व्यतीत हो जाने पर मुग़ल-साम्राज्य की सैन्यरूपी मशीन दिल्ली से चलकर काबुल पहुँची और काबुल से कन्दहार की ओर रवाना की गई। कन्दहार की ओर जाने वाली सेना सिपाहियों के साथ युद्ध भूमि के लिए प्रस्थान किया।

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उनका सेनापतित्व औरंगजेब को दिया गया उसकी सहायता के लिए वज़ीर सादुल्ला खान को नियुक्त किया गया। दोनों सेनापतियों ने ५० हजार कन्दहार पर १६ मई, सन १६४९ ई० से मुगलों का प्रत्याक्रमण आरम्भ हुआ। वह पहला प्रत्याक्रमण था। दूसरा प्रत्याक्रमण १६५२ ई० में हुआ। तीसरा प्रत्याक्रमण १६५३ ई० में हुआ। हरेक प्रत्याक्रमण में कन्दहार को घेर कर फारस की सेना के हाथ से छीनने की चेष्टा हुई। पहले और दूसरे प्रत्याक्रमण में औरंगजेब सेनापति था। दोनों ही प्रत्याक्रमण निष्फल हुए। पहली बार तोपें पर्याप्त नहीं थी, दूसरी बार तोपें तो थीं, परन्तु सेना का दम उखड़ गया। कुछ-न-कुछ कसर दोनों ही बार रही।

औरंगजेब ने चतुरता भी दिखलाई और बहादुरी भी। काबुल में बैठकर शाहजहाँ ने धन, जन और सम्पत्ति द्वारा सलाह देने में कोई कसर नहीं छोड़ी, परन्तु परिणाम कुछ भी न निकला। कन्दहार फारिस की सेनाओं के हाथों में रहा। मुगलों को इतने अनादर का सामना करना पड़ा कि शाह अब्बास को एक बार भी अपनी गही छोड़कर कन्दहार की रक्षा के लिए न आना पड़ा। मुगलों की विशाल सेना और राजकुमारों के सन्नाह का उत्तर शाह के सेनापति हो देते रहे।

औरंगज़ेब की निष्फलता पर शाहजहाँ के दरबार में खूब फब्तियाँ उड़ती थीं। बादशाह स्वयं औरंगज़ेब से असन्तुष्ट हो गया था उसने कई कड़ी-कड़ी चिट्ठियाँ अपने लड़के को लिखी, जिनमें निष्फलता का उत्तरदायित्व उसी पर फेंका गया। दारा के पक्षपाती दरबारी लोग बादशाह की असन्तोषाग्नि को मजाक और तानों द्वारा भड़काने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे। दारा भी उस मजाक में शामिल हो जाता चा । परन्तु उसके मान-मर्दन में भी देर न लगी।

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तीसरा प्रत्याक्रमण दारा की ही अध्यक्षता में हुआ। दारा बादशाह का लाडला बेटा था। कन्दहार को लेना अति आवश्यक हो गया था, इस कारण तीसरे प्रत्याक्रमण में सिपाही, खजाना और तोपखाना-तीनों वस्तुओं का अपूर्व समारोह किया गया, परन्तु दारा की निष्फलता औरंगजेब की निष्फलता की अपेक्षा कहीं अधिक भी हुई। जहाँ औरंगजेब ने उन युद्धों में विजय प्राप्त न करते हुए भी व्यक्तिगत रूप से बहादुरी और युद्ध कुशलता का सिक्का जमा दिया और सिद्ध कर दिया कि वह सेना और सेनापतियों का नियन्त्रण और संचालन कर सतता है, वहाँ दारा को हर प्रकार की निष्फलता प्राप्त हुई।

सदा दरबार में रहने से उसे युद्ध-कला का व्यावहारिक परिज्ञान नहीं हुआ था। हमेशा खुशामदियों से घिरा रहने के कारण उसके स्वभाव में उग्रता और अहमन्यता आ गई थी। कठिनाइयों से बचे रहने के कारण, व्यक्तिगत सहिष्णुता के साथ-साथ दूसरों में जोश पैदा करने और युद्ध के लिए उत्तम साधन चुनने की शक्ति का उसमें विकास नहीं हुआ। दारा की यह सब निर्बलतायें कन्दहार की युद्ध-भूमि में प्रत्यक्ष हो गई। दारा को भी शर्म से गर्दन नीची करके हार माननी पड़ी और कन्दहार को शत्रु के कब्जे में छोड़कर काबुल होते हुए दिल्ली वापस आना

