जड़वादियों और चेतनवादियों का युद्ध है कुम्भ

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कुम्भ राशि गत सुर-गुरु, बृहस्पति द्वारा प्रेरित महाकुम्भ का महापर्व हरिद्वार में क्यों मनाया जाता है! हरिद्वार, जो प्राचीनतम मायापुरी क्षेत्रा का अभिन्न अंग, गंगा द्वार था आध्यात्मिक उपलब्ध्यिों का स्त्रोत रहा हैऋ एवं इस तीर्थ की ऐतिहासिक महत्ता महाकुम्भ से निर्विवाद जुड़ी हुई कही जा सकती है। संभवतः यदि गंगावतरण का कथानक पौराणिक व ऐतिहासिक रूचि का आदि-प्रकाशक है तो गंगाद्वार, हरिद्वार और महाकुम्भ का आध्यात्मिक प्रसंग भी उससे जुड़ा होने का संकेत देता है। अथर्ववेद में पूर्ण कुम्भ का काल 12 वर्षों, ट्टतुओं, मासों आदि के रूप में निर्धरित किया गया है एवं यह काल-चक्र संसार का पालक माना गया है।

यथाः पूर्णः कुम्भोध्किाल अहितस्तं वै पश्यामो बहुध नु संतः।
स इमा विश्वा भुवनानि प्रत्यघ् कालं तमाहुः परमे व्योमन्।।

कुम्भ का तात्विक अभिप्रायः ‘कुत्सित दोषों को जगत् कल्याण की भावना से प्रेरित होकर दूर करना है।’ यथाः ‘‘कु कुत्सितं उम्भति दूरयति जगतायेतिवा कुम्भः।’’ और भीः ‘‘कुं पृथिवीं उम्भति पूरयति मंगल सम्मानादिभिरिति कुम्भः।’’ अर्थात् पृथ्वी को मंगल-स्नान आदि से पूर्ण करने वाले को कुंभ कहते हैं।

अतएव कुम्भ से सम्बन्ध्ति भौतिक सुख-शान्ति के लिए किए जाने योग्य ज्ञान यज्ञों के स्थानों का निर्देश पुराणों में दिया गया ताकि जन-सामान्य उससे लाभान्वित हो सके। इन यज्ञों, समागमों के आयोजन के लिए स्थान व समय ;कालद्ध निर्धरित किए गए। सर्वप्रथम एवं सर्व-अग्रणी स्थान हरिद्वार और समय बृहस्पति के कुम्भ राशि में गतिमान होने पर सूर्य के स्वोच्च मेष राशि में प्रवेश को घोषित किया गया। यथाः कुम्भ राशि गते जीवे तथा मेषे गते रवौ। हरिद्वारे कृतं स्नानं पुरावृत्तिवर्जनम्।। ;अर्थात् कुम्भ राशि के बृहस्पति तथा मेष राशि पर सूर्य के होने पर हरिद्वार में स्नान करने से पुनर्जन्म नहीं होता, मोक्ष प्राप्त हो जाता है।

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पुराणों में हरिद्वार को महापुण्य वाला तीर्थ कहा गया है। ‘‘हरिद्वारं महापुण्यं देवर्षि सत्तम। यत्रा गंगा वहत्येव तत्रोक्तमं तीर्थमुक्तमम्।।’ हरिद्वार में ब्रह्मकुण्ड, हर की पौड़ी सबसे पवित्रा तीर्थ-स्थान माना गया है। यहीं पर प्राचीनकाल से ही लोक मान्यता के अनुसार ‘विष्णु और शिव एवं हरि और हर के निवास के कारण हरिद्वार में हरद्वार नाम प्रख्यात है।’ यह मान्यता भी है कि ब्रह्मा ने यहीं पर तपस्या भी की थीऋ ब्रह्मा द्वारा किए गए यज्ञ के पवित्रा स्थान को ब्रह्म-कुण्ड के नाम से जाना जाता है। यहीं पर ब्रह्माजी की पादुका भी हैं।

गंगावतरण के समय श्री ब्रह्माजी ने गंगा द्वार पर ही प्रगट होकर महाराजा भगीरथ को आशीर्वाद देते हुए कहा थाः इयं च दुहिता ज्येष्ठा तव गंगा भविष्यति। त्वत्कृतेन च नाम्राथ लोके स्थास्यति विश्रुता।।;गंगा तुम्हारी बड़ी पुत्राी समझी जाएगी, क्योंकि तुम्हारे ही प्रयत्न से यह भूतल पर आई है। श्री महाभारत के आदि-सम्भव पर्व-अध्याय 67 में गंगा द्वार में भीष्म के पितामह राजर्षि भूपति प्रतीप द्वारा किए गए कठोर जप यज्ञ का वर्णन है, जहां श्रीगंगा जी स्वयं प्रकट हुई एवं आश्वासन दियाः ‘‘त्वद्भक्तया तु भजिष्यामि प्रख्यातं भारत कुलं’’, अर्थात् तुम पर भक्ति करके एवं तुम्हारे अनुरूप मैं इस भारत वंश की सेवा करूंगी।

सबके हितार्थ राजा प्रतीप ने गंगा द्वार ;हरिद्वारद्ध में जप किया। स्पष्ट है कि इन्द्रप्रस्थ के सम्राट गंगाजी के वरदान से ही ;समस्त भारत, विशेषतः उत्तर-भारत मेंद्ध वंश व वैभव सम्पन्न रहे। हरिद्वार की आध्यात्मिक महत्ता सम्राट विक्रमादित्य के राज्यकाल से भी पूर्व विख्यात रही होगी। तभी तो सम्राट के परमविद्वान, ज्ञानवान, भाई महाकवि भर्तृहरि द्वारा की गई गंगा द्वार ;हरिद्वारद्ध तपस्या की पुण्य-स्मृति में पौड़ियों और हवन कुण्ड आदि का निर्माण या पुनर्निर्माणद्ध करवाया गया। श्रद्धालुजन का विश्वास है कि हरिद्वार में ‘हर की पौड़ी’ नाम भर्तृहरि के समय से विख्यात हुआ।

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हरिद्वार की महिमा का वर्णन करते हुए पप्र पुराण ने इस तीर्थ को ध्र्म, अर्थ, काम और मोक्ष देने वाला बताया है। हरिद्वार-स्य सदृशं शक्रप्रस्थगतस्य वै। न तीर्थं पृथिवी लोके चतुर्वर्ग पफलप्रदम्।। अर्थात् इस पृथ्वी पर हरिद्वार के सामान अन्य कोई तीर्थ, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का देने वाला नहीं है। गंगाद्वार पर महाकुम्भ और हरिद्वार का प्राचीनतम ऐतिहासिक सम्बन्ध् निर्विवाद है।

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