शाहजहाँ की क्रूर संतान औरंगजेब, जिसने अपने भाई दारा शिकोह को भी मार दिया

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जिस पड़ाव पर हम पहुँच गये हैं, कहाँ शाहजहाँ का अकेला रास्ता समाप्त होता है और उसके लड़कों के चार रास्ते आरम्भ हो जाते है। इसके आगे उस शक्तिशाली परन्तु अभागे सम्राट का इतिहास सन्तान के इतिहास में लुप्त हो जाता है। अवसर आ गया है कि हम पिता को आच्छादित कर देने वाली सन्तान का परिचय प्राप्त करें और देखें कि किस प्रकार एक सम्राट-शक्ति कई शाखाओं में विभाजित हुई और किस प्रकार इस शक्ति-विभाग ने साम्राज्य का सर्वनाश किया। यों तो शाहजहाँ की कई संताने हुई, परन्तु उनमें छह ही ने इतिहास के क्षेत्र पर अपने पदचिह्न छोड़े हैं। उन छह में से चार लड़के थे और दो लड़कियां।

लड़कों के नाम निम्नलिखित हैं-

  1. दाराशिकोह
  2. औरंगजेब
  3. शुजा
  4. मुरादवस

एक लड़की का नाम था जहाँनारा और दूसरों का रोशनारा था। दारा शिकोह सबसे बड़ा था वह देखने में सुन्दर, डोलडौल का जवान और प्रतिभा सम्पन्न था। वह अपने पिता का दुलारा और तबीयत का उदार था। बचपन से ही शाहजहाँ ने उसे अपने पास रखा। जब जहाँगीर शाहजहाँ से बहुत नाराज हुआ, तो उसने नेक चलनी को जमानत के तौर पर दारा शिकोह और औरंगजेब को अपने पास रखा। वह बेचारे दादा की मृत्यु पर ही अपनी माता से मिल सके।

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इतिहास लेखक ने लिखा है कि अपने बिछुड़े हुए धन को प्राप्त करके मुमताज बेगम खूब रोई। पढ़ने-लिखने में दारा की बुद्धि खूब चलती थी उसके धार्मिक विचार अकबर की शैली के थे उसके अनुशीलन का क्षेत्र बहुत विस्तृत था। उसकी मानसिक विशालता का इससे बढ़कर क्या सबूत हो सकता है कि जहाँ उसने इस्लाम की शिक्षा सरमद नाम के मुसलमान फकीर से प्राप्त को, वहाँ हिन्दू योगी कालिदास के चरणों में बैठ कर वेदान्त की शिक्षा का भी लाभ उठाया। जहाँ उसने एक ओर बाइबिल के पुराने और नये अहमदनामों का मनन किया, वहाँ उपनिषदों का भी गहरा अनुशीलन किया। इस्लाम और हिन्दू धर्म दोनों ही में उसे सच्या का अंश दिखाई देते थे और इसी आशय को प्रकट करने के लिए उसने ‘मजमुआ-ए-बाहरियान’ के नाम से एक ग्रन्थ लिखा।

पण्डितों की सहायता से दारा ने उपनिषदों का फारसी अनुवाद भी तैयार किया था। उसके कराये हुए पचास उपनिषदों के फारसी अनुवाद का नाम ‘सिर उल-असरार’ था। बावा लाल दास से दारा की जो ज्ञान-गोष्ठी होती थी उसका संग्रह ‘बाबा लाल दास से बातचीत’ के नाम से प्रकाशित किया गया। मुसलमान सन्तों की जीवनियों के संग्रह का नाम ‘सफीनत-उल औलिया’ रख गया था। दारा का विशेष धर्मगुरु मियाँ मीर का जीवन चरित्र ‘सकीनत-उल-औलिया’ के नाम से प्रकाशित किया गया था। इस प्रकार दारा का धार्मिक स्वास्थ्य और उसकी प्रेरणा से लिखी गई पुस्तकों से सिद्ध होता है कि जहाँ वह विश्वासों में मुसलमान था, वहाँ उसकी दृष्टि सच्चाई का अन्वेषण इस्लाम के दायरे से बाहर भी कर सकती थी। वह धार्मिक दृष्टि से अकबर का शिष्य था।

चारों भाई एक ही माता के पुत्र थे। दारा उनमें बड़ा था। इस कारण स्वभावत: राज्य का उत्तराधिकारी वही था। शाहजहाँ ने उसी को युवराज पद का अधिकारी मान रखा था। इसमें कोई अन्याय या पक्षपात की बात भी प्रतीत नहीं होती। अनेक झगड़े के होते हुए भी हरेक देश और हरेक ऐसी जाति में जहाँ वंशानुक्रम से राजगद्दी का अधिकार प्राप्त होता हो, वहाँ बड़ा पुत्र ही स्वाभाविक अधिकार समझा जाता है। शाहजहाँ और उसके दरबारी-सभी लोग दारा को भावी सम्राट् समझते थे और उसका विशेष आदर करते थे। इसके साथ ही यह कह देना भी आवश्यक है कि दारा शिकोह अपने पिता की सेवा अनन्य-भाव से करता था। यदि शाहजहाँ उसे अपने समीप रखना चाहता था, तो दारा उसे आराम पहुँचाने में कोई कसर न छोड़ता था हम दारा को हरेक कष्ट में बूढ़े पिता को कंधे का सहारा देते हुए पाते हैं।