पड़ा। कन्दहार पर जो फोन प्रत्याक्रमण हुए, उनका भारत की प्रजा पर कितना असह्य बोझ पड़ा, यह इससे विदित हो सकता है कि इन प्रत्याक्रमणों की खातिर दिल्ली के खजाने से कम-से-कम दस करोड़ रुपया भेजा गया। कुछ दिनों तक कन्दहार को कब्जे में लेकर उसके दुर्ग को मजबूत करने और घन-धान्य से सम्पन्न करने में एक करोड़ के लगभग व्यय हुआ। इतनी धनराशि देश भर के लगान से दो वर्ष में वसूल हो सकती थी मनुष्यों और पशुओं का जो क्षय हुआ, उसका तो ठीक-ठीक हिसाब ही नहीं, परन्तु केवल मनुष्यों का क्षय पच्चास तीस हजार से कम नहीं हुआ, यह निश्चय से कहा जा सकता है।

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इस व्यय के बदले में हिंदुस्तान को क्या मिला ? कुछ नहीं। क्या मुगल-साम्राज्य ने इस खर्च से कुछ कमाया? हाँ, मुगल साम्राज्य ने कमाया संसार में अपयश और पड़ोसियों में गौरव का क्षय। अब तक मुगल बादशाहों का सिक्का जमा हुआ था। समझा जाता था कि उनकी युद्ध-शक्ति को परास्त करना असम्भव है। वह माया कन्दहार के निप्पल प्रत्याक्रमण ने तोड़ दी। बलम की निष्फलता से माथे पर जो कलंक का टीका लगा था, वह अधिक विस्तृत और गहरे रंग का हो गया।

इस पराजय के कारण क्या थे? यदि निष्फलता केवल बलख तक ही परिमित होती, तो शायद युद्ध-स्थल की दूरता, हिन्दुकुश पर्वत की हिमाच्छन्न घाटियाँ या उल्का की तरह गिरकर चोट करने और फिर विलुप्त हो जाने वाले उज्वक योद्धा दोषी ठहराये जा सकते थे, परन्तु कन्दहार तो उतना दूर नहीं था। वहाँ तो सभ्य फारिस निवासियों के साथ संघर्ष था। फिर एक नहीं, तीन-तीन आक्रमण हुए। बलव और कन्दहार के युद्धों में शाहजहाँ के तीन पुत्रों ने सेनापति की हैसियत से कार्य किया। मुराद, औरंगजेब और दारा की क्रमश: परीक्षा हुई। सब अनुत्तीर्ण हुए। राजपूत, पठान या फारसी सभी जातियों के धुरन्धर सेनापति मैदान में उतरे और हराकर वापिस गये।

उस समय के नाटक के नटों ने निष्फलता के दो को एक दूसरे पर डालने का यत्न किया था। शाहजहाँ का कहना था कि औरंगजेब लड़की तो बहुत रखता है, परन्तु सेनापति अच्छा नहीं है। औरंगज़ेब की शिकायत थी कि उसे कभी स्वतन्त्रता से सेना-संचालन का अधिकार नहीं दिया गया। प्रथम तो स्वयं शाहजहाँ काबुल में बैठकर युद्ध का संचालन करता था। अगर तोप को एक स्थान से उठाकर दूसरे जगह ले जाना होता तो बादशाह से आज्ञा माननी पड़ती थी, जिसमें कभी कभी २० या २५ दिन लग जाते थे हरेक प्रश्न का अन्तिम निर्णय बादशाह स्वयं करता था। दूसरे हमेशा औरंगजेब की गति को रोकने के लिए एक वज़ीर साथ नत्थी किया जाता था बादशाह, वजीर और शाहजादा, युद्ध का नियन्त्रण तीनों में बँटा हुआ था। युद्ध कोई दावत नहीं है कि बाँटकर खाई जा सके। युद्ध क्षेत्र में तो एक ही आज्ञा अन्तिम

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होनी चाहिए। बादशाह वजीर और युवराज मिलकर युद्ध का संचालन करते थे, और फिर भी शिकायत यह थी कि अगर सिपाही पहुँच गये हैं तो तोपें नहीं पहुंची, और तोपें पहुँची तो ऐसे अनपड़ तोपची भेजे गये हैं कि तोप को ही निकम्मा कर दिया है कन्दहार के घेरे के लिए आठ बड़ी तोपें भेजी गई थीं, जिनमें तीन से अधिक बारूद डालकर चलाने से फट गई इस कारण केवल पाँच तोपें काम में लाई जा सकीं। निष्फलता के कारण व्यक्तिगत नहीं थे, वह सामान्य और काफी ये। वह निष्फलतायें किसी एक सेनापति या शाहजादे की निष्फलता नहीं थीं, यह साम्राज्य की निष्फलतायें थीं, यह सामान्य कारण, जिन्होंने

मुगल-साम्राज्य को इस तिरस्कार का मुंह दिखाया निम्नलिखित थे

१. पहला कारण

मुगल साम्राज्य का प्रजा पर राज्य था और न सरदारों का सामान्य लोगों पर राज्य था। वह एक मुगल-सम्राट् का सल्तनत पर शासन था। एक ही इच्छा थी जो समस्त कल को चलाती थी। ऐसा राज्य दो ही अवस्थाओं में शान्ति और सफलता के साथ चल सकता है या तो वह राज्य इतना परिमित हो कि उसे आसानी से संभाला जा सके, और या संभालने वाला हाथ इतना जबरदस्त और उसको चलाने वाला दिमाग इतना विशाल हो कि किसी पुर्ने को कभी बेकाबू न होने दे। मुग़ल साम्राज्य में दोनों ही वस्तुओं का अभाव हो गया था। साम्राज्य का आकार बहुत बढ़ गया था और बढ़ रहा था और बादशाह कुछ आयु और कुछ भोग-विलास के कारण शिथिल हो रहा था।

