चरक संहिता और सुश्रुत संहिता

चरक संहिता और सुश्रुत संहिता

चरक संहिता और शुश्रुत संहिता

आयुर्वेद :-

सबसे पहले आयुर्वेद के बारे मे जानते है। आयुर्वेद विश्व की सबसे प्राचीनतम चिकित्सा प्रणालियों में से एक है। यह विज्ञान, कला और दर्शन का एक मिश्रण है। आयुर्वेद नाम का अर्थ है, ” जीवन से संबंधित ज्ञान”। आयुर्वेद भारतीय आयुर्विज्ञान है। आयुर्विज्ञान, विज्ञान की वह शाखा है जिसका संबंध मानव शरीर को स्वस्थ रखने, रोग हो जाने पर रोग से मुक्त करने अथवा उसका शमन करने तथा आयु बढाने से होता है। धनवंतरि आयुर्वेद के देवता हैं। वे विष्णु के अवतार माने जाते हैं। भरतीय स्वास्थ्य प्रणाली सात पारंपरिक प्रणालियों को मान्यता देती है : आयुर्वेद, सिद्ध, यूनानी, योग, प्राकृतिक चिकित्सा, होम्योपैथी और हाल ही में सोवा- रिग्पा ( चिकित्सा की तिब्बत प्रणाली) इनमे से आयुर्वेद सबसे पुरना और सबसे प्रसिद्ध है। यह श्रीलंका और नेपाल जैसे पड़ौसी देश में भी फैल गया है। हाल के वर्षों में आयुर्वेद ने पश्चिमी देशो में आधुनिक चिकित्सा के रुप में लोकप्रियता और मान्यता प्राप्त की हैं।

आयुर्वेद के काल विभाजन

चरक संहिता और सुश्रुत संहिता आयुर्वेद के इतिहास को मुख्यतया तीन भागों में विभक्त किया गया है :-

  • संहिताकाल  
  • व्याख्याकाल
  • विवृतिकाल 

संहिताकाल का समय 5वीं शती ई.पू . से 6वीं शती तक माना जाता है। यह काल आयुर्वेद की मौलिक रचनाओं का युग था। आयुर्वेद के त्रिमुनि- चरक , सुश्रुत और वाग्भट के उदय का काल भी संहिताकाल ही हैं।  चरक संहिता के मध्यम से कार्यचिकितसा में काफी सफलता मिली।

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चरक संहिता 

चरक संहिता आयुर्वेद का एक प्रसिध्द ग्रंथ है। यह संस्कृत भाषा मे  है। इसके उपदेशक अत्रिपुत्र पुनवर्सु है। चरकसंहिता की रचना दुसरी शताब्दी से भी पुर्व हुई थी। यह आठ  भागो में बटा हुआ है जिन्हे ‘ स्थान ‘ नाम दिया गया है।  प्रत्येक स्थान के अन्य कई अध्याय है जिनकी कुल संख्या 120 है। चरक संहिता मे भोजन, स्वछ्ता, रोगों से बचने के उपाय, चिकित्सा – शिक्षा आदि सब कुछ दिया गया है।

रचनाकार:-

चरक संहिता निम्न रचनाकारो का योगदान है – आचार्य अग्निवेश-  चरक संहिता के मुख्य  रचनाकार है। इनकी रचना का प्रतिसंस्कार करके चरकसंहिता का निर्माण किया गया।  आचार्य चरक – चरक पंजाब देश के कपिल स्थल नामक ग्राम के निवासी थे। आचार्य चरक को वैशम्पायन मुनि का शिष्य माना गया है। चरक काल पहली सदी मानी गई है।

रचनाकाल 

चरक संहिता में पाली सहित्य के कुछ शब्द मिलते है जैसे अवक्रांती, जनताक ( विनयपिटक) आदि। इससे चरक संहिता का काल उपनिषदों के बाद और बुद्ध के पुर्व माना गया है।

