कोविड-9 महामारी के दौर में होगा हरिद्वार कुम्भ-2021 का बड़ा धार्मिक समागम

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हरिद्वार कुम्भ का इतिहास एवं वर्तमान स्वरूप

धर्म नगरी हरिद्वार पर धीरे-धीरे अब कुंभ मेले का रंग चढ़ता जा रहा है। इन दिनों हरिद्वार आने श्रद्धालुओं के आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। हरिद्वार कुंभ मेले की शुरूआत 14 जनवरी 2021 को मकर संक्रांति के पर्व से हो जाएगी। दुनिया के सबसे बडे़ धार्मिक मेले हरिद्वार कुंभ में आस्था की डुबकी लगाने को करोड़ों लोग तैयारी में हैं। लेकिन इस बार का यह कुंभ कोविड महामारी के कारण अलग ही होगा। पहली बार कुंभ के शाही स्नानों में चुनिंदा संत ही शामिल हो पायेंगे।

कुम्भ का इतिहास बहुत पुराना है। जिस काल में समुद्र मंथन हुआ वह काल देवलोक और वैदिक काल था। अतः उस समय आम जन सम्भाषण की भाषा संस्कृतमयी हिन्दी होने के साक्ष्य मिलते हैं। कुम्भ संस्ड्डत का एक श्रृंगारिक शब्द है। अतः मेले को ‘कुम्भ’ मेले का सम्बोधन दिया गया।जहाँ तक लिखित इतिहास की बात है लिखित इतिहास और प्राड्डत इतिहास में बहुत अन्तर होता है।

हालांकि कुछ स्थानों पर कुम्भ मेले की परम्परा गुप्त साम्राज्य से प्रारम्भ हुई बताई गई है, और कुछ स्थानों पर इसे हर्षवर्धन के काल से प्रारम्भ हुआ बताया गया है, और कुछ कुम्भ परम्परा को आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित परम्परा मानते हैं। जो भी हो कुम्भ ने मेले का स्वरूप कब से लिया इसका कोई स्पष्ट या पुख्ता मत प्राप्त नहीं होता है। यदि पौराणिक काल गणना को सही माना जाए तो भारतीय पुराणों में भारतीय सभ्यता के लाखों वर्षों का विवरण मिलता है। पौराणिक संदर्भों के अनुसार इस समय 28वीं चतुर्युगी के अन्तिम युग कलियुग का 6106वां वर्ष चल रहा है और समुद्र मंथन की घटना सतयुग से 2 लाख वर्ष पूर्व अर्थात् अब से 23.77 लाख वर्ष घटित हुई मानी गयी है। अतः कुम्भ मेले के प्रारम्भ का कोई पुष्ट प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

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अनादि काल से प्रचलित कुम्भ परम्परा को समय-समय पर विभिन्न कालों के हिन्दु राजाओं ने व्यवस्थित किया है। कुछ लोग कुम्भ की शुरूआत सम्राट हर्षवर्धन ;612-647 ई.द्ध से मानते हैं। सातवीं शताब्दी के चीनी ह्वेनसांग केे द्वारा लिखे गये यात्रा वर्णन में भी इसका प्रमाण मिलता है। ऐसे भी ऐतिहासिक तथ्य हैं कि बौ( काल में कुम्भ पर्व का प्रचलित रूप बदलकर ‘महादान पर्व’ के रूप में आ गया होगा जिसे बाद में आदि शंकराचार्य के आविर्भाव के बाद संन्यासियों की दशनाम परम्परा के द्वारा पुनः व्यवस्थित किया गया होगा।

कुम्भ मेले को लेकर मेदिनीशाह के विषय में एक ऐतिहासिक घटना का वर्णन इतिहास में आता है। कहा जाता है कि एक बार हरिद्वार के कुम्भ मेले में मेदिनीशाह स्नान करने के लिए गया। उसका शिविर चण्डीघाट पर पड़ा था। प्राचीन काल से चली आई प्रथा के अनुसार कुम्भ के पर्व पर सबसे पहले गढ़ नरेश ब्रह्म कुण्ड में स्नान किया करता था।