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ऐसे समय में क्षय से बचने के दो ही उपाय थे। या तो शासन की प्रणाली बदल जाती और एकसत्तात्मक राज्य न रहता, पर या कोई ऐसा राजा बनाया जाता जो न कभी बूढ़ा होता और न कभी आराम करता। शासन-प्रणाली के बदलने का समय अभी बहुत दूर था। ऐसा मनुष्य मिलना कठिन था जो न कभी बूढ़ा हो और न कभी भूल करे इधर साम्राज्य का शरीर बेतरह मोटा हो रहा था। ऐसी दशा में आवश्यक परिणाम यही हो सकता था कि साम्राज्य की बागडोर शिथिल हो जाय। अकबर के बाद से शासन बराबर शिथिल हो रहा था। शाहजहाँ ने कुदरत के क्रम को जवानी में रोकने की चेष्टा की परन्तु उसे सफलता न हुई। शासन करने वाले हाथ के बूढ़ा होते ही प्रकृति ने अपना क्रम जारी कर दिया।

२. दूसरा कारण

सम्भव है कि एक बादशाह अपने वज़ीरों और सेनापतियों द्वारा बढ़ते हुए राज्य को संभालने में सफल हो जाय, परन्तु मुगल राज्य की जो स्थायी समस्या थी, उसका इलाज किसी के पास नहीं था। यह रोग हिकमत की शक्ति से बाहर हो गया था वह रोग था, राजकुमारों की महत्वाकांक्षा । भारत में मुसलमान-राज्य के आरम्भ से हो यह प्रधा चली आई थी कि बादशाह का बड़ा या छोटा बेटा ही नहीं, प्रत्युत वजोर और गुलाम भी यह समझता था कि वह बल से या छल से, जैसे भी हो दूसरे उम्मीदवारों को मारकर गद्दी पर बैठ सकता है। कोई रूदि नहीं थी और न कोई नियम था।

राजपुत्र तो जन्म से ही समझ लेते थे कि राज्य का अधिकार हमारा है उनके पिता जितने दिन की पर बैठता था, उसे भी वह अपने अधिकारों की हत्या समझते थे। यह पुराना रोग शाहजहाँ के समय अधिक भयंकर हो उठा था क्योंकि चारों पुत्र जवान हो चुके थे। दारा की आयु ४० के लगभग बी शजा उससे दो वर्ष छोटा था, औरंगजेब उससे दो वर्ष छोटा था, और मुराद भी युवा हो चुका था। सभी को किसी न किसी प्रान्त को हुकूमत का मज़ा आ चुका था। सभी गद्दी के लिए उत्सुक हो रहे थे, इस कारण बाप पर वेटों का विश्वास था, और बेटों पर बाप का भरोसा नहीं था। दोनों एक दूसरे के कार्यों को आशंका की दृष्टि से देखते थे जहाँ परस्पर विश्वास न हो, वहाँ संग्राम नहीं जीते जा सकते।

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३. तीसरा कारण

निष्फलता का तीसरा कारण यह था कि बादशाह और राजपुत्रों के अनुकरण में सरदार और उनके अनुकरण में सिपाहो-इस प्रकार शासक जाति की परम्परा विषय और मोदी को अधिकार का आवश्यक अंग समझकर अपनी आरम्भिक शक्ति को खो चुकी थी। यह कहने की तो आवश्यकता ही नहीं कि जजिया कर के न होने पर भी वह राज्य मुसलमानों का हिन्दुओं पर राज्य था जो मुसलमान बाबर के साथ हिन्दू कुश की घाटियों उतर कर आये थे, वह कठोर और परिश्रमी थे। भारत के धनधान्यपूर्ण प्रदेश में आमोद और प्रमोद की यातायात में रहकर उनकी वह शक्तियाँ क्षीण हो चुकी थी। अब वह फारिस के कठोर सिपाहियों के साथ लड़ने की योग्यता नहीं रखते थे। शाह अब्बास का यह व्यंग्य उचित होगा कि ‘मुगल-सम्राट सोने के लोभ से किसी किलेदार को जीत सकते हैं, परन्तु शस्त्रों से किसी किले को नहीं जीत सकते। विलासी जीवन ने कठोर सिपाहियों को आमोद प्रिय दरबारी बना दिया था।

निष्फलता के यह सामान्य कारण थे पाले राज्यों में जो दोप बोरूप थे वह अब धीरे-धीरे कर वृक्ष का रूप धारण कर रहे थे।

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