भावनात्मक एकता के प्रतीक हैं कुम्भ मेले

भावनात्मक एकता के प्रतीक हैं कुम्भ मेले

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कुम्भ आस्था का महान पर्व है। इसकी तुलना विश्व के किसी भी पर्व से नहीं की जा सकती। इसका ऐतिहासिक, दार्शनिक, सामाजिक कोई भी पक्ष क्यों न लें यह अनुपमेय है।

कुम्भ का ऐतिहासिक पक्ष

कुम्भ-पर्व का सर्वप्रथम आयोजन कब हुआ था, यह तो निश्चित कर पाना कठिन है किन्तु यह बात निश्चित रूप से कही जा सकती है कि यह पर्व भारत वर्ष में अत्यन्त प्राचीन काल से ही मनाया जाता रहा है। विश्व का सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद है और इसमें भी कुम्भ पर्व का वर्णन मिलता है। ऋग्वेद में कर्म फल के सिद्धांत को कुम्भ पर्व से जोड़ा गया है-

वह मनुष्य जो कुम्भ पर्व में कर्मफल के परिणाम स्वरूप स्नान, दान तथा होम आदि पवित्र कर्म करता है, निश्चय ही इन कर्मों से काठ को काटने वाले कुठार की भांति अपने पापों को नष्ट करता है। विष्णु पुराण में कुम्भ का महत्व बताते हुए कहा गया है कि एक हजार अश्वमेध, एक सौ वाजपेय यज्ञ और पृथ्वी की एक लाख प्रदक्षिणा के पुण्य के बराबर अकेले कुम्भ स्नान का फल है।

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‘अश्वमेध सहस्त्राणि वाजपेय शतानि च। लक्षं प्रदक्षिणां पृथ्वयाः कुम्भ स्नाने हि तत्फलम्।।

’ वायु पुराण के अनुसार श्राद्धे कुम्भे विमुंचंति ज्ञेयं पाप विषूदनम्। श्राद्धं तत्राक्षयं प्रोक्तं जप्य होम तपांसि च।।

अर्थात् कुम्भ में जप, तप, होम, हवनादि तथा श्रद्धाकर्म करने से पापों का समूल क्षय हो जाता है। अथर्ववेद में कहा गया है कि ‘काल के ऊपर भरा कुम्भ रखा है। काल सुदूर आकाश में स्थित है परन्तु लोकों में चलायमान दिखाई देता है।

’ मनुस्मृति के अनुसार कुम्भ- पर्व ‘मनुष्य के द्वारा इस लोक में किए गए सत्कर्मों के हेतु अनेक प्रकार के सुखों को देने वाला और दूसरे लोक में पितरों को उत्तमात्तम सुखों को देने वाला है।’ उपर्युक्त श्लोकों में कुम्भ पर्व के पीछे छिपी एक आध्यात्मिक भावना व्याप्त है। कुम्भ का विस्तृत वर्णन एवं महात्म्य हमारे स्कन्द पुराण, ब्रह्म पुराण, भविष्य पुराण, वायु पुराण, विष्णु पुराण आदि में विशेष रूप से मिलता है। इसके अतिरिक्त वेदांगों, भाष्यों, स्मृतियों एवं महाकाव्यों में भी विभिन्न रूपों में कुम्भ का वर्णन परिलक्षित होता है। आधुनिक काल में कन्नौज के राजा हर्षवर्धन के शासन काल के दौरान ह्नेन्साँग नामक एक चीनी यात्री भारत आया था। उसने अपनी यात्रा के संस्मरणों में इस पर्व का वर्णन किया है जिमसें सम्राट ने अपना सर्वस्व दान कर दिया था। साधुओं के संघर्ष प्रायः कुम्भ पर्व पर प्रथम स्नान को लेकर हुआ करते थे। प्रत्येक समुदाय प्रायः अपनी शक्ति-प्रदर्शन द्वारा प्रथम स्नान का प्रयास करता था। संघर्षों को समाप्त करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने प्राचीन परम्पराओं के प्रमाण एकत्र किए और उन्हीं तथ्यों के आधार पर स्नान के क्रम व नियम निर्धारित किए जिनका ब्रिटिश सरकार ने कठोरता से पालन कराया। वर्तमान भारत सरकार भी उन्हीं नियमों के अनुसार व्यवस्था करती है। नियमानुसार स्नानों का क्रम इस प्रकार तय हुआ थाः-

सर्वप्रथम नागा संन्यासियों के अखाड़े, दूसरे स्थान पर वैरागी साधुओं के अखाड़े और तीसरे स्थान पर उदासीन अखाड़े और सबसे अन्त में निर्मल सम्प्रदाय के साधु स्नान करेंगे।

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कुम्भ का दार्शनिक पक्ष

कुम्भ का दार्शनिक पक्ष

साधारण बोलचाल की भाषा में कुम्भ को मेला कहा जाता है। जबकि कुम्भ मेला न होकर ऐतिहासिक, दार्शनिक और सामाजिक पर्व है। मेले का सामान्यतः अर्थ हैः जहाँ अधिकतम लोग जुड़ें, खूब भीड़भाड़ हो, मनोरंजन के पर्याप्त साधन आदि हों। मेले का योग भौतिक दृष्टि से होता है जबकि पर्व का योग ज्योतिष शास्त्र की कला, पक्ष, नक्षत्र, ग्रह, गणना एवं मुहूर्त द्वारा निर्धारित होता है। इसमें भाग लेने वालों का उद्देश्य धार्मिक पुण्य एवं आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करना होता है।

‘वयं अमृतस्य पुत्राः’