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इस बार कुछ नरेशों ने गढ़ नरेश से पहले कुण्ड में स्नान करने की योजना बनाई और अपनी योजना को सफल करने के लिए आवश्यकता पड़ने पर यु की द्ध भी तैयारी कर ली। कहते हैं कि मेदिनीशाह ने युद्ध करना उचित न समझ कर पर्व से पहली रात्रि को कहा- ‘‘मेरी गंगा ह्वैली तो मेरा पास आली।’’ अगले दिन रात्रि खुलने पर सबने आश्चर्य से देखा कि गंगा की धारा पलट कर चण्डीघाट के पास बहने लगी है और ब्रह्मकुण्ड में गंगाजल नहीं पहुँच रहा है। गढ़ नरेश ने कुंभ पर्व पर अपने शिविर के पास गंगा में स्नान किया। इसको गढ़ नरेश की महानता का प्रभाव समझ कर उपस्थित राजाओं और जनता ने गढ़ नरेश के दर्शन किये और उनसे क्षमा माँगी।

कुम्भ के अवसरों को लेकर यूँ तो सैकड़ों ऐतिहासिक तथ्य हैं पर यदि प्रमुख घटनाओं की दृष्टि से हरिद्वार में सम्पन्न होने वाले कुम्भ मेले का इतिहास उठाकर देखा जाए तो पता चलता है कि कुम्भ मेलों में हिन्दु धर्म से जुड़े सभी सम्प्रदाय, उन सम्प्रदायों के प्रमुख अपने-अपने अनुयायियों के साथ स्नान को आते थे और अमृत प्राप्ति हेतु अमृतमयी नक्षत्रों के ठीक संयोजन के योग पर पहले स्नान का सारा पुण्य स्वयं ले लेने की अभिलाषा में एक दूसरे सम्प्रदाय से भिड़ जाते थे। ऐसी भिड़न्तों और विवादों ने कई बार युद्ध और मुठभेड़ का रूप ले लिया। इसके कई प्रमाण मिलते हैं।

सन् 1260 के हरिद्वार कुंभ में हुई थी साधुओं के बीच मुठभेड़

सन् 1260 में हरिद्वार में हुए कुम्भ मेले में भावानन्द गिरी, सुन्दरानन्द पुरी तथा कमलानन्द आदि साधुओं के बीच हुई जबर्दस्त मुठभेड़ में हजारों वैष्णव साधुओं के मारे जाने का वृतान्त प्राचीन पुस्तकों में उपलब्ध है। सन् 1742 में पेशवा बालाजी राव के काल में हरिद्वार कुम्भ के दौरान भी साधु सन्तों की भिड़न्त का विवरण बालाजी राव के काल में हरिद्वार कुम्भ के दौरान भी साधु सन्तों की भिड़न्त का विवरण बाला जी राव काल से सम्बन्धित इतिहास में उपलब्ध है।

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विल्सन नामक एक अंग्रेज द्वारा ब्रिटिश शासन काल के दौरान लिखे गये वृतान्त में 1760 में पड़े कुम्भ मेले के दौरान वैष्णव और नागा सन्यासियों के बीच हुए संघर्ष के कारण हजारों साधुओं के मारे जाने का वर्णन है। एशियाटिक रिसेर्चेज में रैंसेड ने मारे गये लोगों की संख्या 18 हजार लिखी है। 1796 में कैप्टन टाॅमस हार्डविक द्वारा भी हरिद्वार कुम्भ मेले में सिख और सन्यासियों के बीच जबर्दस्त मुठभेड़ का वर्णन किया गया है।

इसके अलावा सन् 1398 में तैमूर लंग ने भी कुम्भ पर ही कहर बरपाया था। जब तैमूर लंग मथुरा, मेरठ और बिजनौर होता हुआ हरिद्वार ;मायापुरद्ध में रुका था। वह कुम्भ का वर्ष था, अतः तैमूर को हरिद्वार में भारी मेला लगा जिसे उसके आततायी सिपाहियों ने जी भर कर लूटा। सन् 1760, 1776, 1819, 1927, 1938, 1950, 1986,1998 और 2010 के कुम्भ वर्ष हरिद्वार के लिए निरापद नहीं रहे। भारी भीड़, स्नान स्थलों की संकीर्णता, सुविधाओं का अभाव और यातायात के अनियंत्रित हो जाने जैसे कारणों ने समय-समय पर अनेक लोगों की जानें ली हैं।