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चरक संहिता का मूल 

‘ चरक संहिता ‘ आज जिस रूप मे हमारे पास उपल्ब्ध है उसकी रचना  आत्रेय   के एक शिष्य अग्निवेश  ने की थी।  समय के साथ-साथ आयुर्वेद चिकित्सा शस्त्र के नये सिद्धांत बनते गये और नये – नये उपचार की खोज होती रही। अग्निवेश का ग्रंथ 11वीं शताब्दी ई.। तक उप्लब्ध रहा।   बाद मे अग्निवेश तंत्र का एक नया  रुप दिया गया और यह कार्य चरक ने किया। इसी संशोधित रुप को ‘चरक संहिता’ के नाम सेे जाना गया। इसे 9 वीं शताबदी में एक कश्मीरी पंडित ने फिर सेे इसे संंशोधित किया और यही अब हमारे पास उप्लाब्ध है। चरक संहिता और सुश्रुत संहिता चरक संहिता एक विशाल ग्रंथ है जिसमें आयुर्वेद चिकित्सा शास्त्र के अनेक पहलुओं का वर्णन किया गया है। इस ग्रंथ से हमे प्राचीन काल में चिकित्सा की जानकारी मिलती है।

शुश्रुत संहिता

चरक संहिता, आयुर्वद का सबसे पुराना जाना जाने वाला ग्रंथ है तथा इसका शुश्रुत संहिता मे अनुपालन भी हुआ है। कुछ विषयों को छोड़कर दोनों में एक सी बात है। इन दोनो में विशेष अंतर है की शुश्रुत संहिता मे शल्यक्रिया का आधार रखा गया है और चरक संहिता मुख्य रुप से मैडिसिन तक ही सीमित है। शुश्रुत संहिता आयुर्वेद और शल्यचिकित्सा का प्राचीन संस्कृत ग्रंथ हैं। शुश्रुत संहिता आयुर्वेद के तीन मुख्य ग्रंथ मे से एक है। आठवीं शताब्दी में इस ग्रंथ का अरबी भाषा में “किताब-ए-शुस्रुद ” नाम से अनुवाद हुआ था। शुश्रुत संहिता मे 186 अध्याय है जिनमे 1120 रोगों, 700 औषधिय पौधो, खनिज-श्रोतों पर आधारित 64 , जन्तु-श्रोतों पर आधारित 57 तथा 8 प्रकार की शल्य क्रियाओ का उल्लेख है। इसके रचनाकार श्री शुश्रुत जी है जो छठीं शताब्दी ई.पू. कशी मे जन्में थे। शल्य शास्त्र को धरती पर लाने वाले पहले व्यक्ति आचार्य धनवंतरि थे।  बाद मे आचार्य  शुश्रुत  नेे गुरु उपदेश को तंत्र रुप में लिपिबद्ध किया। चरक संहिता और सुश्रुत संहिता आचार्य शुश्रुत त्वचा रोपण तंत्र (Plastic Surgeory) में भी पारंगत थे। आंखो में मोतियाबिंद निकलने की सरल कृया के विशेषज्ञ थे। शुश्रुत संहिता शल्यतंत्र का आदि ग्रंथ है।

संरचना

शुश्रुत संहिता 2 खंडो मे बँटा हुआ है :- पुर्वतंत्र और उत्तरतन्त्र

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पुर्वतन्त्र 

इसमे पाँच भाग है :- सूत्रस्थान, निदास्थान, शारिरस्थान, कल्पस्थान और चिकित्सास्थान। इसमे 120 अध्याय है। जिनमे आयुर्वेद के प्रथम 4 अंगो का विवरण है। ( शल्यतन्त्र, अगदतन्त्र, रसायनतन्त्र, वाजीतन्त्र)

