बॉलीवुड का भी एक धर्म है, जाति है

बॉलीवुड का भी एक धर्म है, जाति है

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सिनेमा की सबसे बड़ी खासियत उसका सभी कलाओ का मिश्रण होना है। परदे पर बहता संगीत हो, उसमे कोई गीत हो, कहानी हो , पेंटिंग सरीखे  दृश्य हो, अभिनय ,सब अपने आप में इंडिविजुअल आर्ट है। सही मात्रा और संतुलन में सिनेमा ,इन सबको अपने आप में बाँध लेता है।

सिनेमा एक ऐसा जादू है जो अँधेरे में चमकती रौशनी के ज़रिये, आपके ज़ेहन को, बेहद ख़ूबसूरती से अपने कब्ज़े में ले लेता है। इतना महत्वपूर्ण और सशक्त माध्यम, जो जाने अनजाने में हमारी सोच, भावनाये , कल्चर यहाँ तक हमारे इतिहास को अलग परिपेक्ष्य में प्रस्तुत कर सकता है और हम उस सोच को सच  मानने के लिए मजबूर हो जाते है।

इसी बेहद ताक़तवर माध्यम का प्रयोग एक ख़ास तरह की प्रयोगशाला के लिए किया गया  प्रतीत होता है। एक धर्म विशेष के खिलाफ धीरे धीरे सुनियोजित तरीके से फिल्मे बनाकर ,बेहद  चतुराई से भारतीय जनमानस के ह्रदय और मष्तिष्क पर चस्पा कर दी गयी। लगभग हर दशक में यही धर्म विशेष और इस धर्म से जुडी अलग अलग जातिया, को नकारात्मक तरीके से दिखाने का प्रयास किया गया।

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इस विषय की गहराई से पड़ताल करने पर मैनेजमेंट प्रोफेसर धीरज शर्मा ने, तथ्य पर आधारित, आंखे खोलने वाला विश्लेषण प्रस्तुत किया। धीरज शर्मा की रिसर्च में उन्होंने आज़ादी के बाद के हर दशक की ५० फिल्म का रैंडम सैंपल लिया।

क्यों एक ही धर्म और जाति गलत होती है?

यहाँ पर ये देखना बेहद ज़रूरी है कि ये फिल्म बिना किसी पूर्वाग्रह के चयनित की गयी थी। हर दशक इन फिल्म्स में कुछ ख़ास बाते देखी  गयी। सबसे ज़्यादा चौकाने वाली बात रही कि फिल्म में भ्रष्ट राजनीतिक व्यक्ति का किरदार निभा रहे ५८% की जाति ब्राह्मण रही है।

ये संयोग नहीं हो सकता कि १०० भ्रष्ट राजनीतिक किरदार में लगभग ६० प्रतिशत हिन्दू ब्राह्मण है जबकि समाज और राजनीतिक  में व्याप्त भ्रष्टाचार में इस विशिष्ट जाति का ये प्रतिशत सच से कोसो दूर है। देश के सर्वाधिक भ्रष्ट नेता की लिस्ट में भी ब्राह्मण का परसेंट, अन्य जातियों से कहीं कम है।

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विभिन्न  साइट्स पर दिए लिस्ट को अगर देखा जाय तो भ्रष्ट नेताओ की लिस्ट में शरद पवार, मायावती, लालू यादव, मुलायम सिंह  यादव, शशिकला,  ए  राजा , मधु कोड़ा , कानिमोझी ज़्यादातर गैर ब्राह्मण है। यही नहीं ख़ास धर्म और जातियों को अलग रंग में पेंट करने के सुनियोजित प्रयास में ६२ % हिन्दू वैश्य जाती के लोगो को भ्रष्ट व्यापारी दिखाया गया है।

समाज में कुरीतिया, कुप्रथाएं एक सामान्य प्रक्रिया है।  जैसे जैसे कोई समाज, धर्म, या जाति, अपनी सम्पूर्णता में ज़्यादा पढ़ी लिखी और व्यवहारिक होती जाती है, वो अपनी ही कुरीतियों का विरोध करती जाती है।

