चित्तौड़गढ़

उत्कृष्ट मनुष्य ही उत्कृष्ट शासक बन सकता है। जिसमें मनुष्यता का अभाव है, वह सेना और शस्त्र की सहायता से विजय तो प्राप्त कर सकता है, परन्तु राज्य की बुनियाद को पाताल तक नहीं पहुँचा सकता।

साम्राज्य की जो बुनियाद प्रजा के हृदयों में चुनी जाती है, वह मजबूत और स्थिर होती है। बल के प्रयोग से राज्य की स्थापना की जाती है और सहानुभूति, हितकामना और प्रेम के प्रयोग से उसे दृढ़ किया जाता है। जो राजा बलहीन है, वह सीमा प्रान्त की रेखा से आगे नहीं बढ़ सकता, और जो सहानुभूति से शून्य है वह समय की रेखा को पार नहीं कर सकता।

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अकबर ने अपने मुग़ल राज्य को बल से खुद बढ़ाया

अकबर ने मुगल राज्य को बल से बढ़ाया और सहानुभूति से स्थिर किया। बल और सहानुभूति यह दोनों मनुष्यता के चिह हैं। जिसमें बल नहीं, वह नपुंसक है, और जिसमें सहानुभूति नहीं, वह राक्षस है। साम्राज्यों की स्थापना और स्थिरता मनुष्यों से हो सकती है, नपुंसकों और राक्षसों से नहीं। अकबर की सफलता का रहस्य उसकी मनुष्यता में तलाश किया जा सकता है।

वह आधमखों को माफ़़ कर सकता था, तो समय पड़ने पर उसे किले की दीवार पर से गिरवा भी सकता था, उसने बैरम को मार-मारकर शिवालक की तलैहटियों में खदेड़ दिया, तो नम्र होने पर क्षमा भी कर दिया यही अकबर की नीति का सूत्र था। अकबर के जिन गुणों ने उसे क्रियात्मक राजनीति में आदरणीय इनाया है, उनमें से मुख्य उसका हिन्दू प्रजा के साथ उत्तम व्यवहार था।

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चित्तौड़गढ़

अकबर मुसलमान था, परन्तु उसके अन्तरंग से अन्तरंग मित्रों की सूची को पढ़िए, तो वह हिन्दू नामों से पूर्ण मिलेगी राजा बीरबल सबसे अधिक समीपस्थ रखा था, राजा टोडरमल राज्य का प्रधान अर्थ-सचिव था, राजा भगवानदास और राजा मानसिंह से अधिक आदर अकबर के दरबार में शायद ही किसी सेनापति को प्राप्त हो।

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अन्तःपुर में जोधाबाई पटरानी थी, उसके आगे किसी की न चलती थी इस प्रकार अकबर ने अपने चारों ओर देश के असली निवासियों को इकट्ठा कर लिया था। यह देखकर पहला विचार यही उत्पन्न होगा कि केवल नीति और सहानुभूति के प्रयोग से उसने हिन्दुओं को काबू में किया, जिससे उसका साम्राज्य फैला और मजबूत हुआ, परन्तु जब हम इतिहास के पृष्ठों को पलटते हैं, तब हमें दूसरा ही किस्सा सुनाई देता है।

अकबर ने हिन्दुओं के साथ जो लड़ाई लड़ी, उसके सामने कई अंशों में शेप सब लड़ाइयाँ मात हो जाती हैं। अकबर ने हिन्दू शरीर के अन्य सब अंशों को छोड़, उसके हृदय पर आघात किया। उसने देश की लम्बाई-चौड़ाई की परवाह न करके हिन्दू ध्वजा पर ही आक्रमण कर दिया।

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वह यदि संग्रामसिंह और टोडरमल की मित्रता के कारण ख्यात है, तो इस बात को भी भुलाना नहीं चाहिए कि मेवाड़ का मान-मर्दन करने वाला भी अकबर ही था। राजपूतों को अकबर ने केवल अधिकार के लोभ से ही यश में नहीं किया, उसने चित्तौड़गढ़ पर इस्लाम का झण्डा गाड़कर यह भी सिद्ध कर दिया कि उसमें राजपूतों से लड़ने की शक्ति भी है।