अर्थात् हम अमृत के पुत्र हैं इस वेद वाक्य से ही सिद्ध होता है कि हम अनादिकाल से ही अमृत ;अमरताद्ध के जिज्ञासु रहे हैं। अमृत प्राप्ति की उत्कट अभिलाषा में ही आसुरी शक्तियों के साथ मिलकर मंथन किया था। मंथन एक परम्परा है जो आज भी जारी है। प्रत्येक जीव को अपना भी मंथन करना होता है क्योंकि प्रत्येक जीव के पास अमृत है। योगी लोग भलीभांति जानते हैं कि दोनों भृकुटियों के मध्य पियूष ग्रन्थि है यही अमृत कुम्भ है। इसमें से ही अमृत का संचरण होता है। जो लोग आत्मज्ञान का मंथन करते हैं उन्हीं को अमृत की प्राप्ति होती है। प्रयाग की गंगा, यमुना एवं सरस्वती की भांति मस्तिष्क में इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना तीन नाड़ियाॅं विद्यमान हैं, मूलाधार ही कच्छप है तथा सुषुम्ना से लिपटी हुई नाड़ियाॅं वासुकी नाग हैं। इस प्रकार जब ध्यान-योग-मंथन होता है तो महाकुम्भ का अमृतपान होता है। इस प्रकार कुम्भ की परम्परा में ‘अहं ब्रह्मास्मि’ का साक्षात्कार भी अनायास ही हो जाता है। तीर्थ, कुम्भ पर्व से यदि शारीरिक पुण्यामृत अर्जित होता है जो आन्तरिक कुम्भ से आत्मा का अमृत प्राप्त होता है। हमारे अंतःकरण में आसुरी शक्तियों एवं दैवीय शक्तियों में निरन्तर संघर्ष चलता रहता है। यदि अमृत तत्त्व की प्राप्ति नहीं हुई तो आसुरी शक्तियां पतन की ओर ले जा सकती हैं। अतः अमृत की प्राप्ति का प्रयास अत्यन्त आवश्यक है।

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कुम्भ का सामाजिक पक्ष

कुम्भ एक महान सामाजिक और सांस्कृतिक उद्देश्य का पोषक पर्व है। इसमें लोग श्रद्धा से अमृतमय तीर्थों पर एकत्रित होकर संतों, विद्वानों के दर्शनों और वचनों द्वारा ज्ञान प्राप्त कर लाभ उठाते हैं। पुरातन काल में यह पर्व सामाजिक शिक्षा और धर्म के प्रचार-प्रसार का अत्युत्तम माध्यम था। वर्तमान काल में तो यातायात के साधन बहुत विकसित व सुलभ हैं। लोग सरलता से कुम्भ स्थान पर पहॅुंच सकते हैं जबकि प्राचीन काल में तो लोग पैदल ही लम्बी तथा कष्टकारी यात्रा करके पहुंचते थे। उसके पीछे उनकी अटूट श्रद्धा एवं प्रबल धार्मिक आस्थाएं ही थीं। कुम्भ में जाकर लोग संतों, मनीषियों, विद्वानों और साधुओं की संगत करते थे और सात्त्विक आचरण, सदाचार व लोक कल्याण का पाठ सीखते थे तथा वापिस अपने-अपने क्षेत्रों में जाकर इस परम्परा का प्रचार करते थे।

आज भी यदि हम धार्मिक दृष्टिकोण से न देखकर सामाजिक दृष्टिकोण से देखें तो हमारे समाज ;विशेष कर शहरी समाजद्ध का एक बहुत बड़ा भाग कुम्भ पर्व में सम्मिलित होकर भावी जीवन को सुधारने का प्रयास करता है। कुम्भ में धर्म चर्चा भी होती है और ज्ञान चर्चा भी। वहाॅं से प्रेरणा लेकर लोग अपने जीवन को सही दिशा देकर लोक और परलोक दोनों को ही सुखमय और शान्तिमय बनाने का प्रयास करते हैं। आज जैसा राष्ट्रीय एकता और भावनात्मक एकता का प्रचार हो रहा है वैसा इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। उस समय तो ऐसे मेलों और पर्वों के माध्यम से ही राष्ट्रीय एकात्मकता बनी रहती थी। कुम्भ मेले मूलतः भावनात्मक एकता के ही तो प्रतीक हैं। इन मेलों में बिना किसी भेदभाव के धर्म प्रचार, शिक्षा और वाणिज्य आदि के आदान-प्रदान के अवसर सुलभ होते हैं।

उपनिषदों की महिमा, जीवन दृष्टि-‘मृत्योर्मामृतं गमय’ ही मूलतः कुम्भ के इस लोेक पर्व की आधार भूमि रही है जिसे केन्द्र में लेकर लाखों-लाखों जन अमृतत्व की खोज में उमड़ पड़ते हैं। निश्चय ही कुम्भ हमारी लोक परम्परा का एक ऐसा सनातन पर्व है जिसमें दर्शन, इतिहास, अध्यात्म, ज्योतिष, पुराण आदि के साथ जन-आस्था का समन्वय हो गया है। हमारी पुराण-कथा और लोक पर्व की चिंतन धारा में ‘विष’ और ‘अमृत’ मूलतः मानव जीवन के दो शाश्वत सत्यों ‘जन्म’ और ‘मृत्यु’ को ही तो व्यंजित करते हैं अतः अमृत की प्राप्ति का प्रयास अत्यन्त आवश्यक है। जन्म और मृत्यु के बीच लम्बे अंतराल में ‘जीवन’ होता है। जीवन में उचित एवं अनुचित का और आसुरी एवं दैवीय शक्तियों का लम्बा संघर्ष चलता है। इस संघर्ष का सार अथवा उद्देश्य अमृत प्राप्ति होती है।

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