भक्तों की हर मन्नत पूरी होती है मायादेवी मन्दिर में

भक्तों की हर मन्नत पूरी होती है मायादेवी मन्दिर में

भगवान शिव की अर्धांगिनी और प्रजापति राजा दक्ष की सुपुत्री सती के आत्मदाह के साथ ही तीर्थ नगरी हरिद्वार को सप्तपुरियों में से एक मायापुरी का स्थान प्राप्त हुआ ।मायापुरी बनने से पहले तीर्थ नगरी हरिद्वार को हरद्वार ,गंगा द्वार और हरिद्वार के नाम से जाना जाता था। ब्रह्माजी के मानस पुत्र राजा दक्ष प्रजापति ने सती के जन्म स्थल कनखल में एक बड़े यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें सती के पति और अपने दामाद भगवान शिव को नहीं बुलाया। जब बिन बुलाए सती अपने मायके में आयोजित यज्ञ में पहुंची तो उनके पिता राजा दक्ष प्रजापति द्वारा उनके पति का अपमान किया गया तो सती क्रोधित होकर यज्ञ कुंड में कूद पड़ी और उन्होंने आत्मदाह कर लिया जिसके कारण यज्ञ विध्वंस हो गया।

जब शिव को सती के आत्मदाह की सूचना मिली तो उन्होंने अपनी जटाओं को पर्वतमाला के ऊपर पटका तो वीरभद्र नामक गण की उत्पत्ति हुई और उस गण ने राजा दक्ष का सिर काट कर यज्ञ कुंड में डाल दिया । राजा दक्ष की पत्नी सती की मां और देवी देवताओं ने भगवान शंकर से क्षमा मांगी और भगवान शंकर ने बकरे का सिर लगा कर राजा दक्ष को जीवनदान दिया और कनखल स्थित सती कुंड से वे विक्षिप्त अवस्था में सती की पार्थिव देह को लेकर जब निकले तो उन्होंने जिस स्थान पर सती की पार्थिव देह को रखा वह स्थान माया देवी के रूप में प्रतिष्ठित हुआ और सर्वांग पीठ कहलाया और जब इस स्थान पर सती की पार्थिव देह के साथ भगवान शिव को विक्षिप्त अवस्था में भगवान विष्णु ने देखा तो उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शव के विभिन्न टुकड़े किए।

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जिस जिस स्थान पर सती की देह के टुकड़े गिरे, वह स्थान सिद्ध पीठ कहलाया और इस तरह भारत में 51 सिद्ध पीठ और नेपाल में एक सिद्ध पीठ की स्थापना हुई। मायापुरी अधिष्ठात्री सिद्ध पीठ के रूप में प्रतिष्ठित हुई। इसी के साथ हरिद्वार देश में विभिन्न स्थानों में स्थापित सप्तपुरियों में से एक मायापुरी के रूप में प्रसिद्ध हुआ और हरिद्वार तीर्थ नगरी की इष्ट देवी माया देवी बनी और उनके सिद्ध पीठ मंदिर के पास आनंद भैरव प्रकट हुए, जो हरिद्वार तीर्थ नगरी के कोतवाल बने ।तब से हरिद्वार में देशभर के देवी के भक्त और तंत्र साधक माया देवी की पूजा करने यहां पर आते हैं और माया देवी के रूप में मां शक्ति इस तीर्थ नगरी की रक्षा करती हैं और कोतवाल आनंद भैरव उनके सुरक्षा प्रहरी रूप में विराजमान रहते हैं।

मायादेवी मंदिर से शुरू होती है उत्तराखंड के समस्त तीर्थों में भ्रमण करने वाली छड़ी

मायादेवी मंदिर से शुरू होती है उत्तराखंड के समस्त तीर्थों में भ्रमण करने वाली छड़ी

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यह दोनों मंदिर जागृत अवस्था में माने जाते हैं, जो भी भक्त यहां से जो मन्नत मांगता है ,वह पूरी होती है। तंत्र और देवी की पूजा करने वालों के लिए यह स्थान सबसे उपयुक्त माना गया है ।आजकल इस सिद्ध पीठ का प्रबंधन श्री पंच दशनाम जूना अखाड़ा के पास है ।इस अखाड़े के दशनाम नाम नागा संन्यासी इस मंदिर की पूजा अर्चना मुख्य पुजारियों के रूप में करते हैं ।उत्तराखंड के समस्त तीर्थों में भ्रमण करने वाली छड़ी यात्रा भी इसी माया देवी मंदिर से शुरू होती है और उत्तराखंड की सभी देवियों के मंदिर का भ्रमण करके वापस इसी स्थान पर आकर स्थापित की जाती है ।