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शाहजहाँ ज्यों-ज्यों आयु और भोग के कारण शिथिल होता गया. त्यों-त्यों उसे लाठियों के सहारे की आवश्यकता होती गई। दाराशिकोह यूके की लाठिया बन गया। लाठियों को हमेशा बूढ़े के पास रहना पड़ता है, दारा भी प्रायः दरबार को ही सुशोभित करता था वह इलाहाबाद, पंजाब और मुल्तान जैसे धन-धान्य पूर्ण प्रान्तों का सूबेदार बनाया गया, परन्तु उसे कभी सूबे में जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी। वह अपने प्रतिनिधियों द्वारा हो शासन करता था। स्वयं उसका केन्द्र आगरा या दिल्ली में ही रहता था।

साम्राज्य में दारा शिकोह का स्थान शाहजहाँ से दूसरे दर्जे पर था। आयु में तीसरा परन्तु महत्व में दूसरा भाई औरंगजेब संसार के उन विशेष पुरुषों में से है, जो अपने मित्र द्वारा एक विशेष दग का नमूना स्थापित कर गया है। यह महान था, उसके गुण भी महान थे, उसके दोष भी महान् ये। उसके चरित्र के गुण दोषों का विस्तृत विवरण इस पुस्तक के दूसरे भाग में पाया जायेगा औरंगजेब का चरित्र भारत के इतिहास पर ही नहीं, इस्लाम के इतिहास पर और संसार के इतिहास पर अपना सिक्का छोड़ गया है।

यहाँ हम उस चरित्र का सम्पूर्ण चित्रण नहीं करना चाहते। यहाँ हमें केवल इतना निर्देश करना है कि सम्राट औरंगजेब का चरित्र कई अंशों में सम्राट् के अनुकूल, परन्तु कई अंशों में भिन्न था। अवस्थाओं ने उसमें बहुत से परिवर्तन कर दिये थे। इतना होते हुए भी हम निश्चयपूर्वक कह सकते हैं कि सम्राट औरंगजेब रूपो महावृक्ष शाहजादा औरंगजेब रूपी बीज में विद्यमान था। शाहजादा औरंगज़ेब देखने में बहुत सुन्दर नहीं था, परन्तु गठीले शरीर का था।

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उसे शारीरिक व्यायाम और युद्ध-कला के अभ्यास का शौक था। पढ़ने-लिखने में उसकी बुद्धि यद्यपि विशाल नहीं थी, परन्तु खूब प्रखर थी। उसकी विशेष अभिरुचि इस्लाम के मजहब साहित्य की ओर थी। कुरान और हदीस उसे खब उपस्थित थे। अरबी और फारसी बोलने में वह उन भाषाओं के पण्डितों को मात करता था। कहते हैं कि उसने हिन्दी भी पढ़ी थी। तुर्की भाषा का भी उसने अभ्यास किया था। शेख सादी की कविता को कण्ठस्थ थी। इस प्रकार अनुशीलन की शक्ति और अभिरुचि रखते हुए भी यह कहना अनुचित नहीं है कि उसका शिक्षण एक दफा था। उसके हृदय का संस्कार एक ही से वातावरण में हुआ था उसकी साधारण प्रवृत्ति इस्लाम के मजहब साहित्य की ओर थी। कुरान से उतरकर यदि उसे किसी किताब का शौक था, तो वह कुरान की टीका थी।

बचपन से ही उसे ललित-कला की ओर से गुणा थी। चित्रकारी को वह पाप समझता था। संगीत तो कुफ्र था ही यद्यपि उसने राज्याधिकारी बनकर कई इमारतें बनवाई हैं, तो भी वह इतनी साधारण हैं कि हम यह कहने में कोई अत्युक्ति नहीं करते कि रचना के सौन्दर्य का उसे कोई शौक नहीं था। कविताओं को आश्रय देना या सुन्दर कविता सुनकर इनाम देना उसकी प्रकृति के विरुद्ध था। इतना होते हुए भी हमें बाल्य और यौवन काल में औरंगजेब सर्वथा रस्ता नहीं प्रतीत होता।

शेख सादी और ऐसे ही अन्य बहुत से फारसी कवियों विहान की कवितायें उसने कण्ठस्थ कर ली थी। इसके अतिरिक्त ‘हीराबाई और औरंगजेब का मोहित होना, और फिर उसे अन्तःपुर में रखना उसके उस नीरस और कठोर चरित्र के साथ मेल नहीं खाथा, जो हम साम्राज्य के धुरन्धर होने की दशा में देखते हैं। औरंगजेब की माता की यहिन का पति मीर खलील बुरहानपुर का शासक था। जय शाहजाद दक्षिण की सूबेदार बनकर औरंगाबाद की ओर को जा रहा था, अपनी मौसी से मिलने के लिए बुरहानपुर में ठहरा।

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वहाँ बारा में टहलते हुए उसने मौसी की अनुचारियों में एक किशोरी को देखा जो देखने में सुन्दरी और हाव-भाव में चंचल थी। जब वह किशोरी राजकुमार के सामने से गुजर रही थी, तब आमों से लदे एक पेड़ के पास जाकर उछलकर फल तोड़ने लगी। आमोद और यौवन के कारण उसका अंग अंग नाच रहा था। औरंगजेब घायल हो गया और देर तक वहीं मोह को अवस्था में खड़ा रहा। जब मौसी को लड़के की दुरवस्था का पता लगा तो उसने अपने पति से चर्चा की। वह किशोरी मीर खलील की गुलाम थी। उसका नाम मीराबाई थी।

मीर खलील ने औरंगजेब की प्राणरक्षा का दूसरा उपाय न देखकर हीराबाई का छत्र बाई नाम की औरंगजेब की एक गुलाम कन्या के साथ बदल लिया। शाहजादे पर उस गायिका का ऐसा जादू चला कि कुछ समय के लिए अपने इस्लाम और महत्वाक्षाओं को भूलकर शृंगार-रस में मग्न हो गया कहा जाता है कि हीराबाई उर्फ जायद की मधुर प्रेरणा से यह शराब तक पौने को उद्यत हो गया था। यह मानना कठिन है कि औरंगजेब एकदम रसविहीन शुष्क काष्ठ ही था।

