अकबर का अंत क्यों और कैसे हुआ?

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अकबर का हँसता हुआ सौभाग्य-चन्द्रमा अन्तिम समय में मेघाच्छन हो गया था। वह मुगल-वंश का स्थायी रोग था एक हुमायूँ को छोड़कर बाबर से लेकर औरंगजेब तक जितने मुगल बादशाह हुए, उनमें कई गुण थे। वह शारीरिक बल, साहस, युद्ध-कला और शासन करने की स्वाभाविक शक्ति में अपने समकालीन लोगों में अद्वितीय समझते जाते थे। साथ ही उनकी आयु भी बड़ी होती थी मुग़ल-बादशाहों की सफलता उनकी व्यक्तिगत सफलता थी। वह अपने बाहू-बल और बुद्धिबल से राज्य करते थे। अकबर के गुण और हुमायूं के दोष ही उनकी सफलता और असफलता के कारण थे।

जहाँ एक सत्तात्मक राज्य हो, वहाँ यह परिणाम आवश्यक है। अकबर के राज्य के अन्तिम भाग में उसका बड़ा पुत्र सलीम विद्रोही हो गया पहले इसके कि हम उस विद्रोही की कहानी सुनायें, हमें दो प्रश्नों का उत्तर देना आवश्यक प्रतीत होता है सलीम को अकबर जैसे स्नेही और समझदार पिता के विरुद्ध विद्रोह करने की आवश्यकता क्यों प्रतीत हुई? और एक मध्यम दर्जे के सेनापति को अपने समय के शिरोमणी सिपाही का सामना करने का साहस कैसे हुआ? विद्रोह की आवश्यकता समझने के लिए हमें उस समय के शासन और राज्य के आदर्श को देखना होगा। उस समय के शासन और राज्य का आदर्श था-विषय-भोग, विलासिता और उन्माद।

किसानों को जागीरदार खाते थे, जागीरदारों को उमरा खाते थे, उमरा को सूों के गवर्नर खाते थे और गवर्नरों को बादशाह चूसता था। युद्ध की दशा को छोड़कर शेष समय में बादशाह की यही विशेषता थी कि वह अपनी सारी रियाया की अपेक्षा अधिक राशि में भोग सामग्री को प्राप्त कर सके। भोग-भोग-भोग-यह उनका मूल मन्त्र था।

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बादशाह का हरेक बेटा अपने बाप को विलास की सामग्री में लोटता देखकर ईर्ष्या करता था। युवावस्था के चढ़ते ही उसके दिमाग पर यह भूत सवार हो जाता था कि यदि मेरे बाप को सुख भोगने का अधिकार है तो मुझे क्यों नहीं है? ज्यों-ज्यों आयु बढ़ती थी उसकी घबराहट बढ़ती थी। वह सोचता था कि भोग की आयु व्यतीत हो रही है आप मरने को नहीं आता। क्या मेरे भाग्य में बादशाहत का मजा लिखा ही नहीं। लूट और विषय-भोग में हिस्सा चाहने वालों की संसार में कमी नहीं है। जहाँ शहजादे के हृदय में संतान पैदा हुआ कि यहकाने वाले यारों की मण्डलों इकट्ठी हुई। इसी क्रम से विद्रोही का भाव उत्पन्न होता और बढ़ता था। सलीम के हृदय में भी इसी प्रकार का विक्षोभ उत्पन्न हुआ। १६०० ई० में उसकी आयु ३१ वर्ष की हो गई थी। जवानी अपने यौवन पर थी। विजय-भावना का दरिया उमड़ रहा था। अब उसे रात-दिन सूबों के प्रबन्ध में गुजारना कठिन प्रतीत होता था, और मृत्यु कहाँ आसपास दिखाई नहीं देती थी सलीम का विषय-लोलुप हृदय ऐश्वर्य के सागर में लोटने के लिए अधीर हो उठा।

दूसरा प्रश्न यह है कि सलीम को अकबर जैसे विजेता का सामना करने का साहस कैसे हुआ? प्रश्न का समाधान स्पष्ट है। वह राज्य प्राचीन रूम पर अवलम्बित था और न प्रजा की इच्छा पर। मुसलमाना के राज्य-काल में कोई राजवंश इतने काल तक स्थायी न रहा कि उसे रुचि पर कायम समझ सके। केवल एक मुगल-वंश शाहजहाँ के समय कुछ स्थिर रूप में खड़ा हुआ दिखाई दिया, परन्तु अगले ही शासन दक्षिण से धक्का लगते ही यह खम्ये जो फौलाद के प्रतीत होते लड़खड़ाकर गिर पड़े और तब मालूम हुआ कि जिसे फौलाद समास गया था, वह असल में कच्ची धातु थी।

