“ब्राह्मणवाद” के नाम पर मिथ्याप्रचार: भाग-1

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मित्रों,
मैं जाति विषयक विवादों पर कुछ भी लिखने से बचना चाहता था। मेरे लिए राष्ट्रीयता और समग्र सनातन समाज अधिक महत्वपूर्ण था/है। मगर समाज की स्थितियां ऐसी है कि ब्राह्मणों को निशाना बनाया जा रहा है, उनके साथ भेदभाव, द्वेष एवं अत्याचार हो रहा है। कोई व्यक्ति अपनी जाति नहीं चुनता। फिर जाति के आधार पर अत्याचार और भेदभाव क्यों? इसलिए दो-तीन भागों में मैं उन प्रश्नों/आरोपों का उत्तर दूंगा जो षड़यंत्र के तहत ब्राह्मणों पर निराधार लगाये जाते रहे हैं। कृपया अधिक से अधिक शेयर करें और अपने विचार भी रखें।

ब्राह्मणों के विरुद्ध दुष्प्रचार, विषवमन और षड्यंत्र जिस प्रकार किए जा रहे हैं; लगता है ब्राह्मणों की स्थिति यहूदियों जैसी होने वाली है। इस विष का अधिकतर भाग ईसाई पादरियों द्वारा चर्च की प्रयोगशालाओं में तैयार किया जाता है। हिंदू (अधिकतर तथाकथित दलित) से बने नवईसाई लोगों के माध्यम से शेष दलित समाज में प्रसारित किया जाता है।

Evangelist और संगठित आइ टी सेल के माध्यम से सामाजिक संचार माध्यमों (social media platforms) के विभिन्न प्लेटफार्म पर प्रचारित कर दिया जाता है। यहां पर ब्राह्मणों के विरुद्ध पहले से ही ब्रेनवाश्ड संगठित (तथाकथित) दलित/पिछड़े समाज में पहुंचा देते हैं। ब्राह्मणों के विरुद्ध होने वाली विभिन्न अत्याचार की घटनाओं का इस प्रचार से सीधा संबंध है। आश्चर्य की बात तो यह है कि इसमें सिर्फ स्वघोषित दलित ही नहीं बल्कि अधिकतर तथाकथित पिछड़ी जातियां शामिल हो चुकी हैं।

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ब्राह्मणवाद पर मिथ्या प्रश्न

कुछ वर्ष पूर्व मेरे साथ जो घटना घटी उसे मैं आपसे साझा कर रहा हूं। मेरे एक मित्र ने (जो इस समय भारतीय सेना में कर्नल के पद पर हैं) मुझे अपने घर पर रात्रि भोज (dinner) के लिए बुलाया। वहां हमारे कई अन्य कोर्समेट (Officers’ Training Academy, Chennai) और मित्र भी आए हुए थे। सभी छोटे-छोटे गुटों में बैठकर देश-दुनिया, नयी-पुरानी बातें कर रहे थे।

उनमें से एक भद्र महिला ने किसी बात पर टिप्पणी करते हुए कहा “ब्राह्मण लोग बहुत चालाक होते थे। वे लोगों को अशिक्षित और गरीब बना कर रखते थे ताकि वह हमेशा पिछड़े रहे।” अधिकतर उपस्थित महिलाएं (और कुछ पुरूष भी) उनका समर्थन कर रही थी। यह अधिकतर वह लोग हैं जिनके पास स्वयं का करोड़ों का घर है और अच्छी-अच्छी गाड़ियां हैं, तथाकथित “अच्छे विद्यालयों” में शिक्षा हुई है।

यानी जिनसे अपेक्षा की जाती है कि वे कोई भी बात कहने या उसे सच मानने के पहले अपने विवेक का इस्तेमाल करेंगे, लेकिन नहीं। यह convent educated लोगों का समूह था। इसलिए अधिकतर बातें भी अंग्रेजी में ही हो रही थी।

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मैंने उस महिला से कहा “मैडम आप यह बात किस आधार पर कह रही हैं? यह बिल्कुल ही निराधार और झूठी बात है। आपको ऐसी आधारहीन बात नहीं कहनी चाहिए”। परंतु वह अपनी बात पर अड़ी रहीं।