यदि राजनीतिक आवश्यकतायें उसे कट्टर मुल्ला बनने पर बाधित न कर देती, तो सम्भव है उसका हृदय इतना ऊपर न होता। बचपन से युद्ध-विद्या और शारीरिक व्यायाम का उसे शौक था। डर किस चिड़िया का नाम है, यह उसे विदित ही नहीं था। यचपन को एक पटना औरंगजेब की निर्भया को कब सूचित करती है। २८ मई १६३३ ई० की बात है। शाहजहां को अन्य सभी मुगल बादशाहों की तरह हाथियों की लड़ाई देखने का शौक था। उस रोज सुधाकर और सूरत-सुन्दर नाम के दो मस्त हाथियों को आगरे के किले के नोचे भिड़ाया गया दोनों हाथी लड़ते-लड़ते कुछ दूर चले गये।

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द्वन्द्र-युद्ध को समीप से देखने के लिए शाहजहाँ अपने आसन से उठकर युद्ध स्थल की ओर चला। उसके पीछे तीनों बड़े लड़के भी थे लड़ते-लड़ते दोनों नर पर्वतों को दम चढ़ गया। दम लेने के लिए दोनों कुछ कदम पीछे को हट गये सुधाकर नाम का हाथी, जिधर दम ले रहा था, औरंगजेब का घोड़ा उधर ही को बढ़ गया या फिर क्या था, सुधाकर जोश में था ही, भयंकर चिंघाड़ के साथ शाहजादे औरंगजेब पर टूट पड़ा। औरंगजेब उस समय केवल १४ वर्ष का था।

दूसरा कोई होता तो उस पिशाच से भागकर जान बचाने की कोशिश करता, परन्तु औरंगजेब ने अपने घोड़े की लगाम को संभालकर मस्त हाथी पर ने का वार किया। हाथी नेजे की चोट खाकर और भी प्रचण्ड हो उठा और उसने अपनी सूंड के वार से औरंगजेब के घोड़े को गिरा दिया। उपस्थित जनता में हाहाकार मच गया। शाहजहाँ ने अपने सब सरदारों को शाहजादे की मदद करने के लिए ललकारा। हाथी को डराने के लिए बारूद के गोले छोड़े गये। राजकुमार शुजा लोहे को बढ़़ाकर हाथी पर वार करना चाहता था कि हाथी ने सड आपात से सवार और घोडा दोनों को नीचे पटक दिया।

चारों और पुराने और जास का दूश्य उपस्थित हो गया. परन्तु निश्चित, गम्भीर और वीर राजकुमार घोड़े पर से कूदकर अलग जा खड़ा हुआ और म्यान से तलवार निकालकर हाथी को रोकने का पल करने लगा। इतने में महाराजा जयसिंह ने आगे बदकर सुनकर पर नेजे का भरपूर कार किया। उधर सूरत-सुन्दर भी दम लेकर ताजा हो चुका था। उसने भयंकर ध्यनि के साथ सुधाकर पर वार किया। नेजे को चोट, गोलों की आवाज और उस पर सूरत सुन्दर का धावा इन तीन चीजों को सहने में असमर्थ होकर सुधाकर मैदान छोड़कर भाग निकला।

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इस प्रकार औरंगजेब ने बचपन में उस अदम्य साहस का परिचय दिया, जो अगले जन्म में उसका साथ देने वाला था। समय के साथ औरंगजेब के निर्भय साहस में वृद्धि हो हुई, अवनति नहीं। जिस समय औरंगजेब बला की लड़ाई में शत्रुओं से गिर गया था, उस समय की पटना है कि युद्ध होते-होते साँझ हो गई नमाज का समय आ गया। चारों ओर तीर और गोले बरस रहे थे और बहादुरी की लाशें गिर रही थीं। बोच में औरंगजेब घोड़े पर से उतरता है और भूमि में कपड़ा बिछाकर शान्ति पूर्वक नमाज पढता है विरोधी सेनापति ने जिस समय यह देखा, उस समय उसके मुँह से अकस्मात यह शब्द निकले कि “जो आदमी युद्ध के घोर निनाद में इस प्रकार नमाज पढ़ सकता है, उससे लड़ने का य्न करना पागलपन है।”

यही साहस था, जिसने राजधानी के लिए भाइयों की परस्पर लड़ाई में औरंगजेब को विजय बनाया। संग्राम हो रहा था दिल्ली की राजगदी बाजी पर रखी हुई थी। यह निश्चय हो रहा था कि भारत का सम्ाट् दारा शिकोह बनेगा या औरंगजेब। जयश्री हाथ से फिसलती दिखाई देती थी, अपनी सेनाओं के दिल टूट रहे थे, ऐसे समय में औरंगजेब न हाथी से उतरता है और न हाथी का मुँह फेरता है यह अपने हाथी के पाँव जंजीरों से बांध देता है, ताकि वह दुश्मन के वार से पवड़ाकर पीठ न दिखा दे। वह साँकलें, इस संकल्प का चिह थी कि या तो जोतकर राजगद्धो पर बैठेंगे और या इसी स्थान पर मर जाऊंगा।