अकबर के समय में तो मुगल राज्य को जड़े जमीन में भी दिखाई देती थी यह विशाल वृक्ष अकबर के विशाल कंधे के सहारे जमीन पर ही खड़ा हुआ था। सलीम ने देखा कि बाप बढ़ा हुआ-में जवान है। राज्य करने का अधिकार शक्ति पर निर्भर करता है-अब मैं शक्त हो गया, तो बाप को मुझे राज्य से वंचित रखने का क्या अधिकार है? जो राज्य न चिरकाल की रूि पर स्थित हो और न प्रजा के प्रेम पर, उसके संचालक का बुढ़ापा या रोग एक प्रकार से विद्रोह का निमन्त्रण है अकबर की वृद्धावस्था देखकर स्वभावत: सलीम के हृदय में यह भाव उत्पन्न हुआ कि यदि शक्ति ही राज्यरोहण की प्रधान साधिका है, तो जवान सलीम बूढ़े अकबर की अपेक्षा राज्य का अधिक अधिकारी क्यों नहीं है?

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सलीम को विद्रोही बनने में इस बात से भी कुछ कम सहायता नहीं मिली कि अकबर के धार्मिक विचारों ने मुसलमानों में खलबली सी मचा रखी थी। वह अकबर की उदारता को द्वीप और घृणा की दृष्टि से देखते थे। ऊपर से चुप थे, क्योंकि चढ़ती कला के सामने हरेक आदमी झुक जाता है, परन्तु अन्दर से वह उस समय की प्रतीक्षा कर रहे थे जब कोई कट्टर मुसलमान बादशाह आगरे को गद्दी पर बैठे। सलीम चाहे अन्दर से कट्टर मुसलमान न हो, परन्तु अपने राज्य के खातिर नीति के तौर पर उसे कट्टर मुसलमान बनने से इन्कार नहीं था। उसने राजगद्दी पर बैठने से पूर्व मुसलमान सरकार से वादा किया था कि वह भारत में इस्लाम की रक्षा करेगा सलीम को आशा थी कि यदि पिता-पुत्र की लड़ाई हुई, तो मुसलमानों का अधिकांश पुत्र का साथ देगा।

अकबर के समय में मुगल-साम्राज्य अपने यौवन की ओर जा रहा था। उसके आधार मजबूत हो रहे थे, परन्तु वह रोग जो अन्त में मुगल साम्राज्य को खा जाने वाले थे, बीज रूप में विद्यमान थे उनमें तीन मुख्य रोगों की ओर हमने ऊपर निर्देश किया है। संक्षेप में यह निम्नलिखित हैं

  1. शासक वर्ग की विषयासक्ति और लम्पटता।
  2. राज्य-शक्ति का केवल एक सत्तात्मक होना।
  3. शासक-जाति का मज़हबी कट्टरपन, जिसके कारण उदार से उदार शासक को भी उन सरदारों का सहारा लेना पड़ता था, जो भारत की हिन्दू प्रजा को काफिर समझते थे।

यह तीन कारण थे जिन्होंने सलीम को विद्रोह के लिए प्रेरित किया, परन्तु इसका यह अभिप्राय नहीं कि सलीम इनके लिए विशेष रूप में दोषी था। वह केवल अवस्थाओं का दास था। दोप या तो वंशीय थे या सामयिक। उस समय एक बड़ा रोग मद्य-पान था। सलीम बाड़ा भारी पीने वाला था परन्तु यह केवल उसी का दोष नहीं था। मुगल साम्राज्य का संस्थापक बाबर खूब शराब पीता था। उसने आत्म-कि में जापान के दौरे का मजेदार वर्णन किया है हुमायूँ भी पीता था अकबर शराब और अफीम दोनों का प्रयोग करता था कभी-की शराब की मस्ती में वह ऐसे अनर्थ कर बैठता था कि सचेत अवस्था में उन पर शर्माना पड़े। बड़ी उमर में उसने शराब पीना छोड़ दिया था परन्तु उसके स्थान पर अफीम खाने का व्यसन सोमा से अधिक वव गया था। ऐसे वंशज संस्कारों में उत्पन्न होकर यदि सलीम मद्य और