हमारा मत है कि चित्तौड़गढ़ की फतह के बिना अकबर के भारतव्यापी राज्य की स्थापना असंभव थी। यदि वह हिन्दूपति को परास्त न कर देता, तो राजपूतों के प्रेम को भी न जीत सकता।अकबर के सामाग्य विस्तार को पहली मंजिल चित्तौड़ की लड़ाई है। उसने असली अकबर को प्रकाशित किया। उसके शत्रु दहल गये, मित्रों के हृदय में ढांढस बोध गया और वीर राजपूतों ने उसे अपने प्रेम के लायक समझा।

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इसका यह अभिप्राय नहीं कि उसका राजपूतों से सम्बन्ध उसी दिन से प्रारम्भ होताहा आमेर के राजा विहारी लगे १५६५ ही अकबर आधीनता प्यार कर ली थी। राजा बिहारीमल के पुत्र राजा भगवानदास और पुत्र राजा मानसिंह ने इस पर को सब निभाया। अकबर ने भी उन्हें आदर देने में कोई नहीं रखी 1 विश्व के ऊँचे से को पद उन्हें प्रदान किये। राणा भगवानदास की बहन मुगल-सम्राट की पटरानी बनी। इस प्रकार राजपूतों से अकबर के प्रेम-सम्बन्ध तो आरम्भ से ही अंकुरित होने लगे थे, परन्तु यह एक परिवार के साथ डी निज सम्वन्ध रहते, यदि यह चित्तौड़गढ़ को जीत लेता।

चित्तौड़गढ़ का मान-मर्दन करके यह पीर राजपूतों को जानी दुश्मन बना लेता, यदि उसमें यह सहानुभूति और उदारता की मात्रा न हो, जिसके बिना शरीर को तो जीता जा सकता है, परन्तु उदय को नहीं जीता जा सकता। मुगल बादशाह अकबर और चित्तौड़ के उस समय के राणा उदय सिंह के जीवन समानताओं और क्षमता के बहुत ही बढ़िया नमूने हैं।

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रत्नसिंह के विक्रमादित्य गद्दी पर बैठे

घटनाओं के क्रम में एक से, परन्तु परिणाम में भित्र दो ऐसे समकालिक जीवनों का मिलना कठिन है उदयसिंह प्रसिद्ध महाराणा सांगा के सबसे छोटे पुत्र थे। उस नर्सरी की मृत्यु के बाद योडे से ही वर्षों में मेवाड़ को अनेक आपत्तियों का सामना करना पड़ा। उदयसिंह के पुत्र राणा प्रताप सिंह प्रायः कहा करते थे कि “यदि दादा (महाराणा सांगा) के बाद में गद्दी पर बैठता तो मेवाड़ का सर्वनाश न होता।

” संग्रामसिंह की मृत्यु १५३० में हुई और प्रताप सिंह १५७२ में सिंहारानारु हुए। बीच के ४२ वर्ष अजेय चित्तौड़गढ़ के इतिहास में पराजय और अपमान के सर्प है। सांगाजी का उत्तराधिकारी रत्नसिंह बहादुर था, परन्तु प्रोधी था वह केवल पांच वर्ष तक राज्य करके बूँदी के राजा सूरजमल के साथ हन्द्र युद्ध में मारा गया। रत्नसिंह के बाद विक्रमादित्य गद्दी पर बैठा। यह राणा सांगा का पुत्र होने का और भी कम अधिकारी था। वह क्रोधी था, आचारभ्रष्ट था, विवेकहीन था।

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चित्तौड़गढ़

राजपूत सरदार राजा का आदर करना जानते थे परन्तु दुराचारी द्वारा अपमान को नहीं सह सकते थे विक्रमादित्य वीरता से शून्य य क्रूर और उदारता से शून्य दुराचारी था परिणामतः सारे सरदार उससे बिगड़ गये। राजपूताने के गद्य की उस निर्वलता के समाचार चारों ओर फैल गये। महत्वाकांक्षियों के मुंह में पानी आने लगा गुजरात का बादशाह बहादुर शाह मालवे के बादशाह को साथ लेकर चित्तौड़गढ़ पर चाय आया।