सिपाहियों ने जब बादशाह के हाथी को हिमालय की तरह स्थिर और अटल देखा तो उनके डूबते हुए हृदय तैर उठे। कायरों के दिलों में वीरता का प्रवेश हो गया और ये इतने जोर से लड़े कि शत्रुओं के पाँव उखड़ गये। जयश्री और राज्यश्री ने साथ हो साथ औरंगजेब का आलिंगन किया। इन सब गुणों के साथ-साथ औरंगजेब में का बड़े दोष भी थे। हम देख चुके हैं कि उसको धार्मिक परिधि संकुचित यो, उसकी मानसिक शक्तियों में तीव्रता या, पन्त उदारता का कवर्धा अभाव था। तीखापन चा परन्तु फैलाय नहीं था। यह अनुदारता जीवन के प्रत्येक भाव में प्रकट होती थी। यह बचपन से ही कट्टर मुसलमान था।

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ज्यों ज्यों आयु बढ़ती गई त्यों-त्यों कट्टरपन में भी वृद्धि होती गई। हम आगे देखेंगे कि उस कट्टरपन की धार को राजनीतिक आवश्यकताओं ने खुच पैना किया-इतना पैना किया कि सब गुण एक हो दोष से आच्छादित हो गये, परन्तु वह दोष यो रूप में पहले से ही विद्यमान था।

एक कट्टर-से-कट्टर धार्मिक पुरुष दूसरे के धर्म के लिए उदारता का विचार रख सकता है। धर्म ऐसी यस्तु नहीं है कि वह ददय की खिड़की को सहानुभूति या सहिष्णुता के पवित्रतापन के लिए बन्द कर दे। धर्म का लक्ष्य हृदय को विशाल और विचारों को उदार बनाना है। ऐसा पवित्र धर्म जय किसी संकुचित और अनुदार पात्र में पड़ जाता है, तो दो में से एक परिणाम अवश्य होना चाहिए। या तो पात्र की अनुदारता नष्ट हो जाएगी और या धर्म अपने असली रूप को खोकर भयानक प्रलयाग्रि का रूप धारण करेगा।

धर्म को अधिकता से प्रथम तो मनुष्य देवता बन जायेगा, परन्तु यदि किसी प्रबल विरोधी स्वभाव के कारण यह सम्भव हो, तो धर्म मजहबी पागलपन के रूप में परिणत होकर अपने धारण करने वाले को राक्षस बनाकर छोड़ेगा यह एक आग है, जो या तो सोने को तपाकर विशुद्ध कर देगी, या हरे-भरे उद्यान को जलाकर राख कर देगी। औरंगजेब का इस्लाम उसके स्वभाव दोष के कारण अमृत न बनकर विप बन गया। उसके लिए इस्लाम से प्रेम का अर्थ था-हिन्दू धर्म से घृणा, हिन्दू जाति से घृणा और हिन्दू इमारतों से घृणा। राजनीतिक आवश्यकताओं के कारण इस घृणा का विस्तार इतना बढ़ा कि औरंगजेब उन लोगों से भी घृणा करने लगा जो मुसलमान होते हुए भी काफिरों से घृणा न करे भीरे धीरे औरंगालेय की दृष्टि ‘मुसलमान’ का लक्षण ‘काफिर से घृणा करने वाला’ और

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‘काफिर’ का लक्षण ‘काफिर से घृणा न करने वाला’ यह हो गया। यौवन में ही हृदय की यह अनुदारता रंग लाने लगी चौ। बुन्देला युद्ध में १७ वर्ष का शहजादा औरंगजेब मुगल-सेना का सेनापति बनाया गया पीछे से स्वयं शाहजहाँ भी उस युद्ध में पाच गया था यह शाहजहाँ, जो सामान्यतः राजकार्य में धर्मगत भेद को कभी आगे नहीं बनने देता या गोंड-देश के जप के समय के अपने लाहके के आपर को न रोक सका। औरंगजेब की प्रार्थना पर शाहजहाँ दतिया और ओरछा का निरीक्षण करने गया। उस समय इस्लाम को विजय को प्रमाणित करने के लिए बुन्देल-नरेश वीरसिंह देव के लाल मंदिर की छोड़ कर उसके स्थान पर मस्जिद बनाई और यह औरंगजेब का इस्लाम प्रचार के क्षेत्र में प्रवेश-संस्कार था।

उसकी मानसिक प्रगति की सूचना निम्नलिखित चित्रों से मिल सकती है, जो उसने दक्षिण के दूसरी बार के शासन के समय में प्रधान वजीर सादुल्ला को ली थी हम उक्त चिट्ठी का कुछ भाग सर जदुनाथ सरकार की ‘औरंगजेब की जीवनी के प्रथम भाग करते है बिहार शहर के कान को ब्राह्मण बोल राम ने रसूल के बारे में कुछ अनुचित शब्दों का प्रयोग किया था हकीकत के बाद बादशाह की आज्ञा से, जुल्फिकार खां और अन्य अफसरों ने उसे फांसी पर चढ़ा दिया था।

जय मुझे मुल्ला मुहन ने लिखा है कि उस काफिर के रिश्तेदारों ने सदर आला ।ord Justice शेख महम्मद मौला, और प्रधान काजी (Ecclesiastical Judge) शेख अब्दुल गनी के विरुद्ध बादशाह के पास अपील की है। मैं तुम्हें याद दिलाना चाहता हैँ कि हरेक मुसलमान का फार्म है कि वह इस्लाम के कानून की हिफाजत करे और बादशाहों का फर्ज है क यह उलमा को इस्लाम के कानून को प्रचलित करने में सहायता दें। तुम्हें चाहिए कि तुम इन काफिरों के लिए अपील का रास्ता बंद कर दो और मुसलमानों को सफाई पेश करने में मदद दो।

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इस चित्र का अभिप्राय स्पष्ट है। सम्राट औरंगजेब शहजादा औरंगजेब में सूक्ष्मरूप से विद्यमान था। अनर्थ करने की इच्छा और प्रवृत्ति विद्यमान ही, न्यूनता थी केवल अवसर की।