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अफीम का उपासक था, तो आश्चर्य की बात कौन-से हुई? अकबर शासन-काल के गुण और सुधार सब उसकी व्यक्तिगत उदारता और दूरदर्शिता के परिणाम थे उसने कानून का सुधार तो किया, परन्तु कानून बनाने वाली मशीन बैसी की वैसी बनी रही थी बादशाह की इच्छा ही कानून था। एक बादशाह को उदारता ने जो उत्तम से उत्तम कानून बनाये, दूसरे बादशाह की अनुदारता सहज ही में उन पर पानी फेर सकती थी। जिसकी लाठी उसकी भैंस’ यह उसूल उस समय सर्वसम्मत था। जब सलीम ने देखा कि उसके हाथ में लाठी आ गई है तो उसने अपना अधिकार समझा कि बूढ़े बाप के हाथ से हुकूमतरूपी भैंस को छीनने का प्रयत्न करे।

अकबर का हृदय विशाल था इस्लाम के मौलिक सिद्धान्तों को स्वीकार करते हुए भी उसके रूढ़िवाद पर विश्वास करना उसके लिए असम्भव था। उसने ‘दीने इलाही’ की कल्पना की। दुःख की बात है कि उनकी धार्मिक उदारता ने उलटा ही रूप धारण किया। उदारता का उचित रूप यह होता कि वह किसी नये धर्म की स्थापना न करके और अपने मजहब विचारों को राज्य से फैलाने की चेष्टा न करके, प्रजा को अधिकार देता कि वह अपनी इच्छानुसार धार्मिक कर्तव्यों का पालन करे। इस सरल मार्ग को छोड़कर उसने स्वयं मजहवी पेशवा बनने का यल किया। कई सामयिक लेखकों की तो सम्मति है कि अन्तिम वर्षों में अकबर ने इस्लाम पर आघात भी किये।

जिस उदारता से उसने हिन्दुओं के हृदयों को जीत लिया था, मुसलमानों के साथ सलूक करते हुए उसे हाथ से छोड़ दिया था। परिणाम यह हुआ कि यद्यपि धार्मिक अत्याचार प्रत्यक्ष क्रिया रूप में बन्द हो गया, परन्तु धर्म के कारण राजनीतिक अधिकार में भेद करने की प्रवृत्ति कम न हुई। असहिष्णुता का करार दिया गया, परन्तु भाव विद्यमान रहा। शासन करने वाले ह के कमजोर होते हो वह असहिष्णुता का भाव वैसे ही उज्ज्वल हो उ जैसे पवन के झोके से राख के हट जाने पर दबी हुई आग जल उठ है।

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यथा राजा तथा प्रजा। जय बादशाह खुले दरवार में शराब पीता था, तो रईस और उमरा क्यों कसर छोड़ने लगे शराब और अफीम अधिकार के आभूषण बन गये हरेक रईस छोटे पैमाने पर राजदरबार का अनुकरण करना चाहता था। स्त्रियों के सम्बन्ध में इस्लाम में बॉ हुए बन्धन का उल्लंघन ऐश्वर्य का आभूषण समझा जाता था अबुल फजल के चार औरत थी, इसलिए यह तो एकदम पर सदाचारी और शुद्ध सोना समझा जाता था। जीते हुए शत्रु को औरतें तो विजेता की सहज सम्पत्ति मानी जाती थी। विवाहित औरतों के अतिरिक्त गोलियाँ रखने का रिवाज भी आम था।

विजेता मुसलमानों के इन दोनों से राजपूत रईस भी नहीं बच सके थे वह लोग अफीम की बुरी तरह व्यवहार करते थे। शासन के नीति में भी सभी रईस या सूबा अपनी-अपनी सोमा में छोटे बादशाह बने हुए थे। बादशाह की नजर बचाकर जहाँ तक बन पड़ा था, अपने मजहब पागलपन की भी करामात दिखला देते थे। ऐसे गन्दे समाज में सलीम का अपने पिता के प्रति विद्रोही बन जाना क्या आश्चर्यजनक था ? १५९१ में अकबर को कालिफ की पीड़ा हुई, तो उसने दरबारियों से यह संकेत प्रकट किया कि शायद सलीम ने जहर दे दिया है २६०० ई० तक पहुंचते-पहुंचते शहजादे का धैर्य जाता रहा। वह गद्दी पर बैठने के लिए उतावला हो उठा।