तब मैंने उनसे पूछा कि आप स्वयं यह बताइए कि आप किस जाति की हैं? (हालांकि मैं अच्छी तरह से जानता था कि वह यादव है)। उन्होंने गर्व कहा कि मैं यादव हूं। मैंने कहा ठीक है अब यह बताइए कि क्या यादवों को भी ब्राह्मण लोग अशिक्षित रखते थे? बोली “हां वह सभी ‘शूद्र’ जातियों को अशिक्षित रखते थे”।

मैंने कहा फिर तो यादव का ही उदाहरण लेते हैं। यह बताइए “इतिहास में सबसे महान यादव आप किसे समझती हैं?” उन्होंने कहा कि “भगवान श्रीकृष्ण हमारे ही वंश (उनका मतलब जाति से था) के थे”। तब मैंने उनसे प्रश्न पूछा कि ठीक है।

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अब ये बताइए कि “कृष्ण शिक्षित थे या अशिक्षित?” वह बोली “वो तो महाज्ञानी थे, भगवद्गीता की शिक्षा उन्होंने ही दी है।” मैंने पूछा “भगवान श्री कृष्ण को शिक्षा किसने दी थी?” तो उनकी सिट्टी-पिट्टी बन्द। बस काटो तो खून नहीं। थोड़ी देर तक अवाक् रहकर बोली- “सांदीपनि ऋषि ने।” फिर मैंने पूछा- “आप क्या समझती हैं सांदीपनि ऋषि यादव थे क्या?” बोली- “नहीं, वह तो ब्राह्मण थे।”

“फिर आप कैसे कह सकती हैं कि ब्राह्मण लोग अब्राह्मण (तथाकथित आज के “पिछड़ों”) को शिक्षा नहीं देते थे? दूसरा जो आप कह रही है कि ब्राह्मण लोग सभी को गरीब रखते थे और स्वयं मंदिर का चढ़ावा लेकर धनी होते थे, तो उसी युग की आपको बात बताता हूं। जिनको आपने अपने वंश का “यादव” बताया है, यानी श्री कृष्ण, वह तो द्वारकाधीश थे और उन्हीं का मित्र सुदामा, उन्हीं के युग में निहायत गरीब ब्राह्मण था। तो ब्राह्मण धनी कब होते थे?

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उसी युग में द्रोणाचार्य हुए थे। जिनके बराबर धनुर्विद्या और युद्धविद्या का कोई ज्ञाता नहीं था। वह महान विद्वान ब्राह्मण थे। सारी शिक्षा निशुल्क देते थे। जब स्वयं उनका बेटा अश्वत्थामा पैदा हुआ तो उनके पास एक गाय नहीं थी जिसका दूध वह बेटे को पिला सकते। जब वह राजा द्रुपद के पास एक गाय मांगने गए तो द्रुपद ने उनका अपमान किया और गाय भी नहीं दी। तो आप यह कैसे कह सकती हैं ब्राह्मण लोग धनी होते थे और बाकी को गरीब बना कर रखते थे?

अब उनके पास कोई उत्तर नहीं था। मैंने कहा आप ये झूठा प्रचार बंद कर दीजिए। यह पढ़े लिखे लोगों के लिए ठीक नहीं है। अपने इतिहास की सही जानकारी प्राप्त कीजिए। अपने अज्ञान और झूठे प्रचार पर वह काफी झेंप गई थी उनके पास कोई उत्तर नहीं था। संभवतः पहली बार उन्हें किसी ने सत्य का दर्पण दिखाया था।

लेकिन थोड़ी देर बाद वह मेरे पास आई और बोली-

“लेकिन द्रोणाचार्य ने एक दलित का अंगूठा कटवा लिया था वह अत्याचार नहीं था?” मैंने कहा “यह आपकी मानसिकता पर निर्भर करता है। आपसे मैं एक प्रश्न पूछता हूं- आपको सभी को यह शिकायत है कि द्रोणाचार्य ने एकलव्य का अंगूठा कटवा कर उसके साथ बहुत बड़ा धोखा और अत्याचार किया था। यह शिकायत कई साल से आप लोग करते आ रहे हैं क्योंकि शिकायत करने की आपकी प्रवृत्ति है।

