October 31, 2020
कोरोना की वैक्सीन

Covid-19 अपडेट | कब तक बनेगी कोरोना की वैक्सीन

कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण से भारत समेत सम्पूर्ण विश्व भयभीत है। इस घातक वायरस के सामने कई शक्तिशाली देशों ने भी अपने हाथ खड़े कर दिए हैं। इस वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए पूरे भारत में लॉकडाउन की व्यवस्था लागू की गई है। ऐसे में कोरोना वायरस की वैक्सीन सर्वप्रतीक्षित है। हालांकि कोरोना के वैक्सीन को लेकर भारत ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व शोध प्रक्रियाओं से गुजर रहा है। जिस कारण हजारों वैज्ञानिक कोरोना वायरस संक्रामक वायरस से निपटने के लिए वैक्सीन बनाने में अहर्निश प्रयासरत हैं।

सामान्यतः वैक्सीन को बनाने में दो से पांच वर्ष का समय लग जाता है। इसके बाद उस वैक्सीन के इस्तेमाल से लेकर उसकी प्रमाणिकता मिलने की एक स्थाई व चरणबद्ध प्रक्रिया होती है। ऐसे में जब विविध टी. वी. चैनल, टी. आर. पी. बटोरने हेतु कम समय में वैक्सीन बनने के समाचारों को प्रसारित कर रहे हैं, तब आज हम इस लेख के माध्यम से प्रयोगशाला से बाजार तक, कोरोना वायरस वैक्सीन की यात्रा को जानने का प्रयास करेंगे।

तो आइए जानते हैं कोई वैक्सीन किन चरणों से गुजरकर चिकित्सा हेतु रोगी के इलाज के लिए तक पहुंचती है।

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वैक्सीन के द्वारा शरीर में किसी रोग विशेष से लड़ने की क्षमता में वृद्धि होती है। वैक्सीन मानव शरीर को किसी भी रोग विशेष से लड़ने के लिए तैयार करती है तथा प्रतिरोधक तंत्र  (इम्यून सिस्टम) को सुदृढ़ बनाती है। वैक्सीन शरीर में उत्पन्न होने वाले सूक्ष्म जीवों यथा- जीवाणु (बैक्टीरिया) एवं विषाणु (विषाणु) इत्यादि, को बढ़ने से रोकने में सहायता प्रदान करती है।

यह मानव शरीर में उपस्थित विषाणु (वायरस) को पहचान कर उनको नष्ट करने में सहायता प्रदान करती है और शरीर में एंटीबॉडीज का निर्माण करती है। जब शरीर को कोई रोग हानि पहुंचाता है तब आपके शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र इससे लड़ने के लिए कोशिकाओं का निर्माण करता है मगर जब शरीर कमजोर हो जाता है अर्थात प्रतिरक्षा तंत्र कमजोर पड़ता है तब वैक्सीन ही यह कार्य करती है। वैक्सीन की सहायता से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि होती है।

*इंटरनेशनल कॉन्फरेंस ऑन हार्मोनाइजेशन* – ICH अर्थात एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन, जिसका संयुक्त नेतृत्व अमेरिका और जापान आदि ने किया, जिसमें क्लीनिकल ट्रायल रिसर्च के लिए इन देशों ने कुछ दिशा- निर्देश निर्धारित किए हैं। अब क्लीनिकल ट्रायल रिसर्च के लिए इन्हीं निर्धारित दिशा- निर्देशों का पालन किया जाता है। इसे ICH-GCP कहा जाता है।

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क्लीनिकल ट्रायल एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें चिकित्सा की प्रक्रियाओं और दवाओं की सुरक्षा एवं प्रभावशीलता का मूल्यांकन करने के लिए अनुसंधान एवं अध्ययन किया जाता है। किसी भी चिकित्सा उपकरण या फिर नवीन प्रक्रिया के लिए क्लीनिकल ट्रायल अवश्य किया जाता है।

इसका उद्देश्य है- क्लीनिकल ट्रायल के माध्यम से रोगियों की सहायता करना, चिकित्सा हेतु नवीन एवं उन्नत माध्यम खोजना, अधिक प्रभावी और बेहतर उपचार स्थापित करना, नए प्रयोग एवं शोध करना, नवीन अनुसंधान में मदद तथा नए रोगों का समाधान ढूंढने के लिए किया जाता है।

क्लीनिकल ट्रायल के मुख्यतः चार चरण होते हैं-

यह परीक्षण चार चरणों में संपादित किया जाता है। इन चार चरणों में अलग- अलग प्रकार के चिकित्सीय परीक्षण किए जाते हैं। क्लीनिकल ट्रायल परीक्षण की पूरी प्रक्रिया में कई वर्ष लग सकते हैं। अगर किसी वजह से प्रक्रिया को इमरजेंसी स्थिति में तेजी से भी किया जाए तो करीब एक से डेढ़ वर्ष तक लग ही जाते हैं। पशुओं बंदर, चूहा इत्यादि जानवरों पर परीक्षण होने के पश्यात भी इतना समय लग जाता है।