१५६२ में अकबर ने खानदेश और वरार को जीतकर अपने राज्य में सम्मिलित कर लिया था। अकबर के दो पुत्र मुराद और दानियाल एक दूसरे के बाद उस सूबे के शासक बनाकर भेजे गये, परन्तु दोनों ही शराबी, विषयासक्त और निर्बल थे दोनों ही नाकामयाब हुए १५१९ में अबुल फजल को दक्षिण को जीतने के लिए सूवा बनाकर भेजा गया। सुस्ती देखकर अकबर स्वयं मैदान में पहुंचा और चाँदबीबी द्वारा अपूर्व साहस और धैर्य से सुरक्षित अहमदनगर को सैन्य बल और उद्यम से जीतने में समर्थ हुआ। १६०० ई० में असीरगढ़ का किला भी मुगल राज्य का अंग बन गया। इस प्रकार खानदेश की विजय को पूर्ण करके १६०१ ई० में अकबर आगरे वापस आ गया आने पर उसे मालूम हुआ कि सलीम ने विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया है, और स्वतन्त्र राजा के सभी चिन्ह धारण कर लिये हैं ।

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दक्षिण की ओर जाते हुए अकबर ने सलीम को अजमेर का ‘सूबेदार’ नियुक्त किया था उसकी सहायता के लिए राजा मानसिंह भी गये। कुछ दिन बाद बंगाल में उस्मान खाँ ने विद्रोह खड़ा किया। राजा मानसिंह को वहां जाना पड़ा। बादशाह दक्षिण में और राजा मानसिंह बंगाल में-शहजादे के मुंह में पानी भर आया। उसने सूबेदारी छोड़कर बादशाह बन जाने का संकल्प किया और अजमेर को परित्याग कर आगरे को ओर यात्रा को। आगरे पहुंचकर चाहा कि वहाँ के शासक को मुट्ठी में करके खजाने पर अधिकार जमा ले, परन्तु कलीज खों की विभक्ति व लिप्स सिद्ध हुई। उसने शहर के द्वार सलीम के लिए बन्द कर दिये, जिससे निराश होकर उसे इलाहाबाद का रास्ता लेना पड़ा। इलाहाबाद में सलीम के कुछ मददगार थे।

उनकी सहायता से उसने सरकारी खजाने पर कब्जा कर लिया और संघ और बिहार के स में अपने आप बादशाह बन बैठा। खजाने में लगभग ३० लाख रुपये थे। यह सब उसके हाथ आये। थोड़े ही दिनों में सलीम के नाम के सिक्के बाजार में चलने लगे। अकबर ने दक्षिण से लौटकर अपने सपत्र की करतूत कानों से सुनी और आँखों से देखी, क्योंकि सलीम ने पितृद्रोही के दोष को मिठाई द्वारा पूर्णता तक पहुँचा देने के लिए अपने नाम के सोने और चाँदी के सिक्के अकबर के पास भेज दिये थे। दो वर्ष तक ऐसी ही दशा बनी रही सलीम ने अपने दूत द्वारा अकबर को कहला भेजा कि मेरे बारे में आपको गलतफहमी हुई है, उसे दूर करने के लिए मैं ७० हजार सिपाहियों को साथ लेकर आना चाहता हूँ।

अकबर ने इस अद्भुत मुलाकात को मंजूर नहीं किया। परन्तु कुछ स्वाभाविक पुत्र प्रेम से और कुछ दूरदर्शिता से प्रेरित होकर वह उदार शासक सलीम को सीधा विद्रोही नहीं बनाना चाहता था। मामला इसी तरह लटकता गया। इस समय एक ऐसी दुर्घटना हो गई, जिसने अकबर के हृदय को गहरी चोट पहुँचाई और विद्रोह को विद्रोह समझने के लिए बाधित किया। अबुल फजल अकबर का इतिहास-लेखक हैं नहीं था, वह उसका गहरा दोस्त और अन्तरंग सलाहकार था। वह १६०२ ई० के आरम्भ में दक्षिण से आगरे की ओर आ रहा था। सलीम अबुल फजल से बहुत जलता था। उसके दिल में यह बात जम गई थी कि अकबर के हृदय में उसकी ओर से मैल पैदा करने वाला अबुलफजल ही है। वजीर के आगरे लौटने की खबर सुनकर शहजादा घवरा गया।