ये कुरीतिया दरअसल पूर्व काल में कुछ हद तक जस्टीफ़ाइड होती है क्योंकि उस कालखंड में आजकल की कुरीति,  एक ज़रुरत थी। सभी धर्मो में सामान रूप से व्याप्त, सामाजिक कुरीति और धार्मिक, अतार्किक, अवैज्ञानिक धारणाओं की भरमार है।

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बेहद आश्चर्य की बात है इस सोशल ईविल के हर धर्म में होने के बावजूद, धार्मिक कुरीतियों पर आधारित फिल्म में सिर्फ हिन्दू धर्म की कुरीति पर ज़ोर दिया गया है। कमाल ये है की एक धर्म विशेष की इतनी कुरीतियों को दिखाने और इष्ट पर हमले के बावजूद, भारत में कभी भी बेहद मुखर विरोध नहीं हुआ, दंगे नहीं भड़के, घर नहीं जलाये गए।

कई मुस्लिम कलाकार द्वारा भगवान् और देवी के नग्न, अर्धनग्न चित्र बनाये गए लेकिन उन कलाकारों पर शारीरिक हमले नहीं हुए। जबकि मुस्लिम धर्म की कुरीतियों और उनके पीर, पैगम्बर के खिलाफ, मामूली मज़ाक भी सामूहिक हत्या, आगजनी और बड़े दंगे का कारण बन सकता है।

ओह माय गॉड, मोहल्ला अस्सी, पी के, जैसी बहुत सी फिल्म है जिसमे सीधे सीधे हिन्दू धर्म की मान्यता, उनके देवता, भगवान्, इष्ट पुरुष बेहद छिछले तरीके से दिखाया गया है।

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मोहल्ला अस्सी में भगवान्  शिव की वेशभूषा में एक कलाकार को बेहद गन्दी गालियों का धड़ल्ले से प्रयोग करते दिखाया गया है। हालांकि अगर बनारस के घाट के सच्चे माहौल को ही दिखाना था तो किसी भी और किरदार के मुँह से ऐसी भाषा का प्रयोग कराया जा सकता था। लेकिन बेहद सहिष्णु और उदार होने की वजह से खास धर्म के प्रतीक और भगवानो का इस प्रकार से चरित्र चित्रण, बेहद आपत्तिजनक है।

धीरज की रिसर्च में एक और बात अंडरलाइन करने योग्य है कि बॉलीवुड के ८४ % मुसलमान किरदार, बेहद धार्मिक और ईमानदार दर्शाये गए है। यहाँ तक कि अगर  किसी मुस्लिम किरदार को खल चरित्र के रूप में भी दिखाया गया है तो भी ईमानदार और बेहतर इंसान है। जबकि अगर हम पूरे विश्व में आतंकवाद, अपराध और हिंसा से जुडी हरकत को देखे तो सर्वाधिक प्रतिशत ,मुस्लिम आबादी का आता है।

भारत की नेशनल इन्वेस्टीगेशन एजेंसी यानी एन आई ए, की मोस्ट वांटेड क्रिमिनल लिस्ट में ९० % से ज़्यादा मुस्लिम है।  बावजूद इसके फिल्मो में मुस्लिम अपराधी की संख्या, समाज में सच के प्रतिशत  से मैच नहीं करती।  यही नहीं बल्कि किसी फिल्म में अगर मुस्लिम आतंकवादी का किरदार है तो उसको एक झूठ का साथ बेहद खुबसुरती से परोसा जाता रहा है। उसके आतंकवादी बनने में उसकी धर्मान्धता का काम, बल्कि उसके बचपन में इस्लामॉफ़ोबिआ की वजह, उसके परिवार का क़त्ल होता है।