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युद्ध के आरम्भ में ही विक्रमादित्य परास्त हो गया और युद्ध- को दूसरों के हाथ में चला गया कायर विक्रमादित्य चित्तौड़ की रक्षा का बोझ दूसरों पर डालकर नपुंसकों की भांति अलग हो गया, परनु राजपूतों ने अपने झण्डे को सहज ही में नीचा नहीं होने दिया। राजपूत शेरों की तरह लड़े और राजपूताना शेर माताओं की तरह आन पर मर में इस दूसरे साके का वृत्तान्त राजपूतों के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाने योग्य है, परन्तु उसके सुनाने का यह स्थान नहीं है।

वीरगाथा सुनाने का आनन्द प्राप्त करने और उस निष्फल परन्तु संसार की वीरता के इतिहास में अमिट अक्षरों से लिखने योग्य जीवन-संग्राम का संगीत गाकर श्रेय उपलभ्य करने के लिए हृदय में जो गुदगुदी पैदा हो रही है, उसे रोककर लेखक को इतना लिखकर ही सन्तोष करना पड़ता है कि प्रतापगढ़ के सरदार बांध सिंह, चुंडावत राव दुर्गादास और अन्य वीरों की अपूर्व वीरता और राठौर कुल की यशस्विनी राजमाता जवाहर भाई की ओज भरी ललकार भी वहादुर शाह के योरपियन तोपखाने और अनगिनत सैन्यों का सामना न कर सकी।

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३२ हजार राजपूत चित्तौड़गढ़ की रक्षा के निमित्त बलिदान हुए, १२ सहस्र राजपूताना सतीत्व की रक्षा के लिए अग्नि-देव के अर्पण हुई। चित्तौड़गढ़ का झण्डा फहराने लगा। पर बहादुर शाह परन्तु बहादुरशाह देर तक विजय का आनन्द भोग न सका। उसे समाचार मिला कि हुमायूँ बंगाल की ओर से बढ़ता आ रहा है। चित्तौड़ को छोड़कर वह मालवे की ओर रवाना हुआ। वरवाद चित्तौड़गढ़ को खाली पाकर विक्रमादित्य फिर राजगद्दी पर आ विराजा, परन्तु राणा की आब उड़ चुकी थी।

जो गद्दी की मान रक्षा न कर सके, वह उस पर बैठने योग्य भी नहीं हो सकता। राजपूत सरदारों ने राणा सांगा के भाई पृथ्वीराज के खवास पुत्र बनवीर को आमन्त्रित करके बुला लिया। विक्रमादित्य के पक्ष में एक भी शब्द या एक भी हथियार न उठा। दुराचारी कायरों की प्रायः यही गति होती है। राजपूत सरदारों ने बनवीर को इस आशय से राजगद्दी पर बिठाया था कि वह राणा सांगा के छोटे पुत्र उदय सिंह का, जो उस समय पन्ना नाम की धाय की गोद में पल रहा था, संरक्षक बनकर राज्य करे और जब उदयसिंह बालिग हो, तब उसे राज्य साँप दे। राज्यलक्ष्मी बड़ों बड़ों को अन्धा कर देती है।

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बनवीर ने राज्य लक्ष्मी का निर्विघ्न पाणिग्रहण करने के लिए असली उम्मीदवार को मार्ग से हटा देने का संकल्प किया। आधी रात के समय नंगी तलवार हाथ में लेकर बनवीर उस घर में पहुँचा, जहाँ पलंग पर बालक उदयसिंह सो रहा था। पन्ना को पहले से ही पापी के पाप-संकल्प की खबर लग चुकी थी उसने अपने कर्तव्य का भी निश्चय कर लिया था। उस स्वामिभक्त धाय ने वह काम किया जो मानवी से तो नहीं हो सकता। उसने स्वामी प्रेम पर पुत्र प्रेम को कुर्बान कर दिया, उसने अपने औरस पुत्र की बलि चढ़ाकर चित्तौड़ के न्याय सिद्ध राजा की प्राणरक्षा कर ली। उदयसिंह को तो एक टोकरी में डालकर दूसरी जगह भेज दिया, और उसके पलंग पर अपने दिल के टुकड़े को डाल दिया।

