आयुर्वेद के अनुसार अदरक के फायदे, और महत्व

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आयुर्वेदाचार्य डा. अलीजाह अमरोहवी का कहना है कि अदरक का प्रयोग प्राचीन काल से चला आ रहा है। इसकी गाँठों और बीज को भारत से ईरान ले जाया गया और ईरान से अबर वासियों में इसके प्रयोग का प्रचलन चल पड़ा। मसाले के साथ-साथ इसकी औषधीय उपयोगिता को भी समझा गया। महर्षि चरक ने सूखे अदरक (सौंठ) को बड़ा लाभकारी और स्वास्थ्य वर्धक बताया हैं विश्व में सर्वप्रथम इसका प्रयोग भारतवर्ष में ही हुआ है। देश की मूल भाषा संस्कृत मानी जाती है जिसमें श्रंग अथवा श्रंगबेर के विकृत रूप में प्रतिपादित किया गया है। श्रृंग का तात्पर्य सींग से लिया गया है क्योंकि अदरक की आकृति सींग जैसी होती है। भगवान राम ने वन गमन के समय एक रात्रि राजा गुह की राजधानी श्रृंगवेरपुर में बिताई थी। श्रृंगबेर अदरक को ही कहा जाता है आज भी श्रृंगबेर कस्बा सैकड़ों वर्षो से अदरक की निर्यातक भूमि के रूप में जाना जाता है। यह इसकी सामान्य सी ऐतिहासिक झाँकी है चूँकि हमारे आयुर्वेदाचार्यो ने अदरक को महाऔषधि की संज्ञा दी है इसलिए इसके गुणों को जानना भी अधिक आवश्यक है।

उड़द, चना, आलू आदि दाल सब्जी वात कपफ प्रधान होती है। यदि इनमें अदरक मिला दिया जाये तो स्वास्थ्य की दृष्टि से अनुकूल हो जाती है। बच्चों के पेट में कृमियों का प्रकोप होने पर अदरक का रस 2-2 चम्मच सुबह-शाम लेने पर एक सप्ताह में ही अपना लाभकारी असर छोड़ता है।

शीतकाल में अदरक गुड़ के साथ मिला कर लेने से शरीर में गर्मी आने लगती है। पेट का दर्द, अपफरा, दमा, गठिया, खांसी में इसके खाने से लाभ मिलता है और कब्ज भी दूर होती है। आवाज के बैठ जाने पर नमक के साथ इसका सेवन करें। अदरक के रस को सपफेद नमक के साथ गर्म पानी में डालकर गरारे करने से एन्फ्रलुएन्जा और गले का दर्द दूर होता है। फ्रलू में ज्वर को उतारने के लिए अदरक के साथ सौंपफ का रस तथा शहद मिलाकर पीने से बुखार उतर जाता है। गन्ने के रस में अदरक का रस मिला कर पीने से भूख लगने लगती है। यदि भोजन से पूर्व नमक मिलाकर अदरक का सेवन करें और भोजन में नींबू लें तो भोजन शीघ्र पच जाता है। अदरक का रस निकालकर उसमें तिल का तेल ;आधी मात्राद्ध मिलाकर पकायें उस तेल से मालिश करने पर गठिया व बाय का दर्द मिट जाता है।

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नजला एक ऐसा रोग है जो रात्रि को ठीक से सोने नहीं देता और असमय मं ही बाल सपफेद कर देता है। अदरक की एक गाँठ में छोटा सा छेद करके काली मिर्च के बराबर हींग भर दें। ऊपर से काला नमक भर कर पान के पत्ते में लपेट दें। ऊपर से गीली मिट्टी की परत चढ़ा कर अंगारों पर तपायें, जब तक पत्ता लाल न हो हटायें नहीं। लाल रंग होने पर ठंडा करके पीस लें छोटी-छोटी गोलियाँ बनाकर सेवन करने से नजले की बीमारी नहीं रहती।

प्याज और अदरक का रस समान मात्रा में पीने से वमन यानी उल्टियाँ रूक जाती है। दूध में 5-10 बूंदे अदरक की मिलाकर बच्चों को पिलाई जाय तो पेट दर्द, अपफारा, गैस आदि नहीं रहती। जुकाम में तुलसी की पत्ती और नमक को अदरक की चाय में पीने से पुदीना, नींबू और शहद मिला कर लेने से गले की खराश दूर होती है। खांसी में अदरक के रस को गुनगुना करके मधु के साथ सेवन करें। अदरक के रस को गुनगुना करके कान में डालें तो कान का दर्द नहीं रहता। सुबह और शाम अदरक का रस 20 मि.ली. की मात्रा में शहद के साथ लेने से शरीर का दर्द मिट जाता है।