हृदय की संकुचिता या अनुदारता ऐसी वस्तु नहीं है कि वह एक दिशा में जाय और दूसरी दिशा को छोड़ दे। वह एक व्यापक दोष है जो मनुष्य जीवन के हरेक अंग को व्याप्त कर लेता है। यही नहीं कि औरंगजेब के हृदय कपाट हिन्दुओं के लिए इन्द्र थे. वह अपने रिश्तेदारों और बाद में अपने पुत्रों तक के लिए बन्द हो गये थे ‘अविश्वास औरंगजेब का मूल मन्त्र था। वह १७ वर्ष की यूपी में सरकारी ओहदे पर आसीन हुआ। उस समय से लेकर राजगद्दी पर बैठने की दशा वक शाहजहाँ ने उसे किसी न किसी कैंची ओहदे पर स्थापित किया। बुन्देलखण्ड के बाद यह दक्षिण का सूबेदार हुआ। फिर उसे मुल्तान का सूर्या देकर कन्दहार की विराट सेना का प्रधान सेनापति बनाया गया यहाँ विफलता मिलने पर भी उसे दक्षिण के विस्तृत सूर्य का शासक नियुक्त किया गया।

इस प्रकार शाहजहाँ ने से विश्वास के ऊँचे से ऊँचे पद दिये, परन्तु औरंगजेब की गिरनार यही शिकायत रही है मुझ पर विश्वास नहीं करता क्योंकि दुश्मनों के हाथ में है।” बादशाह भाइयों में से शुजा और मुराद छोटे थे वह शक्ति और पदवी में भी कम थे। इस कारण यौवन में औरंगजेब की घोर ईष्या की मार से बचे हुए थे, परन्तु बड़े भाई दारा शिकोह के साथ उसका ३ और ६ का सा सम्बन्ध था। औरंगजेब दारा को अपना घोर शत्रु समझता था। पत्र व्यवहार में वह कभी बड़े भाई का नाम नहीं लिखता था। यदि उसकी ओर कभी निर्देश करना अभीष्ट होता था तो ‘दुश्मन’ शब्द से ही करता था। शाहजहाँ के सम्बन्ध में उसे सबसे बड़ी शिकायत यह थी कि वह दारा से अधिक प्रेम करता था दारा उस में सब भाइयों में बड़ा था, वह राज्य का स्वाभाविक उत्तराधिकारी था।

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उसके साथ ही प्रतीत होता है कि वह पिता तथा अन्य सम्बन्धियों से गहरा प्रेम रखता था। इन कारणों से शाहजहाँ का झुकाव उसकी ओर अधिक था। औरंगजेब स्वभाव से विश्वास था। वह सदा यह समझता रहता कि शाहजहाँ को दारा बहकाता है। पिता और पुत्र का परस्पर पत्र-व्यवहार पढ़कर आश्चर्य होता है औरंगजेब पिता से हमेशा बेरुखेपन की और पक्षपात की शिकायत करता था और शाहजहाँ भी प्राय: औरंगजेब का मजाक उड़ाता या उसे झाड़ता रहता था। दोनों बेटों के प्रश्न झगड़े के कारण दरबार में और घर में रात-दिन कलह पैदा न हो, इसका उपाय शाहजहाँ ने यह किया कि दोनों शेरों को जुदा-जुदा पिंजरों में बन्द कर दिया। दारा शिकोह का दरबार में रखकर और औरंगजेब को कार्यक्षेत्र में भेजकर स्नेही पिता ने समझा कि उसने विकट घरेलू समस्या को हल कर दिया है, परन्तु यह उसकी भूल थी औरंगजेब शुजा नहीं था, कि दूरस्थ प्रान्त में गुम होकर बैठ जाता।

वह दक्षिण में हो या मुल्तान में, दरबार की एक-एक खबर का पता रखता था। उसके गुप्तचर आगरे और दिल्ली की चिट्ठी नियमपूर्वक भेजते रहते थे बादशाह की छोटी-से छोटी आज्ञा के वह गुप्त अर्थ निकालता था। उसकी तीक्ष्ण प्रतिभा बादशाह की प्रत्येक चाल में दारा के हाथ को तलाश कर लेती थी। कभी वह शिकायत करता था कि “मेरी सिफारिश पर बादशाह किसी अच्छे पदाधिकारी को नियुक्त नहीं करते।” कभी वह रोना रोता था कि “दाराशिकोह के लड़कों को जितना आदर प्राप्त हो रहा है उतना भी मुझे प्राप्त नहीं होता” बहुत दिनों तक बाप-बेटे में इस झगड़े पर गर्मागर्म पत्र-व्यवहार चला कि दक्षिण के सूखे के शासन का खर्च शाही खजाने से दिया जाय या नहीं।

औरंगजेब का कथन था कि क्योंकि दक्षिण का प्रान्त नया है और अधिकांश ऊसर है, इस कारण उसके शासन व्यय का कुछ भाग उपजाऊ क्यों से मिलना चाहिए। शाहजहाँ चाहता था कि प्रत्येक प्रान्त अपना खर्च स्वयं चलाये। यह विवाद वर्षों तक चलता रहा। इस प्रकार वाद-विवाद से बादशाह की तबियत रखी गई और वह औरंगजेब से लड़ने लगा। एक बार तो मामला यहाँ तक बढ़ा कि औरंगजेब का दरबार में