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प्रारम्भिक समय मेें मेले की व्यवस्था और देख-रेख के लिए अंग्रेज सरकार ने किसी प्रशासनिक अधिकारी के स्थान पर अंग्रेजी नागरिक की नियुक्ति किये जाने का प्रावधान रखा था, उस समय कुम्भ मेले की व्यवस्था मात्र तीन या चार माह पूर्व की जाती थी। हरिद्वार में अंग्रेज सरकार द्वारा सर्वप्रथम कुम्भ मेले का व्यवस्थित करने की जिम्मेदारी एक अंग्रेज नागरिक मि. क्रिस्टी को सौंपी गयी थी।

इस बात का वर्णन ‘‘कुम्भ मेला और भारतीय संस्ड्डति’’ नामक पुस्तक में मिलता है। जिसमें लेखक ने यह भी सम्भावना व्यक्त की है कि हो सकता है कि 400 बरस बाद लोग कुम्भ मेले का आयोजन कर्ता क्रिस्टी को ही समझ बैठें। इस बात से स्पष्ट होता है कि मि. क्रिस्टी से पूर्व कुम्भ मेले का कोई प्रभारी नियुक्त किये जाने का कोई प्रावधान नहीं था। सम्भवतः मि. क्रिस्टी से ही कुम्भ मेले की प्रशासनिक व्यवस्थाओं का दौर शुरू हुआ हो। बाद में सन् 1868 में हरिद्वार से एक डवलपेंट कमेटी का गठन हुआ जो नगर पालिका कहलायी तथा आज नगर निगम है।

भारतीय साधना व संस्ड्डति के मूल में जो परम सत्य निहित है, कुम्भ मेला की मूल स्थिति में भी उसी सत्य का बीज निहित है। उसके कारण ही इतने स्थिर और निश्चितरूप से चला आ रहा है। यह सच है कि कुम्भ के लिए भीड़ जुटाने का कोेई उद्यम नहीं होता, विज्ञापन की आवश्यकता नहीं होती, निमंत्रण या अभ्यर्थना नहीं होती फिर भी धनी-निर्धन, छोटे-बड़े, विरक्त तथा गृहस्थ लाखों की संख्या में हर-हर गंगे का उच्चारण करते हुए पर्व पर इकट्ठे हो जाते हैं तथा गंगा स्नान और साधु दर्शन का अवसर पाकर स्वयं को धन्य समझते हैं।

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सन् 1905 की शाम को गाँधीजी कस्तूरबा के साथ जब हरिद्वार पहुँचे तो कुम्भ के आयोजन को देखकर भावविभोर हो गये। उन्होंने कहा कि ‘‘अब कुम्भ का दिन आया, मेरे लिए वह घड़ी धन्य थी। परन्तु मैं तीर्थ यात्रा की भावना से हरिद्वार नहीं गया था। पवित्रता आदि के लिए तीर्थ क्षेत्र जाने का मोह मुझे कभी नहीं रहा। मेरा ख्याल यह था कि सत्रह लाख यात्रियों में सभी पाखण्डी नहीं हो सकते। यह कहा जाता था कि मेले में सत्रह लाख आदमी इकट्ठे हुए थे। मुझे इस विषय में कोई संदेह नहीं था कि इनमें असंख्य लोग पुण्य कमाने के लिए, अपने को शुद्ध करने के लिए आये थे।’’

काल गणना के अन्तर के कारण ही हरिद्वार में वर्ष 1856 के स्थान पर कुम्भ मेला 1857 में हुआ था। यह दौर आजादी की क्रान्ति सुलगने का दौर था। कुम्भ मेला क्योंकि एक ऐसा मेला है जिसमें करोड़ों लोग बिना किसी आमन्त्रण के और वह भी केवल हिन्दू एकत्र होते हैं, अतः स्वामी दयानन्द ने इस अवसर का उपयोग करने की ठानी। उस समय छोटे-छोटे राज्यों के राजा ब्रिटिश शासन के विरु( अपने-अपने स्तर पर संघर्षरत् थे।