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ज़्यादातर, हिन्दू आबादी द्वारा, उस मुस्लिम आतकवादी के परिवार को पीट पीटकर सिर्फ इस वजह से मार दिया गया होता है क्योकि वो मुस्लिम है और ज़्यादातर मुस्लिम आतकवादी होते है। अपने बचपन में वो आतंकवादी, अपने बेहद ईमानदार, नेकदिल नमाज़ी पिता का क़त्ल देखकर आतंकवादी बन जाता है। इस तरह के नैरेटिव लगातार दिखाकर, अक्सर आतंकवाद को जस्टीफ़ाइड करने का काम भी किया जाता रहा है

सिनेमा जैसा माध्यम, जो धीरे धीरे हमारे अवचेतन मन को अपनी मुट्ठी में क़ैद करता जाता है और हमे इसका तनिक भी अहसास नहीं होता। अक्सर किरदार की अदा, मैनरिज़्म, संवाद अदाएगी का जादू हमारे दिल की सबसे गहरी रग में इस कदर बस जाता है कि उसकी काल्पनिक ज़िन्दगी भी हमे सच जैसी लगने लगती है। सिनेमा ने भी इस झूठे सच की पारदर्शी दुनिया का निर्माण किया।

सिनेमा की इसी चमत्कारिक शक्ति का उपयोग, इन साजिशकर्ताओं ने बेहद चतुराई से इस्तेमाल किया। सालो साल एक ख़ास तरह का नैरेटिव परोसने की वजह से, आम जनमानस में ये व्याप्त हो गया कि वैश्य व्यापारी, बुनियादी तौर पर बेईमान  होता है। ब्राह्मण अगर पुजारी है तो पाखंडी होगा, भगवान् का सौदा करेगा, राजनीतिक होगा तो ज़्यादातर बेईमान होगा। देश और मंत्रालय का सौदा करेगा।

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७० के दशक की कुछ फिल्मो के पन्ने पलटते है। इस दशक की सबसे बड़ी कमर्शियल हिट, जिसके हर किरदार ने, फिल्म में अपनी उम्र से ज़्यादा, लोगो के दिल में जीना शुरू कर दिया, ऐसी फिल्म ‘शोले ‘ का किरदार ‘इमाम साब’ अंधे होने के बावजूद, पांचो वक़्त की नमाज़ पढ़ते है।

बेहद अच्छे दिल वाले इमाम साब के किरदार की सारी परते बेहद, बेहद नेक और अच्छी है। गौरतलब है की ये फिल्म का एकलौता मुस्लिम किरदार है। ठीक इसी तरह, ७० दशक के एक और फिल्म ‘शान ‘ में एकलौता मुस्लिम किरदार ‘अब्दुल’ है। एक स्ट्रीट बेगर होने का बावजूद अब्दुल बेहद नेकदिल, मददगार है, और बुराई का दुश्मन है।

इस सबसे भी ज़्यादा वो ईमान का पक्का है क्योंकि वो मुसलमान है। ५ वक़्त का नमाज़ी भी है सो उसके बेईमान होने की गुंजाइश ख़त्म हो जाती है।

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हिंदी फिल्म में अंडरवर्ल्ड डॉन, दावूद, हाजी मस्तान, करीम लाला, अबू सालेम जैसे वास्तविक किरदार पर भी जब फिल्म बनायीं, किरदार के साथ अन्याय दिखा कर, उसके क्राइम को एक हद तक जस्टिफाई करने का प्रयास किया गया।

सेक्युलिस्म की कस्मे खाता बॉलीवुड, दशकों से एक ख़ास विचार को इतनी कोमलता से हमारे मष्तिष्क में चित्रित कर दिया  कि बहुसंख्यक दर्शक, इस भ्रमजाल को सच का हिस्सा मान बैठा। बिटवीन द लाइन्स और अंडर करंट में परोसे जा रहे इस नैरेटिव को नकारने की आववश्यकता है और फिल्म इंडस्ट्री से उम्मीद है कि समाज के सच को दिखाकर, लोगो को जागरूक करे और धर्म को उसकी सच्चाई के साथ पेश करे।

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