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आना बन्द कर दिया गया। दारा पिता का प्यारा और सल्तनत का दुलारा होने के कारण अतुल सम्पत्ति का स्वामी था। उसने आगरे में नया महल बनवाया। माल के तैयार हो जाने पर उसको देखने के लिए समस्त परिवार को निमन्त्रण दिया गया। महल में एक तहखाना था। उसमें केवल एक द्वार था। जब दारा शाहजहाँ को और अपने भाइयों को तहखाने में ले जाने लगा तो औरंगजेब दरवाजे पर ही रुक गया और जब तक सब लोग तहखाने से वापस आये तब तक वहीं बैठा रहा। शाहजहाँ को अपने लड़के की इस चेष्टा पर बड़ा दुःख हुआ। उसने क्रोध को प्रकाशित करने के लिए सूबेदारी का काम और अन्य सब राजकीय अधिकार औरंगजेब से छीन लिये।

प्रायः ग्रन्थों में ऐसा लिखा जाता है कि यौवनावस्था में औरंगजेब की प्रवृति त्याग की ओर इतनी बढ़ गई थी कि उसने पिता से मक्के जाने की आज्ञा मांगी थी। इस जनश्रुति का मूल ऐसी ही किसी पटना में प्रतीत होता है ऐसे ही किसी अपमान के क्षण में औरंगजेब ने यह संकल्प प्रकट किया था कि इस अपमान से तो अच्छा है कि इस गुलाम को हज करने की इजाजत दी जाय। यह संकल्प-प्रेम के पाश में फैसे हुए पुरुष के निराश के क्षण में मरण-संकल्प के समान था।

औरंगजेब की महत्वाकांक्षा बचपन से बहुत बड़ी थी-यह पूरा रूप में उग्र थी, किसी रुकावट के कारण उसका मन्द हो जाना सम्भव था, पर मिट जाना असम्भव। पिता और पुत्र को इस मान-लोला का अन्त प्रेममयो साप्यो जहाँनारा के प्रयत्न से हुआ। जहाँनारा शाहजहाँ की सबसे अधिक प्यारी सन्तान थी। माँ (मुमताज महल) के मरने पर बाप के दय को इस स्नेहपूर्ण पत्नी ने संभाला था। उसने पिता को विश्वास दिलाया कि औरंगजेब का दारा के तहखाने में जाने से इन्कार करने का कारण यह था कि उसे दारा के हाथों छल द्वारा बादशाह के मारे जाने का भय था। वह दरवाजे पर पहरेदार बनकर बैठा हुआ था। विश्वास पुत्र को पितृ भक्ति की कल्पना ने चोदा यादशाह को प्रसन्न कर दिया और

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औरंगजेब फिर से सूबेदारी पर नियुक्त किया गया। दारा और औरंगजेब को प्रतिद्वंद्विता के कारण समस्त साम्राज्य में एक विशेष परिस्थिति पैदा हो गई प्रतिदन्दिता के असर से बचने के लिए शाहजहां ने जिस नीति का अवलम्बन किया उसका उन दोनों राजकुमारों के चरित्र पर भी गहरा असर पड़े बिना न रहा। सापाजके कर्मचारी और बादशाह के समर्थक दो हिस्सों में बंट गये दारा में धार्मिक विचार उदार थे, या जिनकी बादशाह में व्यक्तिगत गहरो भक्त थी, वह भी बड़े राजकुमार का ही समर्थन करते थे दारा की बादशाह के कानों तक पहुंची है, यह समझकर जो युवराज द्वारा अपनी कार्यसिद्धि करवाना चाहते थे, वह भी उसके स्वार्थी अनुयायी समझे जाते थे। दूसरी ओर ऐसे सब सरदार या उलेमा थे जो अन्धी इस्लामी भावना से प्रेरित थे, और जिनके सामने मुहम्मद गौरी, अलाउद्दीन खिलजी और तैमूर के कारनामे, आदर्श की तरह घूम रहे थे, वह दूसरे शाहजादे पर आशायें याँधे हुए थे।

जिन लोगों को दारा की बढ़ती देखकर ईष्ष्यां उत्पन्न होती थी, वह भी औरंगजेब की ओर झुकते थे इनके अतिरिक्त सरदारों का एक जत्था था, जिसे सालों में और युद्धों में औरंगजेब के नीचे कार्य करने का अवसर मिला था। औरंगजेब की प्रतिभा, निर्यात और कार्यकुशलता ने उन लोगों को अपने वश में कर लिया था। वह उस पर जी जान से फिदा होने को तैयार रहते थे।

दोनों राजकुमारों के चरित्र पर उस परिस्थिति का गहरा असर पड़ा। दारा शिकोह रेशमी गदेलों में पैदा हुआ, संगमरमर के फलों पर खेला, फूलों की सेज पर पला और लक्ष्मी को गोद में बड़ा हुआ। वह बादशाह के कृपा-पीयूष में स्नान करता था, चाटुकारों की मधुर स्तुतियों को सुनकर फूलता है और गद्दी पर बैठकर राजकाज की देखभाल करता था। वह कई सूबों का सूबेदार बनाया गया, परन्तु उसे कहीं जाना नहीं पड़ा। शासन का कार्य कारिन्दे करते थे, दारा तो उन सुबों की पुष्कल आय का उपभोग करता था युद्ध के मैदान में, कड़ी धूप और बर्फ में, उसे वैतरणी नदी को पार करने का अवसर नहीं मिला। केवल एक बड़ी मुहीम में, जो कन्दहार की तीसरी मुहिम कही जाती है, दारा को सेनापति बनाकर भेजा गया था, परन्तु वहाँ उसके साथ इतने सेनापति और वजीर थे कि उसे स्वयं कुछ भी नहीं करना पड़ा। युद्ध का परिणाम भी नाकामयाबी हुआ। इस प्रकार न तो प्रबन्ध के कार्य में और न रणक्षेत्र में युवराज को क्रियात्मक शिक्षण का अवसर मिला। वह सब शक्तियों को रखते हुए भी उनके प्रयोग में आने से आराम कुसी