माया देवी मंदिर सिद्ध पीठ हिंदू देवी अधिष्ठात्री को समर्पित है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इन तीर्थ स्थलों की यात्रा से मोक्ष प्राप्ति होती है। सप्तपुरी में भारत के सात शहर शामिल हैं। ऋषियों के अनुसार सप्तपुरी के यह सात शहर सांस्कृतिक और भाषाई विविधता के बावजूद भारत की आध्यात्मिक एकता और समन्वय को प्रदर्शित करते हैं।सप्तपुरियों में अयोध्या,मथुरा,माया (हरिद्वार),काशी,कांची,अवंतिका (उज्जयिनी) और द्वारका शामिल है । इन सप्तपुरियों में से दो पुरिया हरिद्वार और उज्जैन में कुंभ मेला भरता है ,जहां पर अमृत की बूंदे गिरी थी ।तंत्र साधना के ज्ञाता इन सप्तपुरियों में अपनी साधना की सिद्धि के लिए शारदीय और चैत्र नवरात्रि में हर वर्ष आते हैं।

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सिद्ध पीठ को दिया जा रहा है भव्य रूप माया देवी मंदिर और आनंद भैरव मंदिर को कुंभ के अवसर पर भव्य और विशाल रूप देने के लिए श्री पंच दशनाम जूना अखाड़ा ने एक महत्वपूर्ण योजना को अंतिम रूप दिया है। जिसवंके मानचित्र को कुंभ मेला प्रशासन और हरिद्वार रुड़की विकास प्राधिकरण द्वारा स्वीकृति भी प्रदान कर दी गई है। श्री पंच दशनाम जूना अखाड़ा के संरक्षक और श्री अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री महन्त हरि गिरी महाराज ने बताया कि माया देवी मंदिर की चोटी 291फिट ऊंची बनाई जाएगी। इसी तरह आनंद भैरव मंदिर को भव्य रुप दिया जाएगा और इसकी ऊंचाई 171 फिट ऊंची रखी जाएगी। हरिद्वार तीर्थ नगरी की अधिष्ठात्री देवी माया देवी मंदिर तंत्र साधकों के लिए सबसे उपयुक्त केंद्र माना गया है । शिव जी के गण भैरव जी की आनंद भैरव मंदिर सिद्ध पीठ सात्विक सिद्ध पीठ मानी जाती है।

आध्यात्मिक धर्म ग्रंथों के जानकार गोपाल सिंह रावत का कहना है कि हरिद्वार में 634 ईसवी में चीनी इतिहासकार व्हेन सांग भारत भ्रमण के दौरान आया था उसने इस मायानगरी में बहुत मोर देखकर इसका नाम मायालु संबोधित किया और उसने माया देवी मंदिर का उल्लेख अपनी पुस्तकों में किया लिखा कि इस मंदिर के प्रांगण में कुछ साधु संत रहते थे और देवी की पूजा करते थे।

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ब्रिटिश काल में सर्वेयर जनरल ऑफ इंडिया अलेक्जेंडर कनिंघम हरिद्वार आए और उन्होंने यहां पर माया देवी मंदिर और आनंद भैरव मंदिर का उल्लेख किया और अपनी पुस्तक में लिखा कि इस स्थान पर अत्यंत प्राचीन देवी का मंदिर स्थापित है ,जो देवी चार हाथों वाली है। श्री पंच दशनाम जूना अखाड़ा के अध्यक्ष महन्त प्रेम गिरि महाराज का कहना है कि आदि जगद्शंकराचार्य ने जब सनातन धर्म की रक्षा के लिए दशनामी संन्यासी परंपरा के अखाड़ों की स्थापना की तो उन्होंने दशनामी अखाड़ों के साधुओं की 52 मढ़िया 52 शक्तिपीठों के अनुसार ही स्थापित की। इन 52 शक्तिपीठों में एक मढ़ी तिब्बत में लामा मढ़ी के रूप में स्थापित है।

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