ब्राह्मण ही बन सकते हैं अग्नि अखाड़े के सदस्य

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कुम्भ मेला की भव्यता, पौराणिकता व संस्कृति के परिचायक अखाड़ों की अपनी-अपनी मान्यताएं व परम्पराएं हैं। श्री पंच अग्नि अखाड़ा की परम्परा व मान्यता बिल्कुल पृथक मानी जाती है। इस अखाड़े का सदस्य केवल ब्राह्मण ही बन सकते हैं। इस अखाड़े में नैष्ठिक ब्रह्मचारियों को ही दीक्षित किया जाता है। हरिद्वार में अखाड़े का संचालन सिद्ध पीठ दक्षिणा काली मन्दिर से ही होता है।

श्री पंच अग्नि अखाड़ा को श्री दशनाम पंच अग्नि अखाड़ा भी कहा जाता है। बताया जाता है कि श्री पंच अग्नि अखाड़ा की स्थापना आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को विक्रमी संवत 1192 सन् 1136 में हुई। अखाड़े का मुख्यालय नया महादेव राजघाट मकान नम्बर ए-11/30 सी वाराणसी में है।

अखाड़ों की शाखाएं हरिद्वार के अलावा प्रयागराज तक हैं फैली

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अखाड़े की शाखाएं हरिद्वार के अलावा प्रयागराज, त्रायम्बकेश्वर उज्जैन, बरेली, बिलावा, इन्दौर, अहमदाबाद, मऊरानीपुर, कामाख्या, जूनागढ़, भोपाल, गोरेगांव, रेणुका जी व राजस्थान में जयपुर, जोध्पुर आदि स्थानों पर है। अखाड़ा के आचार्य महामण्डलेश्वर श्रीमद् रामकृष्णानन्द महाराज हैं जो अमरकंटक में निवास करते हैं। अखाड़े के अध्यक्ष बापू गोपालानन्द ब्रह्मचाीर तथा जनरल सेक्रेटरी श्री महंत गोविन्दानन्द महाराज हैं। इसके अलावा स्थानीय स्थानापति एवं सचिव श्री महंत कैलाशानन्द महाराज हरिद्वार में चण्डीदेवी पर्वत के पैदल मार्ग स्थित दक्षिणा काली मन्दिर में निवास करते हैं।

श्री महंत कैलाशानन्द महाराज वाराणसी, बरेली, जयपुर, जोध्पुर की अखाड़ा गतिविध्यिों का संचालन करते हैं। अखाड़े में पांच रमता पंच श्री महंतों का भी महत्वपूर्ण स्थान होता है। अखाड़े के दो महामण्डलेश्वरों में स्वामी मुरारी चेतन महाराज व स्वामी विष्णुदेवानन्द महाराज हैं।
श्री पंच अग्नि अखाड़े की परम्परा अलग ही है। इस अखाड़े में केवल नैष्ठिक ब्रह्मचारियों को ही दीक्षित किया जाता है। दशनाम संन्यासियों के ब्रह्मचारी ही इससे सम्बन्ध रहते हैं।

अन्य अखाड़ों में जहां संन्यासी नागा साधु होते हैं वहीं इस अखाड़े में चतुर्नाम्ना कर्मकाण्डी नैष्ठिक ब्रह्मचारी होते हैं। ब्राह्मण परिवार में जन्मे साधु ही इस अखाड़े के सदस्य हो सकते हैं।

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