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पर बैठने वाला राजनीतिज्ञ बन गया। इसके विपरीत औरंगजेब यद्यपि रेशमी गदेलों में उत्पन्न हुआ, और संगमरमर के फर्श पर खेला, परन्तु दक्षिण के कण्टकाकीर्ण सूबे के कड़े शासन में बड़ा हुआ, बलय और कन्दहार की कठोर या माटियों में गदा गया और बादशाह का सहारा न मिलने के कारण अपने पाँच पर खड़ा होने का अभ्यासी बन गया। उसकी प्रतिभा शासन की गहरी समस्याओं की आग में पड़कर उज्वल हो गई, और उसका साहस प्रबल शत्रु के साथ रणक्षेत्र में भिड़कर प्रचण्ड हो उठा। उसकी शक्तियाँ निरन्तर उपयोग से परिमार्जित और परिवर्धित हो गई औरंगजेब १७ वर्ष की आयु में बुन्देलखण्ड के युद्ध में प्रधान सेनापति बनाया गया। उसके बाद वह क्रमश दक्षिण गुजरात, मुल्तान तथा सिन्धु और फिर दक्षिण का सूबेदार नियुक्त हुआ।

यह बल्ब कन्दहार और दक्षिण के संग्रामों में प्रधान सेनापति के पद पर नियुक्त होकर कार्य करता रहा। यह जहाँ भी रहा, अपना स्वामी स्वयं बनकर रहा। जब यह सूबेदार यथा, तथा असल में ही सूबेदार बना, केवल लगानभोगी रईस नहीं। जब वह सेनापति पद पर नियुक्त किया गया तय सचमुच हो सेनापति बनकर रहा, केवल मिट्टी के माधो या मुहर लगाने की मशीन बनकर नहीं। परिणाम यह हुआ कि औरंगजेब को स्वाभाविक शक्तियां परीक्षा के जल से सींची जाकर निरन्तर बढ़ती और परिपुष्ट होती गई।

आयु में दूसरा परन्तु महत्त्व में तीसरा राजकुमार शुजा था। शुजा में दारा शिकोह के कई गुण थे यह शरीर से बलवान, दूरदर्शी और उदार था। पिता के आज्ञानुसार उसने बंगाल की सूबेदारों का कार्य लगभग २० वर्ष तक भली प्रकार चलाया। उसके समय में शस्य-श्यामला बंग भूमि शाही जाने के लिए रतालू बन गई थी प्रान्त में शान्ति राही। शाहजहाँ का उस पर विश्वास घा। जय कभी वह दक्षिण प्रान्त को आमदनी कम होने के कारण औरंगजेब से असन्तुष्ट होता, तथ प्रायः शुजा से उस प्रान्त की सूबेदारी स्वीकार करने के सम्बन्ध में पूछा करता था। इतने गुणों के होते हुए भी उसमें दो कमरे थो।

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प्रथम तो उसका शुकाय मुसलमानों के शैया पन्ध की ओर अधिक था, जिससे उस काल के अधिकांश मुसलमान असन्तुष्ट थे उस समय भारत के अधिकतर मुसलमान सुभी सम्प्रदाय के थे दूसरी कमी ये थी कि दीर्घकाल तक बंगाल के जल-बहुल सूखे में रहने और संग्राम की कठिनाइयों से दूर रहने के कारण उसका शरीर शिथिल हो गया था ४ वर्ष की आयु में शुजा बूढ़ा प्रतीत होता था। उसे शराब पीने की बुरी लत पड़ी हुई थी।

सबसे छोटा और निकम्मा भाई मुराद या मुराद की सुइयों में सूबेदार बनाकर भेजा गया और बला के युद्ध में प्रभान सेनापति पद के लिए भी नियुक्त किया गया, परन्तु किसी स्थान पर भी उसने नाम को उज्जवल न किया। यह नहीं कि उसमें कोई गुण था हो नहीं। यह खुली तबीयत का बहादुर नौजवान था। युद्ध में तलवार हाथ में ले शेर की तरह शत्रुओं पर टूट पड़ना उसका प्रधान गुण था। उस समय शआ की अधिक संख्या या अपनी दुर्बलता से नहीं डरा सकती थी। जिधर निकल पड़ता था उधर कम्पा देता चा परन्तु यह काम एक सिपाहो का है सेनापति का नहीं । यह सिपाही था। सेनापति या शासक नहीं।

फिर म-सेवा में तो वह शुजा को भी पीछे छोड दिया था। नासमझी और शराय दोनों वस्तुएं मिलकर समय-समय पर मनुष्य को हिंसक जन्न बना देती हैं मुराद भी क्रोध के समय घोर हिंसक जन्तु के रूप में परिणत हो जाता था। उसकी आयु यौवन में प्रवेश कर रही थी, परन्तु बचपन की यह दशा थी कि जब उसे बुला के जीतने के लिए सेनापति बनाकर भेजा गया, तो वहाँ पहुँचकर उसका जी उदास हो गया। उसने बादशाह को लिखा कि मेरा यहां जी नहीं लगता, इसलिए वापस लौटने की इजाजत दी जाय। शत्रु का देश, भयानक सर्दी, हजारों सिपाही पड़े हुए-ऐसी दशा में शत्रु के सामने सेनापति का जी उदास हो जाय, और वह घर वापस जाना चाहे तो उसे कौन सी आज्ञा देगा? बादशाह ने आज्ञा न दी। मुराद अपने बाल हठ पर जमा रहा।

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परिणाम यह हुआ कि प्रधान वजीर सादुल्ला खान को बन जाना पड़ा. जहाँ जाकर उसने राजकुमार को समझा-बुझाकर सेना के साथ रखने की चेष्टा की, परन्तु मुराद की समझ में कोई बात नहीं आई। अन्त को लाचार होकर सदु लाखों ने राजकुमार को सेनापति पद से अलग कर दिया। कुछ समय तक मुराद का दरबार में प्रवेश न हुआ।