स्वामी दयानन्द उस समय भारत में स्वदेशी और स्वतन्त्रता प्राप्ति की चर्चा चलाने वाले प्रथम व्यक्ति थे। उन्होंने तात्या टोपे, अजिमुल्ला खां, नाना साहेब, बाला साहेब और बाबू कुंवर सिंह, को निमंत्रण भेजा। वे स्वामी दयानन्द से हरिद्वार में मिलने आये। आजादी के लिए कसमसाते अलग-अलग दल यहाँ एकजुट हो गये और आजादी के संग्राम की प्रथम रूपरेखा कुम्भ मेला के अवसर पर तय की गयी। क्रान्तिदूतों ने देश भर में फैलकर क्रान्ति का संदेश प्रसारित किया और आजादी की क्रान्ति ज्वाला पूरे देश में फैल गयी।

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इसी अवसर पर सैनिकों में गुप्त संदेश पहुँचाने के लिए कमल का फूल तथा आम जनता में क्रान्ति के लिए उठ खड़े होने मेें रोटी का प्रतीक निर्धारित किया गया था। झाँसी की रानी के साथ अंग्र्रेजों के विरुद्ध युद्ध में नागा संन्यासियों की अग्रणी भूमिका रही। सन् 1915 में गाँधीजी ने स्वामी श्रद्ध नन्द से गुरुकुल में विशेष भेंट की। कुल मिलाकर हरिद्वार के कुम्भ का इतिहास अपने आप में बडे़ गौरव का विषय है। इससे कुम्भ का ऐतिहासिक महत्व द्विगुणित हो जाता है।

सद्प्रवृत्तियों और सद्विचारोंको समाज में बांटने का पर्व है कुंभ

कुम्भ पर्व वस्तुतः सद्प्रवृत्तियों और सद्विचारों को सारे समाज के बीच समभाव से बाँट देने का पर्व है। इसीलिए समाज के अग्रणी माने जाने वाले ऋषि-मुनि, साधु-संन्यासी, साधक-तपस्वी भी बारह बरस में एक बार एक स्थल पर एकत्र होकर अपने समाज को दायित्वबोध कराने का कार्य किया करते थे। इन अवसरों पर बारह बरस में आई सामाजिक जड़ता, विड्डति और उदासीनता पर गहन विमर्श होता था और तय होता था कि आगे आने वाले बारह वर्षों में समाज के इन दोनों वर्गों के क्या दायित्व होंगे। लेकिन वर्तमान संदर्भ में ‘कुम्भ पर्व’ के मायने ही बदल गये हैं। न तो अब जनता में और न ही साधु-संन्यासियों में पहले वाली भावनाएँ काम कर रही हैं। सरकारी तंत्र भी इस मेले को आध्यात्मिक बनाने की अपेक्षा पर्यटनोन्मुख बनाने में अधिक रुचि दिखा रहा है।

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1954 के कुंभ के बाद से यह बदलाव अब चरम सीमा पर है। अब विदेशियों को लुभाने के काफी प्रयास हो रहे हैं। पहले ऐसे मेला अधिकारी ढूँढे जाते थे, जो आध्यात्मिक रुचि होने के साथ-साथ संत-महात्माओं, दशनामी संन्यासियों तथा अखाडों के बारे में अच्छी जानकारी रखते थे। आज स्थितियाँ बदल गई हैं। मेले की शुरुआत ही जमीन के बँटवारे को लेकर साधु-संतों की धमकियों से होती है।

इस आध्यात्मिक मेले में कितना परिवर्तन आ चुका है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज शासन-प्रशासन मेले में संतों की अपेक्षा विदेशियों के लिए अधिक लालायित हैं। भारतीय संस्कृति में तो आतिथ्य सत्कार की एक समृ( परम्परा रही है। विदेशी मेहमानों का स्वागत होना चाहिए लेकिन इस मेले के मेरुदंड कहे जाने वाले साधु-संतो, संन्यासियों, नागा साधुओं की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए।

इस सम्बन्ध में 1954 में पारित कुंभ अधिनियम का पालन होना चाहिए। इस अधिनियम में साफ तौर पर कहा गया है कि हम सभी पंथों सम्प्रदायों का धार्मिक क्षेत्र में बिना किसी भेदभाव के आवश्यक सुविधा प्रदान करेंगे। संतों की बात की पहले कितनी अहमियत होती थी, इसका उदाहरण आपात काल के समय लगे कुंभ की व्यवस्था से मिलता है। उन विषम परिस्थितियों के चलते संत-महात्माओं को लगा कि उनकी उपेक्षा हो सकती है। इसके लिए देवरहा बाबा के माध्यम से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को संदेश भेजा गया। बाबा के संदेश का निहितार्थ था कि आपात स्थिति राज्य व्यवस्था के लिए है, कुंभ के लिए नहीं। उनके इस सुझाव का अक्षरशः पालन किया गया और महाकुंभ की व्यवस्था में कोई कमी नहीं की गई।

