कुम्भ और अर्ध कुम्भ

कुम्भ राशि गत सुर-गुरु, बृहस्पति द्वारा प्रेरित महाकुम्भ का महापर्व हरिद्वार में क्यों मनाया जाता है! हरिद्वार, जो प्राचीनतम मायापुरी क्षेत्रा का अभिन्न अंग, गंगा

भावनात्मक एकता के प्रतीक हैं कुम्भ मेले

कुम्भ आस्था का महान पर्व है। इसकी तुलना विश्व के किसी भी पर्व से नहीं की जा सकती। इसका ऐतिहासिक, दार्शनिक, सामाजिक कोई भी पक्ष

कोविड-9 महामारी के दौर में होगा हरिद्वार c-2021 का बड़ा धार्मिक समागम

हरिद्वार कुम्भ का इतिहास एवं वर्तमान स्वरूप धर्म नगरी हरिद्वार पर धीरे-धीरे अब कुंभ मेले का रंग चढ़ता जा रहा है। इन दिनों हरिद्वार आने

महर्षि दुर्वासा से भी जुड़ी हैं हरिद्वार की कथाएं

हरिद्वार से महाभारत काल स रामायण काल की कथाएं जुड़ी हैं तो सतयुग की भी कई कथाएं जुड़ी हैं। महर्षि दुर्वासा की भी कथा हरिद्वार

भावनात्मक एकता के प्रतीक हैं कुम्भ मेले

कुम्भ मेला का आयोजन केवल निर्धरित बारह साल की काल गणना के आधर पर ही नहीं होता, बल्कि खगोलीय ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति इस महापर्व की

ब्राह्मण ही बन सकते हैं अग्नि अखाड़े के सदस्य

कुम्भ मेला की भव्यता, पौराणिकता व संस्कृति के परिचायक अखाड़ों की अपनी-अपनी मान्यताएं व परम्पराएं हैं। श्री पंच अग्नि अखाड़ा की परम्परा व मान्यता बिल्कुल

संतो के अखाड़े ही है, भारतीय संस्कृति के रक्षक

आदि जगद्गुरु शंकराचार्य से पूर्व संतों-संन्यासियों के पद नाम नहीं थे, लेकिन विगत शताब्दियों में दशनाम संन्यासियों के पद नाम उनके नामों से जुड़ने पर

कुम्भ की पौराणिकता, इतिहास क्या है? और कुम्भ तथा सिंहस्थ में क्या अंतर है?

मेरी रामकहानी से जैसे गंगामैया अलग नहीं हो सकती वैसे ही अलग नहीं किए जा सकते कुम्भ (Kumbh) और अर्द्धकुम्भ पर्व। गंगास्नानों के विभिन्न पर्व

Load More