यह चार भाई थे। इनकी दो बहनें थी। एक जहाँनारा और दूसरी रोशनारा। यह दोनों बहनें एक दूसरे का जवाब थीं-एक तरह से दारा शिकोह और औरंगजेब थीं। जहानारा का दूसरा नाम बादशाह बेगम था। जहानारा को भूमि पर स्वर्ग की अप्सरा करें तो अत्युक्ति न होगी। वह रूप में सुन्दर, प्रतिभा में उज्ज्वल और स्वभाव में देवी थी। उसकी सुन्दरता की ख्याति देश-विदेश में फैली हुई थी, बड़े-बड़े कवि और विद्वान् उसकी सेवा में आश्रय पाते थे, और वह स्वयं कविता करती थी। स्वभाव में तो उसे अमृतमयी कहना चाहिए। शान्ति और धोरता का एक नमूना थी। घर में जब कभी पानी प्रज्वलित होती तथ जहानारा हो जल-वृष्टि का कार्य करती और अगर पिता और पुत्र लढ़ पड़े हैं तो जहाँनारा मध्यस्थ बनती। यदि दारा और औरंगजेब का झगडा है तो बहिन उनमें जज बनाई जाती। पर की सीमाओं से बाहर भी उसकी उदारता और स्नेह का प्रभाव दिखाई देता था अनगिनत विधवाओं और अनाथों को उससे सहारा मिला था। यह कि वह अशान्त राज-परिवार में एक शान्ति का सोत थी।

शाहजहाँ के लिए तो वह स्नेहमयी माता थी, घर की स्वामिनी थी और प्रेममयो बेटी थी। शेष सब सन्तान को अपेक्षा वह इस योग्य थो भी। माता के मरने पर जहानारा ने अपने युद्ध पिता की गृहस्थी को सम्भाला। जब पुत्रों के परस्पर द्वेष के कारण शाहजहाँ का गदय दुःखी राशन ले तथा उसी ने पिता के घाव पर मरहम लगाने का कार्य किया। फिर जब बूढ़ा पिता विजयी पुत्र औरंगजेब को कैदी बना, तब उस टूटी ई कमर की लाठियां अगर कोई थी तो जहानारा थी। यद्यपि उसका विशेष प्रेम दारा शिकोह से था, तो भी वह सदा औरंगजेब को पिता के क्रोध से बचाने का यत्न करती, शाहजहाँ के क्रोधित हृदय पर ठण्डा जल छिड़कते होती।

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वह भारत के शहंशाह की लड़की थी। फलों के देर उसके चरणों में लोट रहे थे। वह चाहती तो कितनी ही अमीरी करती. परन्तु उस लक्ष्मी और संभोग के भवन में रहकर यदि जहाँनारा का नाम किसी गुण के लिए देश भर में विख्यात था तो वह उसकी सादगी थी उसकी सम्पत्ति दान के लिए और ऐश्वर्य का अधिकार त्याग करने के लिए था। जीवन में वह एक फकीर बनकर रही और मरते हुए भी अपना ऐसा स्मारक छोड़ गई, जिसकी अपेक्षा प्रभावशाली और हृदयद्रावक स्मारक कहीं मिलना कठिन है। दिल्ली में जाओ और कन्दहार से दक्षिण भारत तक के शहंशाह शाहजहाँ की उस लड़की का मजार देखो। जहाँ छोटे-छोटे जीवों के मकबरे अभिमान से आकाश में सिर उठाये खड़े हैं, वहाँ उस साध्वी के मजार पर घास खड़ी है, और उस घास के बीच में निम्नलिखित शेर लिखा हुआ है, जो मरने से पूर्व स्वयं जहानारा बनाकर रख गई थी

बगैर सब्जी पोशद कसे मज़ार मेरा

कि शब्जपोश शरीबान हमें गयाह बस अस्त।

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हमारे मजार पर हरे पास के सिवा कोई ढकना न होना चाहिए, क्योंकि गरीबों के लिए घास का आच्छादन ही सर्वोत्तम है। शाहजहाँ की दूसरी लड़की का नाम रोशनारा था। रोशनारा स्वभाव और आवृत्ति से औरंगजेब की ओर झुकती थी। वह हृदय की अनुदार और चालबाज थी। पिता का जहानारा से जो प्रेम था, उससे वह जलती थी। पर की और दरबार की गुप्त खबरें औरंगजेब तक उसी के द्वारा पहुँचती रहती थी। उससे जहाँ तक बन पड़ता था, दारा और औरंगजेब की

कलहाग्नि में घी की आहुतियाँ डालती रहती। यह थी शाहजहाँ की संतान। मानना पड़ेगा कि शाहजहाँ शेरों का पिता था। सब अपने अपने रंग में रंगे हुए थे गुणहोन कोई भी न था। दारा की उदार महान् भावना औरंगजेब की अदमनीय वीरता, शुजा को मधुर दूरदर्शिता और मुराद की प्रचण्ड निर्यात से अगर कोई व्यक्ति कार्य ले सकता, तो वह संसार के इतिहास में सफलता के अनूठे अध्याय लिख जाता। फिर शाहजहाँ के पास तो योग्य वीरों का भी अभाव ना था। परन्तु ललाट की रेखा को कौन मेट सकता है? शेरों का पिता संसार के इतिहास में सफलता के अध्याय लिखने के स्थान पर जो दुः दया और चेतना से भरा हुआ अध्याय लिख गया है, उसकी समাन मिलनी कठिन है।

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