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अबुल फजल का मार्ग ओरछा के सरदार वीरसिंह बुन्देला के इलाके में से होकर गुजरता था। सलीम ने वीरसिंह को रुपये का लोभ देकर वश में कर लिया। अबुल फजल की फौज को अकस्मात छापा मारा वीर सिंह ने तितर-बितर कर दिया और वज़ीर का सिर काटकर सलीम के पास भेज दिया। इस समाचार ने अकबर के हृदय को मसल डाला। वह बहुत रोया और कई दिनों तक दरबार में न आया। बादशाह ने अबुलफजल का हत्या का क्रोध वीरसिंह पर उतारना चाहा परन्तु बुन्देला राजपूत भा निकला। इस प्रकार अवस्था बिगड़ रही थी. जब राजपरिवार की महिलाओं ने गुत्थी को सुलझाने की चेष्टा की और कृतकार्य का भी प्राप्त की। सलीमा बेगम जो पटरानी होने से अन्य रानियों की अपेक्षा अकबर पर अधिक अधिकार रखती थी, स्वयं इलाहाबाद गई, समझा-बुझाकर सलीम को आगरे ले आई। आगरे में अकबर की माता ने पोते की सुरक्षा का बोझ अपने ऊपर लिया। इस प्रकार पुत्र और पिता में सुलह हो गई। पुत्र ने आदर के तौर पर १२ हजार मुहरें, ७८० हाथी और बहुत-सी कीमती चीजें पिता को भेंट की अकबर ने कुछ हाथी रख लिये, शेप वापस दे दिया।

प्रत्यक्ष रूप में दोनों में सुलह हो गई, पर अन्दर ही अन्दर आग सुलगती रही। सलीम इलाहाबाद लौट गया वहाँ जाकर फिर उसी राजसी ठाठ से रहने लगा। शराब और अफीम का दौर दिन-दूनी और रात-चौगुनी गति से बढ़ने लगा। अतिक्रमण का असर सलीम की तययत पर भी हुआ। उसकी तबीयत उग्र हो उठो। जरा-जरा-सी बात पर खफा हो जाता और अपराधी को मरवा डालता। आसपास के लोग उससे बाघ के समान डरने लगे भविष्य में राजगद्दी पर बैठने वाले मनुष्य के लिए यह शकुन अच्छे नहीं थे।

इधर जहाँगीर अकबर को आँखें दिखा रहा था, उधर मुराद और दानियाल शराब और अफीम के नशे में अपनी आयु और विभूति को गर्क कर रहे थे। दानियाल पर बादशाह की बड़ी आशायें थीं। सलीम के बिगड़ जाने पर पिता की आँखें छोटे पुत्र पर ही पड़ती थी; उसके गौरव को बढ़ाने के लिए १६०४ ई० में बीजापुर के बादशाह की कन्या से दानियाल की शादी की गई, परन्तु होनी को कौन टाल सकता है। शराब का दुर्व्यसन अपना काम कर गया अकबर ने राजकुमार को शराब से बचाने के जितने उपाय किये, व्यर्थ गये जो पहरेदार मद्य की पहुँच को रोकने के लिए खड़े किये गये, उन्हें दानियाल ने पैसों से जीत लिया और अपनी मौत को निमन्त्रण देकर बुला लिया। १६०६ ई० के समाप्त होने से पहले ही उसका देहान्त हो गया शराब के नशे में ही बेहोशी और कम्पकम्पी का एक दौरा उठा कि राजकुमार के मजबूत शरीर को हार माननी पड़ी। बुढ़ापे में विजयी बादशाह को भाग्य से हार खानी पड़ी।

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उधर सलीम के अत्याचारों की कथायें प्रतिदिन आ रही थीं। उन्हें सुन-सुनकर अकबर का हृदय दग्ध हो रहा था। आखिर उसकी सहनशक्ति का अन्त हो गया उसने इलाहाबाद में पहुँचकर बिगड़े हाथी को जंजीरों में बाँधने का निश्चय किया इधर दरबार में एक पार्टी ऐसी खड़ी हो रही थी, जो सलीम के स्थान पर उसके पुत्र खुसरों को गद्दी का अधिकारी बनाना चाहती थी उस पार्टी के नेता राजा मानसिंह और खान-ए-आजम थे। ये दोनों अमीर खुसरो के रिश्तेदार भी थे राजा मानसिंह खुसरो का मामा और खान-ए-आजम उसका श्वसुर था। सलीम को सजा देने के लिए अकबर का लश्कर तैयार होकर जमुना से पार हो गया था और स्वयं बादशाह भी कूच का हुक्म देने के लिए आ पहुंचे थे कि इतने में एक दुर्घटना ने उसका हाथ थाम लिया।