स्वार्थ के पुतले ने मकान में आकर पन्ना से पूछा कि उदय सिंह कहां सो रहा है? पत्र रोल न सकी, उसने केवल हाथ से पलंग की ओर इशारा कर दिया। उस कमरे में यदि कोई चित्रकार होता, तो वह भलाई और बुराई के चित्रों के लिए नमूने ले सकता था। एक और बुराई, हाथ में नंगी तलवार लिये अपने भाई का यह मांग रही थी, दूसरी ओर भलाई दूध के प्यार और स्वामिभकि से प्रेरित होकर अपने दिल के टुकड़े को तलवार की धार पर रख रही थी। जनवरी में आगे बढ़कर एक ही हाथ में पन्ना के लाल का काम तमाम कर दिया।

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संसार में आज तक होता है राणा प्रताप का यशोगान

पन्ना ने उस राक्षसी कृत्य को अपनी आँखों से देखा, पर इस डर से कि कहीं भेद न खुल जाय उस चीख को भी रोक लिया, जो दुःखी हृदय का आखिरी सन्तोष पत्नी राजपूत इतिहास में अपना नाम अमर कर गई। आज तक संसार में राणा प्रताप का यशोगान होता है, तब तक उसके पिता उदयसिंह पर अपने पुत्र को न्योछावर कर देने वाली पन्ना की मूर्ति भी गाई जायेगी जब तक भूमण्डल पर स्वामि भक्त, कर्तव्यपरायणता और स्वार्थत्याग की महिमा का आदर होगा, तय तक पन्ना का आसन भी आदरणीय आत्माओं की श्रेणी में बना रहेगा।

ऐसे दृष्टान्त उपन्यासों में बहुत हैं, पर इतिहास में कम। उदयसिंह को बनवीर की तलवार से बचाकर कुम्भलमेर में आशा शाह नाम के वैश्य के घर पहुंचाया गया। जहाँ उसका प्रेमपूर्वक लालन पालन हुआ। ७ वर्ष तक चित्तौड़ का भावी महाराणा एक वैश्य के पुत्र की भांति पला, परन्तु आग की चिनगारी देर तक राख के नीचे छुपी न रही। खबर चारों ओर फैल गई। उधर उग्र बनवीर यह समझकर कि मार्ग निष्कंटक हो गया, और भी अधिक उग्र हो उठा था उसने अपने कठोर व्यवहार से राजपूत सरदारों को विगाड़ लिया था।

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चित्तौड़गढ़

असली महाराणा के जीवित रहने का समाचार पाकर प्यासे चातकों को पानी की फुहार मिली। राज्य के मुखिया सरदार कुम्भलमेर से उदय सिंह को लिवा लाये और बुधवार को कह दिया कि अब आप अपने घर को तशरीफ ले जाइए। १२ वर्ष की आयु में उदयसिंह राजगद्दी पर बैठा। जिस वर्ष उदयसिंह का राजतिलक हुआ, उसी वर्ष अकबर का जन्म हुआ। उस समय अभागा हुमायूँ शहर से शहर, गाँव से गाँव में भागा फिरता था।

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अकबर का जन्म एक हिन्दू छत के नीचे हुआ था। उसका ओपन हुमायूँ के दुर्भाग्य और भाग-दौड़ में हो व्यतोत हुआ। यह भी एक प्रकार से चित्तौड़ से दूर कुम्भलमेर में ही पला था, ब्योंकि हुमायूं दिल्ली और आगरे को दूर से ही तरसती हुई आँखों से देख रहा था। जब उस अभागे परन्तु उदार राजा का भाग्यचक्र फिरा और वह दिल्ली का अधीश्वर बना, तभी फिर भाग्य की सीढ़ी पर उसका पाँय फिसल गया और उदय सिंह का प्रतिद्वंद्वी १३ वर्ष की अवस्था दिल्ली के सिंहासन पर आरूढ़ हुआ।

वस, वहीं उदयसिंह और अकबर के जीवन की समानतायें समाप्त होती हैं। एक सत्तात्मक राज्य में राजा के गुण-अवगुण, देश और जाति को किस प्रकार, बना या विगाड़ सकते हैं, यह देखना हो, तो इन दोनों वाले-राजाओं के जीवनों का अनुशीलन करो। एक ने शून्य को साम्राज्य के रूप में परिणत कर दिया, और दूसरे ने सदियों की राजपूती शान को मिट्टी में मिला दिया।

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