पतले दस्त के रोगी को चित्त लिटाकर उसकी नाभि के चारों तरपफ उड़द के आटे का लेप करने के बाद अदरक का रस भर दें एक घंटे के भीतर ही दस्त रूक जायेगा। नाक बंद होने पर अदरक का रस एक चम्मच आधा चम्मच शहद के साथ चार दिन तक सेवन करने से नाक खुल जाती है। घुटनों में दर्द होने पर अदरक का रस एक चम्मच और आधा चम्मच घी मिलाकर लेने से लाभ होता है। अपस्मार रोग में रोगी दर्द की वजह से बेहोश हो जाता है ऐसी स्थिति में 25 मि.ली. अदरक का गर्म रस लेने से बेहोशी हट जाती है। जुकाम होने पर कपड़े से छाना हुआ अदरक 20 मि.ली. की मात्रा में उतनी ही मात्रा शहद की लेने से जुकाम ठीक हो जाता है।

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अदरक का एक टुकड़ा मुँह में रखने से कपफ निकल जाता है। कान में दर्द होने पर अदरक का रस, शहद और थोड़ा सा नमक मिला कर सहता हुआ गर्म करके डालने से दर्द बंद हो जाता है। सर्दियों में इसका सेवन विशेष लाभकारी होता है। स्मरण रहे गर्म वस्तुओं से हानि वाले लोगों को अदरक सेवन नहीं करना चाहिए। खुजली तथा किडनी के रोगी भी इसका प्रयोग न करें। अदरक को शहद के साथ प्रयोग करने से खांसी, दमा और यकृत के रोग मिटते है। अदरक को भूनकर खाने से पेट दर्द बंद हो जाता है।

भोजन से पूर्व अदरक को संेधा नमक के साथ लेने से जीभ और कण्ठ भी सापफ होता है और मुँह का जायका भी बन जाता है। अदरक के रस में दूध मिलाकर सूँघने से सिर दर्द दूर हो जाता है। बादी के दर्द में अदरक का रस अजवाइन के साथ लेने से रोग भागता है। कागजी नींबू के साथ अदरक को नमक मिला कर खाने से बदहजमी मिटती है और अदरक को घी में भून कर खाने से अपफारा मिटता है। मुंह से बार-बार गंदा थूक निकलने पर अदरक का सेवन बड़ा लाभकारी होता है। 25 ग्राम अदरक को बारीक कतर कर एक टुकड़ा गुड़ के साथ आग पर रखें। दोनों को मिलाकर एक-एक चम्मच लेने से कपफ युक्त खांसी को दूर करता है।

पतले दस्त आने लगे तो एक कप गर्म पानी में अदरक का रस मिला कर लेने से दस्त रूक जाते है। अदरक का रस मधु के साथ समान मात्रा में लेने से खांसी नहीं रहती और आवाज भी सापफ हो जाती है। उल्टी रोकने के लिए अदरक के एक चम्मच रस में थोड़ी मात्रा में सेंधा नमक और काली मिर्च मिला कर लेना लाभप्रद होता है। अदरक के बारीक टुकड़े चूसने से हिचकी बंद हो जाती है।

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आयुर्वेदशास्त्रा में एक स्थान पर लिखा है-‘वात पित्त कपफे भानां, शरीरवन चारिणाम्। एक एव निहन्त्पत्रा लवणार्द्रककेसरी’ अर्थात वात, पित्त और कपफ रूपी हाथी जो शरीर रूपी वन में विचरण करते पिफरते है उनको मारने के लिए एक ही महापराक्रमी लवणयुक्त अदरक रूपी सिंह है। सौंठ का गीला स्वरूप अदरक कहलाता है। इसके औषधीय गुणों को ध्यान में रखते हुए ही ऋषियों ने इसे ‘रसायन’ की श्रेणी में स्थान दिया है। जन साधारण के मन-मस्तिष्क में एक ही मान्यता घर कर चुकी है कि गर्म पदार्थ के सेवन से वीर्य में पतलापन आता है और शरीर में उत्तेजना बढ़ाता है किन्तु इस तथ्य को भी भूलना नहीं चाहिए कि जितने भी पाचक पदार्थ होते है उनमें उष्णता का होना स्वाभाविक ही है। ग्रहण की गयी वस्तु से सर्वप्रथम रस, रक्त आदि सात धातुओं का निर्माण होता है। तत्पश्चात ही वीर्य का नम्बर आता है।

अदरक वीर्य को गाढ़ा बनाता है और यौनांग को ऊष्मा-ऊर्जा से भर देता है इसलिए तो )षियों ने इसे भोजन का आवश्यक अंग माना है। संयमशील जीवन रीति-नीति अपनाने वाले को ओजस्वी-तेजस्वी भी बनाता है। कुछ लोगों का भ्रम है कि च्यवनप्राश, शिंगरपफ और शिलाजीत ही धातु बनाने में सपफल होते हैं। ये तो मात्रा पाचक औषधि के अन्तर्गत आते है। अदरक का एक नाम सच्छाक भी हैं जो शाक-सब्जियों से मिलाकर खाने से स्वास्थ्य के लिए अत्यधिक लाभकारी है। महर्षि चरक ने तो इसे वृष्य यानी साँड जैसी मर्दानंगी का प्रतीक बताया है।

