भारतीय शिक्षा की पुनः प्रतिष्ठा कैसे हो ?

भारतीय शिक्षा की पुनः प्रतिष्ठा कैसे हो ?

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भारतीय शिक्षा की पुनः प्रतिष्ठा कैसे हो, इस पर विचार का आग्रह किया गया है। यहाँ कुछ प्रारंभिक विचार आवश्यक हैं। सर्वप्रथम तो यही विचार आवश्यक है कि वस्तुतः भारत में भारतीय शिक्षा की पुनः प्रतिष्ठा चाहता कौन है? परंतु उससे भी पहले एक विचित्र स्थिति जो भारत में आ गई है, उसका ध्यान आवष्यक है। वह यह है कि यदि यह बात 1947 में कही जाती तो इसका अर्थ बहुत स्पष्ट होता। परंतु 72 वर्षों में भारत में शासन के द्वारा बलपूर्वक शिक्षा के नाम पर मानविकी विद्याओं में अज्ञान और मूर्खता का एक बड़ा ठाठ रचकर बहुसंख्यक नागरिकों पर थोप दिया गया है।

कांग्रेस शासन ने नागरिकों के साथ किया था पक्षपात और भेदभाव – 

यहाँ यह भी ध्यान देने की बात है कि संविधान की मूल प्रतिज्ञा की पूर्ण उपेक्षा करते हुये कांग्रेस शासन ने भारतीय नागरिकों के प्रति खुलेआम पक्षपात और भेदभाव की नीति अपनाई है। संविधान की सरासर अवहेलना करते हुये कांग्रेस ने बहुसंख्यकों को उनकी हजारों वर्षों की महान परंपरा की उपेक्षा करते हुये मानविकी विद्याओं में उन्हें एक ऐसे समाज की तुतलाहट को ज्ञान बताकर पढ़ने को जबरन विवश किया है, जिसके पास इन विषयों में सोच विचार और लेखन का केवल 150 वर्षों का ही टूटा-फूटा अनुभव है और जो ज्ञान की प्रत्येक शाखा में योजनापूर्वक किसी एजेंडे के तहत ही लिखने के अभ्यस्त अभी तक रहे हैं, जिन्होंने सत्य का प्रशान्त चित्त से अवगाहन करने की विद्या आज तक जानी ही नहीं है।

भारतीय शिक्षा की पुनः प्रतिष्ठा कैसे हो?

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दूसरी ओर मुसलमानों, ईसाइयों आदि को उनके वास्तविक अंतर्राष्ट्रीय संदर्भों से काटकर भारत में हिन्दुओं को भरमाया है और इस प्रकार उन्हें विशेष संरक्षण देने का एक बहाना ढूंढ लिया है, अल्पसंख्यक कहकर। जबकि किसी भी अंतर्राष्ट्रीय संस्था या मंच पर इस कसौटी का उपयोग कांग्रेस ने कभी नहीं किया। अन्यथा विश्व की संस्थाओं में हिन्दुत्व ही अल्पसंख्यकों की विद्या और संस्कृति के रूप में विशेष संरक्षण प्राप्त करता। इस प्रकार बहुसंख्यक – अल्पसंख्यक की कसौटी के विषय में भी कांग्रेस ने दोहरे मानदंड अपनाये और अल्पसंख्यक होने के आवरण में इस्लाम की परंपरागत पढ़ाई का पूरा प्रबंध करके उसे विषेष संरक्षण और अनुदान दिया तथा ईसाइयत की परंपरागत पढ़ाई का पूरा प्रबंध करके ईसाई मिषनरी स्कूलों और महाविद्यालयों को भी विषेष संरक्षण और अनुदान दिया।

बहुसंख्यकों को उनके ही ज्ञान से किया गया था वंचित –

यह अनुदान और सरंक्षण भारत सरकार के उस खजाने से दिया गया, जो भारत के नागरिकों के द्वारा दिये जाने वाले कर से संचित कोष है और जिसमें बहुसंख्यकों का स्वाभाविक ही मुख्य योगदान है। दूसरी ओर, बहुसंख्यकों को उनके परंपरागत ज्ञान से बलपूर्वक वंचित किया और उन्हें यूरोप का मानविकी विषयों में कचरा जबरन पढ़ाया गया।  शासन द्वारा षिक्षा और संचार माध्यमों में सोवियत संघ की नकल में पूर्ण नियंत्रण रखने के कारण बहुसंख्यकों का एक बड़ा वर्ग ऐसा तैयार हो गया है जो इस कचरे को ही षिक्षा मानकर इसे ही बटोरने के लिये अपने बच्चों को उत्साहपूर्वक नियोजित करता है और अनुशासित करता है तथा उसी में मगन रहता है।

भारतीय शिक्षा की पुनः प्रतिष्ठा कैसे हो?

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इसीलिये आज भारतीय शिक्षा की पुनः प्रतिष्ठा करने की बात पर वह इसी कचरे को नई शिक्षानीति या नई योजना के अंतर्गत प्रतिष्ठित किये जाने की बात ही करेगा और समझेगा। इसलिये इस कथन में प्रारंभ में ही यह स्पष्टता आवष्यक है कि भारतीय षिक्षा की पुनः प्रतिष्ठा से आशय है भारतीय ज्ञान परंपरा की पुनः प्रतिष्ठा। यहीं पर यह प्रश्न सर्वाधिक महतव का हो उठता है कि भारत में वस्तुतः भारतीय शिक्षा की अर्थात् भारतीय ज्ञान परंपरा की पुनः प्रतिष्ठा चाहता कौन है?

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