अकबर की बूड़ी माँ अकस्मात् बीमार हो गई और चिकित्सकों ने दो कि वे मृत्यु शैय्या पर पड़ी है। समाचार सुनते ही बादशाह आगरे लौट आया। किन्तु होनी को कौन टाल सकता है। राज-माता पाँच दिन तक बेहोशी की हालत में रहकर २६ अगस्त १६०४ के दिन इस संसार को छोड़ गई। अकबर को एक और धक्का पहुंचा। उसने सलीम को सजा देने का विचार छोड़ दिया। सलीम को भी सुलह के लिए अच्छा मौका मिला। दादी के मरने के बहाने से वह आगरे आया। अकबर ने उसका प्रत्यक्ष रूप में तो खूब स्वागत किया, परन्तु ज्यों ही वह दरवार में पिता के सामने आकर झुका कि अकबर ने हाथ से पकड़ कर उसे अन्दर की ओर घसीट लिया और छोटे से कमरे में ले जाकर विगडे हुए बेटे के मुँह पर जोर की चपत जमाई और बहुत बुरा-भला कहा। सलीम के हिमायती कैद कर दिये गये, उसे बीमार बनाकर नज़रबन्दी में अच्छे हकीमों की देख-रेख में रखा गया। कुछ दिनों बाद नजरबन्दी जाती रही और वह शहजादा एक जुदा महल में रहने लगा।

अकबर का अन समय आ पहुंचा कहते हैं कि उसकी अन्तिम बीमारी अपनी ही करनी का फल था। वह राजा मानसिंह को सलीम के रास्ते से हटाना चाहता था उसने हकीम से एक ही रूप-रंग की दो गोलियाँ बनवाई थीं, जिनमें से एक ज़हरीली और दूसरी सादी थी। देते हुए भूल हो गई। अपना दाँव अपने ही सिर पर सवार हो गया। बादशाह ने वह गोली तो स्वयं खा ली, जो मानसिंह के लिए थी और मानसिंह को निर्दोष गोली दे दी। बीमारी का इलाज करने की बहुत

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चेष्टा हुई, परन्तु अवस्था प्रतिदिन खराब ही खराब होती गई। जब अकबर की दशा निराशाजनक हो गई, तब सलीम जो खुसरो की पार्टी के डर से पिता के पास आने से घबराता था, हिम्मत करके, बहुत से मददगारों के साथ महल में पहुँचा और रोगी की शय्या के पास हाजिर हुआ। उस समय अकबर की जबान बन्द हो चुकी थी, परन्तु देखने और समझने की शक्ति कायम थी। सलीम ने झुककर सलाम किया। अकबर ने हाथ के इशारे से उसे उठाने को कहा और दरबारियों को इशारा किया कि सलीम के सिर पर राजा की पगड़ी रख दें और कमर में हुमायूँ की तलवार, जो दीवार पर लटक रही थी, बाँध द आज्ञा का पालन किया गया सलीम का राज्याभिषेक हो गया उसके योड़े ही समय बाद बादशाह के प्राण-पखेरू नश्वर शरीर को छोड़क उड़ गये।

इस प्रकार उस शक्तिशाली, दूरदर्शी और उदार बादशाह का अन्त हुआ, जिसका नाम भारतवर्ष ही नहीं, अपितु संसार के साम्राज्य संस्थापकों की सूची में स्वर्णाक्षरों में लिखा जा चुका है। वह प्रतिभा के साथ पैदा हुआ था। वह स्थान, जाति या मजहब के तंग विचारों और संस्कारों को महत्वाकांक्षा की पवित्र वेदी पर कुर्बान कर सकता था। उसमें जो दो थे, वह समय के दोष थे, पर जो उसमें गुण थे वह समय से बहुत ऊँचे थे, वह उसके अपने थे मुगल-साम्राज्य की और उसके साथ ही इस्लाम की उन जड़ों को जो कई सौ साल बीत जाने पर भी अभी भूतल पर ही फैल रही थीं, अकबर ने बहुत दूर तक गहराई में पहुँचा दिया। उसकी मृत्यु से पूर्व, यूरोप में और एशिया के अन्य देशों में यह खबर मशहूर हो गई थी कि “हिन्दुस्तान में एक महानुभाव राजा राज्य करता है, जिसके घाट पर बाघ और बकरी एक साथ पानी पीते हैं।”

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