उत्तरतन्त्र 

इस तंत्र मे 64अध्याय है जिनमें आयुर्वेद के शेष 4 अंगो का विवरण है। (शलक्या, कायचिकित्सा, भूतविद्या, कौमर्यभृत्या)। इस तंत्र को “औपद्र्विक ” भी कहते है क्योकि इसमे शल्यक्रिया से होने वाले ‘ उपद्रवों ‘ के साथ ही ज्वर , पेचिस, हिचकी, पीलिया, कमला, कृमिरोग आदि। उत्तरतन्त्र का एक भाग ‘शलक्यातन्त्र’ है जिनमें आँख, कान, नाक और सर के रोगो का वर्णन है। इस तरह शुश्रुतसंहिता के दोनो भागों में 6 स्थान तथा 186 अध्याय है।

आज के युग में इनका उपयोग

आयुर्वेद ‘जीवन विज्ञान’  के रुप में अनुवाद करता है। इसका ज्ञान चिकित्सा, इलाज या चिकित्सा तक ही सीमित नही है यह चिकित्सकों, परिवारों, समुदायों के साथ-साथ चिकित्सकों के लिए भी है। अपने विकासवादी इतिहास के दौरान, आयुर्वेद और स्थानीय स्वास्थ्य परंपराओ ने एक दूसरे को पारंपरिक रुप से प्रभावित किया है|

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चरक संहिता और सुश्रुत संहिता
बायोमेडिसिन

आधुनिक समय में, आयुर्वेद पर बायोमेडिसिन का प्रभाव इसकी चिकित्सा के  लिए जाना जाता है। पिछ्ली एक सदी में, भारत में बायोमेडिसिन की शुरुआत ने मानव को सकारात्मक रूप से ज्ञान केे लिए एक बहुत विषेश वस्तुु बना दिया है। एक ऐसा व्यक्ति जिसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझा जा सकता है और इसे चिकित्सा ज्ञान  के माध्यम से नियंत्रित किया जा सकता हैं। आज हम सब यह देख सकते हैं कि कैसे पूरी दुनिया महामारी  से लड़ रही है और इस वक्त सभी लोग पुरानी चीज़ो की तरफ रुख कर रहे है। पाचन शक्ति बढाने के लिए सभी आयुर्वेद का सहारा ले रहे हैं। यहा तक कि इसके इलाज के लिय भी अनेक प्रकार के औषधिय अवंं गुड़कारी पेड़ो और जड़ी बूटियों का सहारा ले रहे हैं। यह सब यही दर्शाता है कि हमे अपनी पुरातन संसकृति को वापस धारण करना होगा। आज भी जब कोई नई खोज की बात होती तो वह कही न कही उन चीज़ो से जुड़ी होती है जो हमरे पूर्वज कई हजारो वर्ष पुर्व ही कह चुके है या कही न कही उस बात का ज़िक्र ज़रूर आया है। कुछ उदहारण पृकृति के लय के साथ-साथ रखने की ज़रूरत है। पाचन को जगाने के लिए नींबू , अदरक, शहद और गरम पेय के साथ दिन की शुरुआत ; जीभ से विषैले तत्व को हटाना। यह सभी आज के समय में प्रयोग किया जाता है। हमारे आधुनिक जीवन में हम उत्तेजना द्वारा बमबारी कर रहे है :- बिजली और प्रौद्यौगिकी, परिवार की मांग , वित्तिय दबाव, तनाव, सामजिक अपेक्षाएं रखतेे है। आयुर्वेद हजारो वर्षों से रहा है, और इसे रोगों के उपचार और प्राचीन भारत में एक स्वस्थ्य जीवन शैली का नेतृत्व करने में सर्वोत्तम माना जाता है। अच्छे स्वास्थ्य को बनाए रखने  के लिए,  हमने अपने आधुनिक विश्व में आयुर्वेद के सिद्धांतो का उपयोग शुरु हो गया है। आयुर्वेद हमारी आधुनिक जीवन शैली और स्वास्थ्य उन्मुख आदतों को प्राकृतिक पदार्थों, दवाओं और जड़ी-बूटियों के उपयोग के साथ ही हमें स्वस्थ, खुशहाल, तनाव मुक्त और रोगमुक्त जीवन जीने में मदद करता है। आयुर्वेद को आधिकारिक तौर पर 1976 में (WHO) द्वारा मान्यता दी गई थी।

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