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जबकि ब्राह्मण कभी शिकायत नहीं करता। ब्राह्मणों के ऊपर जो अत्याचार होता है या तो उसे सहन कर रहता है या तो उसका प्रतिकार करता है वह प्रचार नहीं करता। और हां युग युगांतर तक किसी को उसके लिए दोष नहीं देता फिरता।

मैंने उनसे कहा- “आपको यह तो याद है कि द्रोणाचार्य ने एकलव्य का अंगूठा कटवा लिया था परंतु आपको यह याद नहीं है कि कई क्षत्रिय और एक यादव ने मिलकर (सभी पांडव, धृष्टद्युम्न और श्रीकृष्ण) छल और झूठ से द्रोणाचार्य का सिर कटवा लिया था? मैंने कहा कि महाभारत के युद्ध में निहत्थे द्रोणाचार्य के साथ छल, कपट और झूठ बोल कर के यादव श्री कृष्ण ने और सभी पांडवों ने मिलकर धोखे से उनका सिर काट लिया। परंतु क्या आज तक किसी ब्राह्मण ने इस बात की शिकायत की कि ब्राह्मणों के साथ अत्याचार हुआ?

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मैंने कहा यह अंतर है ब्राह्मण और दूसरे लोगों में। “आपके पास शिकायतें बहुत हैं जबकि अत्याचार नगण्य है। ब्राह्मणों के ऊपर अत्याचार असंख्य है लेकिन उनकी शिकायतें नहीं है। उसी युग में एक अपराध की सजा के चार दंड थे: शूद्र को सबसे कम, वैश्य को उसका दो गुना, क्षत्रिय को चार गुना और ब्राह्मणों को सर्वाधिक आठ गुना दंड दिया जाता था।

यह दंड स्वयं धर्मराज युधिष्ठिर द्वारा अनुमोदित था। सच्चाई यह है कि कि किसी के ऊपर कोई अत्याचार नहीं हुआ। सब कुछ युगानुकुल होता है। यह आपकी सोच, मानसिकता और व्याख्या या अर्थ निकलने पर निर्भर करता है। जिसे आप सिर्फ “यादव” मानती है, सारे ब्राह्मण उसे सिर्फ ईश्वर का अवतार मानते हैं।

ऋषि वेदव्यास ने उसी की प्रसंशा में महाभारत और सूरदास (ब्राह्मण) ने उसी की भक्ति और प्रसंशा में सूरसागर की रचना की।” देवों और ईश्वर का भी “जातीय” विभाजन अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। मैंने कहा- ‘अगर सभी देवताओं की “जाति” है तो उनमें से कोई ब्राह्मण नहीं है, जबकि उनकी पूजा-अर्चना करने वाले पुजारी सारे ब्राह्मण होते हैं।

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ब्राह्मण विष्णु गुप्त ने इतने बड़े मगध साम्राज्य की स्थापना की किंतु न स्वयं राजा बना न किसी ब्राह्मण को बनाया। उसने अनाम वर्ण चंद्रगुप्त को शिक्षा दी और सम्राट बनाया। उस युग में “जाति” ऐसी होती ही नहीं थी, सिर्फ वर्ण होता था। वर्ण जन्मना और कर्मणा दोनों होता था।

चाहे पौराणिक होगे युग हो या ऐतिहासिक, चाहे प्राचीन काल हो या आधुनिक काल, ब्राह्मणों के ऊपर भी अत्याचार होता रहा है। लेकिन ब्राह्मणों ने कभी शिकायत नहीं की। या तो उन्हें उसका प्रतिकार किया और या तो उसे सहन किया। फिर भी सबको साथ लेकर चले। वसुधैव कुटुंबकम्” और सर्वे भवन्तु सुखिन:” का उद्घोष किया।

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