पेट बढ़ने को रोकने के लिए 10 ग्राम अदरक को बारीक काटकर घी में भूनकर रोटी के साथ खाने से पेट बढ़ना बंद हो जाता है। गर्मी के दिनों में नींबू-नमक के साथ अदरक के प्रयोग से कमर दर्द मिटता है। चोट से कोई अंग कुचल जाता है तो उस भाग पर 2 से.मी. मोटा अदरक का लेप लगाने से दर्द कम हो जाता है। हाथ-पैर सूखने में अदरक के तेल की मालिश बड़ी लाभकारी होती है। अदरक का ताजा रस जलोदर रोग में बड़ा गुणकारी है। 50 ग्राम की मात्रा में अदरक का रस निकाल कर उसमें उतनी ही मात्रा मिश्री की मिलाकर लेते रहना चाहिए। योनि की खुजली होने पर अदरक का रस लगाने से मिट जाती है। कब्ज के रोगियों को अदरक की लम्बी पफांके गुड़ के साथ लेने से पेट सापफ होता है।

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अदरक का तेल बनाने के लिए अदरक का रस, तिल का तेल और दूध को 1ः2 के अनुपात में उबाल कर बनाया जाता है जो बच्चों के सूखा रोग और अशक्त अंगों पर मालिक करने के लिए बड़ा ही उपयोगी साबित होता है। चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ने पर अदरक का रस सांयकाल सोते समय चेहरे पर मल लें और प्रातः चेहरे पर मल लें और चेहरे को धोकर थोड़ा सा नारियल का तेल मलने से चेहरा चाँद जैसा खिल जाता है। आँत उतरने को हार्निया रोग कहते है। जिसमें अण्डकोष की थैली में विशेष पीड़ा होने लगती है। पेट और अण्डकोशों के चारों तरपफ सौंठ तथा अरण्ड की जड़ की छाल पीस कर गुनगुना लेप करने से लाभ मिलता है।

मसूढ़ों की बीमारी में एक चम्मच अदरक का रस एक कप गुनगुने पानी में मिलाकर मुँह भर कर कुल्ले करने जैसी मुद्रा में पी जायें। दिन में 3-4 बार इस क्रिया को करने से मसूढ़ों की सूजन, टीस और स्राव बंद हो जाता है। पफालिज मारने पर अदरक के मुरब्बे का प्रयोग करें तथा जायपफल को हर समय मुँह में रखे रहने से रोग नहीं रहता। अदरक को आग में भून कर खाने से जुकाम नहीं रहता। नाक बंद होने पर अदरक की आधी गांठ जल मंे उबालें और चुल्लू में लेकर नथुनों में गरारे करें। अदरक की थोड़ी गर्म पुल्टिस बांधने से गर्दन का दर्द बंद हो जाता है।

त्वचा के ऊपर कभी-कभी ददोरे निकल आते हैं जिनकी वजह से शरीर में खुजली मचने लगती है। गाय के दूध के साथ अदरक लेने से खुजली नहीं रहती। शौच कृमि दिखने लगें तो 250 ग्राम अदरक पिचे हुए गन्ने का पुराना सिरका 50 मि.ली., काला नमक 10 ग्राम और 10 ग्राम लहसुन मिलाकर भोजन के समय चटनी की तरह प्रयोग करने से पेट के कीड़े मर जाते है और पेट का तनाव भी नहीं रहता।

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सौंठ शरीर के लिए ही नहीं मस्तिष्क की स्मृति बढ़ाने के लिए भी लाभकारी होती है। इसके भीतर एक पीला तथा तिक्त पदार्थ पाया जाता है। जिसे ‘जिंजरोल’ के नाम से जाना जाता है। यह दो प्रकार का होता है। एक सटवा और दूसरी पेटी की। आयुर्वेदशास्त्रा में सटवा सौंठ को अधिक उत्तम बताया गया है। यह रूचिकर, आमवात नाशक, चरपरी, पाचक, स्निग्ध, हलकी, कपफ, वातनाशक होती है। यह वमन, श्वास, दर्द, हृदय रोग, बवासीर और उदर रोगों का नाश करने वाली है। इसमें अग्नि तत्व की प्रधानता से जलांश का शोषण करती है। पाण्डु रोग, संग्रहणी और पित्त रोग को भगाती है। सौंठ के प्रयोग से माँ के स्तनों का दूध अधिक बनता है। खांसी, जुकाम, न्युमोनिया तथा तपैदिक रोग में भी बेजोड़ औषधि का काम करती है। शरीर के भीतर से विषैले तत्वांे को निष्कासित करती और अमृत तुल्य सि( होती है जिससे मनुष्य जीवन पर्यन्त आरोग्य लाभ उठाता है।

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