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आतंकवाद तथा आसुरी वृत्तियों ने राष्ट्र को खतरे में डाल दिया है। देवतुल्य लोगों का जीवन संकट में है। अतः देश व समाज को बचाने के लिए आज पुनः देवासुर संग्राम करना होगा। तभी अमृत प्राप्त होगा और समाज को बचाया जा सकता सकेगा। सभी राष्ट्रप्रेमी रूपी देवता, सज्जन और एवं सदाचारी लोगों की सम्पूर्ण कलाओं अर्थात् अपनी-अपनी शक्तियों से पुनः अमृत कलश का निर्माण हो सकता है कुम्भ पर्व के सभी स्नानार्थियों से प्रार्थना है कि राष्ट्ररूपी कलश की पूजा करना न भूलें। कुम्भ पर्व आज सम्पूर्ण देश का है और हम सब स्नानार्थी हैं।

तात्पर्य यह है कि देश के समक्ष आज राष्ट्र भावना का संकट आ गया है। इस भावना की रक्षा कुम्भ पर्व जैसे पर्व के उद्देश्य पालन करने से ही सम्भव है। क्योंकि जगद्गुरू शंकराचार्य जैसे राष्ट्र निर्माताओं ने भारत को एक सूत्र में बाँधने का जो मूल मंत्र इस देश के निवासियों को दिया है उसके पालन करने से ही राष्ट्र की सुरक्षा सम्भव है। 2021 में हरिद्वार में होने वाले कुंभ पर कोरोना का संकट छाया हुआ है।

आगामी समय में कुंभ का स्वरूप क्या रहेगा, यह तो आने वाले दिनों की परिस्थितियों पर निर्भर रहेगा। लेकिन सरकार की ओर से कुंभ की तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। कोरोना महामारी के बीच साल 2021 में होने जा रहा हरिद्वार कुंभ मेला इस बार मुख्य तौर पर मार्च से अप्रैल 2021 के बीच 48 दिन का ही होगा। पहली बार श्रद्धालुओं को ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन कराना होगा। मेले में प्रवेश से पहले एंटीजन टेस्ट पर विचार किया जा रहा है। ऐसे में कुम्भ स्नान की डुबकी से पहले कोविड-19 निगेटिव रिपोर्ट दिखानी होगी। सरकार फरवरी के अन्त में मेला की विधिवत अधिसूचना जारी करेगी। 2021 का कुंभ मेला 11 साल के अंतराल के बाद हरिद्वार में हो रहा है पिछला कुम्भ साल 2010 में आयोजित हुआ था।

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हरिद्वार कुंभ 2021 स्नान

हरिद्वार कुंभ 2021 का पहला शाही स्नान गुरुवार, 11 मार्च को होगा। इस दिन महाशिवरात्रि रहेगी। भारत रत्न मदन मोहन मालवीय द्वारा स्थापित श्री गंगा सभा के अनुसार उत्तराखंड सरकार ने सभी प्रमुख अखाड़ों से चर्चा के बाद हरिद्वार कुंभ 2021 के शाही स्नान और प्रमुख स्नान की तारीखें घोषित कर दी हैं।

शाही स्नान के दिन – गुरुवार, 11 मार्च 2021 महाशिवरात्रि, सोमवार, 12 अप्रैल सोमवती अमावस्या, बुधवार, 14 अप्रैल मेष संक्रांति और वैशाखी, मंगलवार, 27 अप्रैल चैत्र माह की पूर्णिमा।
प्रमुख स्नान के दिन – गुरुवार, 14 जनवरी 2021 मकर संक्रांति, गुरुवार, 11 फरवरी मौनी अमावस्या, मंगलवार, 16 फरवरी बसंत पंचमी, शनिवार, 27 फरवरी माघ पूर्णिमा, मंगलवार, 13 अप्रैल चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (हिन्दी नववर्ष), बुधवार, 21 अप्रैल राम नवमी।

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