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  1. प्रथम चरण- क्लीनिकल ट्रायल में दवाओं की सुरक्षा और मात्रा की सहनशीलता के आकलन के लिए ट्रायल किया जाता है। इसमें वॉलन्टर्स की संख्या 20 से 100 तक होती है।
  2. द्वितीय चरण- यह क्लीनिकल ट्रायल वॉलन्टर्स के बड़े समूहों पर किया जाता है। इस चरण में दवा का प्रभाव, विषाक्तता, उपचार में दवा की आवश्यक मात्रा आदि का आकलन किया जाता है। द्वितीय चरण एक लंबी समयावधि के पश्यात ही पूरा होता है।
  3. तीसरे चरण– इस चरण में दवा की प्रभावकारिता और दुष्प्रभाव, दोनों का ध्यानपूर्वक अध्ययन किया जाता है देखा जाता है। इसमें परीक्षण केंद्रों पर 300 से 3000 लक्षित पीड़ित रोगियों के समूहों पर लंबे समय तक अर्थात दो से पांच वर्षों तक अनुसंधान किया जाता है। इस चरण में दवा का प्रभावोत्पादकता और दवाओं की मात्रा का परीक्षण किया जाता है।
  4. चौथा चरण- इस चरण के अनुसंधान में रोगियों के एक बड़े समूह पर ज्यादा समयावधि तक दवाओं के दीर्घकालिक उपयोग एवं उनके प्रभाव की जांच की जाती है। चौथे चरण का अध्ययन लगातार नई दवाओं के विपणन( मार्केटिंग) के विषय में अधिक जानकारी प्राप्त करने के लक्ष्य से किया जाता है। इस क्लिनिकल ट्रायल में रोगी पर्यवेक्षण के अधीन रहते हैं। यह ट्रायल चिकित्सक के कार्यालय में ही किया जाता है। जहां पर रोगी को पूर्ण चिकित्सा सुविधाएं प्राप्त होती हैं।

यह चतुर्थ चरण बहुत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि- इस चरण में क्लीनिकल ट्रायल के अध्ययन के पश्यात ही किसी वैक्सीन या औषधि की आगे की रूपरेखा तय होती है। इससे होने वाले लाभ पर अध्ययन होता है। दवा के जोखिम और इससे जुड़ी अधिक जानकारी सर्च करने के बाद इसको अमेरीकी औषधि प्राधिकरण यानी FDA द्वारा दवा निर्माता कंपनी को दवा की बिक्री की मंजूरी दी जाती है, और यह अति- आवश्यक प्रक्रिया होती है।

किसी भी वैक्सीन को सर्टिफिकेशन के लिए बहुत चरणों में टेस्ट किया जाता है। अमेरिका के सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) के मुताबिक ये छह चरण एक्सप्लोरेट्री, प्री-क्लिनिकल, क्लिनिकल डेवलपमेंट और इसके बाद के तीन चरण में मानव पर वैक्सीन का परीक्षण किया जाता है।

कोरोना की वैक्सीन

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वैक्सीन प्रक्रिया के प्रमुख चरण हैं

  1. प्रथम – वायरस या बैक्टीरिया के विरुद्ध लड़ने वाले एंटी-डोट का निर्माण करना।(Exploratory stage)।
  2. द्वितीय – वैक्सीन का जानवरों पर परीक्षण।(Pre-clinical stage)।
  3. तृतीय – मानव पर परीक्षण यानी क्लीनिकल ट्रायल।(Clinical development)
  4. चतुर्थ – प्रमाणिकता।(Regulatory review and approval)।
  5. पंचम – निर्माण।(Manufacturing)।
  6. षष्ठ – गुणवत्ता (Quality control)।

 

कोरोना वायरस और वैक्सीन-

कोरोना वायरस की वैक्सीन को लेकर काफी तेजी से काम चल रहा है, पूरी दुनिया में कोवि़ड -19 की वैक्सीन को लेकर तेजी से रिसर्च चल रही है।

कोरोना की वैक्सीन क्लिनिकल ट्रायल के चरण से गुजर रही है, जिसका परीक्षण अमेरिका में मॉडर्न थैरेप्यूटिक्स की देखरेख में हो रहा है। कोरोना की वैक्सीन के शोध में समस्त विश्व के शोधकर्ता एवं वैज्ञानिक संलग्न हैं।

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अभी इस प्रकार के समाचार कोरी कल्पना मात्र हैं। अतः अपने प्रतिरोधक तंत्र को दृढ़ बनाना तथा स्वयं को सामाजिक दूरी (सोशल डिस्टेंसिंग) तथा शारीरिक दूरी (फिजिकल डिस्टेंसिंग) में रखना कोरोना वायरस के खिलाफ एक बेहतर विकल्प है।

 

कोरोना वायरस की वैक्सीन बनाने में उतना समय अवश्य लगेगा, जितना इसकी प्रक्रिया के लिए बेहद आवश्यक है।

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